पञ्चम सुमन · प्रकरण 93
शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक
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833वह पूजा इस समय में नष्ट हो जाती; पर इस शिवरात्रिके चूहेने उसे दृढ करा दिया । आज हम इसपर विचार करते हैं । ' आलोक ' पाठक इसपर पूरा ध्यान दें ।
१८६४ वा ६५ विक्रमी संवतकी शिवरात्रि में आर्यसमाज के जन्मदाता स्वा ० दयानन्दको १४ वर्षकी बाल्यावस्थामें महादेवकी मूर्तिपर चढ़ा हुआ और नैवेद्य खाता हुआ एक चूहा दिखाई पड़ा उसके देखनेके साथ ही बालकके चित्तमें विचार आया कि- मैंने तो महादेवकी बड़ी महिमा सुनी थी; परन्तु यह मूर्ति तो चूहेको भी हटाने में सामर्थ्य नहीं रखती; तब मेरी रक्षा क्या कर सकेगी? यदि महादेवकी इस मूर्ति में सामर्थ्य होती, तो अपने अपमान करनेवाले - मूषकको वह दण्ड देती; पर वह तो टससे मस नहीं हुई; अतः उस मूर्तिको पूजा भी ठीक नहीं ' इस साधारण - सी बातपर उस बालकके हृदयपर चोट पहुँची । उसके धैर्य और धर्म स्थिर न रह सके । उस दिनसे शुरू करके उसने पूर्वसे मुखको मोड़कर पश्चिमकी ओर मुख करना शुरू कर दिया ।
इसीके आधारसे दयानन्द- समाज आर्यसमाजके नामसे जारी. हुआ । आर्यसमाजी अपने व्याख्यानों में इस घटनाको नमक - मिर्च लगाकर वर्णित करते हैं । मूर्तिपूजाके खण्डनमें भी प्रबल समझकर इसी युक्तिको आगे रखते हैं । यही लीला आर्यसमाजका बीज है, दयानन्दजीके बोधका आदिम - सूत्र है, आर्यसमाजी उपदेशकोंका ब्रह्मास्त्र है, आर्यसमाजियोंका गुरुमन्त्र भी इसे कहा जा सकता है ।
( १ ) अब यह विचारणीय है कि - श्रीमहादेवजी उस समय
834कौन जान सकता है कि- चूहे के चूहेके साथ क्या व्यवहार करते?
अल्पज्ञता के कारण हम भले ही मनमें उस समय कैसा भाव था?
सर्वज्ञ हैं । वे तो सबके भीतर- न जान सकें; पर श्रीमहादेव तो
दयारामने कैसे जाना कि चूहा बाहरका भाव जानते हैं । बालक
कोई मलिनभाव नहीं था, तभी मलिन भावको लेकर आया था?
तो महादेव उससे कुपित नहीं हुए
।
। वे कई प्रकारोंसे विश्वको पालते
( २ ) श्रीमहादेव विश्वम्भर हैं
हैं; अतः उनका भाण्डार सबके लिए खुला रहता है; उसमें किसी वस्तुकी न्यूनता नहीं । तब चूहेको वहांसे क्यों लौटाया जाता? क्या चूहा विश्वसे बाहर था? विश्वनाथकी प्रजा नहीं था? जब - भगवान् ने उसका मुख भी बनाया; बुद्धि भी तदनुसार उसके निर्वाहार्थ उसे दी; तब क्या चूहा भगवान्से नहीं ले सकता था? मनुष्य और मूषककी अवयव - रचना में बड़ा अन्तर है; जैसे- हम कोई वस्तु लेते हैं, चूहा वैसे नहीं ले सकता । तब यदि चूहेने अपनी स्वभावसिद्ध - प्रकृतिके अनुसार उछलकर वह वस्तु ले ली हो; तो उसके लिए दण्डविधान क्या?
( ३ ) कहा जाता है कि - ' जब चूहा महादेवकी मूर्तिपर चढ़ा, तब उसने भगवान्का अपमान किया; इससे चूहेको दण्ड देना चाहिये था ' इसपर यह जानना चाहिये कि - प्रत्येक कार्यके लिए मर्यादाको देखा जाता है; उसीके अनुसार व्यवहार किया जाता है । कोई नीच - पुरुष द्वेषवश प्रतिष्ठित - पुरुषकी पगड़ी उतार दे; तब उसे अपना अपमान समझ क्रोध आता है; अपमन्ताको दण्डविधान भी 835वहाँ आवश्यक है । पर यदि भोलाभाला हृदयका आधार, स्नेहकी मूर्ति, उसी प्रतिष्ठित - पुरुषका बच्चा उसकी गोदपर उछलता हुआ चढ़ जावे; और उसके हाथसे उस पुरुषकी पगड़ी गिर पड़े, वा वह बच्चा ही पगड़ीको खींचकर गिरा दे; तो उसकेलिए न तो उस प्रतिष्ठित - पुरुषको कोई क्रोध आता है, न ही कोई कानून के अनुसार उस बच्चे के लिए कोई दण्ड नियत है; न ही दण्ड उसे दिया जाता है ।
हम प्रतिदिन देखते हैं कि - बच्चे अपने पिता - आदिके सिर पर भी चढ़ जाते हैं; वे कुछ खा रहे हों, तो उनसे छीनकर खा भी लेते हैं; इससे न तो उस बच्चेपर थप्पड़ रसीद किया जाता है, न ही उसे जेलखाने में भेजा जाता है । बल्कि उससे क्रोध भी न करके पिता उस बच्चेसे स्नेह ही करता है । उसका कारण यह है कि — सब बातों में मानसिकभाव ही देखा जाता है । यदि मानसिक- पवित्रता हो; तो शरीर द्वारा मर्यादालंघनको भी उपेक्षित ही किया जाता है । बच्चा अपनी उस अवस्था में इसी तरहसे ही तो अपने प्रेमको प्रकाशित करता है । वह उस समय पिताका प्ररणामादि- द्वारा सम्मान करना नहीं जानता; बल्कि उसपर पेशाब - टट्टी भी कर दिया करता है; पर इससे पिता उस बच्चेको दण्डविधान - नहीं करता ।
योगवासिष्ठमें श्रीवसिष्ठजीने श्रीरामको कहा था - ' -'मनः कृतं कृतं राम! न शरीरकृतं कृतम् । येनैवालिङ्गिता कान्ता तेनैवालिङ्गिता सुता ' अर्थात्– मनसे जो किया जाता है; वही ' किया हुआ ' माना 836जाता है, शरीर से किया हुआ ' किया हुआ ' नहीं माना जाता । देखिये – कोई पुरुष उसी शरीरसे अपनी प्रियाका भी आलिङ्गन करता है; उसी शरीरसे अपनी लड़कीका भी आलिङ्गन करता है । शारीरिक क्रियाके समान होनेपर भी मनोभावके भेदसे उन
लिङ्गनोंको एक नहीं माना जाता ।
कोई पुरुष किसीके शरीर में चाकू चुभोकर उसका कोई ' अवयव काट ले; इस पर उसे दंड मिलता है, पर एक डाक्टर तेज़ चाकूसे किसीके शरीरका अवयव काटता है; तो ब्रणित - द्वारा उस डाक्टरको दण्ड नहीं दिलवाया जाता । यदि कोई किसीको विष खिला दे; तो उसे अपराधी मानकर दण्ड विधान होता है । पर यदि कोई वैद्य किसी रोगीको उस रोगमें उपयुक्त विष खिलावे; इससे वैद्यको दण्डविधान नहीं होता । कोई भिन्न- पुरुष बागीचे में वृक्षके पत्तोंको काटे, तो स्वामी उसपर क्रोध करता है, पर माली पत्ते तो क्या, शाखाओं तकको भी काट देता है; इससे स्वामी उसपर क्रोध नहीं करता । कहां तक इन भावनाओं को गिना जावे, संसार इस - प्रकारकी घटनाओं से परिपूर्ण ही है । उसी कार्यको एक करता है; तो दूसरेको उससे प्रसन्नता होती है, और दूसरा ' उसीको करे; तो उसको उससे क्रोध होता है । काम बराबर होनेपर भी फलभेदका एकमात्र कारण मानसिक भावकी भिन्नता ही है । जब- हम किसी व्यवहारमें प्रसन्न होते हैं; तब हम उसको करने वाले के शरीरपर दृष्टि न डालकर उसके मनका अध्ययन करते हैं ।
