सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 881–890
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 881–890
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र I ? का के शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायको स्थापक ८५३ शिवरात्रिके दिन प्रभु - विश्वनाथके घर महोत्सव होता है । देश - विदेशमें इस दिन बड़ा समारोह होता है । यह भी प्रसिद्ध है कि— चूहा श्रीमहादेवके लड़के श्रीगणेशका वाहन है । इस महोत्सबके दिन गणेशवाहनके जातभाई चूहेने कुछ मांगा हो, वा प्रसन्नता से महादेवकी मूर्त्तिसे कुछ उतार लिया हो, तो यह तो उसका अधिकार था । तव इस अवसर पर महादेव उसे कैसे लौटाते? दाता थे प्रभु महादेवः लेनेवाला था - भृत्य चूहा । उन दोनोंके बीच दयानन्द ' दाल - भात में मूसलचन्द ' क्यों बनने गये १ क्या दयारामकी बाल्यकालिकता तो कारण नहीं थी? मेघदूतमें लिखा है- ' ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बईं भवानी, पुत्रप्रेम्णा कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति । धौतापाङ्ग हरशशिरुचा पावके: ( कार्तिकेयस्य ) तं मयूरं, पश्चाद् अद्रिग्रहण-गुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ' ( पूर्वमेघ ४४ ) कविकुलगुरु- कालिदासके वाक्यमें सूचित किया है कि- हे बादल! पार्वती अपने पुत्र कार्तिकेयके वाहन मोरके पंखको अपने कानमें लगाती है कि— यह पंख मेरे पुत्रके वाहन मोरका है । इस प्रकार यदि पुत्रके नी वाहनका वात्सल्य होता है, तो महादेव अपने पुत्र -गजाननके वाहन मूषकको ही अपने विवाहके उत्सवमें क्यों रोकते? हा! स्वामीजी! पुत्र - रहित आपको प्रजाके वात्सल्य रसका क्या पता? से ब ( १६ ) मनुस्मृति आदि जितने भी धर्मशास्त्र बने हुए हैं, जो नी * चूहेके गणेशवाहन होनेमें ' गणेशचतुर्थी ' निबंध वा ' श्रीगणेशका. मङ्गलाचरण ' आरम्भिक निबन्ध देखें ।
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कर्त्तव्य - कर्मोंकी कर्त्तव्यता तथा दुष्कर्मोंमें दण्डविधान बताते हैं, वा प्रायश्चित्त अनुशिष्ट करते हैं, वह सब मनुष्यों के लिए हैं, पशुओंके लिए नहीं । जन्मसे प्रारम्भ करके अग्निकी लपटोंमें भस्म होनेतक जितना धर्म - कर्म नियमित है, वह सब मनुष्य के लिए - है । मनुष्यके ही मुण्डन, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, विवाह आदि संस्कार यथाविधि हुआ करते हैं; परन्तु घोड़ा, ऊँट, चूहा बिलाव आदि पशुओंका शिरोमुण्डन, यज्ञोपवीत, गुरुकुलगमन आर्य-समाजी पण्डित भी नहीं कराते होंगे । न ही उनके लिए कोई ' संस्कार - विधि ' ही बनी हुई है । न ही उनकेलिए ऐसा व्यवहार उचित है; क्योंकि — वे खाना - पीना, सोना, आदिके अतिरिक्त इतना ज्ञान नहीं रखते कि — वे मनुष्य - नियमित धर्मबन्धनमें पढ़ें । मनुष्यों में यदि कोई माता वा बहिन आदि से अनुचित - सम्बन्ध करे; तो उसे महापतित समझा जाता है; परन्तु पशुओं में ऐसा बन्धन नहीं । वे प्रायः यथेष्टरूपसे इन सबमें सन्तान उत्पन्न कर लेते हैं; पर उन्हें कोई नीच नहीं कहता; इससे उन्हें कोई पाप भी नहीं माना जाता । मनुष्य कर्मयोनि होता है, वह जो कुछ भी करता है; उसे उसका फल भोगना पड़ता है । पशु भोगयोनि में गिना जाता है । वह जो कुछ भी इस शरीर से करता है, बिना विशेष कारण उसका फल उन्हें आगे के जन्ममें नहीं मिलता । वह तो पूर्वजन्म के कर्मफलको भोगनेकेलिए ही केवल उत्पन्न हुआ है । यदि उसे इस पशुजन्मके कर्मका फल भी अग्रिम जन्म में भोगना पड़े; तब तो उसका पशुयोनिसे पिण्ड ही न छूटे । इसी कारण ही
