सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 221–230
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 221–230
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गायत्री मन्त्रकी महत्ता १६१ होगा । अस्तु । ब्राह्मणके लिए तो गायत्री - सावित्री ही आई है । उसकेलिए तो इतना कहा है कि अन्य यदि वह कुछ न कर सके तो सुयन्त्रित होकर सावित्रीको ही अपना ले ' सावित्रीमात्र-सारोपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितस्त्रिवेदोपि ( मनु ० २।११८ ) इससे उसका ब्राह्मणत्व अक्षुण्ण रहता है । सो इस प्रकारके गायत्री-मन्त्रकी यह महत्ता केवल शाब्दिक नहीं है; किन्तु सोपपत्तिक भी है - यह रहस्य ' आलोक ' पाठकोंने समझ लिया होगा । प्रेरणा — ' श्रीसनातनधर्मालोक ' दश सहस्र पृष्ठोंका है । इसके न्यूनसे न्यून पञ्चम पुष्प- इतने बीस पुष्प प्रकाशित हो सकते हैं । यदि संरक्षक तथा सहायक आदि निरन्तर तथा शीघ्र सहायता करते चलें; तो यह ग्रन्थमाला शीघ्र ही पूर्ण हो सकती है । धार्मिकों का इसके संरक्षक तथा सहायकों का जुटाना कर्त्तव्यमें आा पड़ता है । इस ग्रन्थमालाके पूर्ण हो जाने पर सनातनधर्म पर होनेवाली शङ्काएँ प्रायः समाप्त हो जायँगी । सहायकका १०० ) है, और संरक्षकका १००० ) । संरक्षकका चित्र भी छपता है और प्रत्येक प्रकाशनमें नाम भी । प्रेरकोंका नाम भी छपता है । प्राशा है - हिन्दु जनता अपनी शुद्ध कमाईका सदुपयोग इस ग्रन्थमाला में करेगी । जो यह न कर - करा सकें; वे इस ग्रन्थमालाके पुष्पोंको अन्योंकि द्वारा खरीदवाकर भी इसकी सहायता कर सकते हैं । गत चार पुष्पोंका मूल्य ७1 ), डाकञ्यय १ = ) ।
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( ६ ) कच्छबन्ध - रहस्य शास्त्रोंमें ' शिरः प्रावृत्य कर्णं वा मुक्तकच्छशिखोपि वा । अकृत्वा पादयोः शौचम् आचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत् ' इसमें श्राचमनसे शुद्धि बताई गई है पर सन्ध्यादि कर्मके आरम्भमें शिर वा कानको ढकना, कच्छ ( लांग ) वा शिखा खोले रखना, और पांवकी शुद्धि न करना, इनसे, आचमन किये हुए भी पुरुषकी अशुचिता वताई गई है । इनमें लांग खोले रखना भी अशुद्धियों में परिगणित किया गया है । सन्ध्या आदिमें सिरके ढकनेके निषेधका रहस्य यह है कि सन्ध्या - समय में परमात्माकी जो कृपा हमें प्राप्त होती है वह शिखाके द्वारा ही आती है । आशीर्वाद देनेवाला सिरमें शिखावाले स्थान पर हाथ रखके चरण छूनेवालेको आशीर्वाद देता है । शिखाके ढकने पर पुरुष उस कृपाके अंशसे वश्चित हो जाता है । इसके अतिरिक्त सन्ध्यामें पहले स्नान करना पड़ता है । स्नान कर लेने पर फिर सद्यः सन्ध्या करनी पड़ जाती है । स्नानके समय पोंछने पर भी शिरकी क्लिन्नता नहीं जाती । उसको सुखानेके लिए सिरका नंगा रखना आवश्यक हो जाता है; नहीं तो यदि उस समय शिरको पटके आदिसे वेष्टित कर दिया जावेगा; तो सिरकी गर्मी, इधर सिरका गीलापन, इधर सिर बन्द होनेसे मल बढ़ेगा, जिससे सिरमें विकार और जूँ आदि सिरमें हो जाएँगी । उस भयके दूरीकरणार्थ भी सन्ध्या आदिमें नंगा सिर रखना ठीक है ।