इस प्रकार यहां भी जानना चाहिए कि - भगवान् सबके पिता 837हैं । जलचर, स्थलचर, खेचर सब प्राणी उसीकी सन्तान हैं । हम किसीका मानसिक - भाव न पहचान सकें, यह सम्भव है; पर परमात्मा तो सर्वज्ञ होनेसे सब जानता है । तब चूहेका मानसिक- भाव भी पवित्र हो सकता है, जिसे चर्मचक्षु वालक दयानन्द ने समझ सका हो । केवल उसकी शारीरिक क्रियाको देखकर आपात- दृष्टिवाला बालक भ्रान्त हो गया हो । पर अन्तर्यामी एवं दिव्य - दृष्टि भगवान् बिना कारण ही चूहेको क्यों दण्ड देते? चूहे ने पुत्र समझकर ही अपने परमपिता पर उछल - कूद मचाई हो, और उसका भोजन ले लिया हो । क्या दयारामको निराकारके दर्बारसे कोई तार मिला था कि चूहेने महादेवकी मूर्तिपर द्वेषसे आक्रमण किया है । जब तक यह निर्णय न हो जावे कि — चुहेने दुर्भाग्य से मूर्तिपर आक्रमण किया; तब तक चूहेकी दण्डनीयता कैसे सिद्ध की जा सकती है? ।
( ४ ) परमात्मापर श्रद्धा लानेवालोंका यह विश्वास है कि वह सर्वत्र व्यापक है; उसके बिना कोई स्थान भी शून्य नहीं । इसी कारण पृथिवी आदि भगवान् के शरीर माने गये हैं । बृहदारण्यक - उपनिषद् में कहा है- ' यस्य पृथिवी शरीरम् J आपः शरीरम् ' ( ३७ ) । उसी पृथिवी - परमात्माके शरीरपर दयानन्दजी न केवल जूते समेत पांवको रखते थे; बल्कि — उसपर थूकते भी थे, मलमूत्र भी करते थे । किसी साधारण पुरुषके शरीर पर भी कोई थूक दे; तो वह कितना पीटता है; पर आप लोग भगवान्का इतना अपमान करते हैं, वह आपको दण्ड क्यों नहीं देता? क्या 838मूषकका अपराध इससे भी बड़ा था? आप कह सकते हैं कि—– ' परमात्मा तो सर्वव्यापक है; हमें व्यवहारार्थ उसके शरीर - पृथिवी आदि पर चलना पड़ता है; उसके बिना हमारा निर्वाह ही नहीं ' हो सकता ' । तब आप ही चूहे पर अपना गुस्सा क्यों डालते हैं? चूहेका भी निर्वाह ऐसा किये बिना नहीं होता । आप तो ज्ञानी- मनुष्य होकर भी करें; वह ठीक हो जाए, पर दण्ड अज्ञानी- चूहेको दिया जाय?
( ५ ) यदि शङ्काकर्ता कहें कि - ' ईश्वर तो आकाशकी भांति निर्लेप है । घड़ा टूटनेपर भी घटाकाश नहीं टूटता, घड़े के अपवित्र होनेपर भी घटाकाश अपवित्र नहीं होता । वृष्टि होनेपर भी आकाश गीला नहीं होता, सूर्यकी घामसे भी नहीं तपता; तूफानकी मट्टीसे भी मैला नहीं होता; इस प्रकार ईश्वर त्रिकालमें भी एकरस रहता है; वह किसी दोष से भी लिप्त नहीं ' होता ' । तो क्या चूहे की टांग इतनी भारी थी; जिससे भगवान्की निर्लेपता भी टूट पड़ती? जिस प्रकार आप परमात्मापर टट्टी भी कर देते हैं; तो भी वह उससे न तो लिप्त होता है; और न आपको ही दण्ड देता है; इस प्रकार चूहेकेलिए भी समझ लें । जो परमात्मा पृथिवीमें है, वही मूर्ति में भी है, और दोनों ही स्थानों में निर्लेप है ।
यदि आप कहें कि -'टट्टी - पेशाब आदिके समय हमारा मानसिक भाव दूषित नहीं होता है, बल्कि - परमात्मा के अपमानका तो उस समय हमें विचार ही नहीं होता, अतः वह परमात्माका अपमान न 839होनेसे हमें दण्ड भी क्यों मिले? ' तब आपके पास क्या प्रमाण है कि चूहा द्वेषसे ही भगवान् की मूर्तिपर चढ़ा था और उसे दण्ड मिलना चाहिए था । जवतक यह सिद्ध न हो जावे; तब तक मूर्ति- पूजाको कैसे छोड़ा जा सकता है?
( ६ ) मनुष्य पुण्य - पाप जो कुछ भी करता है, उसके कर्मका फल कुछ समय के बाद ही मिलता है । कुपथ्य करनेवालेको भी फल तत्क्षण नहीं मिल जाता । बीमारको भी दवाई तत्क्षण आराम नहीं देती । विद्यार्थी परीक्षा देते हैं, उनका परिणाम भी बाद में ही निकलता है । वीजके बोनेमें अंकुर भी तत्क्षण नहीं निकल आता । पुष्प फल भी पीछे ही होते हैं, पीछे ही पकने पर खाये जाते हैं । दुकानके खोलनेके समय ही लाभ नहीं मिलने लग जाता, किन्तु कुछ समय बाद ही ।
जीव मनुष्य - शरीरको प्राप्त करता है, यह पूर्व जन्मके ही कर्मका फल है । इस जन्ममें जो कर्म हम कर रहे हैं, इसका फल हमें जन्मान्तरमें मिलेगा । यदि दुर्जनतोषन्याय से मान भी लिया जावे कि चूहेने महादेवजी की मूर्तिका अपमान किया; तो यह कहाँका न्याय दयानन्दजीके हाथमें दे दी जाती? क्या चूहेको दण्ड देनेका यही अवसर था? आगेकेलिए क्या भगवान्का दरबार बन्द होने- वाला था?
( ७ ) स्वा ० दयानन्दजीने अपनी ' संस्कारविधि ' के गृहाश्रम- • प्रकरण में यह लिखा है कि- ' नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति 840गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ' ( मनु ० ४।१७२ ) यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृषु । नत्वेवं तु कृतोऽधर्मः कर्तुर्भवति निष्फलः ' ( ४।१७३ ) इन पद्योंका अर्थ स्वामीजीने लिखा है- ' मनुष्य निश्चय करके जाने कि - इस संसार में जैसे गायकी सेवाका फल दूध आदि शीघ्र नहीं होता; वैसे ही किये हुए अधर्मका फल भी शीघ्र नहीं होता; किन्तु धीरे - धीरे अधर्मकर्ताके सुखोंको रोकता हुया सुखके मूलों को काट देता है । पश्चात् अधर्मी दुःख ही दुःख भोगता है । यदि अधर्मका फल कर्ताकी विद्यमानतामें न हो, तो पुत्रों, और पुत्रोंके समयमें न हो तो नातियोंके समय में अवश्य प्राप्त होता है, किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि — कर्ताका किया हुआ कर्म निष्फल होवे ' ।
जब अपने किये हुए मनु - पद्य के अर्थ में स्वामी धर्मका फल तत्काल नहीं मानते; तब चूहे के अधर्मका फल तत्काल क्यों दिलवाना चाहते थे? मनुजीने यह कहीं नहीं लिखा कि चूहेको अधर्म करनेपर तत्काल फाँसी दे दी जावे? हैरानी तो यह है कि - स्वामी दयानन्दकी बालबुद्धिको समझदार भी आर्यसमाजी अभी तक भी महत्त्व दिये ही जाते हैं!!!
