सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 531–540
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 531–540
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वृक्षोंकी चेतनता २०३ जिनसे वृक्षोंके सुख - दुःखका अनुभव प्रत्यक्ष होता था । पर यूरोपके वैज्ञानिकोंने इस पर विश्वास न किया; क्योंकि वे वृक्षोंको जड़ मानते थे । पर वसु - महोदयने सिद्ध किया कि जैसे प्रिय और अप्रिय बातोंका मनुष्यके हृदयपर प्रभाव पड़ता है; वैसे वृक्षोंपर भी । जैसे विष मनुष्यों केलिए घातक है; वैसे ही वृक्षोंकेलिए भी । इस यन्त्रका नाम ' रसोनेण्ट रिकार्डर ' उन्होंने रखा । विदेशी वैज्ञानिक हैरान होते थे कि — ऐसा यन्त्र भारतमें कैसे बन सका? १ ९ २१ में उन्होंने ' क्रसकोग्राफ ' यन्त्र बनाया । यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुओंको दिखलाता था । १६२६ में एक यन्त्र बनाया, जिससे स्पष्ट दीखता था कि — वृक्ष प्रतिक्षण कैसे बढ़ रहे हैं? इस यन्त्रसे पता चलता था कि — कोई पुरुष वृक्षपर अपनी सांस भी डाले; तो वृक्ष की कितनी हानि होती है । फिर वसु - महोदयने वृक्ष तथा अन्य जीवोंकी स्नायुकक्रिया दिखलाई । एक मेंडकको पकड़कर उसकी कमरमें बिजलीकी तरङ्ग डाली, इससे उसका दाहना पांव हिल उठा; विपरीत - तरंग देनेमें बायां पाँव । यही क्रिया उन्होंने लाजवन्ती ( शर्मं- बूटी ) के दो पत्तोंपर दिखलाई । इससे उन्होंने यह सिद्ध किया कि - जीवों और वृक्षोंका स्नायु-संघटन समान है । वृक्षोंमें खादका रस कैसे पहुँचता है— इस सम्बन्धमें लोगोंका विचार था कि — पत्तोंका रस भाफ बनता है; और पत्ते उसे चूस लेते हैं; पर वसु- महाशयने उसे गलत बताया । मरे हुए - से पत्तेपर उन्होंने एक गहरा लेप किया, जिससे रस भाफ बनकर उड़ न
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३०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) · सके । उसमें एक उत्तेजक - रस डालकर उन्होंने पत्तोंको हरा कर दिया । इसप्रकार सजीव पत्तेपर विष डालकर उसे मृत कर दिया । फिर जब उसपर उत्तेजक रस डाला; तो वह पत्ता फिर हरा हो गया । फिर उन्होंने एक और क्रिया दिखलाई कि- जैसे प्राणियोंका • हृदय स्पन्दित होता है, वैसे वृक्षोंका भी । इतना ही नहीं; वल्कि यह भी दिखलाया कि - जैसे दवाई देने से मनुष्यका लाभ होता है; वैसे वृक्षोंका भी । यह भी उन्होंने दिखलाया कि कई वृक्ष संजीवनी - शक्तिका संचार भी करते हैं । एक मेंडककी हृदयकी गति रुक गई । उसमें उक्त वृक्षके रसके इन्जैक्शन से वह फिर जी उठा । उनमें अपने इस आविष्कारपर पूर्ण विश्वास भी था । एक बार वे पैरिसमें विज्ञान परिषद् के आगे अपना प्रयोग दिखा रहे थे कि — भयंकर ‘ पोटेशियम सायनाड् ' नामक विष वृक्षको भी वैसे मार डालेगा, जैसे मनुष्योंको । उक्त विष वहांके एक रासायनिक-द्रव्य - विक्रेतासे मंगाया गया । उसने एक भारतीय के अपमान के लिए वैसे रंग वाली खाँड दे दी । जब उन्होंने वह श्वेत चूर्ण पौधे पर डाला, तब उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । वैज्ञानिक लोग व्यंग्यपूर्ण -हँसी - हँसने लगे । पर इससे श्रीवसु विचलित नहीं हुए । उन्होंने उस कल्पित - विषको खाते हुए कहा कि यदि इस ' विष'का प्रभाव इस पौधेपर नहीं पड़ा; तो मुझपर भी नहीं पड़ेगा । उन्होंने उसे बिना सोचे - विचारे फाँक लिया । उन्हें कुछ भी नहीं हुआ । तब उन्होंने
