सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 361–370

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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मट्टी से हाथोंकी शुद्धि ३३३ है यह भी स्मरण रखनेकी बात है कि विद्यालयों में वा घरोंमें, वा अन्य स्थानोंमें एक ही स्थानमें वहुत लोग लघुशंका करते हैं; वह ठीक नहीं । क्योंकि ऐसा करनेसे दूसरोंके रोग - परमाणु इन्द्रिय द्वारा हमारे अन्दर संक्रान्त हो जाते हैं । जहां घोड़े आदि पशुओंका, विशेष करके गधेका पेशाब हुआ हुआ हो; वहां तो पुरुष कभी भी लघुशंका न करे; इससे आतशक आदि बीमारियां हो जाती हैं । जहां पेशाब का एक ही स्थान हो; तो वहां फिनैल, अथवा पानी डाल देना चाहिये | देहली आदि नगरों में लघुशंकाके स्थानों में प्रत्येक मिनट में जल - यन्त्र द्वारा जल गिरकर स्वयं ही मूत्रस्थानकी शुद्धि होती रहती है, यह अच्छा प्रकार है । इससे एक - दूसरेके रोगके बीजोंके संक्रमणकी आशंका नहीं रहती । उपदंश आदि रोग पितृपरम्परासे प्राप्त होते हैं । उस रोगवाले जहाँ लघुशंका करें; वहाँ पर लघुशंका करनेवालोंको वह रोग हो जाया करता है । अतः सबसे अच्छा उपाय है कि लघुशंकाकर्ता साथ जल ले जानेका अभ्यास करें । ( ७ ) मट्टी से हाथोंकी शुद्धिका विज्ञान । पुरीषालय से आकर प्रक्षालन आदि ताजे पानीसे करके हाथों की जल और मई से शुद्धि करनी पड़ती है - ऐसा हिन्दुओंका व्यवहार है । उसमें पहिले दाहिने और फिर बाएं हाथकी शुद्धि पृथक् - पृथक् करके फिर दोनोंकी इकट्ठी शुद्धि करनी पड़ती है । वाएँ हाथकी शुद्धि दाहिनेकी अपेक्षा अधिक करनी पड़ती है; क्योंकि उससे अपानका स्पर्श करना पड़ता है । यदि दाहिने

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३३४ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) हाथकी शुद्धि आपने दो वार की है, तो बाएँकी पांच बार करें । फिर दोनोंकी इकट्ठी सात बार करें । पर हिन्दुधर्मकी सभी रीतियोंको घृणा दृष्टिसे देखनेवाले आजके सुधारक मट्टीकी अपेक्षा अधिक मूल्यलभ्य ' साबुनों ' को लेकर उन्होंसे हस्तशुद्धि करते हैं; पर वे नहीं जानते कि साबुन से मलके परमाणु नष्ट नहीं होते । मलके परमाणुओं को सर्वथा नष्ट करनेकी शक्ति मट्टी में ही है । इसीलिए हमारे प्राचीन महानुभाव कहा करते थे कि - ' नगरके बाहर शौचार्थ जाओ; और वहां गढ़ा करके मल त्याग करो; और फिर उसे मट्टी से ढक दो । ' इसमें कारण यही था कि मट्टी से मलके परमाणु सर्वथा दूर हो जाते हैं । साबुनमें चिकनाहट होनेसे वे मलके चिकनाहट से मिले परमाणुओं को सजातीयतावश दूर नहीं कर सकते । वल्कि उसमें मलके परमाणु बने रहते हैं । और फिर उसी साबुनको मल त्यागके बाद अपने अन्य व्यक्ति भी उपयोग में लाते हैं । इस प्रकार उसमें मलके परमाणु बढ़ते ही रहते हैं । साबुन एक ऐसा पदार्थ है कि — उसका एक ही · पुरुष उपयोग ले । नहीं तो उसमें एक - दूसरे के परमाणु इकट्ठे होकर एक - दूसरे में संक्रान्त हो सकते हैं । इसके अतिरिक्त साबुनके खरीदने में खर्च भी बहुत होता है । इस कारण इस अवसर पर बहुत सस्ती, सट्टीका उपयोग ही सर्वथा लाभकारी है, . विज्ञान -पूर्ण है, ' कम खर्च बालानशीन ' इस लोकोक्तिका चरितार्थ करनेवाला है!