( ८ ) शास्त्रों में यह भी लिखा है कि- ' अत्युग्र - पुण्यपापानामिहैव फलमश्नुते ' कि- अत्यन्त उग्र पापका फल यहीं शीघ्र मिल जाता है । स्वामीजीके अनुसार कथंचित् यह चूहेका उम्र - पाप और उसे शीघ्र दण्ड देना मान भी लिया जाय; तो कौन जान सकता है कि- बिल तक पहुँचने तक उसकी क्या दशा हुई होगी? पर क्या बालक दयाराम चूहोंका डाक्टर था कि - जान जाता कि चूहेपर रोगका 841आक्रमण हुआ या नहीं? यह दयानन्दजीका चूहा दक्षिण- पश्चिमका था । दक्षिणके चूहे पर ही पहले - पहल प्लेगकी बीमारी शुरू हुई । बम्बई से फैलती हुई प्लेग पंजाब आदिमें चूहेपर ही पहुँची । अब पता नहीं लगता कि क्या दयानन्दजीकी भगवान्की कचहरी में नालिशके कारण ही उस दिनसे चूहों पर प्लेग शुरू हुई? यदि ऐसा है; तो स्वा ० दयानन्दका मूर्तिपूजा छोड़ बैठना उनकी भूल सिद्ध हुआ ।
( a ) यदि कोई साधारण पुरुष कुछ अपराध करे; तो उसे • साधारण - सिपाही ही पकड़कर ले जाता है । उसे गवर्नर आदि वा राजा दण्ड देने स्वयं नहीं आते । हाँ, शासकोंका कोई अपराध हो; तो हैसियतके मुताबिक गवर्नर वा सम्राट् आदि भी दण्ड- विधानार्थ आते हैं । परन्तु अबोध बालक दयानन्दने उस चूहेका ऐसा क्या महत्त्व देखा था; जिससे ज्वर - प्लेग आदि रुद्रके दूत उस मूषकको दण्डित न करते, किन्तु त्रिलोकीके सम्राट् वे स्वयं ही उसे दण्ड देते?
आधी रातका समय था । लोग निद्रा - देवीकी उपासनामें लगे थे । बालक दयानन्दपर भी निद्रादेवी अपना प्रभाव डाल रही थी । वह जलके छींटे मारकर तन्द्राको दूर करनेके प्रयत्नमें लगा था; ( यह दयानन्द - जीवन - चरित्रोंमें स्पष्ट है ) सारे दिनकी भूख भी अपना प्रभाव डाल रही थी । ऐसे समय एक छोटा- बालक अपनी दशा भी नहीं जान पाता, दूसरेकी दशा जाननी तो बहुत कठिन हो जाती है । तब वह बालक जिसे अभी तक योगदृष्टि भी नहीं 842प्राप्त थी; कैसे जान सकता कि - चूहेपर रोगका आक्रमण हो रहा वा नहीं?
( १० ) संसार में देखा जाता है कि कोई प्रतिष्ठित पुरुष अपनी · गद्दीपर बैठा हो; तो उसकी सेवामें बहुतसे नौकर इसलिए ठहरे
जाए । वे स्वामीको पंखा करते हैं होते हैं कि - स्वामीकी सेवा की
चमर डुलाते हैं - इसलिए कि -- कि- स्वामीको गर्मी न लगे ।
स्वामीको मक्खियाँ तंग न करें ।
वे वेत लेकर ठहरते हैं कि कोई दुष्ट स्वामीका अपमान न करे ।
परन्तु उन नौकरोंके मनमें यह
हमारा स्वामी इतना असमर्थ है विचार कभी नहीं आता कि -
कि- वह मक्खियों को भी नहीं
हटा सकता । दीया भी नहीं बुझा सकता, हम ही चुकाते हैं । वे
स्वयं निश्चित कर लेते हैं कि- हमारा धर्म है कि- स्वामीका संकेत बिना पाये भी उसके कार्य करें ।
जब नौकरके उपस्थित होनेपर भी स्वामी ही स्वयं मक्खियाँ उड़ाया करे, चूहा, बिल्ली, कुत्तोंको स्वयं भगाया करे; दूसरा उसका अपमान कर डाले; ऐसे सेवकको लाख - लाख धिक्कार है । इस प्रकार यदि दयानन्द - जैसे नौकरके बैठे रहनेपर भी दुर्जन - मूषक स्वामीकी मूर्तिपर चढ़ गया; तो नौकर- दयानन्दका कर्तव्य था कि- उसे हटा देता! पर भूल उसने की कि उसे न हटाया । अपना कर्तव्य पूर्ण न करनेकेलिए उसे लज्जित होना चाहिये था; भविष्य- केलिए सावधान हो जाना चाहिये था; पर खेद, अबोध बालकने अपनी भूल न मानकर महादेव पर ही असामर्थ्यका दोष लगा दिया! ' उलटा चोर कोतवालको डांटे ' यह उक्ति ही ' चरितार्थ कर दी!
843( ११ ) मालूम होता है कि — दयानन्दजी आशय यह था कि— महादेव मेरे सामने प्रत्यक्ष होकर — चूहेको दण्ड देते; तभी दयानन्दजी देवपूजन मानते; पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि— ईश्वरका दर्शन बड़े भाग्यसे मिलता है । बालक- दयानन्द ईश्वर- दर्शनका अधिकारी नहीं था; न उसका पूर्वजन्मका कोई ईश्वरदर्शनयोग्य . पुण्यातिशय अनुमित होता है, और न ही इस जन्मकी उसकी अक्षुण्ण भक्ति दीखती है । भक्ति थी प्रह्लादमें; जो कि असीम - विपत्तियों में डाला गया हुआ भी स्थिर रहा, विचलित नहीं हुआ । पर्वतसे गिरानेपर भी, अग्नि में जलाने एवं समुद्र में डुबानेपर भी उसकी भगवान् में श्रद्धा - भक्ति चुरण नहीं हुई । बालक प्रह्लादके मनमें नहीं आया कि — ' यदि परमात्मामें कोई शक्ति होती; तो अपने तथा अपने भक्तके अपमानका बदला लेता । कुछ न करने से वह असमर्थ है, या है ही नहीं । भक्त- बालकके पवित्र हृदय में ऐसे कुतर्क ये ही नहीं । बहुत आपत्तियोंके झेलनेपर भी, परमात्माके इतने अपमान में अप्रकटता देखकर भी उसकी श्रद्धा क्षुण्ण नहीं हुई, बल्कि बढ़ी ही । उसके धर्म एवं धैर्य स्थिर ही रहे । अन्तमें श्रीभगवान्ने उसे दर्शन दिये, अपराधी उसके पिताको दण्ड दिया । परन्तु दयानन्दजीको तो न पहाड़से गिराया गया, न ही समुद्र में गिराया गया, न आगमें ही जलाया गया । न पिता ही मारनेको तैयार हुआ । परन्तु इस भक्त (? ) का धैर्य एवं विश्वास ऐसा हलका रहा कि— जिसे एक साधारण - सा चुहा ले भागा, खेद! अत्यन्त खेद!!
