पञ्चम सुमन · प्रकरण 54
पञ्चगव्य - गोमयगोमूत्र
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507चाहिये । फलतः पीपल आदि वृक्षोंका पूजन शास्त्रीय वा लौकिक दोनों दृष्टिकोणोंसे साधार ही है, निराधार नहीं ।
( ४५ ) पञ्चगव्य - गोमय गोमूत्र ।
चरणामृत में पञ्चामृतका उपयोग श्रीसत्यनारायण व्रतकथा में प्रसिद्ध है । उसमें दूध, दही, माखन, मधु, और खाँड इनका उपयोग होता है । लोग इस चरणामृतको प्रेमसे पीते हैं; पर अपनी शुद्धि - विशेषमें पचगव्यका पान भी आया है; उसमें मधु और खाँडकी जगह गोमुत्र तथा गोमयका उपयोग होता है । कई लोग इससे घबड़ाते हैं; वा नाक - भौंह सिकोड़ते हैं । इस अवसर पर वे हैदराबाद दक्षिणके ' रिजवी ' बन बैठते हैं कि - ये ' हिन्दु गायका पेशाव पीते हैं, गायकी टट्टी खाते हैं । पर उन्हें यह याद रखना चाहिए कि सब वस्तुएं सर्वत्र समान नहीं होतीं ।
हिन्दु जाति
- में गोमय एवं गोमुत्रका विशेष उपयोग होता है । कोई व्रत, वा प्रायश्चित्त, वा शुद्धि उसके बिना पूर्ण नहीं होती । प्रसूता हुई स्त्रीकी शुद्ध्यर्थ भी इसका प्रयोग होता है । उपाकर्म वाले दिन भी पचगव्यका उपयोग होता है । गाय इसीलिए तो सब प्राणियोंमें उत्तम मानी गई है कि - गाय से उत्पन्न सब वस्तुएँ पवित्र और पापशोधक हैं । उसका दूध मन और आत्माकेलिए विशेष उपयोगी है । इससे रोग दूर रहते हैं । उसकी दही हैज़ेमें, तथा टाइफाईड बुखारमें लाभदायक है । गायके घीसे बुद्धिकी वृद्धि, वीर्यकी वृद्धि, और आयुकी वृद्धि होती है । गायकी दहीकी छाछ विष, वमन, चर्बी, भगन्दर, प्रमेह, शूल, उदरके रोग; 508पीलिया, अजीर्ण आदिकी दवाई है । इसके प्रयोग से यौवन बहुत समय तक रहता है । इस प्रकार उसके माखन में भी पुष्टि आदि बहुतसे गुण हैं; इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण बाल्यावस्था में उसका बलात् छीनकर भी प्रयोग किया करते थे । बाल्यावस्था में उसके उपयोगसे शरीर यौवन के बाद तक भी बड़ी - बड़ी वक्तृताएँ करने तथा ग्रन्थ - प्रणयनादिसे होनेवाले परिश्रम से नहीं थकताः न ही उसका दिमाग विगड़ता है ।
गोबर से जमीनको इसलिए लीपते हैं कि बीमारी, विषदोष, कीटाणुका विकार तथा प्लेग आदि रोग नष्ट हो जावें । फिनाइलकी भांति इसमें भी दुर्गन्धनाशक शक्ति है । लीपनेसे न केवल वहाँकी भूमि; बल्कि वहाँकी वायु भी शुद्ध हो जाती है । इसका यही कारण है कि गोबर और गोमूत्रमें पोटास, सोडा, मैगनेशिया, शोरा, चूना, लोहभस्म, गन्धक, फासफोरस, एमोनिया आदि अनेक पदार्थोंके तत्त्व मिश्रित होते हैं; वे उड़कर वायुको शुद्ध करते हैं ।
इन पदार्थों में ' पोटाश ' विषहारक है, मलमूत्रको शुद्ध करता है, जठराग्निको प्रदीप्त करता है, उदर- रोग और शीतज्वरको दूर करता है । इस प्रकार सोडा अन्नको पचाता है, मलकी शुद्धि करता है, और कफ के विकारोंको दूर करता है । मैगनेशिया वात, पित्त, अम्ल, प्रमेह और रक्त - दोषोंको दूर करता है । शरीरको निर्बलता से बचाता है; क्योंकि मैगनेशिया अबरकका मूल तत्त्व है । चूने के गुण भी किसी से छिपे हुए नहीं । जिन बच्चोंकी माता मर जाती है, अथवा जीती हुई भी थोड़े स्तन्य वाली है, उनको गायका दूध 509दिया जाता है । उस दूधके गुरुत्व दूर करनेकेलिए, माता के दूध साम्यार्थ उसमें चूने का पानी मिलाया जाता है । चूने के पानी से मिले हुए दूध पीने से शिशुको अनपच सम्बन्धी विरेचन ( दस्त ) आदि दोष नहीं होता । "