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कच्छ्रवन्ध- रहस्य १६३ इसी प्रकार कानके वन्द करने में भी समझ लेना चाहिये । उस समय शिखाका खोले रखना भी ठीक नहीं । खोलकर फिर उसमें ग्रन्थि दे देनी चाहिये, इस विषय में शिखा - विज्ञानमें हम दिखला चुके हैं । पांओंकी शुद्धि आवश्यक है ही, क्योंकि जूते आदिका स्पर्श वा अशुद्ध स्थलका स्पर्श होने से शुद्ध कर्म में अशुद्धि न प्रवेश करे-• अतः पावोंकी जलसे शुद्धि आवश्यक ही है; अब शेष रह जाता है कच्छ बांधना | कच्छसे लांग ( धोतीके पीछेकी ग्रन्थि ) बांधना इष्ट है । जहां वह हमारे कर्मका अङ्ग है वहां लौकिक लाभ भी इसके स्पष्ट हैं । एक तो हिन्दु - मुसलमानका भेद स्पष्ट हो जाता है । उत्तर प्रदेशमें हिन्दुओंकी सङ्गतिसे मुसलमान भी लांग बांधते हैं; पर अन्यत्र पंजाबादिमें नहीं बांधते । पश्चिमी पंजाबके ग्रामके लोगोंने लांग खोले रखना यह वहांके मुसलमानोंके सम्पर्कसे सीखा है । वैदिककर्माधिक़ारी होनेसे द्विजोंका लांग बांधना आवश्यक है । स्त्रियों में भी कर्माधिकार न्यून होनेसे उनकी साड़ीकी लांग भी . खुली रहती है । पर बंगाल आदि दक्षिण देशों में स्त्रियों में भी लांग बांधनेका प्रचार है । अब लांगके लौकिक लाभों पर भी विचार कर लेना चाहिये । लांग न बांधने से चलनेके समय धोतीके अंशके द्वारा जांघोंके पास घर्षण होता रहता है; इससे वहांकी त्वचा तथा नसोंको हानि पहुँचती है । धोतीके आगे के भागके वस्त्रके पांवमें पहुँचने से गिरने की भी आशंका रहती है । उसके वेगसे मट्टीके उड़नेकी आशंका भी १३ स ० ध ०
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१६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) रहती है; और लघुशंका करनेके समय अपने आपको नीचे से नंगा करना पड़ता है । घोड़ेपर वा साइकलपर कूदकर चढ़नेसे नंगे होनेकी शंका रहती है । इसलिए स्त्रियोंकी साड़ी वा घाघरा आदिके लांग - हीन होनेसे साइकल पर कूदकर चलने के समय नंगेपनकी आशंका रहती है; उस आशंकाको दूर करने के लिए स्त्रियों केलिए विशेष प्रकारका साइकल बना होता है, जिसका डंडा ऊपर नहीं होता, किन्तु नीचेसे ही टेढा हुआ हुआ होता है; इससे उन्हें उस पर कूद कर चढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती । इससे उनकी नग्नताकी आशंका भी नहीं रहती । हिन्दु जातीयताका चिन्ह तो है ही । प्राचीन समयसे हिन्दुका ऐसा वेष चला आता है, जिससे पुरानी हिन्दु - जातिके दर्शन भी हो जाते हैं । पंजाब आदिमें मुसलमान इसे हिन्दुओं का चिह्न मानकर उनसे विरुद्ध व्यवहार वाले होनेसे लांग नहीं बांधते । लेकिन घोड़े वा साइकिल आदि पर कूदकर चढ़ने की आवश्यकता में उन्हें भी नग्नताका अनुभवहोता है । तब पीछेकी लांग बांधने में हिन्दुओंका चिह्न न हो जावे, इस कारण वे पीछेकी लांग न बांधकर आगेसे लांग बांध लेते हैं अर्थात पीछेके धोतीके हिस्सेको नीचेसे आगे ऊपर बस्ति-वाले स्थानके पाससे निकाल लेते हैं । यह भी एक लांग जैसी बन जाती है, इससे नग्नताकी आशंका नहीं रहती, पर द्रविडप्राणायाम के समान हो जानेसे इसमें असुविधा बहुत होती है । मशकोंके उठानेवाले मुसलमान भी ऐसी ही लांग बांधते हैं, जिससे धोतीका खुला हुआ भाग जांघसे घिसता हुआ तकलीफ न पहुँचावे ।
