पञ्चम सुमन · प्रकरण 26
मट्टी से हाथोंकी शुद्धि
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333है
यह भी स्मरण रखनेकी बात है कि विद्यालयों में वा घरोंमें, वा अन्य स्थानोंमें एक ही स्थानमें वहुत लोग लघुशंका करते हैं; वह ठीक नहीं । क्योंकि ऐसा करनेसे दूसरोंके रोग - परमाणु इन्द्रिय द्वारा हमारे अन्दर संक्रान्त हो जाते हैं । जहां घोड़े आदि पशुओंका, विशेष करके गधेका पेशाब हुआ हुआ हो; वहां तो पुरुष कभी भी लघुशंका न करे; इससे आतशक आदि बीमारियां हो जाती हैं । जहां पेशाब का एक ही स्थान हो; तो वहां फिनैल, अथवा पानी डाल देना चाहिये | देहली आदि नगरों में लघुशंकाके स्थानों में प्रत्येक मिनट में जल - यन्त्र द्वारा जल गिरकर स्वयं ही मूत्रस्थानकी शुद्धि होती रहती है, यह अच्छा प्रकार है । इससे एक - दूसरेके रोगके बीजोंके संक्रमणकी आशंका नहीं रहती । उपदंश आदि रोग पितृपरम्परासे प्राप्त होते हैं । उस रोगवाले जहाँ लघुशंका करें; वहाँ पर लघुशंका करनेवालोंको वह रोग हो जाया करता है । अतः सबसे अच्छा उपाय है कि लघुशंकाकर्ता साथ जल ले जानेका अभ्यास करें ।
( ७ ) मट्टी से हाथोंकी शुद्धिका विज्ञान ।
पुरीषालय से आकर प्रक्षालन आदि ताजे पानीसे करके हाथों की जल और मई से शुद्धि करनी पड़ती है - ऐसा हिन्दुओंका व्यवहार है । उसमें पहिले दाहिने और फिर बाएं हाथकी शुद्धि पृथक् - पृथक् करके फिर दोनोंकी इकट्ठी शुद्धि करनी पड़ती है । वाएँ हाथकी शुद्धि दाहिनेकी अपेक्षा अधिक करनी पड़ती है; क्योंकि उससे अपानका स्पर्श करना पड़ता है । यदि दाहिने 334हाथकी शुद्धि आपने दो वार की है, तो बाएँकी पांच बार करें । फिर दोनोंकी इकट्ठी सात बार करें । पर हिन्दुधर्मकी सभी रीतियोंको घृणा दृष्टिसे देखनेवाले आजके सुधारक मट्टीकी अपेक्षा अधिक मूल्यलभ्य ' साबुनों ' को लेकर उन्होंसे हस्तशुद्धि करते हैं; पर वे नहीं जानते कि साबुन से मलके परमाणु नष्ट नहीं होते । मलके परमाणुओं को सर्वथा नष्ट करनेकी शक्ति मट्टी में ही है । इसीलिए हमारे प्राचीन महानुभाव कहा करते थे कि - ' नगरके बाहर शौचार्थ जाओ; और वहां गढ़ा करके मल त्याग करो; और फिर उसे मट्टी से ढक दो । ' इसमें कारण यही था कि मट्टी से मलके परमाणु सर्वथा दूर हो जाते हैं । साबुनमें चिकनाहट होनेसे वे मलके चिकनाहट से मिले परमाणुओं को सजातीयतावश दूर नहीं कर सकते । वल्कि उसमें मलके परमाणु बने रहते हैं । और फिर उसी साबुनको मल त्यागके बाद अपने अन्य व्यक्ति भी उपयोग में लाते हैं । इस प्रकार उसमें मलके परमाणु बढ़ते ही रहते हैं । साबुन एक ऐसा पदार्थ है कि — उसका एक ही · पुरुष उपयोग ले । नहीं तो उसमें एक - दूसरे के परमाणु इकट्ठे होकर एक - दूसरे में संक्रान्त हो सकते हैं । इसके अतिरिक्त साबुनके खरीदने में खर्च भी बहुत होता है । इस कारण इस अवसर पर बहुत सस्ती, सट्टीका उपयोग ही सर्वथा लाभकारी है, . विज्ञान -पूर्ण है, ' कम खर्च बालानशीन ' इस लोकोक्तिका चरितार्थ करनेवाला है!
In English
Hygiene of Urination and Hand Washing
This text discusses the importance of maintaining clean urination areas to prevent the spread of germs and diseases. It argues that washing hands with soil is more effective than using soap for removing waste particles and suggests specific rituals for cleaning hands after using the restroom.
This chapter answers
- How to prevent disease from shared urination areas?
- Why should one use soil instead of soap for hand washing?
- What is the correct way to wash hands after using the toilet?
- How to clean communal toilets to avoid infection?
Also written: Matti, Se, Hathonki, Shuddhi, Matti Se Hathonki Shuddhi, मट्टी से हाथोंकी शुद्धि