पञ्चम सुमन · प्रकरण 6
षोडश संस्कार- रहस्य
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199पर हमारे ऋषि - मुनि तो और भी दूर गये हैं । वे कहते हैं कि गर्भ भी वालककी एक अवस्था है । बालक गर्भरूप भी सीखा करता है । अभिमन्युने गर्भ में ही चक्रव्यूह - प्रवेश सीखा था । जबसे गर्भमें चैतन्य - संचार होजाता है, तबसे बालक सीखा करता है । गर्भका ही प्रथम संस्करण बालक है, बालकका ही द्वितीय संस्करण युवा है और तृतीय संस्करण वृद्ध । तभीसे हमें आदर्शरूप बनना चाहिये । केवल बाहर से ही नहीं; किन्तु अन्तरङ्ग भी हमें वैसा बनाना चाहिये; क्योंकि माताके विचारोंका भी गर्भ पर प्रभाव पड़ता है ।
यह गर्भावस्था भी कुछ दूरकी है । निषेक ( गर्भाधान ) बालककी सबसे पूर्वकी और सूक्ष्म अवस्था होती है । इसमें भी माता - पिता के जैसे आचार - विचार - विहार होंगे, उनका संस्कार गर्भस्थ बालक पर अवश्य पड़ेगा — यह विज्ञान हमारे दूरदर्शी ऋषि - मुनियोंने ही निकाला था । प्रत्युत वे इससे भी आगे पहुँचे । उन्होंने अनुसंधान करके यह भी बता दिया कि जब स्त्री ऋतुमती हो तब एकान्त में बैठे । ऋतुस्नान करके फिर पतिके दर्शन करे, अथवा उस समय शीशेमें अपनी आकृति देखे तो सन्तान वैसी ही होगी ' पूर्वं पश्ये-
दृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना । तादृशं जनयेत् पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥
( सुश्रुत ० शारी ० २।२६ )
कितनी ' दूर
दूर ' पहुँचे हैं वे, फिर इससे भी दूर पहुँचते हुए उन्होंने स्त्रीको गृहक्षेत्र देकर और बाह्य - संसारसे उसका सम्बन्ध हटवाकर उसे, तथा हमारे परिवार, प्रत्युत हमारी हिन्दु - संस्कृतिको भी सुरक्षित 200. कर दिया । विचारने पर यह उनकी बहुत सूक्ष्मदर्शिता सिद्ध होती है । ' मनुस्मृति ' में कहा गया है - ' स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च । स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ ( ६७ ) ' तस्मात् प्रजाविशुद्ध्यर्थं स्त्रियं रक्षेत् प्रयत्नतः । ' ( ६ ) इसी संस्कृतिकी रक्षारूप दूरदर्शिताका नाम ऋषि - मुनियोंने ' संस्कार ' रक्खा था ।
हिन्दुधर्म में संस्कारोंका कितना महत्त्वपूर्ण स्थान है? संस्कारों " का क्या लाभ है और उसके कौन अधिकारी हैं? संस्कार कितने
१ संस्कारोंमें किसका क्या मत है? प्रत्येक संस्कारका क्या रहस्य है? इस विषय में हिन्दुमान्त्रको ज्ञान रखना आवश्यक है । इस आकांक्षाकी पूर्तिकेलिए हम प्रयत्न करते हैं ।
संस्कार - महत्त्व
संस्कारका लाभ जगत्प्रसिद्ध है । जव सोना खानसे निकलता है तब वह मलिन होता है । जब तक उसका संस्कार नहीं किया जाता, तब तक सुवर्ण सुवर्ण नहीं बनता । उस समय वर्तमान संस्कृत अवस्थाके समान उसकी चमक - दमक, आकृति एवं मूल्य आदि नहीं हुआ करता । इस कारण सुवर्णका संस्कार करके उसे सु - वर्ण बनाया जाता है । उसे इस प्रकारका बनानेकेलिए पहले उसका मार्जन करना पड़ता है — यह उसका दोष - मार्जक संस्कार होता है । संस्कार के बिना कृत्रिम और अकृत्रिम सुवर्णकी परीक्षा भी सम्भव नहीं होती । संस्कार द्वारा ही सब पदार्थ व्यवहारोप- योगी हो जाते हैं ।
किसी पदार्थमें दोष - निराकरणपूर्वक गुणोंको उत्पन्न करना ही 201उसका संस्कार कहा जाता है । जब तक किसी पदार्थका संस्कार नहीं होता, तब तक वह सदोष और गुणहीन रहता है । संस्कार होने पर ही उस पदार्थके दोष दूर होते हैं और गुण प्रकट होते हैं । जब तक हीरेको शारण पर संस्कृत नहीं किया जाता, तब तक हीरेका न तो मिट्टीका आवरण ही हटता है, न उसमें चमक ही आती है । इस प्रकार शारण - संस्कारके बिना तलवारकी न तीक्ष्ण धार बनती है, न उसमें छेदनकी शक्ति प्राप्त होती है । जब ये वस्तुएँ शाणमें संस्कार पाती हैं, तभी उक्त दोष दूर होते हैं और गुण प्रकट होते हैं । गुण प्रकट होनेसे ही उनका मूल्याङ्कन होता है । जाति यदि स्वरूपकी सत्ताको देती है; तो संस्कार उसका उत्कर्ष उत्पन्न करते हैं । एक लोहा जिसकी साधारण - सी जाति है, संस्कार को प्राप्त करके घड़ीके बाल - कमानी आदि पुर्जे के रूपमें आता है; तब वह लोहा रहता हुआ एक घड़ी एवं उसका आत्मा बनकर महामूल्यवान् होजाता है । कभी - कभी तो विशेष सारंगियोंका तार . बनकर सुवर्ण से भी महँगा बिकता है । यह संस्कारकी महिमा है ।
संस्करणका नाम ' संस्कार ' होता है । सम् उपसर्गसे कृब् धातुको घन् प्रत्यय करने पर और ' सम्परिभ्यां करोतौ भूषणे ' . ( पा ० · ६।१।१३७ ) इस सूत्र से भूषण - अर्थ में सुट् करने पर ‘ संस्कार ’ • शब्द बनता है ।. सोनेका खानसे निकलने पर उसका मल हटाना यह उसका पहला दोषमार्जक संस्कार होता है; तब हम यदि उसका भूषण बनाना चाहें, तो उसे अग्निमें तपाकर, हथौड़ेसे उसे पीटकर, छैनीसे उसे जहाँ - तहाँ काटकर, यन्त्र- विशेषसे उसे घिसकर 202तब उसका भूषण बनता है - यह उसका हीनाङ्गपूरक संस्कार होता है । फिर उसमें हीरा एवं मोती रत्न आदिको यथास्थान खचित ( जड़ना ) किया जाय तो यह उसका अतिशयाधान - संस्कार होगा । इससे सोना बहुत सुन्दर, उपादेय तथा बहुमूल्य होजाता है । लकड़ी में भी बढ़ई द्वारा संस्कार करने पर उसकी बहुमूल्यता हो जाती है । जब जड़ वस्तुओं में भी संस्कारसे इस प्रकारकी . विलक्षणता हो जाती है, तब मनुष्योंका तो क्या कहना?