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कच्छबन्ध - रहस्य १६२ सन्ध्यादिके समय लांग न बांधी जाय तो नीचेसे नग्नता होनेसे देवताकी अवहेलना समझी जाती है; अतः उस समय लांगका बांधना आवश्यक है | धोती में पीछे की लांग होने से चलने, उठने, बैठने आदि में एक सुविधासी रहती है इसका अनुभव लांग बांधने-वाले ही जान सकते हैं । लांग खोले रहने में तब त्रयुक्तता नहीं मानी जाती; जब अन्दर से कौपीन ( लँगोटा ) हो । इसलिए जव ब्रह्मचारी वा संन्यासी विना लांगकी धोती बांधते हैं; तो वे अन्दर कौपीन पहर लेते हैं । स्त्रियां वैसा साड़ीका वेष सुन्दर लगनेसे अन्दरसे पेटीकोट पहर लेती हैं । पजामा, सलवार, पतलून आदि पहनना हिन्दु - वेष नहीं है । यह मुसलमानों वा अँग्रेजोंसे आया है । हमारे धार्मिक कार्योंमें इसका उपयोग नहीं किया जाता । उनके पहननेवाले उन्हें उतारनेके समय अन्य पजामे वा पतलून आदि नहीं पहर सकते; अतः उन्हें अन्य पजामा आदि बदलने और पहले पजामा आदिके उतारने में या तो नंगा होना पड़ता है या धोती पहननी पड़ती है । पजामे आदि में बन्धन होता है, नालेकी पराधीनता पड़ती है; कभी नाला ही नहीं खुलता, कभी टूट ही जाता है तो बड़ी असुविधा होती है । पेशाब आदिके समय पजामा खोलकर कुछ नग्न भी होना पड़ता है, पर धोती में स्वाधीनता है । आग लग जाए तो धोतीको जल्दीसे खोला जा सकता है; पर पजामे आदि खोलने में बहुत देर लग जाती है; उसके उतारनेमें भी समय लग जाता है । पैन्टवाला नीचे भूमि पर ठीक नहीं बैठ सकता; उसे टांगें फैलाकर असभ्यतासे बैठना पड़ता
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१३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) है । साथ ही उसने कन्धे तककी चमड़ेकी पेटी भी यदि लगा रखी हो, और कभी बूटके सबब से गिर जावे; तो फिर वह स्वयं उठ भी नहीं सकता, जब तक कि कोई दूसरा उठाकर खड़ा न करे । अतः धोतीका वेष जहां प्राचीन है, भारतीयता वा हिन्दु - संस्कृति वा सात्त्विकताका बोध करानेवाला है वहां बहुत लाभका भी देनेवाला है, और लांग होनेपर लघुशंका आदिके समय बिना धोती खोले भी मूत्रत्याग आदि कार्य में कोई रुकावट नहीं पड़ती, और किसी भी प्रकारकी नग्नताका अनुभव नहीं करना पड़ता । लगता भी यह वेष सुन्दर है । पर लार्ड मैकालेके मानस दास इस पर उपहास करते हैं । इसका भाव यह है कि उन्हें भारतीयता से घृणा तथा अँजियत से ' अनुराग है । सड़क आदिमें कीचड़ होनेपर धोतीको सिकोड़ा भी जा सकता है । यदि कभी बहुत आवश्यकता भी पड़े तो धोतीके अग्रभागके कपड़े में कोई वस्तु भी ली जा सकती है । जो नाक आदि साफ कर चुके हों तो उसके अग्रभागसे नाकको साफ भी किया जा सकता है । गीले हाथ भी सुखाये जा सकते हैं । आंख वा नाकमें खुजली होनेपर उसके अग्रभागसे ठीक किया जा सकता है । फलतः लांग - सिष्टम तथा धोतीवाला वेष जहां प्राचीनता एवं सात्त्विकता लिये हुए है वहां लाभप्रद भी बहुत है । हिन्दुजातिको इसका परित्याग नहीं करना चाहिये । इसे कमर पर लपेटकर बांधनेका अभ्यास करना चाहिये | अभ्यासी व्यक्ति जब इसे बांधता है; तो दूसरा व्यक्ति उस धोतीको खैंचकर भी खोलने में समर्थ नहीं हो सकता । अतः जो लोग खुल जानेके डरसे इसे नहीं पहनना चाहते वा इसके पहिननेमें असभ्यता समझते हैं उन्हें यह भ्रम दूर कर लेना चाहिये ।