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कहां - कहां लघुशंका न करे ३३२ ८. ( क ) कहां - कहां लघुशंका आदि न करे? मनुस्मृति में कहा है- ' न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गो-ब्रजे । न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते । न जीर्ण देवायतने न वल्मीके कढ़ाचन ' ( ४ | ४५-४६ ) न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन्नापि च स्थितः । न नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ' ( ४ | ४७ ) वाय्वग्नि-विप्रमादित्यमपः पश्यँस्तथैव गाः । न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ' ( ४ | ४८ ) रास्ते में, राखमें, गोशाला में, जुते खेतमें, जल में, चिता में, पर्वत में, पुराने देवमन्दिर में, बिलमें, जीवोंसे युक्त गढ़ों में टट्टी - पेशाब न करे । खड़े होकर, चलते हुए, नदी किनारे, वायु, अग्नि और ब्राह्मणके सामने तथा सूर्य और गायके सामने टट्टी - पेशाब न करे । इनमें सूर्य आदिके सामने तथा खड़े होकर पेशाब न करनेके विषय में हम पहले लिख चुके हैं । जनसाधारणके रास्ते में मलमूत्रका विसर्जन, मलमूत्रके पर-माणुओंको फैलाना तथा दूसरोंके रास्तेमें रुकावट डालना है । भस्म, पात्रोंके पवित्र करनेके काम आती है; उसमें मलमूत्रका करना उचित नहीं; और इधर वह भस्म फैल भी जाती है । गोशाला में गौच्चों का बैठनेका स्थान होनेसे वहाँ मलमूत्र करने से वे परमाणु उनको चिपटेंगे; वा गायकी प्रकृति उसे खाने वा चाटनेकी बनेगी, जिससे उसके दुग्धपर उसका प्रभाव पड़ेगा, वही दुग्ध जनताको पीना पड़ेगा - यह उचित नहीं । कर्षित हुए खेत में करने से * मनुस्मृति सृष्टिकी आदिमें बनी मानी जाती है, तब मनुमें वर्णित ' देवमन्दिर ' भी सृष्टिकी आदिमें सिद्ध हुए । '

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३३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उसका खेती पर प्रभाव पड़ेगा । गायके गोवरका खाद तो लाभप्रद है; पुरुषका मलमूत्र वहुत गन्दे परमाणुओं वाला होने से हानिजनक होता है । चितामें करने से उससे उठे हुए शवके परमाणु हमें हानि पहुँचायेंगे । पर्वत में करने से उसके छींटे नीचे जाते हुओं पर पड़ सकते हैं । पुराना भी मन्दिर अन्ततः देवस्थान है; वहाँ करने पर देवका अपमान है । विलमें करने पर उसमें रहनेवाला जीव भूत्रकी उष्णतासे भट बाहर आ सकता है, वह हमें काट सकता है; या हम डर जावें; तो मूत्रके वेगमें एकदम अवरोध पड़ने से हमारी हानि सम्भव है । चलते हुए पेशावका छिड़काव करना असभ्यता तथा अपनेको अपवित्र करना है । नदी के किनारे पर भी ठीक नहीं; वहाँ लोगोंने अपने कपड़े रखने होते हैं; बैठना होता है और नदीके देवता वेद - वर्णित वरुणका अपमान भी है । इत्यादि बातें सभ्यता के नातेसे वर्जित की गई हैं । अन्य भी हानियाँ सोचने पर प्रतीत हो सकती हैं । ८. ( ख ) मलसूत्र त्यागके बादके नियम । मल - त्यागके बाद गुदा आदिकी जलसे शुद्धि करके फिर मिट्टी से हाथोंकी शुद्धि करके पाँवोंकी भी घुटने तक शुद्धि करनी चाहिये; उन्हें जल से धोना चाहिये; क्योंकि उस समय यह भाग अनावृत होने से मलमूत्रादिके परमाणुओंसे युक्त होनेसे शोधनीय हो जाता है । इससे जहां पाँवोंकी शुद्धि होती है; वहाँ शरीर भी स्निग्ध तथा स्वस्थ रहता है ।