फलतः सांसारिक सब पदार्थोंकी यदि उपयोगिता इष्ट हो तो उनका संस्कार अवश्य अपेक्षित होगा । इस प्रकारकी कोई वस्तु नहीं मिलती, जिसका कार्योपयोग केलिए संस्कार न किया जाता हो । इस प्रकार मनुष्यका भी स्वरूप संस्कारसे ही यथार्थतः प्रकाशित होता है । संस्कारसे ही मनुष्यता प्राप्त होती है । संस्कार से ही मनुष्यका दृष्ट- अदृष्ट मल प्रक्षालित होता है । सोलह संस्कारोंका भी यही लाभ होता है । माता - पिताके रजोवीर्यगत दोषके कारण सन्तानमें शारीरिक और मानसिक बहुत सी त्रुटियाँ रह सकती हैं, -उनको दूर करने तथा पापोंको हटानेकेलिए संस्कारोंका यथाधिकार उपयोग हुआ करता है । जैसा कि मनुस्मृति में कहा है-
गार्होमैर्जातकर्म चौडमौञ्जीनिबन्धनैः । बैजिक गार्भिकं चैन द्विजानामपसृज्यते ॥ ( २।२७ ) वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्वि- जन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ॥ ( २।२६ )
. यहाँपर शारीरिक संस्कारको इस लोक तथा परलोकमें पावन 203तथा वीजगत एवं गर्भगत दोषोंका दूर करनेवाला माना है । इनमें गर्भाधान, जातकर्म, अन्नप्राशन आदि संस्कार - द्वारा दोषमार्जन होता है । चूड़ाकर्म, उपनयनादि संस्कारों द्वारा हीनाङ्गपूर्ति होती है । गृहाश्रम, संन्यासाश्रम आदि संस्कारोंके द्वारा अतिशयाधान होता है । पुरुष इनसे ' सत्यं शिवं सुन्दरम् ' स्वरूपको प्राप्त करता है । शरीर, आत्मा एवं मन संस्कृत हो जाते हैं । ऋषियोंने संस्कारोंके सोलह प्रकाशस्तम्भ नियत किये हैं । वे उस मार्ग के अधिकारियोंको यथावत् मार्गनिर्देश करते हैं । इन संस्कारोंके प्रकाशमें जो जाता है, वह चन्द्रमाकी तरह षोडशकलापूर्ण होकर संसारमें प्रकाशित होता है । ये संस्कार धर्मरूप चावलोंकी रक्षा के लिये उसकी ऊपर की त्वचा हैं 1
। इसी त्वचासे धर्मरूप चावलोंका परिपोषण एवं वृद्धि होती है ।
संस्कारोंके अधिकारी
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यारूयो द्विजाः ।
निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ॥ ( १।२।१० )
इस याज्ञवल्क्यके वचनसे द्विज - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंके गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टितक सभी संस्कार मन्त्रसहित होते हैं । शूद्रोंके सब संस्कार नहीं होते । उनके श्राश्रम संस्कार तो होते ही नहीं; केवल गृहाश्रम ही विना वेदमन्त्रोंके होता है । ब्रह्मचर्याश्रम भी शूद्रोंका वैध नहीं होता; इस प्रकार उनके उपनयन - वेदारम्भ- समावर्तन आदि संस्कार भी नहीं होते । जब कि श्रीमनुजी के ' योऽनधीत्य द्विजो वेदम्... स जीवन्नेव शूद्रत्वम् ' ( २।१६८ ) ' स 204शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ' ( २/१०३ ) इन वचनोंको वादी - प्रतिवादी सभी अप्रक्षिप्त स्वीकृत करते हैं; तब शूद्रोंके वेदान- धिकारवश उसके उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन आदि संस्कार भी नहीं होते । उनके जो कई संस्कार होते हैं वे अमन्त्रक, पौराणिक एवं तान्त्रिक मन्त्रोंसे होते हैं; जैसे कि - ' व्यासस्मृति ' में भी लिखा है-
' नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्ज क्रियाः स्त्रियाः ।
विवाहो मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्यामन्त्रतो दश ' ॥ ( १।१६-१७ )
वैध ब्रह्मचर्याश्रम स्त्रियोंका भी नहीं होता; विवाह ही उनका द्विजत्वाधायक संस्कार होता है । श्रीमनुजीने कहा है- ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ' ( २२६७ ) अर्थात् — स्त्रियोंका विवाह ही उनका उपनयन एवं वेदारम्भ होता है, क्योंकि स्त्रियोंका पति से व्यतिरिक्त गुरु न होनेसे पतिके पास विधिपूर्वक नयन तथा उससे उन्हें उपवस्त्रकी प्राप्ति और उसे यज्ञोपवीत - सूत्रकी तरह लपेट लेना ही उसका उपनयन और विवाहसम्बन्धी एवं यज्ञोपयुक्त स्त्रीसम्बन्धी कई विशिष्ट मन्त्रोंका पतिरूप गुरुके श्राश्रयसे उच्चारण ही उनका वेदारम्भ होता है । स्त्रियोंका स्वतन्त्रतासे न तो उपनयनका विधान है, न वेदारम्भका, गुरुस्थानीय पतिके पास निवास और पतिकी सेवा करना ही उनका गुरुकुलवास होता है, घरके काम - काज करके, गृहपतित्व प्राप्त करके, पतिको घरके कामोंसे निश्चिन्त करके उसके विद्या, पठन - पाठन आदि कमोंमें असुविधाओंको 205हटाना, उसकी यज्ञादि सामग्री जुटाना, समिधाओंका परिमारणा- नुसार काटना, यज्ञमें पतिके साथ बैठना, अपने घरसे लायी गयी वैवाहिक अग्निको कभी भी बुझने न देना, उसीमें ही बलिकर्म तथा पाकक्रिया - निष्पादन - यही पत्नीका अग्निहोत्र - विधान है ।
जब इस प्रकार पत्नी अनायास ही ' द्विज ' हो जाती है, पति- कर्तृक यज्ञादि धर्म - कर्मकी और स्वर्गादिक फलकी इच्छाकी अधिकारिणी हो जाती है तो उसे अन्य क्या चाहिये? ' अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्? ' वैसे सोचा जाय तो घरके काम - धन्धे, पतिके धर्मकर्म में विघ्न न आने देना - इत्यादि कार्य भी बहुत कठिन हैं । पतिसे यह सम्भव नहीं । पतिकेलिए यह कृत्य . उसके धर्म - कर्म में विघ्न डालनेवाले तथा उसके अर्थकार्य में धक्का - पहुँचानेवाले हैं; तब उसमें सहायता पहुँचानेवाली, उसकी अभि- न्नताको प्राप्त हुई पत्नी भला पतिके धर्म - कर्मके फलमें अधिकारिणी हो भी क्यों नहीं?