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( ७ ) षोडश संस्कार और उनका रहस्य ' पुत्र ही पिता होता है, ' ' आजके बालक कलके भविष्यद् भारतवर्ष हैं ' ये उक्तियाँ जहाँ प्रसिद्ध हैं, वहाँ ठीक भी हैं । हम बालकोंमें जैसा संस्कार डालेंगे, हमारे आचार - विचारोंका जो प्रभाव उनपर पड़ेगा, वे वैसे ही बनेंगे; वही आगे भारतवर्षका स्वरूप बनेगा । अंग्रेजी राज्यके समय अंग्रेजियतका प्रभाव जनता पर अधिक पड़ा; उस जनताके वैसे ही आचार - विचार - विहार बने । उसका बालकों पर गम्भीर प्रभाव पड़ा । उस समय बालक आज युवा हैं । वे भी अप - टू - डेट अंग्रेज बने हैं । न केवल उनका वेषभूषादि बाह्य व्यापार ही, अपितु उनका मन एवं मस्तिष्क भी वैसा बना है । अंग्रेजों के चले जाने पर भी अंग्रेजियत नहीं गयी । लार्ड मैकालेने भारतीय बालकों पर अपनी शिक्षा - दीक्षाका संस्कार डालकर उनको इस प्रकार अपना मानसिक दास बना लिया है कि अब वे युवक प्राच्य - साहित्य से घृणा दिलानेवाले विषैले साहित्य की सृष्टिमें लगे हैं । उन पर प्राच्य आचार - विचारोंका तथा प्राच्य युक्तियोंका प्रभाव नहीं पड़ता । ' पूर्वको दिशा भारतका उदय है, पश्चिम अस्त है ' - यह वे जानते हुए भी नहीं जान पाते । अब आगे भारतीय बालकको नवीन वातावरणके चंगुल से बचाना चाहिये, उस पर पाश्चात्त्य संस्कारोंका असर न पड़ने देकर प्राच्य संस्कार डालने चाहियें - जिससे यहाँका बालक . भारतीय - धर्म एवं भारतीय - संस्कृतिका उपासक बने, उससे जातीयता
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१३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) की भावना तथा गौरव न छूटे; अतः बालक पर अपने संस्कार डालने चाहियें । यह उचित भी है; क्योंकि नीति - शास्त्रकी यह उक्ति परम प्रसिद्ध है कि- ' नवे हि भाजने लग्नः संस्कारो नान्यथा भवेत् ' नवीन पात्र में लगा हुआ संस्कार अन्यथा नहीं हुआ करता; उसमें स्थिर रहा करता है । वह नवीन पात्र बालक है । उस पर जो आचार - विचारका संस्कार पड़ेगा, वह परिवर्तित नहीं होगा । बालक पर ही देशका, जातिका, धर्मका तथा संस्कृतिका भविष्य निर्भर है । संस्कारोंसे ही बालक सद्गुणी, सद्विचारसम्पन्न, सदाचारी, सत्कर्म - परायण, आदर्शभूत, अनुशासनप्रिय, सेवा-परायण, साहसी एवं संयमी होगा । इसके ऐसा बनने से समाज तथा ' देश भी वैसा बनेगा । बालकके संस्कारहीन होने पर वह बिगड़ेगा; इससे देश एवं समाज भी बिगड़ेगा । इसी बिगड़नेके परिणाम कलह, युद्ध एवं महायुद्ध हैं । बालककी सीमा क्या है? शिशु, बाल, कुमार, पौगण्ड, किशोर – ये बालकके अवस्था - भेद हैं । बालक इन अवस्थाओं में सब सीखता है बालक अनुकरणप्रिय तो होता ही है; हम जो करेंगे, वह वही करेगा । इस कारण हमें उसके सामने आदर्श बनकर रहना पड़ेगा! ' यह अबोध शिशु है इस पर हमारे असंयम आदिका क्या प्रभाव पड़ेगा ' – यह सोचना सर्वथा अयुक्त है । · उसके मन - बुद्धिका विकास चाहे न हुआ हो, तथापि मन एवं बुद्धि की सत्ता तो उसमें भी होती है; अतः उस पर भी यथा तथा प्रभाव पड़ता ही है ।