गोबरमें लोहभस्म रहती है; वह वात, कफ, गुल्म, अ ( बवासीर ), उदर - रोग और रक्तदोषको दूर कर देता है । इ प्रकार गन्धक तथा वालुकाद्रव, फासफोरस, अमोनिया आदि पदार्थोंमें भी अनेक आश्चर्यकारक रोगनाशक दिव्यगुण भरे हुए हैं । गोमयके तत्त्वोंको पृथक् - पृथक् करनेपर यह पदार्थ यथायोग्य परिमाण में प्राप्त हो सकते हैं ।
गोवर में अन्न आदिके उत्पादन में भी विशेष शक्ति होती है । इसीलिए पृथिवीमें उसका खाद दिया जाता है । गोबरको शरीर में मलकर स्नान करनेसे खुजली हट जाती है । गोबरकी भस्म पात्रोंको पवित्र करती है, सर्दी हटाती है । इसलिए साधु लोग शरीर में उसका विशेष लेप करते हैं शीतलाके व्रण में गोबरकी भस्म लगाने से वह सूख जाता है । घीके साथ राख लगाने से व्रणकी चिकित्सा हो जाती है । गेहूँ में गोबरकी भस्म डालकर रखने से घुण नहीं लगता । इस प्रकारके गुणों वाले गोवरका महत्त्व वर्णित नहीं किया जा सकता । इसीलिए सनातनधर्मके माङ्गलिक हवनादि कार्यों में उसका उपयोग हुआ करता है ।
गोमूत्रकी महिमा भी कम नहीं है । शारीरिक भयङ्करतम भी रोगोंको अकेले गोमूत्रका उपयोग भी दूर कर सकता है । गोमूत्र 510उदर - रोगोंकेलिए तथा श्वास, प्रमेह, मधुमेह, अजीर्ण तथा जलोदर केलिए व्यर्थ औषध है । कुष्ठरोग और हृदयरोग इसके पानसे दूर हो जाता है । गर्म किये हुए गोमूत्रको कान में डालनेसे कानका बहना बन्द हो जाता है । गोमूत्र से आँखोंके धोनेसे उनकी ज्योति बुढ़ापे तक ठीक रहती है । रघुवंशमें रघुकी नन्दिनी- गाय के मूत्र से दिव्यदृष्टिकी प्राप्ति प्रसिद्ध है ही । काली गाय के मूत्रको १५ दिन तक पीनेसे गलेमें सुन्दर स्वर उत्पन्न होता है । पेटके कीड़े गोमूत्र के पीनेसे मर जाते हैं । इसीलिए प्रसूता - स्त्रीको उसका पान कराया
है ।
गोमूत्र वैद्योंकेलिए टानिक दवाई सिद्ध हो सकती है, यदि वे इसका उपयोग करें । इसीलिए हिन्दुओंके सभी व्रत - उपवास आदिमें गोवर - गोमूत्र से मिला हुआ गौओंका दूध, घी और दही पञ्चगव्य रूपमें प्रयुक्त होता है ।
( ४६ ) गोमूत्र में गंगाका निवास ।
सनातनधर्मी - संसारमें यह प्रसिद्ध है कि गोमूत्र में गंगा रहा करती है - ' गोमूत्रे विद्यते गंगा ' उसमें आजकल के व्यक्ति विप्रति- पत्तियाँ उठाते हैं । उसमें रहस्य यह है कि जब डा ० है केन्सिनने गंगाजलकी परीक्षा की; तब उसे पता लगा कि - गंगाजल हैजाके कीटाणुओं को दूर करता है, और उदर रोगोंको नष्ट करता है, और स्वास्थ्य बढ़ाता है - इत्यादि । गोमूत्र में भी वे ही गुण दीखते हैं । वैद्य लोग ओषधि रूपमें गोमूत्र को देकर विविध • व्याधियोंको तथा उदरके रोगोंको दूर करते हैं; तब यह ठीक हुआ
In English
The Importance of Panchagavya
This chapter explains the ritual and medicinal importance of products derived from the cow, specifically panthagavya. It argues that cow dung and urine possess purifying properties and specific chemical elements that treat various physical ailments and purify the environment.
This chapter answers
- What is panchagavya?
- Medicinal benefits of cow urine?
- Uses of cow dung in rituals and health?
- Why is cow products used for purification?
- Nutritional value of cow milk ghee and curd?
Also written: Panchagavya, Gomayagomutra, Panchagavya Gomayagomutra, पञ्चगव्य - गोमयगोमूत्र