( १२ ) बालक- दयानन्दने मूर्तिपूजा इसलिए छोड़ी कि - महादेव 844उस चूहेको न हटा सके; परन्तु यह जान रखना चाहिये कि संसार में जहां आस्तिक रहते हैं, वहीं ईश्वरके न माननेवाले नास्तिक भी रहते हैं । नास्तिक तो भगवान् के अस्तित्वका घोर खण्डन करते हैं, भगवानको गालियां निकालकर उसकी निन्दा भी करते हैं । इसप्रकार के नास्तिक भी कोई दो - चार नहीं; प्रत्युत बहुत - संख्या में है । रूसका तो सारा साम्राज्य ही नास्तिक है । कहते हैं— ' रूसने परमात्माकी मूर्ति बनाकर उसे फांसी भी दे दी थी । चूहेने तो भगवान्की मूर्त्तिपर केवल पांव ही रखा था, परन्तु नास्तिक तो निराकार भगवान्को संसारसे ही नष्ट करना चाहते हैं । यदि निराकार परमात्मा इनसे आत्मरक्षा नहीं कर सकता; तो क्या आप यही कहेंगे कि परमात्मामें कुछ शक्ति ही नहीं? . उसकी उपासना छोड़कर वहांसे भाग खड़े होंगे, और एक नास्तिक- सम्प्रदाय खड़ा कर देंगे?
यदि आप कहें कि — भगवान् किसी समय में उन्हें दण्ड दे देंगे, तब प्रश्न है कि उन्हें उसी समय दण्ड क्यों नहीं दिया . जाता, जो उसका अपमान करनेवाले उसे उड़ाना ही चाहते हैं? यदि उनको दण्ड देनेकेलिए तिथि नियत की जा सकती है; तो क्या चूहा ही इतना बड़ा अपराधी था कि उसी समय उसे फांसी चढ़ा दिया जाता?
यह भी सोचिये - सन् १ ९ १५ में आर्यसमाज के काङ्गड़ी गुरुकुल के उत्सबपर ला ० मुन्शीराम ( स्वामी श्रद्धानन्द ) जीके सुझाव से वेदोंकी चार पोथियोंको सभापति बनाया गया था; इसपर देखिये 845मेरठका · वेदप्रकाश - पत्र ( सन् १ ९ १६ वर्षका १२७ पृष्ठ ) । क्या. वे वेदपुस्तकें जनतापर कण्ट्रोल करती थीं? यदि ऐसा नहीं; तब उन्हें सभापति क्यों बनाया गया? यदि उन्हें मान देनेकेलिए ऐसा किया गया; तो यह मूर्त्तिपूजा सिद्ध हुई! यदि उस समय कोई मूर्ख - व्यक्ति सभापति बने हुए - वेदपर पांव रखकर कहता कि— ' आपका सभापति वेद- भगवान् मुझे तो कुछ दण्ड नहीं देरहा, अतः वह असत्य है; प्रतारणा है, इसका त्याग कर दो '; तब क्या आप भगवान् के ज्ञानके मूर्तरूप वेदपोथियोंको सभापति बनने में निर्बल समझकर उन पोथियोंको परे फेंक देंगे? वा उनका मानना बन्द कर देंगे?? नहीं, बल्कि आप उस वेदको पांवकी ठोकर मारनेवालेकी बुद्धिको शोचनीय समझ लेंगे? हो सकता है, उसे दो - चार थप्पड़ भी लगा दें । इस प्रकार मूषक द्वारा महादेवकी ' मूर्तिका अपमान देखकर उसकी पूजा छोड़नेवाले तथा उस मूषकको वहांसे न हटाकर स्वयं ही वहांसे हट आनेवाले बालकका यह बोधोत्सव नहीं; किन्तु महान अबोध ही है ।
शासक कितने बलवान् होते है, किसीने शासकोंके शिरोमणि गांधीजीको मार डाला; फिर भी उसे एकदम दण्ड नहीं मिला । मुकदमे में ही बहुत - सा समय लग गया । बहुत समयके बाद गोडसेको फांसी मिली । ईश्वर भी प्रत्येक शुभ कर्मका यथासमय और यथाधिकार ही दण्ड विधान करता है । इधर ईश्वर में न्याय- कारिता और दयालुता यह दोनों ही गुण बराबर होते हैं । और वह अन्तर्यामी भी होता है, और जानता है कि- इसने यह 846अपराध ज्ञानसे किया है, वा अज्ञानसे । यदि चूहेने सचमुच ही महादेवका अपमान किया था, वह महान देव यथाधिकार तथा यथासमय उसे दण्ड देगा ही । बालक दयानन्द कौन था उस व्यवस्थामें हस्तक्षेप करनेवाला?
अथवा आपका यह अभिप्राय हो कि - महादेवकी मूर्त्ति चूहे से अपनी रक्षा न कर सकी; अतः वह असमर्थ होने से पूजनीय नहीं, तो आप निराकार परमात्माको तो सर्वशक्तिमान् मानते ही हैं । हमारे सामने आप उसी निराकार ईश्वरको करोड़ों गालियां देकर अपमान करें; तब देखिये कि क्या वह आपको उसी समय दण्ड दे देगा? वहिरा तो है नहीं कि वह सुन नहीं सकता । आप भी तो मानते हैं कि - ' स शृणोत्यकर्ण: ' इस प्रकार आपके देखते ही देखते किसी नास्तिकने आपके ईश्वरको गाली देकर अपमानित कर दिया, तब उसी समय उसे दण्ड दिया जाता हुआ न देखकर उस सर्वशक्तिमान् निराकार परमेश्वरका मानना भी बन्द कर देंगे?? यदि नहीं; तो फिर काम- क्रोधादि, तथा रक्त - माँस, एवं मल - मूत्रादि - दोषरहित शुद्ध मूर्तिके ऊपर चूहेके चढ़नेसे, और मूर्ति द्वारा चूहेके न हटाने से यदि मूर्ति- पूजाको हटाते हैं; तो यह आपका बोध ही है । यदि निराकार- परमेश्वरको गालिप्रदानरूप पापका वा ईश्वरको उड़ानेरूप- पापका फल वा दण्ड होना आप कभी मानेंगे; तो वेदोक्त महादेवको मूर्तिके तिरस्कारकों को भी यथासमय दण्ड मिलेगा ही ।
अन्य यह भी ध्यान देनेकी बात है कि - सनातनधर्मियोंकी
847शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४७. भांति आर्यसमाजी तथा उनके स्वामी भी ईश्वरको सर्वव्यापक मानते हैं । तब इन्हींसे सर्वव्यापक माना हुआ वह महान् देव मूर्ति में भी व्यापक है; तथा उस समय भी व्यापक था ही । तब उसी निराकार ने अपनी आश्रित मूर्तिपर चढ़ते हुए चूहेको – यदि प्रतिपक्षियोंके अनुसार यह उसका अपमान था - तो नष्ट क्यों नहीं किया; वा क्यों नहीं हटाया? यदि उनसे माना हुआ निराकार - ईश्वर भी अपने ऊपर चढ़ते हुए चूहे को न हटा सका; तब इसी प्रकारकी शङ्का करके मूर्तिपूजा से हटना क्या यह बालक दयारामका अबोध नहीं? यदि वे कहें कि — ईश्वर मूर्ति में व्यापक नहीं; तब उनका ईश्वरको सर्वव्यापक मानना ही क्या अबोध नहीं? यदि वे कहें कि— ईश्वर तो चूहे में भी व्याप्त था; तो फिर कहिये कि - फिर कौन किसको रोकता? तब भी वह शङ्का अबोध ही है ।
फिर भी यदि वे कहें कि — चूहा चेतन है, और मूर्ति जड़ । चेतन - चूहे में ईश्वर चेतनरूपमें व्यापक है; और जड़ मूर्तिमें व्यापक ईश्वर भी जड़ होने से चेतन मूषकको ऊपर चढ़ने से न हटा सका; अतः मूर्तिपूजा ठीक नहीं; तब तो उनका यह कथन भी इसलिए अबोधरूप है कि - फिर आप जड़मूर्ति में प्राण - प्रतिष्ठा एवम् आवा- हनादि से इस प्रकारकी शक्तिका उत्पन्न होना कैसे मानते हैं, जो चूहेको अपने ऊपर चढ़नेसे रोके । जिस ईश्वर को आप सच्चिदानन्द मानते हैं; उस ईश्वरकी व्यापकतासे तो जड़मूर्ति में चेतनता आवे नहीं, और आवाहन एवं प्राणप्रतिष्ठासे उस मूर्ति में चेतनता आती हुई न देखकर मूर्तिपूजन यदि आप निषिद्ध मानें तो यह भी तो 848अबोध सिद्ध होगा । फलतः बालक दयानन्दका महादेवकी मूर्तिके ' अपमानसे महादेव - द्वारा चूहेको दण्डविधान न देखकर महादेवकी मूर्तिकी पूजा से श्रद्धा हटा लेना यह बोध सिद्ध न हुआ; किन्तु बालकपनका अबोध ही सिद्ध हुआ । इसपर बोधोत्सव मनाना भी अबोध - परम्परा बन जाती है ।
वस्तुतः तब नींद - भूख आदिसे हुई - हुई बालककी व्याकुलता अबोध ही थी । यदि यह बोध ही था; तो इसके बाद किये हुए दयानन्दजीके आचार श्रार्यसमाजियोंको मान्य होने चाहियें । दयानन्द - चरित ' श्रीमद्द्यानन्द प्रकाश ' ५३ पृष्ठमें लिखा है - ' उन दिनों स्वामीजी भालपर विभूति रमाया करते थे, गलेमें रुद्राक्षकी एक माला होती थी ' । ७४-७५ पृष्ठमें लिखा है - ' उस [ स्वा ० द ० की वैष्णवों पर प्राप्त की हुई ] विजयसे प्रभावित होकर लोग धड़ाधड़ शैव बनने लगे । कण्ठियोंका स्थान रुद्राक्ष की मालाएं लेने लगीं । महाराजा रामसिंहने भी शैव सम्प्रदायको स्वीकार कर लिया । इससे राजकीय हाथी और घोड़ोंके गलेमें भी रुद्राक्ष की मालाएँ पड़ गईं । स्वामीजीके हाथ से भी मालाएँ वितरण कराई गईं ' । इसी प्रकार स्वामीजीके अपने कहे हुए जीवनचरित्रके ४६ पृष्ठमें भी कहा है । ' दयानन्दप्रकाश ' के ८० पृष्ठमें लिखा है- ' पुष्करनिवासके दिनों में स्वामीजी वहांसे विभूति मंगाकर रमाया करते थे । उनके कठमें रुद्राक्षकी माला थी, उसके बीचोंबीच में एक - एक दाना श्वेत काँचका भी था ' ।
यदि १४ वर्षकी आयु में चूहे की घटनासे दयारामजीको बोध 849होगया होता; तो २७ सालके बाद ४१ वर्षकी आयु में जयपुर में स्वामी दयानन्दजी मूर्तिपूजामूलक इस शैव सम्प्रदायको कैसे स्वीकार करते; और कैसे प्रचारित करते? यदि मृर्तिपूजा - विरोधी होते, तो देवमन्दिरों में क्यों निवास करते?? क्या आर्यसमाजी रुद्राक्ष मालाको धारण करना ठीक मानते हैं? यदि नहीं; तब आर्यसमाजियोंके मतमें स्वा ० दयानन्दजीका यह भी अबोध सिद्ध हुआ । यदि यह बोध है; तो उसका आचरण क्यों नहीं करते? अथवा व्यंग्यसे वे अबोधको वोध कहते हों? नहीं तो वे स्वा ० द ० जीका गुरु आदिज्ञानदाता, शिवरात्रिके चूहेको कैसे बतावें? और आर्य- समाजका भी आदिगुरु चूहा सिद्ध कैसे करें? वस्तुतः यह सब अबोध ही है । जब आर्यसमाजका मुलस्तम्भ भी अबोध ही है तब उसमें बोध कैसे प्राप्त होगा?
यदि इस शिवरात्रिके दिन स्वामीको बोध होगया होता; तो वे अपने जीवनमें निर्भ्रान्त रहते । एक मत मानकर फिर उसे बदलते नहीं । बल्कि हम तो कहते हैं कि- जितने समय वे जीये; उनका जो मत अब बन गया है, उसके बाद यदि वे जीते रहते; तब क्या हुआ, निर्भ्रान्तता क्या रही? यह हम ही नहीं कहते; किन्तु आर्यसमाज के शिरोमणि भारतके मान्य राजनीतिक नेता डी.ए.वी. कालेज लाहौरके सचालक स्वर्गीय ला लाजपतराय भी मान गये. हैं । वे अपने ' दयानन्द - जीवनचरित्र ' में लिखते हैं-
' इसके अतिरिक्त हमको भलीभांति विदित है कि- स्वा ०
850श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
८५०
दयानन्द सरस्वतीने अपने जीवनमें कई वेर अपनी सम्मतियाँ पलटीं । एक समय था कि- वे शिवमतको प्रतिपादन करते थे और रुद्राक्ष - कण्ठीमाला धारण करते थे । फिर एक समय आया कि — उसका खण्डन करने लगे । एक समय था कि-- वे मोक्षकी अवधि नहीं मानते थे, और उनको निश्चय था कि - सुक्त हुई आत्मा फिर देह धारण नहीं कर सकती, फिर वह समय आया कि उन्होंने अपनी सम्मति बदल ली, आदि आदि । किसको विदित है कि- यदि वे जीवित रहते, तो अपने जीवनमें और क्या - क्या सम्मतियां पलटते? जितनी आयु बढ़ती थी, उतनी ही विद्या और ज्ञान उनका अधिक होता जाता था । ऐसी अवस्थामें कौन कह सकता है कि- स्वामीजी निर्भ्रान्त थे? जो महाशय उनको निर्भ्रान्त मानते हैं; बे कृपाकर उस समयको भी प्रकट करें, जब कि वे निर्भ्रान्त हुए ( पृ ० १४२ पं ० ६ )