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वृक्षोंकी चेतनता ५०५ कहा कि- — एक भारतीयके अपमानकेलिए ऐसा किया गया है । तब असली विष मंगाकर उन्होंने उसके इन्जैक्शनसे वृक्षको ' मृत ' कर दिया, फिर संजीवन - रसके इन्जैक्शनसे उसे फिरसे ' जीवित ' कर दिया । आज लोग पूछते हैं कि - वसु - महोदय के इतने जटिल परिश्रम से प्रसूत इस आविष्कारका क्या लाभ मिला? इस पर जानना चाहिये कि जो लोग पहले वृक्षोंको जड़ मानते थे, उनके मुंह पर थप्पड़ लगा — एक तो इसका यह लाभ हुआ । हमारे पूर्वजोंकी भी विज्ञान में अबाध गति थी - यह जतलाना - यह दूसरा लाभ हुआ । जो वृक्षोंको जड़ मानकर उनके पूजकों पर उपहास करते थे; उनकी चुप्पी - यह तीसरा लाभ है । शेष लाभ आगे होंगे । माताके गर्भसे पैदा हुआ बच्चा पण्डित नहीं बन जाता । जब पहले - पहले रेलवे- इञ्जन बना था; तो लोग कहते थे कि यह पटरी परसे . गिरेगा - बहुत सी हानियाँ पहुँचावेगा; पर अब उस रेलगाड़ीके लाभ प्रत्यक्ष हैं । कई लोग यह मानते हैं कि इस आविष्कार से भविष्य में कृषिमें बहुत बड़ी सहायता मिलनेकी आशा है । जो लोग यज्ञों में पशु - हिंसा देखकर उससे घृणा करते थे, उसमें बलात् वृक्षों वा ओषधियोंका अर्थ करते थे, उन्हें उचित है कि वृक्षके पत्ते एवं पुष्प आदिका उपयोग करके भी हिंसक न बनें । इसलिए महाभारत में कहा है- ' नहि पश्यामि जीवन्तं लोके कञ्चिद् अहिंसया । . सत्त्वैः सत्त्वा हि जीवन्ति दुर्बलैर्बलवत्तराः । विना वधं न कुर्वन्ति
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५०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तापसाः प्राणयापनम् ' ( १५/२४ ) उदके वहवः प्राणाः पृथिव्यां च फलेषु च । न च कश्चिन्न तान् हन्ति किमन्यत् प्राणयापनात् ' ( २५ ) भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीन् अण्डजान् पशून् । मनुष्यास्तन्वते यज्ञान् ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च । ( १५।२८ ) । पर देवकार्य - हवन एवं देव - मूर्तिपूजाकेलिए वृक्षादियोंका उपयोग तथा जन्मान्तरसें उनकी सद्गति शास्त्रकार भी मानते हैं । जैसे कि मनुजीने कहा है — ' प्रोषध्यः पशवो वृक्षाः • यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युत्स्मृतीः ( जात्युत्कर्षं ) पुनः ' ( ५४० ) यहाँ ओषधि तथा वृक्षोंका यज्ञार्थ निधन ( मारना ) कहकर, उनका अन्य जन्म उत्तम बताकर वृक्षोंको चेतन सिद्ध कर दिया है; तब उनकी पूजा जड़पूजा सिद्ध न होकर चेतन - पूजा सिद्ध हुई; और देव - पूजनके लिए उनका उपयोग करके फिर उनके भागोंका अपने उपयोग में लाना भी पाप सिद्ध न हुआ । हाँ, बाहरी दृष्टिसे यह मी हिंसा ही है; पर मनुष्य स्वार्थी है । यह जैसे अपनी रक्षार्थ कीटाणुओं की हिंसा करता है, मनुष्य - भक्षक शेर - बाघ आदिको मरवाता है; खेत में हानि पहुँचानेवाले जीवोंको मरवाता है । घरमें तकलीफ देनेवाले दीमक, जू आदिकी हिंसा करके भी अपने - आप को पापी नहीं समझता; वैसे इधर भी समझ लेना चाहिये । पर इससे हम हिंसावाले यज्ञोंका समर्थन नहीं कर रहे, वे तो कलियुग में वर्जित हैं; हम क्यों उन्हें करनेकेलिए प्रोत्साहन देंगे? पर यह कहते हैं कि - शास्त्रोंमें जो ऐसे वर्णन आते हैं, उसमें ऋषि-मुनियोंका अपमान नहीं करना चाहिये; वस्तुस्थिति समझनी
