पञ्चम सुमन · प्रकरण 55

गोमूत्र में गङ्गाका निवास

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511क्रि — ' गोमूत्रे विद्यते गंगा ' । तभी तो पापोंके विविध प्रायश्चित्तों में पाप दूर करनेकेलिए प्राचीन लोग गोमूत्र एवं गोबरका उपयोग करवाते थे, जैसे कि - मनुस्मृतिमें कृच्छ्रसान्तपन में कहा है- ' गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ' ( ११ २१२ ) इसमें पञ्चगव्यका उपयोग तथा उपवास पापशोधक कहा है । पापमें अशुद्धि पेटमें पहुँच जाती है । उपवास तथा पञ्चगव्यके उपयोगसे पेट खाली हो जाने से वह पाप मलद्वार द्वारा निकलकर शुद्धि हो जाती हैं ।

वैसे तो जहां पापका कारण पेट है, वहां रोगोंका कारण भी पेट है । गोमूत्रपानसे उदरकी स्वच्छता हो जानेके कारण वह रोग दूर हो जाता है, जिगर ( यकृत ) के बढ़ जानेपर शक्तिके अनुसार पांच तोले तक गोमूत्रको लवण मिलाकर पीनेसे यकृत् साम्यावस्थामें आ जाता है । तिल्ली बढ़ जानेपर भी इसी गोमूत्र के देने से लाभ होता है । जिगर और तिल्लीकी वृद्धिमें ऊपर गोमूत्रका ताप भी लाभकारक है । ईटको वा ढेलेको आगमें खूब तपाकर उसके ऊपर गोमूत्र डाल दीजिये । फिर गोमूत्रसे भीगे हुए कपड़ेमें उस ई'टके टुकड़े वा ढेलेको लपेटकर जिगर एवं तिल्लीके सेक करनेसे दो - तीन दिनों में जिगर तथा तिल्लीका बढ़ना हटकर समता आ जाएगी ।

शरीर में खुजली हो; तो कड़वे - जीरेको गोमूत्रमें पीसकर लेपनसे खुजली हट जाती है । सफेद - कुष्ठ भी गोमूत्र से हट जाता है । रातमें सोनेके समय ' बावची ' को गोमूत्र में पीसकर श्वेतकुष्ठ में 512गाढ़ - लेपसे, और प्रातः गोमूत्र द्वारा धोनेसे श्वेतकुष्ठ दूर होना शुरू हो जाता है । परन्तु यह औषधि बहुत दिन तक करनी पड़ती है । पेट बढ़ जानेपर गोमूत्र से ताप करना पड़ता है । जिगर और तिल्लीके बढ़ने से यदि कोई उदर - व्याधि पैदा हो जावे; तो पुनर्नवाके क्वाथमें आधा क्वाथ गोमूत्र मिलाकर पीने से उदर - रोग हट

है ।

जलोदर रोग में भी गोमूत्रका उपयोग सफलताप्रद सिद्ध होता है । उसमें आधा सेर गोमूत्र में मधु मिलाकर देनेसे और धा सेर दूध देने से एक महीने में ही रोगी स्वस्थ हो जाता है । फिर भी जब तक स्वास्थ्य न हो तब तक गोमूत्रका सेवन छोड़ना नहीं चाहिये । यदि ऐसा है, तो ऋषि - मुनियोंने प्रसूता - स्त्री आदिके लिए तथा मुसलमानादि अशुद्धोंका भोजन खा लेनेसे अशुद्ध हुकी शुद्धिके दूरीकरणार्थं जो कि पञ्चगव्य का उपयोग शुद्धयर्थ बताया है, इससे उनका भीतरी मल दूर हो जावे; तो आश्चर्यकी कोई बात नहीं । तो जो कि बृहत्पराशरस्मृति में लिखा है कि — ' प्रस्रावे ( गोमूत्रे ) जाह्नवीजलम् ' ( ५।३८ ) ' गोमूत्रे विद्यते गंगा ' इत्यादि; सो गंगाजलवाले सभी गुण होनेसे वह बात यथार्थ सिद्ध हुई ।

( ४७ ) गोबर में लक्ष्मीका निवास ।

महाभारतके अनुशासन - पर्वस्थ दानधर्मपर्व में लक्ष्मी

गौओंका वाक्य प्रसिद्ध है - ' अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यश- स्विनि! शकृन्मूत्रे वस त्वं भो! पुण्यमेतद्धि नः शुभे ' ( ८२।२४ )

In English

The Uses of Cow Urine and Dung

This text explains the ritual and medicinal uses of cow urine and dung for purification and healing. It describes how these substances can be used to treat liver and spleen enlargement, skin conditions like itching or white leprosy, and ascites.

This chapter answers

  • How to use cow urine for liver and spleen issues?
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  • Benefits of panchagavya for purification?
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Also written: Gomutra, Men, Gangaka, Nivasa, Gomutra Men Gangaka Nivasa, गोमूत्र में गङ्गाका निवास

मूल ग्रन्थ

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