पृष्ठ 365

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कुल्ला करना तथा मुंह धोना ३३७ ( E ) कुल्ला करना तथा मुह धोना । मल - त्यागके बाद अन्य शुद्धि करके फिर गण्डूष ( कुल्ला ) करनेका विधान भी आया है, यह भी रहस्यपूर्ण है । हम किसी गली में जारहे हैं; और वहाँ मल - पात्र पड़ा हुआ है - वा पेशाबका स्थान है | हम उस स्थलसे जाते हुए एक तो मुँह और नाक बन्द कर लेते हैं, और उस स्थानको पार करके मुँहसे थूक गिरा देते हैं । उसमें कारण क्या है? यही कि तब हमारे मुखमें दुर्गन्धके परमाणु आ जाते हैं । वे भीतर न चले जावें; अतः उन्हें निकालने केलिए थूका जाता है । उस स्थलको पार करना तो थोड़े से समयका है; पर पुरीषालय में अथवा पुरीष करनेकेलिए किसी खुले स्थानपर कुछ काल तक रहना पड़ता है । तब मुखमें गये हुए गन्दे परमाणुओं को हटानेकेलिए साधारण थूकसे काम नहीं चलता; तब बारह बार कुल्ला किया जाता है, जिससे पूर्ण शुद्धि हो जाय । मुनियोंने उसका परिमाण जो बनाया; वह इसीलिए कि इतनी संख्या तक करनेसे वे परमाणु पूर्णरूपसे निकल जाते हैं । मूत्रोत्सर्गके समय मलकी अपेक्षा परमाणुओंकी शक्ति न्यून होनेसे चार बार कुल्ला करना पर्याप्त होजाता है । इसीलिए आश्वलायनका यह प्रमाण मिलता है - ' कुर्याद् द्वादश गण्डूषान् पुरीषोत्सर्जने ततः । मूत्रोत्सर्गे तु चतुरो भोजनान्ते तु षोडश । भक्ष्यभोज्यावसाने तु गण्डूषाष्टकमाचरेत् ' II । भोजनके समय १६ कुल्ला करनेका लाभ दन्तस्थित उच्छिष्टको सर्वथा बाहर निकालनेकेलिए है; नहीं तो दांतों में उच्छिष्ट रह जानेसे दांत शीघ्र टूट जाते हैं । २२ स ० ध ०

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३३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अस्तु; कुल्ला करनेके बाद मुँह तथा आंखें भी धोनी चाहियें । वहाँ भी मल आदिके परमाणुओं को दूर करना लक्ष्य होता है; नहीं तो शुद्धि न करने से आँखोंकी हानि होती है । मुहमें पानी भरकर तब शुद्ध शीतल जलसे मुँह और आँख धोने चाहियें । इससे आँखों की नसें अधिक तेजस्वी हो जाती हैं और नेत्र शीघ्र विकृत नहीं होते । मुँह धोना दिनमें तीन - चार बार होना चाहिए अपने कार्यसे आकर फिर भी मुँह शीतल जलसे धोना चाहिए । इससे आँखोंकी ज्योति बढ़ती है । प्रातः मुख धोने से रातकी उत्पन्न मैल आँखों से हटती है । ( १० ) दातन वा मंजनका प्रयोग । रातको जब हम सोते हैं; तो भोजन करके सोते हैं; सोते हुए ही उस भोजनकी पाकक्रिया होती रहती है । फिर गन्दे श्वास-प्रश्वास निकला करते हैं; उसका मुहके भीतर, जीभ तथा दांतों पर भी प्रभाव पड़ता है । उस समयकी थूक विषाक्त होती है । उसका प्रमाण यही है कि— यदि हम उस थूकको अपने फोड़े में लगाएँ; तो वह शीघ्र नष्ट हो जाता है । अतः उस समय दांतोंकी तथा मुखके भीतरी भाग- जिह्वा आदिकी शुद्धि अपेक्षित होती ही है । यदि ऐसा न किया जावे; तो दांत पीले बने रहते हैं, और वह मैल भोजन खानेके समय अन्दर जाकर हानि पहुंचाता है । दांतोंका महत्त्व सभी जानते हैं । दांतोंके स्वास्थ्यपर शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर है । डाक्टर लोग कई युवकोंके दांत इसलिए निकलवा देते हैं कि - यदि ऐसा न किया गया; तो उसको राज-