वस्तुतः विचारा जाय तो पति - पत्नी एक - दूसरे के शेष पूरक हैं? जिस कार्यको एक नहीं जानता या नहीं कर सकता, उसको दूसरा पूर्ण करता है । पति यदि विदेशमन्त्री है तो पत्नी स्वदेशमन्त्रिणी है । पति बाहरका स्वामी है तो पत्नी घरकी । पति यदि दाहिनी आँख है तो पत्नी बायीं । पति यदि दाहिनी भुजा है तो पत्नी बायीं । पति यदि दाहिनी जाँघ है तो स्त्री बायीं । पति यदि साइकलका अगला पहिया है तो पत्नी पिछला । पति यदि रथका . दाहिना पहिया है तो पत्नी बायाँ । पति यदि द्वारका दाहिना 206किवाड़ है तो पत्नी बायाँ । इस प्रकार पति - पत्नी एक देहके गौरी - शङ्कर हैं; चतुर्भुज लक्ष्मी - नारायण हैं; सीता - राम हैं । अपने- अपने अधिकारमें रहना ही, समय - समयपर एक - दूसरेकी सहायता करना ही व्यवस्था स्थापन है । पति ' पोषक ' होता है, पत्नी ' पोष्या ' होती हैं । उसी पतिकी संतानकी ' पोषक ' भी होती है । फलतः पत्नीको स्वतन्त्र कुछ भी कार्य नहीं होता । पतिका संन्यासी होना या स्वर्गवासी होना — यही पत्नीका संन्यास होता है- इससे भिन्न नहीं ।
संस्कारों की संख्या
' गौतमधर्मसूत्र ' में ४० संस्कार कहे गये हैं- ' चत्वारिंशत्संस्कारैः संस्कृतः ' ( १ । ८ । ८ ) । वे संस्कार ये हैं -१ गर्भाधान, २ पु'सवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ अन्नप्राशन, ७ चूड़ा- कर्म, म उपनयन, ६-१२ चार वेदोंके व्रत, १३ समावर्तन, १४ विवाह, १५ देवयज्ञ, १६ पितृयज्ञ, १७ अतिथियज्ञ, १८ भूतयज्ञ, १६ ब्रह्मयज्ञ ( यह पञ्चममहायज्ञ ), २० श्रावणीकर्म २१ आश्विनी- कर्म, २२ आग्रहायणी - कर्म, २३ चैत्रकर्म, २४ अग्न्याधान ( श्रौत एवं स्मार्त ), २५ नित्याग्निहोत्र, २६ दर्श- पौर्णमासयाग, २७ चातुर्मास्य ( वश्वदेव, वरुणप्रघास, शाकमेध, शुनासीरीय ), २८ आमयणेष्टि ( नवान्नेष्टि ), २६ निरूढपशुयाग, ३० सौत्रामणीयाग ( यह सात हविर्यज्ञ ), ३१ अग्निष्टोम, ३२ अत्यग्निष्टोम, ३३ उक्थ्य, ३४ षोडशी, ३५ वाजपेय, ३६ अतिरात्र, ३७ आप्तोर्याम - ( यह सात सोमयाग ), ३८ पितृमेध ( पिण्डपितृयज्ञ ), ३६ अष्टका श्राद्ध, ४० पार्वणश्राद्ध ।
207घोडश संस्कार - रहस्य
( गौतम - धर्मसूत्र ११८ १४ - २२, गौतम - स्मृति ( ३ ) । १ दया, २ शान्ति, ३ अनसूया, ४ शौच, ५ अनायास, ६ मङ्गल, ७ अकार्पण्य, अस्पृहा – इन आठ आत्म - गुणोंके साथ गौतमने ४८ संस्कार कहे हैं ।
अङ्गिराने ये पच्चीस संस्कार कहे हैं -१ गर्भाधान, २ पु सघन, ३ सीमन्त, ४ विष्णुबलि - कर्म, ५ जातकर्म, ६ नामकर्म, ७ निष्क्रम, ८ अन्नप्राशन, ६ चूडाकर्म, १० उपनयन, ११-१४ चारों वेदोंके वेदारम्भ, १५ स्नान ( समावर्तन ), १६ विवाह, १७ आग्रयण, १८ अष्टका, १ ९ श्रावणीपर्व, २० आश्विनीपर्व, २१ मार्गशीर्षीपर्व, २२ पार्वण, २३ उपाकर्म, २४ उत्सर्ग, २५ नित्यमहायज्ञ ।
‘ व्यासस्मृति ' ( १।१३-१४-१५ ) में ये १६ संस्कार कहे गये हैं- १ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्त, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ वपन, ( चूड़ाकर्म ), ६ कर्णवेध, १० व्रतादेश, ( उपनयन ) ११ वेदारम्भ, १२ केशान्त, १३ स्नान ( समावर्तन ), १४ विवाह, १५ विवाहाग्निपरिग्रह, १६ त्रेताग्निसंग्रह । कई विद्वान् यहाँपर ' चिताग्निसंग्रह ' पाठ मनाते हैं । सनातनधर्मके प्रसिद्ध विद्वान् श्री पं ० भीमसेन शर्माजीने १५ वें संस्कारका नाम ' आवसथ्याधान ' और १६ वेंका नाम ' श्रौताधान ' कहकर यही १६ संस्कार अपनी ‘ षोडशसंस्कारविधि ' में निरूपित किये हैं ।
श्रीजातूकर्ण्यने ये १६ संस्कार गिनाये हैं -१ आधान, २ पुस- वन, ३. सीमन्त, ४ जातकर्म, ५ नाम, ६ अन्नप्राशन ७ चौलक, ८ मौजी, ६-१२ चतुर्वेद - व्रत, १३ गोदान ( केशान्त ), १४ समावर्तन, 208१५ विवाह, १६ अन्त्य । ' शूद्राणां चैव भवति विवाहश्चान्त्यकर्म च ' शूद्रोंके उसने दो संकार माने हैं- १ विवाह, २ अन्त्यकर्म । ये १६ संस्कार ब्राह्म कहे जाते हैं, पाकयज्ञ आदि दैव कहे जाते हैं ।
आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीने अपनी ' संस्कार- विधि में १ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, चूड़ाकर्स, ६ कर्णवेध, १० उपनयन, ११ वेदारम्भ, १२ समावर्तन, १३ विवाह, १४ गृहा- श्रम, १५ वानप्रस्थ, १६ संन्यास, १७ अन्त्येष्टि —ये १७ संस्कार कहे हैं । गृहाश्रमको भी उन्होंने पृ ० १७६ में ' संस्कार ' कहा है, अन्त्येष्टिको भी २८८ पृष्ठमें ' शरीर के अन्तका संस्कार ' कहा है । उक्त पुस्तककी सूची बनानेवालोंने ' अन्त्येष्टि ' के साथ ' संस्कार ' न लिख- कर ' अन्त्येष्टिकर्म ' शब्द लिख दिया है । पर स्वामीजीने गर्भाधान प्र ० ( पृ ०३१ ) में अन्त्येष्टिपर्यन्त १६ संस्कार माने हैं; अथवा गृहाश्रम- को विवाहसे पृथक संस्कार न गिनना चाहिये ।
सनातनधर्मके विख्यात - व्याख्याता भारतधर्म- महामंडल के श्रीस्वामी दयानन्दजीने अपने ' धर्मविज्ञान ' में १? गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ अन्नप्राशन, ७ चूडाकरण, ८ उपनयन, ६ ब्रह्मव्रत, १० वेदव्रत, ११ समावर्तन, १२ विवाह, १३ अग्न्याधान, १४ दीक्षा, १५ महाव्रत, १६ संन्यास – ये संस्कार कहे हैं ।
संस्कारोंकी संख्या में भेदका कारण
उक्त संस्कारों में बहुतसे विद्वान् कर्णवेध को नहीं मानते । उपनयन 209और वेदारम्भको पृथक् - पृथक् संस्कार गिनते हैं । कई विद्वान् केशान्तको पृथकू न गिनकर उसका समावर्तनमें अन्तर्भाव मानते हैं । वे भी उपनयन तथा वेदारम्भको पृथक् - पृथक् गिनते हैं, विवाह तथा गृहाश्रमको एक संस्कार मानते हैं । कई विद्वान् आवसध्याधान तथा श्रौताधानको पृथक् - पृथक् संस्कार गिनते हैं 1 । वे वानप्रस्थ तथा संन्यास एवं अन्त्येष्टिको संस्कारोंमें नहीं गिनते ।