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व र क य ना र प श्री में ना El ना ही शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक = १५ पशु जाति - धार्मिक दण्डों से मुक्त मानी जाती है । शास्त्रों में कहा है- ' आहारनिद्राभयमैथुनानि सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो, धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ' अर्थात् खाना, सोना, डरना और मैथुन करना, यह वातें तो जैसे पशुओं में होती है; वैसे मनुष्यों में भी । मनुष्यों में केवल धर्मकी विशेषता है । जिन मनुष्यों में धर्म नहीं है; वे पशुके समान होते हैं । अब पाठकगण जरा विचार करें कि— जिस मनुष्य में धर्म नहीं होता; उसे यदि पशुके समान माना जाता है; तो जो साक्षात पशु हो; उसकेलिए धर्म - बन्धन डालना तो अपने आपको पशु बनाना है । तब यह चूहा भी तो पशु ही था; तब इसके लिए धार्मिक बन्धन भला कैसे हो सकता है? चूहों के लिए कहीं न तो सन्ध्या - वन्दन लिखा है; न ही उनके लिए गुरुकुल कहीं खोले गये हैं; तब श्रीमहादेव उसे दण्ड क्यों देते? बालक दयानन्द अपने विज्ञानको स्वयं ही समझें । ( १७ ) काम किया किसी दूसरेने; और नाम हुआ किसी दूसरे का । भूल में पड़ा तो बालक दयानन्द; पर अपराधी माना गया चूहा | बालक दयानन्दकी थोड़ी - सी उपासना से आशुतोष इतने शीघ्र प्रसन्न हुए कि उन्होंने दयानन्दकी मन द्वारा की हुई चूहेपर नालिश सुनी और उन्होंने चूहेको दण्ड विधान कर दिया । चूहेको उसके बादसे प्लेग शुरू हो गई । स्वामी दयानन्दजीका चूहा भी दक्षिण - पश्चिम दिशा से निकला । प्लेग भी दक्षिण दिशाके ही बम्बईके चूहे पर पहले - पहल शुरू हुई । प्राचीन धार्मिक रीति - रिवाजोंपर प्लेग
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• ६५६ श्रीसनातनधर्माखोक ( ५ ) ( आ.सा. ) भी पहले दक्षिण से - बम्बई से शुरू हुआ । पर प्लेगका चूहा स्वयं भी बीमार होता है, कष्ट पाता है; मरता है, उसके संगसे दूसरे भी अपना जीवन खोते हैं; परन्तु शिवरात्रिका चूहा तो स्वामी दयानन्द को धर्मका रोगी बनाकर स्वयं भाग निकला । पर एक सम्प्रदायके स्थापनाका श्रेय अपने सिरपर लेकर निकल गया । छअब एक - दो बातें कहकर ही इस निबन्धको समाप्त किया जाता है । उसमें पहली बात यह है कि जब कभी आर्यसमाजियोंसे बातचीत होती है; तो वे कहते हैं कि - ' स्वामी दयानन्दजीने वेदों में मूर्त्तिपूजा न देखकर उसका खण्डन किया ' । परन्तु यह उनका भ्रम ही है । वस्तुतः यदि देखा जावे; तो चूहे के कारण ही उन्हें ऐसा करना पड़ा । वेदोंका उस समय उस बालकको ज्ञान नहीं था । घर से निकलकर बहुत समय भटककर तब श्रीकृष्णशास्त्री आदि से . उसने वेदका ज्ञान प्राप्त किया, और स्वामी विरजानन्दजीसे व्याकरणका । फिर वेदमन्त्रोंका अर्जुन -विमर्दन करके उनके अर्थ बदले । इस प्रकार पाठकोंने जान लिया होगा कि स्वामी दयानन्दजीकी इस चूहेवाली बाल्यलीला में कुछ भी तत्त्व नहीं; केवल आपाततो-दर्शी लोग कुछ संशय में पड़ जावें - यह सम्भव है; पर मूर्तिपूजा के महत्त्वपर इसका प्रभाव नहीं पड़ा । प्रतिवर्ष हजारों देवमन्दिर भारतमें नये बनते चले जा रहे हैं । केवल भारत में ही नहीं; अब तो अफ्रीका, अमेरिका एवं लण्डन आदि में भी अनेक मन्दिर बन चुके हैं । स्वामी दयानन्द के समय जितना मूर्त्तिपूजन था; अब