इससे स्पष्ट होगया कि - शिवरात्रि के मूषकसे उन्हें बोध नहीं हुआ, किन्तु भ्रान्तता बढ़ी । यदि बोध होगया होता; तो वे निर्भ्रान्त होगये होते । पर वे कभी भी निर्भ्रान्त नहीं हुए; यह हम नहीं कहते, किन्तु दृढ आर्यसमाजी नेता कह चुके हैं; जिस पर पर्दा नहीं डाला जा सकता ।
उक्त पुस्तकके १४ पृष्ठकी १४ पंक्तिमें ला लाजपतरायने लिखा है कि- ' एक वेर एक बालकने आप ( स्वा ० द ० ) की व्याकरणमें गलती पकड़ी । आपने तत्काल उस भूलको स्वीकार किया ' । क्या यही बोधका लक्षण है १? ॥ आरम्भ में स्वामीने ' संस्कृत वाक्यप्रबोध ' 851छपाया था । उसमें श्रीअम्बिकादत्त - साहित्याचार्यने ' अबोध- निवारण ' में स्वामीजी की १०० अशुद्धियां निकालीं । स्वा ० दयानन्द उसका उत्तर नहीं दे सके । द्वितीय - संस्करण में स्वामीजीने ' अबोध- निवारण ' पुस्तकके अनुसार संशोधन कर लिया । आज भी ' ऋग्वेदादि - भाष्यभूमिका ' की संस्कृतमें व्याकरणको भूलें हैं; क्या यही होता है बोध? यदि शिवरात्रिके दिन स्वामीजीको बोध हो जाता; तो उन्होंने योगानन्दजीसे योग, कृष्णशास्त्रीसे वेद, विरजा- नन्दजीसे व्याकरण क्यों पढ़ा १ स्पष्ट है कि - उन्हें चूहेसे अवोध प्राप्त हुआ था, बोध नहीं ।
( १३ ) ' उपदेशमञ्जरी ' के १५ वें व्याख्यानमें २३६ पृष्ठमें कहा
- ' एक दिन पूना शहरमें अपने जीवनचरित्रको सुनाते हुए इस चूहेकी घटनाका वर्णन स्वामीने किया कि - ' मैंने पिताजीको जगाकर पूछा कि - महादेव इस चूहेको हटाते क्यों नहीं? तब पिताजीने उत्तर दिया कि — तेरी बुद्धि तो भ्रष्ट है, यह तो केवल देवमूर्ति है । तब मैंने निश्चय किया कि- मैं इस त्रिशूलधारी - शिवको जब प्रत्यक्ष देखूंगा, तभी पूजा करूँगा, नहीं तो नहीं । '
इस व्याख्यानसे बात स्पष्ट हो गई कि – स्वा ० दयानन्द, बिना- तपस्या, बिना ही भक्ति - ज्ञानके, बिना ही परिश्रम ईश्वरके दर्शन करना चाहते थे । पीछे उसकी भक्ति करना चाहते थे; पर ' पहले होवे सेवा, फिर मिले मेवा ' | पहले होता है यत्न, फिर मिलता है रत्न । पर स्वामी उल्टी - गङ्गा बहाना चाहते थे । अनन्य- भक्तिके बिना भला भगवान् के दर्शन कैसे होते? । चूहेका तो 852केवल बहाना ही मिल गया ।
( १४ ) सत्यार्थप्रकाशके ७ म समुल्लास ११३ पृष्ठमें स्वामीने लिखा है — ' सहोसि सहो मयि धेहि । ' ( यजु ० १६।६ ) इसका अर्थ उन्होंने वहाँ यह किया है- आप ' निन्दा, स्तुति और स्व- अपराधियोंका सहन करने वाले हैं ' । यह परमात्मा के लिए कहा गया है । जो पुरुष मनमें द्वेष रखकर किसीके साथ नीचतासे व्यवहार करता है; वह अपराधी कहा जाता है । जब इस प्रकार स्वामीने स्वीकार कर लिया कि — परमात्मा निन्दा तथा स्व - अपराधको सहन करता है; तब श्रीमहादेव, आपसे अपराधी कहे जाते हुए चूहेको क्यों दण्ड देते? संसारके अपराधियोंको तो ईश्वर सह जावे; परन्तु उस चूहेका अपराध क्या इतना बड़ा था कि - जिसे प्रभु न सहते; ‘ किमाश्चर्य- मतः परम् ' । वस्तुतः यह बहुत लचर कुतर्क है; इसका विद्वानोंकी दृष्टिमें कोई मूल्य नहीं । हाँ बालबुद्धि अवश्य है; पर आज के युवा एवं आर्यम्मन्य वृद्ध - महाशय इसी पर लट्टू हैं ।
( १५ ) हम तो समझते हैं कि चूहा शिवरात्रि वाले दिन कुछ लेने आया था । जब सेठ, साहूकार वा राजा - महाराजाओंके घरों मैं उत्सव हुआ करते हैं; तब उनके नौकरोंको बड़ी खुशी होती है, क्योंकि उत्सवों में नौकरोंको इनाम दिया जाता है । नौकर तो प्रेमका झगड़ा करके भी मालिकसे ले लेते हैं; यहां तक कि -जब वे देखते हैं कि स्वामी आज बहुत प्रसन्न है; तो उसके कन्धे से रेशमी - दुपट्टा तक उतार लिया करते हैं । उदारचित्त - स्वामी भी प्रसन्न हो जाते हैं और जानते हैं कि आज इनका दिन है ।
853शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायको स्थापक
८५३
शिवरात्रिके दिन प्रभु - विश्वनाथके घर महोत्सव होता है । देश - विदेशमें इस दिन बड़ा समारोह होता है । यह भी प्रसिद्ध है कि— चूहा श्रीमहादेवके लड़के श्रीगणेशका वाहन है । इस महोत्सबके दिन गणेशवाहनके जातभाई चूहेने कुछ मांगा हो, वा प्रसन्नता से महादेवकी मूर्त्तिसे कुछ उतार लिया हो, तो यह तो उसका अधिकार था । तव इस अवसर पर महादेव उसे कैसे लौटाते? दाता थे प्रभु महादेवः लेनेवाला था - भृत्य चूहा । उन दोनोंके बीच दयानन्द ' दाल - भात में मूसलचन्द ' क्यों बनने गये १ क्या दयारामकी बाल्यकालिकता तो कारण नहीं थी?