गौतमस्मृतिमें चालीस संस्कार माने गये हैं - यह पहले दिखलाया जा चुका है, उसमें पहला संस्कार ' गर्भाधान ' कहा है, पिण्ड - पितृयज्ञको भी संस्कारों में गिना है, यही स्पष्ट अन्तिम ' पितृमेध ' है । श्रीजातूकर्ण्यने जिसका प्रमाण म ० म ० पं ० नित्यानन्दजीने अपने ' संस्कारदीपक ' में उद्धृत किया है - आदिम संस्कारका नाम ' आधान ' तथा अन्तिमका नाम ' अन्त्य ' कहा है, स्पष्ट है कि यह ' अन्त्येष्टि ' है । ' मनुस्मृति ' में ' भार्यांयै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाग्नीन् अन्त्यकर्मणि ' ( ५।१६८ ) यहाँपर ' अन्त्यकर्म ' कहा है, स्पष्ट है कि यह ' अन्त्येष्टि ' है ।
' निषेकादिश्मशानान्तो - १ ( २/१६ ) इस मनुके वचन में आदिम संस्कार निषेक ( गर्भाधान ) तथा अन्तिम ' श्मशान ' कहा है । इसी श्मशानक्कत्यका नाम मनुने ५६५ पद्यमें ' पितृमेध ' कहा है । ' निषेकादीनि कर्माणि ' ( २।१४२ ) इस मनुवचनमें ' निषेक ' आदि कर्मका नाम कहा है । ' निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः । ’ ( २।२६ ) इस मनुपद्यमें निषेकादिको शरीरका संस्कार कहा है । मनुजीको यहाँ आदि पदसे ' श्मशान ' ही इष्ट प्रतीत होता है; 210क्योंकि — अन्तिम कमें वे २।१६ पद्यमें वही कह चुके हैं । श्रीयाज्ञ- वल्क्यने भी—— ' ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः । निषेकाद्याः श्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः । ( १/२/१० ) यहाँपर आदिम गर्भाधानकी तथा अन्तिम क्रिया श्मशानकी मानी है । तब पितृमेधमें भी शरीरका संस्कार ही फलित हुआ । संस्कृत अग्निसे शरीरके दाहसे उसके आत्माकी परलोकमें सद्गति होती है । इसलिए संस्कृतों का पितृमेध न होकर पृथ्वीनिखनन ही होता है, मुसल्मानोंका मरनेपर गाड़ा जाना अथवा हिन्दु होते हुए भी मल- कानोंका गाड़ा जाना इसका साक्षी है ।
सोलह संस्कार
हम मनुस्मृतिके अभिप्रायको लेकर १ निषेक ( गर्भाधान ), २ पुंसवन ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ चूडाकरण, ६ कर्णवेध, १० उपनयन - वेदारम्भ ( ब्रह्मचर्य व्रत ), ११ केशान्त, १२ स्नान- समावर्तन ( ब्रह्मचर्य समाप्ति ), १३ विवाह, स्मार्त एवं श्रौत अग्न्याधान, १४ वानप्रस्थ, १५ परिव्रज्या, १६ पितृमेध - ये सोलह संस्कार कहेंगे । इनमें विद्वानोंके मतभेद होनेपर भी इनमें पूर्वोक्त सभी संस्कारोंका अन्तर्भाव हो जाता है ।
‘ मनुस्मृति ' में ‘ गार्भैर्होमैः ' ( २।२६-२७ ) इस वचनसे गर्भसंस्कार गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन इष्ट हैं जो कि सर्वसम्मत हैं । चौथा जातकर्म मनुके ( २२ ९ ) पद्यमें, पांचवां नामकरण ( २/५० ) पद्यमें, छठा - सातवाँ निष्क्रमण तथा अन्नप्राशन ( २।३४ ) पद्यमें, आठवाँ चूडाकरण ( २।३५ ) पद्यमें है । नौवां कर्णवेध मनुस्मृति-
211पृथक् न होनेपर भी. ' शुभे रौक्मे च कुण्डले ' ( १४।३६ पद्य ) में स्पष्ट है, सुश्रुत - चरकादिमें भी स्पष्ट है । दसवाँ संस्कार उपनयन मनु २।३६-६४ पद्यमें और ब्रह्मारम्भ २७१ - १४०-१७३ पद्यमें, ग्यारहवाँ केशान्त ( २।६५ ) श्लोकमें बारहवाँ स्नान ( समावर्तन ) २ । १०८ - २४५ श्लोकमें तथा ३।४ पद्यमें, तेरहवाँ विवाह - गृहाश्रम ३।२, ४/१ पद्यमें, चौदहवाँ वनवास ६ २ पद्य में, पन्द्रहवाँ परिव्रज्या ६ । ३३ पद्यमें कहा है । १६ वाँ पितृमेध मनुजीके मतमें पूर्व दिखाया ही जा चुका है ।
परन्तु कई विद्वान् पितृमेधकर्मको तो स्वीकार करते है. पर उसे संस्कार नहीं मानते । वस्तुतः वह भी शरीर - संस्कार ही है । उसके संस्कृत होने से ही वेदादिमें उसके आत्माकी सद्गति मानी जाती है । वेदमें इस प्रकारके मन्त्र आते हैं, जिनसे सूचित होता है कि मृतक कच्चा न रह जाय, पूरा जल जाय । ईसाई - मुसलमान आदिका संस्कारोंमें अधिकार न होनेसे ही उनके शरीरको भूमिमें गाड़ा जाता है, अग्निसंस्कार उनका नहीं किया जाता । ' नास्य कार्योऽग्निसंस्कारो न च कार्योदकक्रिया ' ( ५२६६ ) इस मनुजीके वचन से संस्कारानई बालकोंका भी अग्निसंस्कार कहा गया है; अतः वह भी संस्कारोंमें गिने जाने योग्य है ।
वस्तुतः संस्कारोंका वर्गीकरण किया जाय, तो यह स्पष्ट दीखता है कि मोक्ष - धाममें जानेकेलिए ब्रह्मचर्याश्रम, गार्हस्थ्याश्रम, वान- प्रस्थाश्रम, संन्यासाश्रम - यह चार जंक्शन स्टेशन हैं । यह शुक्रमें आनेके दिनसे लेकर आगकी लपटोंमें समा जानेतक जीवनको 212सुसंस्कृत बनानेवाले हैं । इनमें वीर्य में जानेसे लेकर जन्मतक १ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म संस्कार हैं । फिर उसी जात ( उत्पन्न ) के साथ संबन्ध रखनेवाले ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ चूडाकरण, ६ कर्णवेध -- यह पांच संस्कार हैं । फिर ब्रह्मचर्याश्रमके १० उपनयन वेदारम्भ, ११ केशान्त, १२ समावर्तन — यह तीन संस्कार हैं कुल बारह संस्कार हुए । मनुजी से कहे केशान्तको ' वेदारम्भ ' कहना ठीक नहीं; अन्यथा वेदारम्भ १६ वें वर्ष में करना पड़ेगा - ' केशान्तः षोडशे वर्षे ' ( मनु ० २।६५ ) गोभिलके मतमें भी केशान्त समावर्तन है, वेदारम्भ नहीं । उपनयन के पीछे वर्णित होनेसे ' केशान्त ' वेदारम्भ नहीं हो जाता ।
फिर गृहस्थाश्रमका संस्कार ( १३ ) विवाह एवं अग्न्याधान है । तब ब्रह्मचर्याश्रम एवं गृहस्थाश्रमके सहचारी वानप्रस्थ आश्रम तथा संन्यास आश्रमका होना भी अनिवार्य है । वानप्रस्थ तथा संन्यासाश्रम्- में प्रविष्ट होनेकेलिए जो विधि अवलम्बित की जाती है, वही इन संस्कारोंकी विधि हो जाती है । अतः मनुस्मृतिकी शैलीसे हमने इन अन्तिम दो श्राश्रमोंको भी संस्कारोंमें स्थान दिया है; इस प्रकार यह अपने स्वतन्त्र संस्कार हुए । अन्तिमका नाम अन्त्य है - इसी को ' पितृमेध ' कहते हैं । मृतक शरीर केलिए वेदादि - शास्त्रों में ' पितृ ' शब्द आता है । इस प्रकार संस्कार चार आश्रमोंमें वर्गीकृत हैं । इन्हींसे मोक्षधामकी प्राप्ति होती है ।