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पञ्चगव्य - गोमयगोमूत्र ५०७ चाहिये । फलतः पीपल आदि वृक्षोंका पूजन शास्त्रीय वा लौकिक दोनों दृष्टिकोणोंसे साधार ही है, निराधार नहीं । ( ४५ ) पञ्चगव्य - गोमय गोमूत्र । चरणामृत में पञ्चामृतका उपयोग श्रीसत्यनारायण व्रतकथा में प्रसिद्ध है । उसमें दूध, दही, माखन, मधु, और खाँड इनका उपयोग होता है । लोग इस चरणामृतको प्रेमसे पीते हैं; पर अपनी शुद्धि - विशेषमें पचगव्यका पान भी आया है; उसमें मधु और खाँडकी जगह गोमुत्र तथा गोमयका उपयोग होता है । कई लोग इससे घबड़ाते हैं; वा नाक - भौंह सिकोड़ते हैं । इस अवसर पर वे हैदराबाद दक्षिणके ' रिजवी ' बन बैठते हैं कि - ये ' हिन्दु गायका पेशाव पीते हैं, गायकी टट्टी खाते हैं । पर उन्हें यह याद रखना चाहिए कि सब वस्तुएं सर्वत्र समान नहीं होतीं । हिन्दु जाति - में गोमय एवं गोमुत्रका विशेष उपयोग होता है । कोई व्रत, वा प्रायश्चित्त, वा शुद्धि उसके बिना पूर्ण नहीं होती । प्रसूता हुई स्त्रीकी शुद्ध्यर्थ भी इसका प्रयोग होता है । उपाकर्म वाले दिन भी पचगव्यका उपयोग होता है । गाय इसीलिए तो सब प्राणियोंमें उत्तम मानी गई है कि - गाय से उत्पन्न सब वस्तुएँ पवित्र और पापशोधक हैं । उसका दूध मन और आत्माकेलिए विशेष उपयोगी है । इससे रोग दूर रहते हैं । उसकी दही हैज़ेमें, तथा टाइफाईड बुखारमें लाभदायक है । गायके घीसे बुद्धिकी वृद्धि, वीर्यकी वृद्धि, और आयुकी वृद्धि होती है । गायकी दहीकी छाछ विष, वमन, चर्बी, भगन्दर, प्रमेह, शूल, उदरके रोग;
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५०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पीलिया, अजीर्ण आदिकी दवाई है । इसके प्रयोग से यौवन बहुत समय तक रहता है । इस प्रकार उसके माखन में भी पुष्टि आदि बहुतसे गुण हैं; इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण बाल्यावस्था में उसका बलात् छीनकर भी प्रयोग किया करते थे । बाल्यावस्था में उसके उपयोगसे शरीर यौवन के बाद तक भी बड़ी - बड़ी वक्तृताएँ करने तथा ग्रन्थ - प्रणयनादिसे होनेवाले परिश्रम से नहीं थकताः न ही उसका दिमाग विगड़ता है । गोबर से जमीनको इसलिए लीपते हैं कि बीमारी, विषदोष, कीटाणुका विकार तथा प्लेग आदि रोग नष्ट हो जावें । फिनाइलकी भांति इसमें भी दुर्गन्धनाशक शक्ति है । लीपनेसे न केवल वहाँकी भूमि; बल्कि वहाँकी वायु भी शुद्ध हो जाती है । इसका यही कारण है कि गोबर और गोमूत्रमें पोटास, सोडा, मैगनेशिया, शोरा, चूना, लोहभस्म, गन्धक, फासफोरस, एमोनिया आदि अनेक पदार्थोंके तत्त्व मिश्रित होते हैं; वे उड़कर वायुको शुद्ध करते हैं । इन पदार्थों में ' पोटाश ' विषहारक है, मलमूत्रको शुद्ध करता है, जठराग्निको प्रदीप्त करता है, उदर- रोग और शीतज्वरको दूर करता है । इस प्रकार सोडा अन्नको पचाता है, मलकी शुद्धि करता है, और कफ के विकारोंको दूर करता है । मैगनेशिया वात, पित्त, अम्ल, प्रमेह और रक्त - दोषोंको दूर करता है । शरीरको निर्बलता से बचाता है; क्योंकि मैगनेशिया अबरकका मूल तत्त्व है । चूने के गुण भी किसी से छिपे हुए नहीं । जिन बच्चोंकी माता मर जाती है, अथवा जीती हुई भी थोड़े स्तन्य वाली है, उनको गायका दूध
