पञ्चम सुमन · प्रकरण 27

कहां - कहां लघुशंकादि न करें

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335८. ( क ) कहां - कहां लघुशंका आदि न करे?

मनुस्मृति में कहा है- ' न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गो- ब्रजे । न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते । न जीर्ण देवायतने न वल्मीके कढ़ाचन ' ( ४ | ४५-४६ ) न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन्नापि च स्थितः । न नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ' ( ४ । ४७ ) वाय्वग्नि- विप्रमादित्यमपः पश्यँस्तथैव गाः । न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ' ( ४ | ४८ ) रास्ते में, राखमें, गोशाला में, जुते खेतमें, जल में, चिता में, पर्वत में, पुराने देवमन्दिर में, बिलमें, जीवोंसे युक्त गढ़ों में टट्टी - पेशाब न करे । खड़े होकर, चलते हुए, नदी किनारे, वायु, अग्नि और ब्राह्मणके सामने तथा सूर्य और गायके सामने टट्टी - पेशाब न करे । इनमें सूर्य आदिके सामने तथा खड़े होकर पेशाब न करनेके विषय में हम पहले लिख चुके हैं ।

जनसाधारणके रास्ते में मलमूत्रका विसर्जन, मलमूत्रके पर- माणुओंको फैलाना तथा दूसरोंके रास्तेमें रुकावट डालना है । भस्म, पात्रोंके पवित्र करनेके काम आती है; उसमें मलमूत्रका करना उचित नहीं; और इधर वह भस्म फैल भी जाती है । गोशाला में गौच्चों का बैठनेका स्थान होनेसे वहाँ मलमूत्र करने से वे परमाणु उनको चिपटेंगे; वा गायकी प्रकृति उसे खाने वा चाटनेकी बनेगी, जिससे उसके दुग्धपर उसका प्रभाव पड़ेगा, वही दुग्ध जनताको पीना पड़ेगा - यह उचित नहीं । कर्षित हुए खेत में करने से

* मनुस्मृति सृष्टिकी आदिमें बनी मानी जाती है, तब मनुमें वर्णित ' देवमन्दिर ' भी सृष्टिकी आदिमें सिद्ध हुए । '

336उसका खेती पर प्रभाव पड़ेगा । गायके गोवरका खाद तो लाभप्रद है; पुरुषका मलमूत्र वहुत गन्दे परमाणुओं वाला होने से हानिजनक होता है । चितामें करने से उससे उठे हुए शवके परमाणु हमें हानि पहुँचायेंगे । पर्वत में करने से उसके छींटे नीचे जाते हुओं पर पड़ सकते हैं । पुराना भी मन्दिर अन्ततः देवस्थान है; वहाँ करने पर देवका अपमान है । विलमें करने पर उसमें रहनेवाला जीव भूत्रकी उष्णतासे भट बाहर आ सकता है, वह हमें काट सकता है; या हम डर जावें; तो मूत्रके वेगमें एकदम अवरोध पड़ने से हमारी हानि सम्भव है । चलते हुए पेशावका छिड़काव करना असभ्यता तथा अपनेको अपवित्र करना है । नदी के किनारे पर भी ठीक नहीं; वहाँ लोगोंने अपने कपड़े रखने होते हैं; बैठना होता है और नदीके देवता वेद - वर्णित वरुणका अपमान भी है । इत्यादि बातें सभ्यता के नातेसे वर्जित की गई हैं । अन्य भी हानियाँ सोचने पर प्रतीत हो सकती हैं ।

८. ( ख ) मलसूत्र त्यागके बादके नियम ।

मल - त्यागके बाद गुदा आदिकी जलसे शुद्धि करके फिर मिट्टी से हाथोंकी शुद्धि करके पाँवोंकी भी घुटने तक शुद्धि करनी चाहिये; उन्हें जल से धोना चाहिये; क्योंकि उस समय यह भाग अनावृत होने से मलमूत्रादिके परमाणुओंसे युक्त होनेसे शोधनीय हो जाता है । इससे जहां पाँवोंकी शुद्धि होती है; वहाँ शरीर भी स्निग्ध तथा स्वस्थ रहता है ।

In English

Rules for Waste Disposal and Personal Cleansing

This chapter lists specific locations and circumstances where one should not urinate or defecate, such as near water, in temples, or in front of cows and the sun. It also outlines the required steps for washing oneself after using the toilet to ensure physical cleanliness.

This chapter answers

  • Where is it forbidden to urinate or defecate according to मनुस्मृति?
  • Why should one not urinate near rivers or mountains?
  • How to clean oneself after using the toilet?
  • Rules for hygiene and waste disposal in hinduism?

Also written: Kahan, Laghushankadi, Na, Karen, Kahan Kahan Laghushankadi Na Karen, कहां - कहां लघुशंकादि न करें

मूल ग्रन्थ

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