संस्कारोंका संक्षिप्त रहस्य
अब १६ संस्कारोंका संक्षिप्त रहस्य बताया जाता है यद्यपि 213सनातनधर्मानुसार संस्कारोंका मुख्य प्रयोजन अदृष्ट ( धर्म ) -प्राप्ति ही है, हिन्दु धर्मका उद्देश्य भी यही है, पर संस्कारोंके कई दृष्ट प्रयोजन भी विद्वानोंने अनुभूत किये हैं; इससे ' सोना और सुगन्ध ' तथा ' एका क्रिया द्वथर्थकरी प्रसिद्धा ' यह न्याय चरितार्थ हो जाते हैं । हम उनके वैज्ञानिक एवं लौकिक रहस्य भी लिखने की चेष्टा करते हैं । ' स्मृतिसंग्रह ' में विवाहान्त संस्कारोंके निम्नलिखित फल लिखे हैं-
गर्भाधानले वीर्यसम्बन्धी तथा गर्भसम्बन्धी पापका नाश होता -है; तथा क्षेत्रका संस्कारभी गर्भाधानका फल कहा गया है । पु'सवनसे गर्भमें पुरुष - चिह्न प्रकट होता है । सीमन्तोन्नयनका फल गर्भाधानके फलके समान ही जानना चाहिये । जातकर्मले गर्भस्राव- जन्य सारा दोष नष्ट हो जाता है । आयु एवं तेजकी वृद्धि तथा लौकिक व्यवहारकी सिद्धि - विद्वानोंने नामकरणका यह फल वर्णित किया है । सूर्यदर्शन से निश्चय ही आयुकी वृद्धि होती है । निष्क्रमणसे भी विद्वानोंने आयुवृद्धि बताई है । अन्नप्राशनसे गर्भमें माताका मल खाने आदिका दोष दूर होता है तथा बल, आयु एवं तेजको वृद्धि चूडाकर्मका फल कहा गया है । द्विजत्वकी प्राप्तिके साथ - साथ वेदाध्ययनके अधिकारकी प्राप्ति ऋषियोंने उपनयनका फल बताया है । ब्राह्म आदि आठ प्रकारके विवाहोंके फलस्वरूप उत्पन्न हुआ पुत्र पितरोंको तारनेवाला होता है । श्रेष्ठ ऋषियोंने विवाहका यही फलं व्यक्त किया है 1
। इसी प्रकार विवाहके द्वारा पत्नीके सहयोग से अग्निहोत्र आदि बन पाता है और उनका स्पष्ट फल स्वर्गकी 214प्राप्ति है ।
इन मूल वचनोंके आधारपर पाठकोंके समक्ष इनपर विवेचना दी जाती है । ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतथं समाः । ' ( यजु ० वा ० सं ० ४०१२ ) इस प्रकार वेद कर्मोंकी आवश्यकताका निरूपण करता है । तब हमें इनपर ध्यान देना चाहिये । संस्कारों का फल मनुजीने इस प्रकार कहा है- ' वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषे- कादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ' ॥ ( २।३६ ) गार्भैर्होमैर्जातकर्मचौडमौञ्जीनिबन्धनैः । वैजिकं गार्मिक चैनो द्विजानामपमृज्यते ॥ ( २।२७ ) इन वचनोंसे संस्कारोंको पाप- मार्जन करनेवाले होनेसे इहलोकमें अभ्युदयार्थ और परलोकमें निःश्रेयसार्थं अवश्य करना चाहिये । इनसे जीवन कलापूर्ण हो जाता है । इनके रहस्यका प्रतिपादन करनेकेलिए हम प्राचीन तथा अर्वाचीन विद्वानोंके तथा अपने विचारोंका यथास्थान उपयोग करेंगे ।
१. गर्भाधान -रहस्य ।
' गर्भाधानं प्रथमतः ' । ( व्यासस्मृति १ । १६ )
यह संस्कार पितृ ऋण के संशोधनार्थ और धार्मिक संततिके उत्पादनार्थ किया जाता है । इस संस्कारसे बीज एवं गर्भसे सम्बद्ध मलिनता नष्ट हो जाती है तथा क्षेत्रका संस्कार हो जाता है । इसमें कामभाव न करके धर्म - भाव किया जाता है । यह बालकका संस्कार नहीं; पर बालक बननेका संस्कार है । इसमें सावधानता न करने से बालकका भविष्य नष्ट हो जाता है । काममूलक - मैथुनसे सन्तान 215कामवाली उत्पन्न होती है; उसमें आगे चलकर व्यभिचारकी भी
शङ्का रहती है । संस्काररूपसे वैध गर्भाधान होनेपर उसमें— ' अमावास्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्य- मप्यृतौ स्नातको द्विजः ' ॥ ( मनु ० ४।१२८ ) ( स्नातक द्विजको चाहिए कि पत्नीका ऋतुकाल आने पर भी अमावास्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशी तिथियोंको सदा ब्रह्मचर्यका ही पालन करे ) । ' इन अमावास्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशी आदिको ब्रह्मचारी रहने आदि नियमों का पालन अनिवार्य होनेसे धर्मानुकूलता आ जाती है ।
' धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ । ' ( गीता ७ । ११ ) ( भरतश्रेष्ठ! मैं सम्पूर्ण भूतोंमें धर्मानुकूल काम हूँ ) । ' प्रजन- श्चास्मि कन्दर्पः ' ( गीता १०।२८ ) ( मैं शास्त्रोक्तरीतिसे सन्तानकी उत्पत्तिका हेतुभूत कामदेव हूँ । ) इस प्रकार धर्मसे अविरुद्ध होने पर वही काम भगवद्रूप हो जाता है । यही समय भावी सन्तानके जीवनके मूल रखनेका होता है । इस समय माता - पिताकी मानसिक तथा शारीरिक स्थिति जैसी शुद्ध पवित्र होगी; बालकका मन. और शरीर भी उससे वैसा ही प्रभावित होगा ।
यदि माता - पिता केवल कामवासना रक्खेंगे तो उनकी सन्तान भी वैसी ही कामी होगी । अतः गर्भाधानके समय शरीरकी नीरोगताके साथ माता - पिताका मन भी स्वस्थ और धर्मान्वित हो- यह आवश्यक है । तब माता - पिताके विचार गर्भ - समय में जैसे होंगे- -उनका पुत्र भी वैसा ही होगा । जैसे कि सुश्रुतसंहिता शारीर- 216- ५१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
स्थानमें कहा है - ' आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ । स्त्रीपुंसौ · समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ' ॥ ( २२४६।५० ) ( ' स्त्री और पुरुष - जैसे आहार, व्यवहार तथा चेष्टा आदि से युक्त होकर परस्पर समागम . करते हैं, उनका पुत्र भी वैसे ही स्वभावका होता है । ' )