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पञ्चगव्य - गोमयगोमूत्र २०६ दिया जाता है । उस दूधके गुरुत्व दूर करनेकेलिए, माता के दूध साम्यार्थ उसमें चूने का पानी मिलाया जाता है । चूने के पानी से मिले हुए दूध पीने से शिशुको अनपच सम्बन्धी विरेचन ( दस्त ) आदि दोष नहीं होता । " गोबरमें लोहभस्म रहती है; वह वात, कफ, गुल्म, अ ( बवासीर ), उदर - रोग और रक्तदोषको दूर कर देता है । इ प्रकार गन्धक तथा वालुकाद्रव, फासफोरस, अमोनिया आदि पदार्थोंमें भी अनेक आश्चर्यकारक रोगनाशक दिव्यगुण भरे हुए हैं । गोमयके तत्त्वोंको पृथक् - पृथक् करनेपर यह पदार्थ यथायोग्य परिमाण में प्राप्त हो सकते हैं । गोवर में अन्न आदिके उत्पादन में भी विशेष शक्ति होती है । इसीलिए पृथिवीमें उसका खाद दिया जाता है । गोबरको शरीर में मलकर स्नान करनेसे खुजली हट जाती है । गोबरकी भस्म पात्रोंको पवित्र करती है, सर्दी हटाती है । इसलिए साधु लोग शरीर में उसका विशेष लेप करते हैं शीतलाके व्रण में गोबरकी भस्म लगाने से वह सूख जाता है । घीके साथ राख लगाने से व्रणकी चिकित्सा हो जाती है । गेहूँ में गोबरकी भस्म डालकर रखने से घुण नहीं लगता । इस प्रकारके गुणों वाले गोवरका महत्त्व वर्णित नहीं किया जा सकता । इसीलिए सनातनधर्मके माङ्गलिक हवनादि कार्यों में उसका उपयोग हुआ करता है । गोमूत्रकी महिमा भी कम नहीं है । शारीरिक भयङ्करतम भी रोगोंको अकेले गोमूत्रका उपयोग भी दूर कर सकता है । गोमूत्र
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११० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उदर - रोगोंकेलिए तथा श्वास, प्रमेह, मधुमेह, अजीर्ण तथा जलोदर केलिए व्यर्थ औषध है । कुष्ठरोग और हृदयरोग इसके पानसे दूर हो जाता है । गर्म किये हुए गोमूत्रको कान में डालनेसे कानका बहना बन्द हो जाता है । गोमूत्र से आँखोंके धोनेसे उनकी ज्योति बुढ़ापे तक ठीक रहती है । रघुवंशमें रघुकी नन्दिनी- गाय के मूत्र से दिव्यदृष्टिकी प्राप्ति प्रसिद्ध है ही । काली गाय के मूत्रको १५ दिन तक पीनेसे गलेमें सुन्दर स्वर उत्पन्न होता है । पेटके कीड़े गोमूत्र के पीनेसे मर जाते हैं । इसीलिए प्रसूता - स्त्रीको उसका पान कराया है । गोमूत्र वैद्योंकेलिए टानिक दवाई सिद्ध हो सकती है, यदि वे इसका उपयोग करें । इसीलिए हिन्दुओंके सभी व्रत - उपवास आदिमें गोवर - गोमूत्र से मिला हुआ गौओंका दूध, घी और दही पञ्चगव्य रूपमें प्रयुक्त होता है । ( ४६ ) गोमूत्र में गंगाका निवास । सनातनधर्मी - संसारमें यह प्रसिद्ध है कि गोमूत्र में गंगा रहा करती है - ' गोमूत्रे विद्यते गंगा ' उसमें आजकल के व्यक्ति विप्रति-पत्तियाँ उठाते हैं । उसमें रहस्य यह है कि जब डा ० है केन्सिनने गंगाजलकी परीक्षा की; तब उसे पता लगा कि - गंगाजल हैजाके कीटाणुओं को दूर करता है, और उदर रोगोंको नष्ट करता है, और स्वास्थ्य बढ़ाता है - इत्यादि । गोमूत्र में भी वे ही गुण दीखते हैं । वैद्य लोग ओषधि रूपमें गोमूत्र को देकर विविध • व्याधियोंको तथा उदरके रोगोंको दूर करते हैं; तब यह ठीक हुआ