मेघदूतमें लिखा है- ' ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बईं भवानी, पुत्रप्रेम्णा कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति । धौतापाङ्ग हरशशिरुचा पावके: ( कार्तिकेयस्य ) तं मयूरं, पश्चाद् अद्रिग्रहण- गुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ' ( पूर्वमेघ ४४ ) कविकुलगुरु- कालिदासके वाक्यमें सूचित किया है कि- हे बादल! पार्वती अपने पुत्र कार्तिकेयके वाहन मोरके पंखको अपने कानमें लगाती है कि— यह पंख मेरे पुत्रके वाहन मोरका है । इस प्रकार यदि पुत्रके वाहन मूषकको ही अपने विवाहके उत्सवमें क्यों रोकते? हा! स्वामीजी! पुत्र - रहित आपको प्रजाके वात्सल्य रसका क्या पता? मङ्गलाचरण ' आरम्भिक निबन्ध देखें ।
854* श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
कर्त्तव्य - कर्मोंकी कर्त्तव्यता तथा दुष्कर्मोंमें दण्डविधान बताते हैं, वा प्रायश्चित्त अनुशिष्ट करते हैं, वह सब मनुष्यों के लिए हैं, पशुओंके लिए नहीं । जन्मसे प्रारम्भ करके अग्निकी लपटोंमें भस्म होनेतक जितना धर्म - कर्म नियमित है, वह सब मनुष्य के लिए - है । मनुष्यके ही मुण्डन, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, विवाह आदि संस्कार यथाविधि हुआ करते हैं; परन्तु घोड़ा, ऊँट, चूहा बिलाव आदि पशुओंका शिरोमुण्डन, यज्ञोपवीत, गुरुकुलगमन आर्य- समाजी पण्डित भी नहीं कराते होंगे । न ही उनके लिए कोई ' संस्कार - विधि ' ही बनी हुई है । न ही उनकेलिए ऐसा व्यवहार उचित है; क्योंकि — वे खाना - पीना, सोना, आदिके अतिरिक्त इतना ज्ञान नहीं रखते कि — वे मनुष्य - नियमित धर्मबन्धनमें पढ़ें ।
मनुष्यों में यदि कोई माता वा बहिन आदि से अनुचित - सम्बन्ध करे; तो उसे महापतित समझा जाता है; परन्तु पशुओं में ऐसा बन्धन नहीं । वे प्रायः यथेष्टरूपसे इन सबमें सन्तान उत्पन्न कर लेते हैं; पर उन्हें कोई नीच नहीं कहता; इससे उन्हें कोई पाप भी नहीं माना जाता । मनुष्य कर्मयोनि होता है, वह जो कुछ भी करता है; उसे उसका फल भोगना पड़ता है । पशु भोगयोनि में गिना जाता है । वह जो कुछ भी इस शरीर से करता है, बिना विशेष कारण उसका फल उन्हें आगे के जन्ममें नहीं मिलता । वह तो पूर्वजन्म के कर्मफलको भोगनेकेलिए ही केवल उत्पन्न हुआ है । यदि उसे इस पशुजन्मके कर्मका फल भी अग्रिम जन्म में भोगना पड़े; तब तो उसका पशुयोनिसे पिण्ड ही न छूटे । इसी कारण ही
855शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक
= १५ पशु जाति
- धार्मिक दण्डों से मुक्त मानी जाती है ।
शास्त्रों में कहा है- ' आहारनिद्राभयमैथुनानि सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो, धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ' अर्थात् खाना, सोना, डरना और मैथुन करना, यह वातें तो जैसे पशुओं में होती है; वैसे मनुष्यों में भी । मनुष्यों में केवल धर्मकी विशेषता है । जिन मनुष्यों में धर्म नहीं है; वे पशुके समान होते हैं । अब पाठकगण जरा विचार करें कि— जिस मनुष्य में धर्म नहीं होता; उसे यदि पशुके समान माना जाता है; तो जो साक्षात पशु हो; उसकेलिए धर्म - बन्धन डालना तो अपने आपको पशु बनाना है । तब यह चूहा भी तो पशु ही था; तब इसके लिए धार्मिक बन्धन भला कैसे हो सकता है? चूहों के लिए कहीं न तो सन्ध्या - वन्दन लिखा है; न ही उनके लिए गुरुकुल कहीं खोले गये हैं; तब श्रीमहादेव उसे दण्ड क्यों देते? बालक दयानन्द अपने विज्ञानको स्वयं ही समझें ।
( १७ ) काम किया किसी दूसरेने; और नाम हुआ किसी दूसरे का । भूल में पड़ा तो बालक दयानन्द; पर अपराधी माना गया चूहा | बालक दयानन्दकी थोड़ी - सी उपासना से आशुतोष इतने शीघ्र प्रसन्न हुए कि उन्होंने दयानन्दकी मन द्वारा की हुई चूहेपर नालिश सुनी और उन्होंने चूहेको दण्ड विधान कर दिया । चूहेको उसके बादसे प्लेग शुरू हो गई । स्वामी दयानन्दजीका चूहा भी दक्षिण - पश्चिम दिशा से निकला । प्लेग भी दक्षिण दिशाके ही बम्बईके चूहे पर पहले - पहल शुरू हुई । प्राचीन धार्मिक रीति - रिवाजोंपर प्लेग 856• ६५६ श्रीसनातनधर्माखोक ( ५ )
( आ.सा. ) भी पहले दक्षिण से - बम्बई से शुरू हुआ । पर प्लेगका चूहा स्वयं भी बीमार होता है, कष्ट पाता है; मरता है, उसके संगसे दूसरे भी अपना जीवन खोते हैं; परन्तु शिवरात्रिका चूहा तो स्वामी दयानन्द को धर्मका रोगी बनाकर स्वयं भाग निकला । पर एक सम्प्रदायके स्थापनाका श्रेय अपने सिरपर लेकर निकल गया ।
छअब एक - दो बातें कहकर ही इस निबन्धको समाप्त किया जाता है । उसमें पहली बात यह है कि जब कभी आर्यसमाजियोंसे बातचीत होती है; तो वे कहते हैं कि - ' स्वामी दयानन्दजीने वेदों में मूर्त्तिपूजा न देखकर उसका खण्डन किया ' । परन्तु यह उनका भ्रम ही है । वस्तुतः यदि देखा जावे; तो चूहे के कारण ही उन्हें ऐसा करना पड़ा । वेदोंका उस समय उस बालकको ज्ञान नहीं था । घर से निकलकर बहुत समय भटककर तब श्रीकृष्णशास्त्री आदि से . उसने वेदका ज्ञान प्राप्त किया, और स्वामी विरजानन्दजीसे व्याकरणका । फिर वेदमन्त्रोंका अर्जुन -विमर्दन करके उनके अर्थ बदले ।
इस प्रकार पाठकोंने जान लिया होगा कि स्वामी दयानन्दजीकी इस चूहेवाली बाल्यलीला में कुछ भी तत्त्व नहीं; केवल आपाततो- दर्शी लोग कुछ संशय में पड़ जावें - यह सम्भव है; पर मूर्तिपूजा के महत्त्वपर इसका प्रभाव नहीं पड़ा । प्रतिवर्ष हजारों देवमन्दिर भारतमें नये बनते चले जा रहे हैं । केवल भारत में ही नहीं; अब तो अफ्रीका, अमेरिका एवं लण्डन आदि में भी अनेक मन्दिर बन चुके हैं । स्वामी दयानन्द के समय जितना मूर्त्तिपूजन था; अब 857उसकी अपेक्षा भी अधिक मात्रा में मिलता है । अब तो आर्यसमाजी अन्त्यजोंके मन्दिर - प्रवेश में आग्रह करते हैं और इस विषय में शास्त्रार्थ भी करते हैं ।
आर्यसमाजियोंमें उच्च - लोग देवमूर्तिका आदर करना भी मानने लग गये है, और दूसरोंके विश्वासका आदर भी वे करना चाहते हैं । तब इस विषय में व्यर्थ ही विवादोंको न बढ़ाकर इस- प्रकारके कार्यो में लग जाना चाहिये कि जिसमें भविष्यत् में जनता का कल्याण हो; और हिन्दुजातिमें फूट न होने पावे । श्रीमहादेव हमारी इस प्रार्थनाको स्वीकार करें और आर्यसमाजियोंको सुमति दें ।