गर्भावस्था में माता - पिता के खान - पानका स्थिति - परिस्थितिका, एक - एक शब्दका, जो उनके कान में पड़ता है, एक - एक दृश्यका जो • उनकी आँखोंके सामने उपस्थित होता है, एक- एक संकल्पका. जो . उनके मनमें उठता है, गर्भस्थ बालक पर प्रभाव पड़ता है;. अतः आदिम तीन गर्भके संस्कारों में माता - पिताको बड़ी सावधानी रखनी चाहिये । महाभारत के अनुसार अभिमन्युने चक्रव्यूहमें प्रवेश · तथा उसका भेदन मातृगर्भ में ही सीखा था, जब कि अर्जुनने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्राको सुनाया था । जब अर्जुन चक्रव्यूहसे . निर्गमनका प्रकार सुभद्राको सुना रहे थे, उस समय उसे नींद आ गई थी, सुभद्रा नहीं सुन सकी; इसीसे गर्भस्थ अभिमन्यु भी उसे नहीं सीख सका; अतः वह उससे निकलने में सफल न होकर मारा गया । इसीसे समन्त्रक गर्भ संस्कार की आवश्यकता सिद्ध होती है ।
प्रह्लाद दैत्य- माता - पिताका पुत्र होने पर भी गर्भावस्थामें : नारदजीका उपदेश पानेसे महान् भगवद्भक्त बन गया — यह घटना पुराणोंमें सुप्रसिद्ध है । महाराष्ट्र - राष्ट्रपति शिवाजी के इतने प्रतापी होनेका कारण भी यही बताया जाता है कि उनकी माता जीजाबाई सदा उसी प्रकारके विचारोंसे युक्त रहती थी । नेपोलियन बोनापार्ट -की अतुल शूरवीरता और अदम्य साहस एवं उत्साहका कारण भी 217यही था कि उसकी गर्भवती माता रणक्षेत्र में रहा करती थी और शूरवीरोंकी गाथाएँ प्रतिदिन सुना करती थी ।
मातामें भी पहलेसे जैसे संस्कार पड़े होते हैं, उसका गर्भदोहद भी उसी प्रकारका होता है । गर्भका दोहद पूर्ण करने पर बालकमें भी पूर्णता होती है । सुश्रुत शारीरस्थानमें दोहदों के भिन्न - भिन्न फल लिखे हैं । जैसे कि—
' राज संदर्शने यस्या दोहदं जायते स्त्रियाः । अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते । (.३।२२।२५ ) ( ' जिस गर्भवती स्त्रीको राजांके दर्शनकी इच्छा होती है, वह परम सौभाग्यशाली और धनवान् पुत्र उत्पन्न करती है । ' ) देवताप्रतिमायां च [ दोहदे ] प्रसूते पार्षदोत्तमम् । दर्शने व्यालजन्तूनां हिंसाशीलः प्रजायते ' ॥ ( ३।१४।२७-२८ ) इत्यादि । ( ' देवमूर्तियोंके दर्शनकी इच्छा होने पर वह श्रेष्ठ भगवद्भक्त बालक को जन्म देती है । सर्पों तथा हिंसक जन्तुओं के दर्शनकी इच्छा होने पर उसके गर्भसे हिंसक स्वभावका बालक पैदा होता है । )
इस प्रकार समक्षस्थित दृश्यके प्रभावका यह उदाहरण प्रसिद्ध है कि एक अमेरिकन रमणीके शयनागार में एक हब्शीका चित्र सामने दीवाल पर टँगा हुआ था । सदा - सर्वदा उस पर दृष्टि पड़ते रहने से उसका लड़का भी काला हब्शी- जैसा उत्पन्न हुआ, जिससे उस अमेरिकनको अपनी पत्नीके चरित्र में भी सन्देह उपस्थित - होगया था । पीछे पता लगने पर सन्देह दूर हुआ । किन्हींकी सन्तान बन्दरों - जैसी, किन्हीं भारतीयोंको सन्तान चीन आदि भिन्न देशीयों - जैसी होजाती है; अतः गर्भावस्था बहुत सावधानताका 218समय है । इस समय गर्भिणी स्त्रीका सिनेमाओं में जाना. तो अत्यन्त ही हानिप्रद है; क्योंकि अच्छे - से - अच्छे चलचित्रमें भी कामवासना - वासित शृङ्गार रक्खा जाता है, जिससे गर्भस्थ बालक पर भी उसका दुष्प्रभाव पड़ना अनिवार्य होजाता है । फलतः इन आदिम तीन संस्कारों में माता - पिताको सदा कुलपरम्परासे चले आते आचार - विचार एवं व्यवहारका पालन अवश्य करना चाहिये । यह संस्कार मनुस्मृति, आश्वलायनगृ ०, पारस्करगृ ० आदि में आया है । वेदमें भी स्पष्ट आया है ।
पर्वमें गर्भाधान - निषेधका रहस्य ।
' पर्ववर्जं ब्रजेच्चैनाम् ' ( मनु ० ३।४५ ) पर्वोको छोड़कर अन्य तिथियों में ऋतुस्नाता पत्नीके पास जाय । ' अमावस्यामष्टमों च पौर्णमासीं चतुर्दशीम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्यृतौ स्नातको द्विजः ' ( मनु ० ४।१२८ ) इसमें कहा हुआ अमावास्या, पूर्णिमा, अष्टमी श्रादिमें स्त्रीगमनका निषेध केवल शास्त्रोक्त नहीं, अपितु वैज्ञानिक भी है । समुद्रमें सबसे अधिक ज्वार - भाटा पूर्णिमा में, सबसे कम अमावस्यामें हुआ करता है । मध्यम ज्वार - भाटा वह होता है, जहाँ जलका उतार - चढ़ाव मध्यम हो - यह दोनों अष्टमियोंका समय है । यह सूर्य - चन्द्रके आकर्षण - विकर्षण से नियमानुसार होता है 1
। जैसे— सूर्य - चन्द्र दोनोंका प्रभाव समुद्र वा नद - नदी, तालाबों तथा फलों पर पड़ता है, वैसे ही प्राणियोंके रक्त पर भी पड़ता है; क्योंकि— रक्त भी जलका ही भाग है । चन्द्रमाका प्रभाव पुरुषकी अपेक्षा स्त्री पर अधिक पड़ता है । उक्त तिथियों में स्त्री - पुरुषों की वीर्य आदि 219धातुएँ विषम होती हैं, अतः यदि इन पर्वोंकी रात्रियों में स्त्री - सम्पर्क किया जाता है तो वैषम्यापन्न शुक्रशोणित विकृत होकर स्वास्थ्यको विकृत कर देते हैं; और इन अवसरोंपर यदि गर्भस्थिति होजाती है तो भावी सन्तान रक्तविकार - दोषवाली, फोड़े - फुन्सी आदि व्रणोंवाली, प्राणशक्तिमें दुर्बल तथा हृदयदोष ( जिससे हार्ट - फेल होजाता है ) आदि बीमारियोंको भोगनेवाली होती है । इसके अतिरिक्त पूर्णिमा देवतिथि है, अमावास्या पितृतिथि और अष्टमी दोनोंकी सम्बद्ध तिथि है । अतः अपने बड़ों के इन विशिष्ट दिनों में स्त्री - संयोग करना अपनी धृष्टता या निर्लज्जताको भी सिद्ध करने वाला होता है । यही कारण है कि पहले समयके लोग इस अवसर पर यज्ञ - व्रत - उपवास आदिका अनुष्ठान करते थे; इसी कारण इन दिनों में वेदोंका अनध्याय भी हुआ करता था ।
दिनमें गर्भाधानका निषेध ।
यह संस्कार स्त्रीके ऋतुस्नानके समय तथा गर्भाधानकी योग्यता होने पर करना चाहिए । यह ऋतु प्राकट्यके पाँचवें दिनसे सोलहवें दिन के अन्दर तक, क्योंकि इतने ही दिनों तक स्त्रीमें ऋतु रहता है - अर्धरात्रिके समय करना चाहिये । दिनमें गर्भाधान करना शरीर और मनकेलिए हानिकारक है । प्रश्नोपनिषद् में कहा है- ' अहोरात्रो वै प्रजापतिः । तस्य अहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः । प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति, ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते, ब्रह्मचर्यमेव तद् यद् रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते । ( १।१३ ) ( ' दिन और रातका जोड़ा ही प्रजापति है । उसका दिन ही प्राण है तथा रात्रि 220ही रयि है । अतः जो दिनमें स्त्री - सहवास करते हैं, ये लोग सचमुच अपने प्राणों को ही क्षीण करते हैं तथा जो रात्रि में बी- सहवास करते हैं, उनका वह सहवास भी ब्रह्मचर्य ही है । )