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गोमूत्र गङ्गाका निवास २११ क्रि — ' गोमूत्रे विद्यते गंगा ' । तभी तो पापोंके विविध प्रायश्चित्तों में पाप दूर करनेकेलिए प्राचीन लोग गोमूत्र एवं गोबरका उपयोग करवाते थे, जैसे कि - मनुस्मृतिमें कृच्छ्रसान्तपन में कहा है-' गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ' ( ११ २१२ ) इसमें पञ्चगव्यका उपयोग तथा उपवास पापशोधक कहा है । पापमें अशुद्धि पेटमें पहुँच जाती है । उपवास तथा पञ्चगव्यके उपयोगसे पेट खाली हो जाने से वह पाप मलद्वार द्वारा निकलकर शुद्धि हो जाती हैं । वैसे तो जहां पापका कारण पेट है, वहां रोगोंका कारण भी पेट है । गोमूत्रपानसे उदरकी स्वच्छता हो जानेके कारण वह रोग दूर हो जाता है, जिगर ( यकृत ) के बढ़ जानेपर शक्तिके अनुसार पांच तोले तक गोमूत्रको लवण मिलाकर पीनेसे यकृत् साम्यावस्थामें आ जाता है । तिल्ली बढ़ जानेपर भी इसी गोमूत्र के देने से लाभ होता है । जिगर और तिल्लीकी वृद्धिमें ऊपर गोमूत्रका ताप भी लाभकारक है । ईटको वा ढेलेको आगमें खूब तपाकर उसके ऊपर गोमूत्र डाल दीजिये । फिर गोमूत्रसे भीगे हुए कपड़ेमें उस ई'टके टुकड़े वा ढेलेको लपेटकर जिगर एवं तिल्लीके सेक करनेसे दो - तीन दिनों में जिगर तथा तिल्लीका बढ़ना हटकर समता आ जाएगी । शरीर में खुजली हो; तो कड़वे - जीरेको गोमूत्रमें पीसकर लेपनसे खुजली हट जाती है । सफेद - कुष्ठ भी गोमूत्र से हट जाता है । रातमें सोनेके समय ' बावची ' को गोमूत्र में पीसकर श्वेतकुष्ठ में
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५१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गाढ़ - लेपसे, और प्रातः गोमूत्र द्वारा धोनेसे श्वेतकुष्ठ दूर होना शुरू हो जाता है । परन्तु यह औषधि बहुत दिन तक करनी पड़ती है । पेट बढ़ जानेपर गोमूत्र से ताप करना पड़ता है । जिगर और तिल्लीके बढ़ने से यदि कोई उदर - व्याधि पैदा हो जावे; तो पुनर्नवाके क्वाथमें आधा क्वाथ गोमूत्र मिलाकर पीने से उदर - रोग हट है । जलोदर रोग में भी गोमूत्रका उपयोग सफलताप्रद सिद्ध होता है । उसमें आधा सेर गोमूत्र में मधु मिलाकर देनेसे और धा सेर दूध देने से एक महीने में ही रोगी स्वस्थ हो जाता है । फिर भी जब तक स्वास्थ्य न हो तब तक गोमूत्रका सेवन छोड़ना नहीं चाहिये । यदि ऐसा है, तो ऋषि - मुनियोंने प्रसूता - स्त्री आदिके लिए तथा मुसलमानादि अशुद्धोंका भोजन खा लेनेसे अशुद्ध हुकी शुद्धिके दूरीकरणार्थं जो कि पञ्चगव्य का उपयोग शुद्धयर्थ बताया है, इससे उनका भीतरी मल दूर हो जावे; तो आश्चर्यकी कोई बात नहीं । तो जो कि बृहत्पराशरस्मृति में लिखा है कि — ' प्रस्रावे ( गोमूत्रे ) जाह्नवीजलम् ' ( ५।३८ ) ' गोमूत्रे विद्यते गंगा ' इत्यादि; सो गंगाजलवाले सभी गुण होनेसे वह बात यथार्थ सिद्ध हुई । ( ४७ ) गोबर में लक्ष्मीका निवास । महाभारतके अनुशासन - पर्वस्थ दानधर्मपर्व में लक्ष्मी गौओंका वाक्य प्रसिद्ध है - ' अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यश-स्विनि! शकृन्मूत्रे वस त्वं भो! पुण्यमेतद्धि नः शुभे ' ( ८२।२४ )