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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ६५७ उसकी अपेक्षा भी अधिक मात्रा में मिलता है । अब तो आर्यसमाजी अन्त्यजोंके मन्दिर - प्रवेश में आग्रह करते हैं और इस विषय में शास्त्रार्थ भी करते हैं । आर्यसमाजियोंमें उच्च - लोग देवमूर्तिका आदर करना भी मानने लग गये है, और दूसरोंके विश्वासका आदर भी वे करना चाहते हैं । तब इस विषय में व्यर्थ ही विवादोंको न बढ़ाकर इस-प्रकारके कार्यो में लग जाना चाहिये कि जिसमें भविष्यत् में जनता का कल्याण हो; और हिन्दुजातिमें फूट न होने पावे । श्रीमहादेव हमारी इस प्रार्थनाको स्वीकार करें और आर्यसमाजियोंको सुमति दें । हम तो समझते हैं कि - स्वामी दयानन्दजीकी यह जो कीर्ति फैली है; वह शिवरात्रिमें शिवाराधना के फलस्वरूप हुई है । उसके पिता आदि बान्धव सो गये, पर बालक दयाराम सारा दिन शिवरात्रिका व्रत करके आधी रात तक महादेव के ध्यान में रहा; परन्तु पीछे यदि वह अश्रद्धा धारण करके व्रत भङ्ग न कर देता; थोड़ा - सा समय और भी धैर्य और श्रद्धा से काम लेता; तो उसका यशरूप चन्द्रमा निष्कलङ्क होता । उसमें कुतर्क - प्रवृत्ति, प्रन्थोंका वास्तविक अर्थ बदलकर अपना मनघड़न्त अर्थ करना, और उसका पत्थर आदि खाना, तथा शोच्य - निधनप्रसङ्ग न होता । यह अवश्य उसके शिव व्रतभङ्गका तथा अन्तिम दिनों में महादेवकी निन्दाका ही दुर्विलसित है - इसमें कोई संशय नहीं । यह हमने शिवरात्रिपर्वके प्रसङ्गमें प्रसक्तानुप्रसक्त लिख दिया
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१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कि पाठकगण भी कहीं इस घटना के सन्देहमें न रह जावें । ( गो ० य ० कु ० भू ० शा ० ) ( २४ ) होली विज्ञानकी कसौटीपर हिन्दुओंके होली - पर्वको विदेशों में घृणित - दृष्टि से देखा जाता है, हमारे कुछ देशी भाई भी इससे नाक - भौं सिकोड़ते देखे गये हैं । हम इस पर शास्त्रीय, वैज्ञानिक, आयुर्वेदिक एवं लौकिक - दृष्टि-कोण से विचार करते हैं-होलीका पर्व वहुत प्राचीन है । ' मीमांसादर्शन ' के भाष्यकार श्रीशबरस्वामीने भी सदाचरणके मुख्य - उदाहरणमें होलिकाको रखा है, पूर्वके प्रदेशमें इसका विशिष्ट - प्रचार माना है । होलीका प्रचार कबसे हुआ — यद्यपि इस विषय में सवका ऐकमत्य नहीं है; तथापि रक्षोघ्न ( राक्षस - नाशक ) मन्त्रोंसे अग्निमें हवि देनेसे राक्षसोंके दूर करनेका तथा नवसस्येष्टिका उद्देश्य करके इसका प्रचार अनादिकाल से ही प्रचलित है । इस पर शास्त्रीय दृष्टि यह है । यजुर्वेद वाजसनेयी संहिता के ' शतपथ ब्राह्मण ' में कहा है- ' याऽसौ फाल्गुनी पौर्णमासी भवति, तस्यै पुरस्तात् षडहे सप्ताहे वा ऋत्विज उपसमायन्ति, अध्वर्युश्च, होता च, ब्रह्मा च, उद्गाता च । एतान् वै अनु अन्ये ऋत्विजः ' ( १३ | ४ | १ | ४ ) तद् वै वसन्त एव अभ्यारभेत, वसन्तो वै ब्राह्मणस्य ऋतुः । य उ वै कश्च यजते, ब्राह्मणीभूयैव [ ब्राह्मणवद् ] यजते ' ( शत ० १३ | ४ | १ | ३ ) । इससे प्रतीत होता है कि वैदिक कालमें फाल्गुन पूर्णिमा में