यहाँ पर दिनको रति करना प्राणोंका क्षीण करना बताया है, रान्त्रिकी रतिको ब्रह्मचर्यावलम्बन कहा है । दिनमें सूर्यमूलक ऊष्मा होने से किया गया गर्भाधान प्राणोंकी - बलकी हानि करनेवाला होता है । इसका फल सन्तानको भी भोगना पड़ता है; श्रतः माता - पिता बननेवालोंको इधर भी अवश्य ध्यान देना चाहिये ।
पुत्र या कन्याकी उत्पत्तिका रहस्य ।
रजस्वलात्वकी विषम रात्रियोंमें ऋतुका वेग बहुत रहता है और सम रात्रियों में कम । ऋतुका पहला दिन विषम होता है, इसमें ऋतुका वेग बहुत हो — यह स्वाभाविक ही है । दूसरा दिन सम होता है - इसमें रजका वेग अधिक होने पर भी अपेक्षाकृत कम होता है । फिर तीसरे विषम दिन रजका पुनः प्राबल्य होजाता है । इन तीन रात्रियों में तो गर्भाधानका सर्वथा निषेध है । फिर चतुर्थ - समरात्रि में रजका वेग कम होता है । इस प्रकार विषम रात्रियोंमें रजका वेग अधिक और सम रात्रियों में कम होता है । सम रात्रि में स्त्रीगमन करनेसे रजका वेग कम होनेके कारण शुक्र प्रबल बन जाता है; अतः ऋतुकी सम रात्रिमें गर्भ स्थापित होनेसे- • ' पुमान् पुंसोऽधिके शुक्रे ' ( मनु ० ३।४६ ) युग्मासु पुत्रा जायन्ते ' ". ” । " तस्माद् युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम् ' ॥ ( ३ । ४८ ) ( ' स्त्री- • सहवास के समय यदि पुरुषका वीर्य रंजकी अपेक्षा अधिक हुआ 221तो उस समय स्थापित किये हुए गर्भसे पुत्रका जन्म होता है । छठी, आठवीं आदि युग्म या सम रात्रियोंमें ऋतुस्नाता पत्नीके साथ समागम करनेसे पुत्र पैदा होते हैं । इसलिए पुत्रको इच्छा रखनेवाला पुरुष ऋतुकाल आने पर युग्म रात्रियोंमें स्त्री- सहवास करे । ' ) इस प्रकार पुत्र होता है । विषम रात्रियों में पूर्वक्रमवश रजका वेग अधिक होनेसे शुक्रकी कमी हो जानेके कारण लड़की उत्पन्न होती है । ' स्त्री भवत्यधिके ( रजसि ) स्त्रियाः ' ( मनु ० ३।४६ ) ( समागमकाल में पुरुषके वीर्यकी अपेक्षा यदि स्त्रीके रजकी अधिकता हो, तो कन्याका जन्म होता है । )
ऋतुकी रात्रियों में पहली चार तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियाँ मनुके ( ३।४७ ) अनुसार निन्दित होती हैं, शेष ६, ८, १०, १२, १४, १६ रात्रियोंमें पुत्रार्थी तथा ५, ७, ६, १५ रात्रियों में कन्यार्थी स्त्री - गमन करे | उनमें भी पर्वकी रात्रियों — पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी तिथियों में भी गर्भाधान न करे ( मनु ० ४ | ५२८, ३४५ ) । ऐसा करने पर गृहस्थाश्रमी भी ब्रह्मचारी माना जाता है, जैसे कि मनुजीने कहा है- ' निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ ( ३।५० ) ( ' छः निन्दनीय रात्रियों में और आठ अनिन्दनीय रात्रियों में भी जो स्त्री - सहवासका त्याग करता है और शेष दो ही रात्रियों में स्त्री - समागम करता है, वह किसी भी आश्रम में रहकर ब्रह्मचारी ही समझा जाता है । ' ) दिन - रातमें कई वारकी विषयासक्तिसे पुरुष जहाँ अपनी स्त्रीको राजयक्ष्मा आदि बीमारियों तथा व्यभिचार - प्रवृत्तिमें 222फँसाता है; वहाँ अपनेको भी । ऐसा करना अपने भावी आनन्दका समय न्यून करना है । अतः दम्पति उक्त शास्त्रीय वचनोंपर ध्यान दें ।
( २ ) पुसवन संस्कारका रहस्य ।
' तृतीये मासि पु'सव: ' ( व्यासस्मृति १।१६ ) ।
गर्भाधानसे तीसरे महीने में पुंसवन संस्कार होना चाहिये । इस संस्कार से पुरुषका शरीर बनता है । ' पुमान् सूयते येन कर्मणा, तदिदं पु ' सवनम् ' जिस कर्म से पुरुषका प्रसव ( पुत्रका जन्म ) हो, उस गर्भ - संस्कार - कर्मका नाम ' पु'सवन ' है ।
गर्भसंस्कारकर्म — ' आश्वलायनगृह्यसूत्र के ( ११११११ ) सूत्रकी व्याख्यामें भाष्यकार श्रीहरदत्ताचार्यने कहा है- ' येन स गर्भः पुमान् भवति तत् पु'सवनम् । ' जिससे वह गर्भ पुरुष होता है, वह पुंसवन कर्म है ।
चार मासतक गर्भ में स्त्री - पुरुषका भेद नहीं होता है, अतः स्त्री- पुरुषके चिह्नकी उत्पत्तिसे पूर्व ही यह संस्कार किया जाता है । अथवा कई वैज्ञानिकों के मतानुसार उस समय तक पुत्र - पुत्री दोनोंके चिह्न बनते हैं, फिर स्त्रीत्व अथवा पुंस्त्व, जिसको शक्ति प्राप्त होती है, उस चिह्नकी वृद्धि तथा दूसरे चिह्नका ऊपर - नीचेकी मांसोत्पत्तिसे आच्छादन तथा स्थगन हो जाता है । पु ंस्त्वको शक्ति प्राप्त करानेकेलिए ही पुरंसवन संस्कार में पहले समय में ओषधि- विशेषको स्त्रीकी नासिकाके मार्ग से भीतर पहुँचाया जाता था । जैसा कि सुश्रुतसंहिता में लिखा है- ' लब्धगर्भायाश्च एतेषु अहःसु 223लक्ष्मणावट शुङ्गासहदेवीविश्वदेवानामन्यतमं क्षीरेण अभिघुट्य त्रीन् चतुरो वा बिन्दून् दद्याद् दक्षिणे नासापुटे पुत्रकामायै न च तन्निष्टीवेत् । ' ( शारीरस्थान २।३४ ) ( ' जिसने गर्भ धारण कर लिया हो, उसकेलिए इन्हीं दिनोंमें लक्ष्मणा, वटशुङ्गा, सहदेवी और विश्वदेवा इनमें से किसी एक ओषधिको दूधके साथ खूब महीन पीसकर उसकी तीन या चार बूँदें उस स्त्रीकी दाहिनी नाक के छिद्रमें डाल दे । यदि उसे पुत्रकी इच्छा हो तभी ऐसा करे । स्त्रीको चाहिये कि वह उस औषधको थूके नहीं । ' )
इसी प्रकार चरकसंहिता ( शारीरस्थान ८३५-३६ ) में दाहिने नथुने द्वारा पीने से पुत्र - प्राप्ति और बायें द्वारा कन्या - प्राप्ति कही है । इससे योनि - दोष दूर होकर पुरुष - संतान उत्पन्न हुआ करती थी । आजकल डाक्टर लोग भी इन्हीं दिनोंमें स्त्रीको कोई ऐसी ओषधि खिलाते हैं और शर्त बाँधते हैं कि अवश्य बालक ही होगा ।.