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षोडश - संस्कार- रहस्य १६६ पर हमारे ऋषि - मुनि तो और भी दूर गये हैं । वे कहते हैं कि गर्भ भी वालककी एक अवस्था है । बालक गर्भरूप भी सीखा करता है । अभिमन्युने गर्भ में ही चक्रव्यूह - प्रवेश सीखा था । जबसे गर्भमें चैतन्य - संचार होजाता है, तबसे बालक सीखा करता है । गर्भका ही प्रथम संस्करण बालक है, बालकका ही द्वितीय संस्करण युवा है और तृतीय संस्करण वृद्ध । तभीसे हमें आदर्शरूप बनना चाहिये । केवल बाहर से ही नहीं; किन्तु अन्तरङ्ग भी हमें वैसा बनाना चाहिये; क्योंकि माताके विचारोंका भी गर्भ पर प्रभाव पड़ता है । यह गर्भावस्था भी कुछ दूरकी है । निषेक ( गर्भाधान ) बालककी सबसे पूर्वकी और सूक्ष्म अवस्था होती है । इसमें भी माता - पिता के जैसे आचार - विचार - विहार होंगे, उनका संस्कार गर्भस्थ बालक पर अवश्य पड़ेगा — यह विज्ञान हमारे दूरदर्शी ऋषि - मुनियोंने ही निकाला था । प्रत्युत वे इससे भी आगे पहुँचे । उन्होंने अनुसंधान करके यह भी बता दिया कि जब स्त्री ऋतुमती हो तब एकान्त में बैठे । ऋतुस्नान करके फिर पतिके दर्शन करे, अथवा उस समय शीशेमें अपनी आकृति देखे तो सन्तान वैसी ही होगी ' पूर्वं पश्ये-दृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना । तादृशं जनयेत् पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥ ( सुश्रुत ० शारी ० २।२६ ) कितनी ' दूर दूर ' पहुँचे हैं वे, फिर इससे भी दूर पहुँचते हुए उन्होंने स्त्रीको गृहक्षेत्र देकर और बाह्य - संसारसे उसका सम्बन्ध हटवाकर उसे, तथा हमारे परिवार, प्रत्युत हमारी हिन्दु - संस्कृतिको भी सुरक्षित
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२०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) . कर दिया । विचारने पर यह उनकी बहुत सूक्ष्मदर्शिता सिद्ध होती है । ' मनुस्मृति ' में कहा गया है - ' स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च । स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ ( ६७ ) ' तस्मात् प्रजाविशुद्ध्यर्थं स्त्रियं रक्षेत् प्रयत्नतः । ' ( ६ ) इसी संस्कृतिकी रक्षारूप दूरदर्शिताका नाम ऋषि - मुनियोंने ' संस्कार ' रक्खा था । हिन्दुधर्म में संस्कारोंका कितना महत्त्वपूर्ण स्थान है? संस्कारों " का क्या लाभ है और उसके कौन अधिकारी हैं? संस्कार कितने १ संस्कारोंमें किसका क्या मत है? प्रत्येक संस्कारका क्या रहस्य है? इस विषय में हिन्दुमान्त्रको ज्ञान रखना आवश्यक है । इस आकांक्षाकी पूर्तिकेलिए हम प्रयत्न करते हैं । संस्कार - महत्त्व संस्कारका लाभ जगत्प्रसिद्ध है । जव सोना खानसे निकलता है तब वह मलिन होता है । जब तक उसका संस्कार नहीं किया जाता, तब तक सुवर्ण सुवर्ण नहीं बनता । उस समय वर्तमान संस्कृत अवस्थाके समान उसकी चमक - दमक, आकृति एवं मूल्य आदि नहीं हुआ करता । इस कारण सुवर्णका संस्कार करके उसे सु - वर्ण बनाया जाता है । उसे इस प्रकारका बनानेकेलिए पहले उसका मार्जन करना पड़ता है — यह उसका दोष - मार्जक संस्कार होता है । संस्कार के बिना कृत्रिम और अकृत्रिम सुवर्णकी परीक्षा भी सम्भव नहीं होती । संस्कार द्वारा ही सब पदार्थ व्यवहारोप-योगी हो जाते हैं । किसी पदार्थमें दोष - निराकरणपूर्वक गुणोंको उत्पन्न करना ही