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होली विज्ञानकी कसौटीपर अश्वमेध यज्ञको प्रथा थी; उसका कार्यक्रम फाल्गुन शुक्ल अष्टमीके बाद प्रारम्भ हो जाता था । अवमेध यज्ञके समय कुछ अश्लील भाषण तथा परिहास भी हुआ करता था - यह शुक्ल यजुर्वेद ( वाज ० ) संहिताके २३ २२ मन्त्र से २३ | ३१ मन्त्र तक दस मन्त्रों में • प्रत्यक्ष है । इसका संकेत हम ' श्रीमहीधर का अर्थ में कर चुके हैं । इस मूलको लेकर होलीके इस समय में अग्नि प्रज्वलन किया जाता है, तथा अश्लील भाषण और दूसरों से छेड़छाड़ की जाती है । ऐसी बात नहीं मान लेनी चाहिये कि - ' वेद में अश्लील भाषण भला कैसे हो सकता है? ' वेदोक्त - कर्म ' त्रैगुण्यविषया वेदाः ' ( भगवद्गीता २।४५ ) त्रैगुण्यविषय होनेसे राजसत्व और तामसत्व से सर्वथा पृथक् नहीं किये जा सकते । भोजन करनेपर शरीर में मल भी तो अवश्य होता है; उसके बहिष्कारसे अपनी शुद्धि करना पुरुषोंका कर्त्तव्य हुआ करता है । इस प्रकार कर्मकाण्डमें भी राजस-तामस अंश अनिवार्य रूपसे आता ही है; उसका शोधनरूप प्रायश्चित्त भी मध्य - मध्य में आया ही करता है । जैसे कि - राक्षस वा असुर देवता वाले मन्त्रोंके उच्चारण करनेपर जलस्पर्श ही प्रायश्चित्त हुआ करता है । इसी कारण वैवाहिक यज्ञमें यम आदि क्रूर - देवताओंके मन्त्रोच्चारणके अवसर पर ' प्रणीतोदक - स्पर्श ' प्रसिद्ध ही है । इसी प्रकार अश्वमेध यज्ञमें भी सम्भावित पापको शान्त करनेकेलिए जलदेवके प्रति प्रार्थना आई है- ' इदमापः प्रवहत अवद्य ं च मलं च यत् । यच्चाभिदुद्रोह अनृतं यच्च शेपे अभी-
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६६० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) रुणम् । आपो मा तस्माद् एनसः पवमानश्च मुञ्चतु ' ( यजुर्वेद - वाज ० सं ० ६।१७ ) । यहां पर ' अनृतम् अभिदुद्रोह, यच्च भीरुणं शेपे ' इन पदोंसे गाली देना, अश्लील- भाषण, किसीसे छेड़ - छाड़ करना, परिहास करना इत्यादि अभिव्यक्त हो रहे हैं । उससे सम्भावित - पापों की निवृत्त्यर्थ जलके स्पर्शसे जलदेवकी प्रार्थना की गई है । इस प्रकार होलीकी अश्लील भाषण - परिपाटी अथवा उपहासकी परिपाटी वेदमूलक ही है । वसन्तके धारम्भिक उत्सव में रङ्गोंका डालना ईश्वरीय सृष्टिके स्वभावका अंशत: अनुकरण है - यह बात वसन्त-ऋतु प्रत्यक्ष ही है, विशेषतः लाल - पीला रंग इस ऋतु में देखा गया है । इसपर हम पूर्व ' वसन्त पंचमी ' में संकेत दे चुके हैं । ( २ ) इसी प्रकार श्रौतस्मार्त्त - नवसस्येष्टिके समय में नूतन जौ, चावल, गेहूँ आदिकी नवान्नेष्टिं भी प्राचीन समय में हुआ करती थी । क्योंकि — नवीन -अन्नकी उत्पत्ति होनेपर जब तक उसे यज्ञ-द्वारा देवताओंको अर्पण नहीं किया जाता था; तब तक उसको उपयोगमें नहीं लाया जाता था । यज्ञ हिन्दुओं का प्राचीन व्यवहार है । क्योंकि उनका विश्वास है कि कृषिसे जो अन्न हमने प्राप्त किया है; वह हमें देवताओंने ही दिया है । तब - ' त्वदीयं वस्तु गोविन्द! तुभ्यमेव समर्प्यते ' इस न्याय से – ' तैर्दत्तान् अप्रदायै-भ्यो यो मुक्के स्तेन एव सः ' इस ' भगवद्गीता ' के वचनानुसार वे अग्निके द्वारा उसे देवताओं को देते हैं । वही यह नवान्नेष्टि- होली है । उसके बाद वे उस अन्नका उपयोग करते थे । संस्कृत में भुने