बालकका महत्त्व सभी जानते- मानते हैं । वह हमारे वंश- कुलकी, हमारी सम्पत्ति तथा वेदादिकी सम्पत्तिकी वृद्धि करता है, हमारे पितरोंकी सद्गति तथा हमारे पितृ ऋणका शोधन करता है, हमारा उत्तराधिकारी बनता है । इसीलिए वेदमें भी उस पुत्रके लिए ही प्रार्थना आई है; क्योंकि वेद अपना अधिकार पुरुषको ही देना चाहता है । इसलिए इस संस्कारका नाम भी पु'सवन रक्खा गया है । वेदमें कहा है- ' पुमांसं पुत्रमाधेहि ' ( अथर्व ० ६।१७११० ) ‘ पुमांसं पुत्रं जनय ' ( अ ० सं ० ३।२३।३ ) यहाँ पुत्रका ' पुमान् ' यह विशेषरण पुरुष - संतानको बता रहा है । अथर्ववेद- 224गोपथ ब्राह्मण में कहा है- ' पुमांसः श्मश्रुवन्तः श्राश्मश्रुवः स्त्रियः ' ( १।३।७ ) ' जिनके दाढ़ी - मूंछ हों वे पुरुष हैं । जिन्हें दाढ़ी - मूंछ नहीं हैं वे खियाँ हैं । ' यहां भविष्य में होनेवाली दाढ़ी - मूंछ को ध्यानमें रखकर पुरुष संतानका यह लक्षण दिया गया है ।
' तैस्त्वं पुत्रं विन्दस्व ' ( अ ० ३।२३।४ ) ( उनके द्वारा तुम पुत्र प्राप्त करो । ' ) ' आ ते योनिं गर्भ एतु पुमान् ' ( अ ० ३।२३।२ ) ( ' तुम्हारी योनिमें पुरुष - गर्भका आगमन हो । ) पुमानका बलशाली अर्थ भी हो सकता है - वह भी अबला - संततिकी इष्टाभावताको ही द्योतित करता है ।
' विन्दस्व पुत्रं नारि ' ' दश अस्यां पुत्रान् आधेहि ' ( ऋ ० सं ० १०।८५।४५ ) ‘ कृपणं दुहिता, ज्योतिर्ह पुत्रः ' ( ऐत ० ब्रा ० ७११३ ) ' पुत्रं ब्राह्मणा इच्छध्वम् ' ' स वैलोको वदावदः ' ( ऐ ० ७१३५ ) ' ऋरणमस्मिन् सन्नमयति अमृतत्वं च गच्छति । पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येच्चे- जीवतोमुखम् । ( ऐ ० ३।१ ) ' तौ एहि सम्भवाव, सह रेतो दधाव है, पुसे पुत्राय वेत्तवै, ( तै ० ना ० ३७११६ ) ' पुमान् गर्भस्तवोदरे ' ( गोभिलगृ ० २।६।३ ) ( ' नारी! तुम्हें पुत्र प्राप्त हो ' ' इस स्त्रीके गर्भ में क्रमशः दस पुत्रोंका आधान करो ' ' दुहिता कृपण है, ' पुत्र ही ज्योति है ' ' ब्राह्मणो! पुत्रकी इच्छा करो ' ' वही वदावद लोक है, ' ' यदि पिता उत्पन्न हुए जीवित पुत्रका मुख देख ले, तो वह अपना पैतृक ऋण उतारकर उसीपर रख देता हैं और स्वयं अमृतत्वको प्राप्त होता है, ' अतः आओ हम दोनों समागम करें, पुरुष - पुत्र की प्राप्तिकेलिए एक साथ रज - वीर्यका आधान करें ' ' तुम्हारे उदर में पुरुष गर्भ है । )
225वेद तो यहाँतक कहता है- ' जायमानं मा पुमांसं स्त्रियं क्रन् ' ( अथर्व ० ८६२५ ) अर्थात् हो रहा हुआ पुरुष स्त्री न बन जाय, जिसकी पुंसवनकी असफलतामें सम्भावना हो सकती है । ' आग्निवेश्यगृह्यसूत्र ' ( १ | ५ | ५ ) में भी कहा है- ' पुमान् स्त्री जायतां गर्भे अन्तः ' ( स्त्री गर्भ अन्दरसे पुरुष बन जाय । ) ' पुमांसं गर्भमाधत्स्व, पुमांस्ते पुत्रो नारि ते पुमान् अनुजायताम् । ' ' पुमान् अयं जनिष्यते ' ( गोभि ० २२७/१५ ) ' पुरुष- गर्भको धारण करो । नारी! तुम्हारा पुत्र पुमान् ( मर्द ) हो । तुमसे बार - बार पुरुषका जन्म हो । ' ' यह पुरुष जन्म लेगा । '
इसी पुत्रके उत्पादनार्थ अजीता ओषधिको नाकके द्वारा देते थे, जैसे कि श्राश्वलायनगृ ० ( १ । १३ । ५ ) में कहा है । जिसका मूल वेद में भी मिलता है- ' तास्त्वा पुत्रविद्याय ( पुत्रलाभाय ) दैवीः प्राबन्तु ( सहाया भवन्तु ) श्रोषधयः ' ( अथर्व ० ३।२३।६ ) ' पुत्रकी प्राप्तिकेलिए दिव्य ओषधियाँ तेरी सहायता करें । ' )
स्वामी दयानन्दजीकी ‘ संस्कारविधि ' में भी कहा है- ' पु ' सवन- संस्कार करना चाहिये, जिससे पुरुषत्व अर्थात् वीर्यका लाभ होवे ' ( पृ ० ४७ ) जब ओषधिविशेषसे गर्भाशयस्थित वीर्यको लाभ अर्थात् सहायता पहुँचेगी, तब वीर्यके प्राबल्यसे रजकी शक्ति कम होकर कन्या उत्पन्न न होकर पुत्र ही उत्पन्न होगा । इसलिए उक्त ' संस्कारविधि'में — पुमान् गर्भस्तवोदरे ' ' पुमांसं पुत्रं विन्दस्ख, ते पुमान् अनुजायताम् ' ( मं ० ना ० १।४।८-६ ) ये मन्त्र पुंसवनमें आये हैं ।
226वैदेशिक भी पुत्रका गौरव मानते हैं । भारतीयोंका तो क्या कहना? भारतीय विद्वान् उसे ' पुत् ' नामक नरकसे बचानेवाला मानते हैं, क्योंकि वह मरणमें पिता - माताको पिण्डदान करके उनकी सद्गति कराता है । जैसे कि निरुक्तमें कहा है- ' पुत्र: - पुरुत्रायते, निपरणाद् वा, पुन्नरकं ततस्त्रायते - इति वा ' ( २।११।१ ) यही बात अथर्ववेदके ' गोपथब्राह्मण ' में भी कही गई है- ' पुन्नाम नरकम् अनेकशततारम्, तस्मात् त्राति पुन्नः, तत् पुत्रस्य पुत्रत्वम् ' ( १।१।२ ) यही बात ' मनुस्मृति ' ( ६।१३८ ) में भी कही गई है । आर्यसमाजी विद्वान् श्रीतुलसीराम - स्वामीजीने भी इस पद्यको प्रक्षिप्त नहीं माना । यही का यही पद्य ' बोधायनीय गृह्यपरिभाषासूत्र ' ( १ । २ । ५ ), ' महाभारत ' आदिपर्व ( २३१।१४ ) तथा ' वाल्मीकिरामायण ' ( २।१०७ । १२ ), ‘ वैखानसगृह्यसूत्र ' ( ६२ ) आदि में भी कहा गया है । इससे इस संस्कारकी महत्ता सिद्ध होती है । इससे गर्भको शक्ति भी प्राप्त होती है ।
यह संस्कार ' मनुस्मृति ' में स्पष्ट तो नहीं है, पर उसको इष्ट है । आश्वलायनगृ ० तथा पारस्करगृ ० में आया है । वेद में तो स्पष्ट. ही है । इस संस्कार से कन्याका अभाव इष्ट नहीं । ' दशपुत्रसमा कन्या '. ( ‘ कन्या दस पुत्रोंके समान है ) यह भी भारतीय नाद ही है । उसके दान देनेसे जो पुण्य होता है वह और कहाँ मिलेगा
पुत्र हमारे स्वार्थ की सिद्धि करता है, कन्या परार्थकी । पर प्रथम संतान अवश्य ही पुरुष हो - यह इस संस्कारका लक्ष्य है ।
In English
The Importance of Samskara
This text explains that samskara is the process of removing defects and bringing out the true qualities of a substance or person. It describes how prenatal influences shape a child and argues that ritual samskaras are necessary to purify human nature and remove physical or mental flaws.
This chapter answers
- What is the meaning of samskara?
- How do maternal thoughts affect a fetus?
- Why are samskaras important in hinduism?
- How does samskara change gold or iron?
- What is the purpose of the sixteen samskaras?
Also written: Shodasha, Sanskara, Rahasya, Shodasha Sanskara Rahasya, षोडश संस्कार- रहस्य