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दातन वा मंजनका प्रयोग ३३६ यक्ष्मा ' होनेका डर सम्भव है । उन दांतों की शुद्ध्यर्थ दन्तधावनकाष्ठ आवश्यक है । इससे ' कम खर्च वाला नशीन ' कहावत चरितार्थ हो जाती है । नीम आदिका दातन करनेसे उसका कटुत्व जहाँ दांतों के कीड़ेको नष्ट करता है; वहाँ उदर रोगोंको भी दूर करता है । प्राचीन लोग दन्तशुद्धिकेलिए सद्यः काटे हुए विशेष - विशेष काष्ठको उपयुक्त करनेका आदेश देते हैं । इससे जहां दांतोंको चबानेका बहुत वल नहीं लगाना पड़ता; वहाँ दांतोंका मल भी शीघ्र दूर हो जाता है, और उसका कषाय - भाग भीतर प्राप्त होकर भीतरी मलको भी दूर कर दिया करता है । उन विशेष वृक्षोंका गुण उसके काष्ठमें होनेसे हमें लाभ पहुँचता है । उससे जीभकी भी शुद्धि हो जाती है । जीभकी शुद्धि भी आवश्यक है । इसके अतिरिक्त दन्तधावन - काष्टमें व्यय भी थोड़ा पड़ता है । पर आज के महाशय बहुमूल्यलभ्य विलायती पेस्टोंको लेकर ब्रुशसे दांतोंकी शुद्धि करते हैं । एक तो उसमें खर्च बढ़ता है । दूसरा उस ब्रु शमें दन्तमलके कीटाणु रह जाते हैं । तीसरा उस ब्रु शके बाल किसी प्रारणीके ही तो होते हैं; उन्हें मुहमें डालना उचित प्रतीत नहीं होता; और वह विलायती ओषधि अपवित्र भी हो सकती है; उसे मु'हमें डालने से धर्महानि भी स्पष्ट है । अतः प्राचीन रीतिका आश्रयरण ही सभी सुविधा और लाभोंको पहुँचाता है । उनमें शास्त्रका अनुसरण होता है, इससे हममें भारतीयता रहती है; हम विलायतकी ओर नहीं खिंचते; और अपने धर्म में निष्ठा रहनेसे दूसरोंके धर्मको घृणित समझकर उसमें हमारे

पृष्ठ 368

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३४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्रविष्ट होनेकी शंका नहीं रहती । अस्तु यदि दन्तधावनका समय न हो, क्योंकि - आजकलके देश-कालमें इतने कार्यं बढ़ गये हैं कि - समयकी भी न्यूनता हो गई है; तब विशुद्ध मंजनका उपयोग कर लेना चाहिए । ' आंखों में अंजन, दांतों में मंजन ' यह लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है । उसमें भी यदि सुविधा न हो; तो नमक और तेलसे दांतोंका घर्षण कर लेना चाहिए, इससे दांत दृढ हो जाते हैं; शीघ्र गिरते नहीं । दांतों में छिद्र भी नहीं होते, उनमें दुर्गन्ध भी नहीं रहता । ( ११ ) तैल - नियमका विज्ञान । इसके बाद स्नानका क्रम आता है । उससे पूर्व तेल लगाना पड़ता है । शीतकालमें शरीरपर एकदम जल डालना हानिकारक हो सकता है; अतः पहले तेल लगा लेनेसे उसकी चिकनाहटके कारण जलका हानिकारक प्रभाव नहीं हो पाता । तेल शरीरमें बल भी देता है । इससे शरीरकी रुखाई भी दूर रहती है; मुख भी स्निग्ध रहता है । अङ्गों में लगाया हुआ तेल रोमकूपोंके द्वारा भीतर घुसकर लाभ पहुँचाता है । तेलका प्रयोग न करनेपर शरीरकी रूक्षता बढ़ जानेसे खुजली बढ़ती है, और शरीर से मट्टी निकलती हुई प्रतीत होती है । बहुतसे जल शरीरमें खुश्की बढ़ाते हैं; उस दोषके दूरीकरणार्थ तेलका प्रयोग आवश्यक है । सिर में तेल डालनेसे सिरके रोग नहीं होते, और मस्तिष्क बलवान् होता है । मुहमें तेल लगाने से मुखकी त्वचापर शीत - उष्णका प्रभाव नहीं पड़ता; आंखोंकी ज्योति तीव्र रहती है । कानों में तेल डालने से

पृष्ठ 369

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तेल- नियमका विज्ञान ३४१ वहांकी नसें बलको प्राप्त होकर नेत्रोंकी ज्योतिको बढ़ाती हैं; कोई भी नेत्र रोग नहीं हो पाता, गर्मी में अांखें आती नहीं । उनमें लालिमा नहीं रहती । पेटमें तेलकी मालिश करनेसे उदरकी वृद्धि नहीं होती, अपान वायु आदि निकलते रहने से शरीर स्वच्छ एवं स्वस्थ रहता है I । पांवों में तेल लगानेपर जूतेसे पैदा हुई पांवों की कठोरता तथा ठोकर लगने से प्राप्त हुई वेदना दूर हो जाती है । पांवोंके तलवेमें तेल लगाने से आंखोंकी ज्योति भी बढ़ती है । तैलमर्दन इन्जैक्शनकी भांति शीघ्र लाभ देनेवाला सिद्ध होता है । तेलोंमें सरसोंका तेल प्रायः प्रयुक्त किया जाता है । तिलके तेलकी मालिश करके सद्यः स्नान करनेसे वातकी व्याधि उठ खड़ी होती है । पर सरसों के तेल के प्रयोगमें ऐसी आशंका नहीं रहती । उससे खुजली और दाद आदि त्वचा के रोग भी शान्त हो जाते हैं । उसकी मालिशसे रक्तकी गति भी बढ़ती है । बालोंके काला रखनेकेलिए तथा मस्तिष्कके लाभार्थ आंवलेका तेल बहुत हितकारी होता है; पर वह मैशीनी नहीं होना चाहिये; क्योंकि— मशीनी तेल बालोंको शीघ्र सफेद कर दिया करते हैं, उनमें मट्टीके तेलकी पुट भी होती है । तेल लगाकर स्नान करनेसे शीत भी नहीं लगता, वातदोष भी शान्त रहता है । विशेष वारों में जो कि शास्त्रों में तेल लगानेका निषेध मिलता है, उसमें भी रहस्यपूर्णता होती है । उसमें निषेधका कारण उस वारके स्वामी ग्रहकी प्रकृतिका विचार होता है । प्रातःकाल उस वारके ग्रहका प्रभाव रहता है । यदि उष्ण प्रकृतिवाले ग्रहका

पृष्ठ 370

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३४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वार है; तो उसका शरीर में पूर्व से ही प्रभाव होने से भीतरी ऊष्मा केलिए किया हुआ तैल प्रयोग हानि - जनक ही होगा । तथापि यदि उसका प्रयोग आवश्यक हो; तो उस समय हमारे दूरदर्शी मुनियों ने पुष्प, दूर्वा आदिके प्रयोगसे उस प्रभावका दूर होना बताया है । वैज्ञानिक हमारे पूर्वजोंने अपने तपोवलमूलक अनुभवों से प्रत्येक वस्तुका विश्लेषण करके उसकी प्रकृतिका परिचय प्राप्त कर लिया था, और उसे अपनी स्मृतियोंमें लेखारूढ कर डाला था; अतः इसमें वैज्ञानिकता ही है । उसमें उपहास करना अपनी बुद्धिका पातदर्शित्व प्रकाशित करना है । वे श्लोक संग्रहग्रन्थों में इस प्रकार प्रसिद्ध हैं- ' तैलाभ्यंगे रखौ तापः, सोमे शोभा, कुजे मृतिः । बुधे धनं, गुरौ हानि:, शुक्रे दुःखं, शनौ सुखम् ' रविवार तेल मालिश करने पर ताप होता है । रवि भी उष्ण है, तेल - मालिश भी; उसका परिणाम ताप स्वाभाविक है | सोम ( चन्द्र ) स्वयं शोभित होता है; अतः उस दिन तैलमर्दनमें भी शोभा बताई गई है । भौम ग्रह अग्निरूप है; और क्रूर है; अतः रक्त भी है । इधर उसकी ऊष्मा, इधर तैलमर्दनकी ऊष्मा; यह दोनों मिलकर मृति ( मृत्यु ) का कारण बन सकती हैं । मृत्यु आठ प्रकारकी होती है; उसमें कष्ट भी एक मृत्यु है । बुध बुद्धि देकर धन - प्राप्तिमें सहायक होता है; तब उस दिनकी तैल - मालिश होनेसे पुरुष पुरुषार्थी होकर धनप्राप्ति कर सकता है । अथवा बुधको अग्नि-स्वरूप माना गया है; अतः उसका मन्त्र भी अग्नि- देवतावाला प्रसिद्ध है । अग्नि सुवर्णका उत्पादक है, जैसा कि मनुस्मृतिमें भी