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होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६१ हुए अन्नको ' होलका ' कहते हैं । उसे अब भी होली के समय प्रयुक्त किया जाता है | वह नया अन्न जो कि सस्य - रूप में हुआ करता है-उसे होलीकी अग्निमें आधा पकाकर कुछ अग्निमें देवताओंको दिया जाता है, क्योंकि अग्निको देवताओंका मुख माना गया है-' अग्निर्वै देवानां मुखम् ' । ( शतपथ ० ३ | ७ | ४ | १० ) ' मुखत एव तद् देवान् प्रीणयति ' ( शाङ्खायनत्रा ० ३।६ ) ' अग्ने! वह हविरद्याय देवान् ' ( ऋ ० सं ० ७१११।५ ) । इस प्रकार देवताओंको देकर पीछे आप खाया जाता है । शूद्र बिना मन्त्रके तथा द्विज मन्त्र- सहित ऐसा किया करते थे । इस कारण वैदिक - सम्प्रदाय में भी यज्ञ के समय जौ - चावल आदिका उपयोग किया जाता है । इस प्रकार यह होलीका पर्व वेदकालीन एवं समूल सिद्ध हुआ । ( ३ ) इसके अतिरिक्त होली ऋतुराज वसन्तका एक उत्सव भी है । वसन्त ऋतुका महत्त्व तो विश्व - विश्रुत है । छः ऋतुओं में वसन्त ही ऋतुराजकी उपाधि से विभूषित है । मनुष्य के स्वास्थ्यका सम्बन्ध देशीय - प्रकृतिके स्वास्थ्य के साथ विशेषतः हुआ करता है । यों तो प्रकृति बारहों महीने विशेष नियमोंको लेकर जगत्के कार्यको प्रवृत्त कर रही होती है; परन्तु अन्य ऋतुओं में इधर - उधरको परिस्थिति-वश वह अपने स्वरूपको प्रकाशित करने में कुछ कुण्ठित - सी रहती है; परन्तु उसके सुखमय स्वरूपके विकासका सुन्दर साधन वसन्त ऋतु ही है । वसन्त - ऋतु एकमात्र मनुष्योंके लिए ही आनन्दप्रद हो ऐसी बात नहीं है; प्रत्युत वह तो मनुष्योंके साथ ही साथ पशु, पक्षी,
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८६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कीट, पतङ्गा आदि सभीका उत्साहवर्धक - काल है । इन्हींका ही क्या, अपितु स्थावर वनस्पतियोंका भी यही उल्लास- काल है | कविकुल- गुरु श्रीकालिदासने वसन्तका प्राकृतिक चित्र अङ्कित करते हुए स्वग, मृग, वृक्ष, लता आदियोंकी भी इसी ऋतु में प्रेमपाश - वद्धता चित्रित की है । भारतीय प्राचीन पद्धति वसन्त के आगमन में देवताओं के लिए प्राचीनकाल में होनेवाले एक बड़े वार्षिक सामष्टिक - यज्ञको परि-चायित करती है, जिसका अनुमान होलिका - दहन से होता है । ( ४ ) इसके अतिरिक यह उत्सव अन्य भी कई इतिहासको अपने गर्भ में धारण करता है । ' भविष्यपुराण ' ( उत्तर पर्व १३३ अध्याय ) के अनुसार पहले समय में दुण्ढानामकी राक्षसी शिवप्राप्त-वरके प्रभावसे अवध्य होकर छोटे बच्चोंको पीड़ा दिया करती थी । तब बीभत्स - गाली देनेके साथ - ' ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति । परापुरो निपुरो ये भरन्ति, अग्निः तान् लोकात् प्रणुदाति अस्मात् ' ( यजुर्वेद - वानसं ० २।३० ) ' अग्निर्हि रक्षसामपहन्ता ' ( शतपथ ० २।४।२।१५ ) -इस प्रकार सूखी लकड़ियों वा उपलोंसे अग्नि जलाने के साथ उसको वहां से हटा दिया गया । उस बातको स्मरण दिलानेवाली यह होली है । उस समय सायं घरको लीपना ही पड़ता है और • गुड़ - पकवान आदि बाँटना पड़ता है । ( ५ ) होलीका सम्बन्ध प्रह्लादके साथ भी माना जाता है । भगवद्भक्तिमें संलग्न प्रह्लाद जब पिता द्वारा समझाने से भी न समझा; तब उसको उस मार्ग से हटाने के लिए पिताने उसे पर्वतसे