हम तो समझते हैं कि - स्वामी दयानन्दजीकी यह जो कीर्ति फैली है; वह शिवरात्रिमें शिवाराधना के फलस्वरूप हुई है । उसके पिता आदि बान्धव सो गये, पर बालक दयाराम सारा दिन शिवरात्रिका व्रत करके आधी रात तक महादेव के ध्यान में रहा; परन्तु पीछे यदि वह अश्रद्धा धारण करके व्रत भङ्ग न कर देता; थोड़ा - सा समय और भी धैर्य और श्रद्धा से काम लेता; तो उसका यशरूप चन्द्रमा निष्कलङ्क होता । उसमें कुतर्क - प्रवृत्ति, प्रन्थोंका वास्तविक अर्थ बदलकर अपना मनघड़न्त अर्थ करना, और उसका पत्थर आदि खाना, तथा शोच्य - निधनप्रसङ्ग न होता । यह अवश्य उसके शिव व्रतभङ्गका तथा अन्तिम दिनों में महादेवकी निन्दाका ही दुर्विलसित है - इसमें कोई संशय नहीं ।
यह हमने शिवरात्रिपर्वके प्रसङ्गमें प्रसक्तानुप्रसक्त लिख दिया 858कि पाठकगण भी कहीं इस घटना के सन्देहमें न रह जावें । ( गो ० य ० कु ० भू ० शा ० )
( २४ ) होली विज्ञानकी कसौटीपर
हिन्दुओंके होली - पर्वको विदेशों में घृणित - दृष्टि से देखा जाता है, हमारे कुछ देशी भाई भी इससे नाक - भौं सिकोड़ते देखे गये हैं । हम इस पर शास्त्रीय, वैज्ञानिक, आयुर्वेदिक एवं लौकिक - दृष्टि- कोण से विचार करते हैं-
होलीका पर्व वहुत प्राचीन है । ' मीमांसादर्शन ' के भाष्यकार श्रीशबरस्वामीने भी सदाचरणके मुख्य - उदाहरणमें होलिकाको रखा है, पूर्वके प्रदेशमें इसका विशिष्ट - प्रचार माना है । होलीका प्रचार कबसे हुआ — यद्यपि इस विषय में सवका ऐकमत्य नहीं है; तथापि रक्षोघ्न ( राक्षस - नाशक ) मन्त्रोंसे अग्निमें हवि देनेसे राक्षसोंके दूर करनेका तथा नवसस्येष्टिका उद्देश्य करके इसका प्रचार अनादिकाल से ही प्रचलित है ।
इस पर शास्त्रीय दृष्टि यह है । यजुर्वेद वाजसनेयी संहिता के ' शतपथ ब्राह्मण ' में कहा है- ' याऽसौ फाल्गुनी पौर्णमासी भवति, तस्यै पुरस्तात् षडहे सप्ताहे वा ऋत्विज उपसमायन्ति, अध्वर्युश्च, होता च, ब्रह्मा च, उद्गाता च । एतान् वै अनु अन्ये ऋत्विजः ' ( १३ | ४ | १ | ४ ) तद् वै वसन्त एव अभ्यारभेत, वसन्तो वै ब्राह्मणस्य ऋतुः । य उ वै कश्च यजते, ब्राह्मणीभूयैव [ ब्राह्मणवद् ] यजते ' ( शत ० १३ | ४ | १ | ३ ) ।
इससे प्रतीत होता है कि वैदिक कालमें फाल्गुन पूर्णिमा में
859होली विज्ञानकी कसौटीपर
अश्वमेध यज्ञको प्रथा थी; उसका कार्यक्रम फाल्गुन शुक्ल अष्टमीके बाद प्रारम्भ हो जाता था । अवमेध यज्ञके समय कुछ अश्लील भाषण तथा परिहास भी हुआ करता था - यह शुक्ल यजुर्वेद ( वाज ० ) संहिताके २३ २२ मन्त्र से २३ | ३१ मन्त्र तक दस मन्त्रों में • प्रत्यक्ष है । इसका संकेत हम ' श्रीमहीधर का अर्थ में कर चुके हैं । इस मूलको लेकर होलीके इस समय में अग्नि प्रज्वलन किया जाता है, तथा अश्लील भाषण और दूसरों से छेड़छाड़ की जाती है ।
ऐसी बात नहीं मान लेनी चाहिये कि - ' वेद में अश्लील भाषण भला कैसे हो सकता है? ' वेदोक्त - कर्म ' त्रैगुण्यविषया वेदाः ' ( भगवद्गीता २।४५ ) त्रैगुण्यविषय होनेसे राजसत्व और तामसत्व से सर्वथा पृथक् नहीं किये जा सकते । भोजन करनेपर शरीर में मल भी तो अवश्य होता है; उसके बहिष्कारसे अपनी शुद्धि करना पुरुषोंका कर्त्तव्य हुआ करता है । इस प्रकार कर्मकाण्डमें भी राजस- तामस अंश अनिवार्य रूपसे आता ही है; उसका शोधनरूप प्रायश्चित्त भी मध्य - मध्य में आया ही करता है । जैसे कि - राक्षस वा असुर देवता वाले मन्त्रोंके उच्चारण करनेपर जलस्पर्श ही प्रायश्चित्त हुआ करता है । इसी कारण वैवाहिक यज्ञमें यम आदि क्रूर - देवताओंके मन्त्रोच्चारणके अवसर पर ' प्रणीतोदक - स्पर्श ' प्रसिद्ध ही है ।
इसी प्रकार अश्वमेध यज्ञमें भी सम्भावित पापको शान्त करनेकेलिए जलदेवके प्रति प्रार्थना आई है- ' इदमापः प्रवहत अवद्य ं च मलं च यत् । यच्चाभिदुद्रोह अनृतं यच्च शेपे अभी- 860रुणम् । आपो मा तस्माद् एनसः पवमानश्च मुञ्चतु ' ( यजुर्वेद - वाज ० सं ० ६।१७ ) ।
यहां पर ' अनृतम् अभिदुद्रोह, यच्च भीरुणं शेपे ' इन पदोंसे गाली देना, अश्लील- भाषण, किसीसे छेड़ -
छाड़ करना, परिहास करना इत्यादि अभिव्यक्त हो रहे हैं । उससे सम्भावित - पापों की निवृत्त्यर्थ जलके स्पर्शसे जलदेवकी प्रार्थना की गई है । इस प्रकार होलीकी अश्लील भाषण - परिपाटी अथवा उपहासकी परिपाटी वेदमूलक ही है । वसन्तके धारम्भिक उत्सव में रङ्गोंका डालना ईश्वरीय सृष्टिके स्वभावका अंशत: अनुकरण है - यह बात वसन्त- ऋतु प्रत्यक्ष ही है, विशेषतः लाल - पीला रंग इस ऋतु में देखा गया है । इसपर हम पूर्व ' वसन्त पंचमी ' में संकेत दे चुके हैं ।
( २ ) इसी प्रकार श्रौतस्मार्त्त - नवसस्येष्टिके समय में नूतन जौ, चावल, गेहूँ आदिकी नवान्नेष्टिं भी प्राचीन समय में हुआ करती थी । क्योंकि — नवीन -अन्नकी उत्पत्ति होनेपर जब तक उसे यज्ञ- द्वारा देवताओंको अर्पण नहीं किया जाता था; तब तक उसको उपयोगमें नहीं लाया जाता था । यज्ञ हिन्दुओं का प्राचीन व्यवहार है । क्योंकि उनका विश्वास है कि कृषिसे जो अन्न हमने प्राप्त किया है; वह हमें देवताओंने ही दिया है । तब - ' त्वदीयं वस्तु गोविन्द! तुभ्यमेव समर्प्यते ' इस न्याय से – ' तैर्दत्तान् अप्रदायै- भ्यो यो मुक्के स्तेन एव सः ' इस ' भगवद्गीता ' के वचनानुसार वे अग्निके द्वारा उसे देवताओं को देते हैं । वही यह नवान्नेष्टि- होली है । उसके बाद वे उस अन्नका उपयोग करते थे । संस्कृत में भुने
In English
The Mouse and the Statue of Shiva
This text describes a childhood event involving Dayananda Saraswati, who saw a mouse eating offerings from a statue of Shiva. This sight led him to question the power of idol worship, eventually influencing his founding of the Arya Samaj. The author argues that the divine nature of Shiva includes providing for all creatures, including animals.
This chapter answers
- Why did dayananda saraswati reject idol worship?
- What happened during dayananda's childhood on shivaratri?
- How does the arya samaj explain the story of the mouse and shiva?
- Did dayananda saraswati change his direction of prayer because of a mouse?
Also written: Shivaratrika, Mushaka, Eka, Sampradayaka, Sthapaka, Shivaratrika Mushaka Eka Sampradayaka Sthapaka, शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक