पञ्चम सुमन · प्रकरण 14

कन्याका विवाह कब?

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261कटाक्ष, मृदु - मधुर मुस्कान तथा कुछ अङ्गलावण्यकी विचित्रता तब एकदम मनोदुर्ग पर अधिकार कर लेते हैं । स्वभाव - चरित्र आदिकी परीक्षाका अवसर भी तब नहीं मिलता । उस अवस्थामें कामभावके आधिक्य वश सात्त्विक प्रेम - भाव के चित्तसे हट जाने के कारण चित्तका मार्दव हट जाता है, और प्रकृति बहुत पुरुषोंके भावों से भावित होने से तब एक में स्थिरता नहीं रह जाती । पितृ - गृह में स्वतन्त्रता अधिक और लज्जाकी न्यूनता होनेसे अधिक आयुमें पति - वशित्व और लज्जाशीलता दुःशक होती है ।

पुरुष होता है अङ्गी और स्त्री अङ्ग । श्रङ्गी मुख्य होता है, और अङ्ग गौण । अङ्गाङ्गिभावसे ही एकता होती है । दोनों ही अङ्ग रहें; या दोनों ही अङ्गी रहें; तो पार्थक्य ही रहेगा, ऐक्य नहीं । इस प्रकार दोनोंका साम्यवाद पार्थक्यकारक एवं विवाद- परिवर्धक होता है, अतः स्त्रीका अधिक आयु में विवाह उसकी अङ्गता हटानेवाला होता है । जिस देशमें कन्याके अधिक वयमें विवाहका नियम होता है; वहां अङ्गाङ्गिभाव नहीं मिलता और वहीं विवाहोच्छेद- प्रथा भी होती है । यदि उस आयुमें स्वभावादिकी परीक्षा, तथा परस्पराभिलषितता -मूलक शान्ति सम्भव होती; तब इङ्गलैंड आदिमें ऐसा कैसे होता? यहां भी ' शारदाविल ' पास हो चुका है; अतः ' तलाक बिल ' भी पास करना पड़ा है ।

फलतः अन्धानुराग - प्रणोदित विवाहके बन्धनमें सत्य प्रेमकी उत्पत्तिकी सम्भावना अतिकठिन होती है । इस कारण साधारण- सी बात में वह बन्धन स्वयं ही विच्छिन्न हो जाता है । अब उन्हीं 262देशों में इसके परिणामसे तंग आकर लोग विवाह प्रथाको हो बन्द करनेकेलिए तैयार हो गये हैं । यदि वहां अधिक वयस्क, परस्परा- भिलषित विवाह सुखजनक सिद्ध होता; तब उस सुखके हटानेके लिए वहां वालोंका इतना यत्न वा आग्रह क्यों होता? इस प्रकारके उपप्लव अधिक वयस्क विवाह के ही फल हैं - इसमें न तो कोई अत्युक्ति है, न असत्य । यदि आजकल के शिक्षितम्मन्य यहां भी उस सरणिमें चलना चाहते हैं; तो उन्हें विवाहोच्छेद आदि कांटोंसे समाजके अङ्ग - भङ्गकेलिए भी सतत उद्यत रहना चाहिये ।

इधर लड़कीकी पक्की आयुवाली हो जानेसे उसे अपने पीछे चलाना भी कठिन हो जाता है । पक्की शाखाको हम अपनी ओर मोड़ें, तो वह टूट जाती है, हमारी ओर नहीं मुड़ती । पर छोटी कोमल शाखाको अपनी ओर अनायास ही मोड़ लेते हैं । इस प्रकार पति छोटी आयुवाली अपनी पत्नीको अपने अनुकूल चला सकता है; २०-२४ वर्षवाली पत्नीको नहीं ।

यदि दोनोंकी केवल स्वतन्त्रता वा परस्पराभिलषितता रखी जावे; तो कुरूप स्त्री - पुरुषोंकी क्या व्यवस्था बनेगी? कुरूपा भी सुरूप को चाहेगी; कुरूप भी सुरूपाको चाहेगा । तब यदि माता- पिताके हाथ में यह काम न रखा जावे, तब क्या कुमार कुमारियाँ

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आमरण ब्रह्मचर्य रखें? क्योंकि कुरूपोंकी परस्पराभिलषितता कभी होगी ही नहीं । ' कन्या वरयते रूपम् ' ( शुक्रनीति ३।१६८ ) यदि वह किसी निर्धन वा अकुलीन सुरूप वरको वरण कर ले; तब रूपमात्रमें मस्त वह भविष्यत्- निर्वाह के विषय में कैसे सोच 263सकेगी? इसलिए उसका भार पितापर ही ठीक है । कन्याके वाल्य वा यौवनमें अनुभव पिताके वार्धक्यके अनुभवसे न्यून ही होता है । इस कारण वहां पिताके परिपक्क अनुभवकी अतिशयित आवश्यकता होती है ।

केवल स्वतन्त्रतामें लाये हुए कुमार युवक - युवति एकमात्र रूपके पिपासु होते हैं । शीतला आदि रोगके वश बादमें उनकी सुन्दरता में थोड़ी भी हानि प्राप्त हो; तो उनका प्रेम विच्छिन्न हो जायगा । इस प्रकार तो बड़ी अव्यवस्था होगी । परस्पराभिलषितता भी ठीक तब होती है कि — पुरुष शीघ्रस्खलनादिदोषोंसे रहित हो, और स्त्री योनिरोगादिसे रहित हो । रूपमात्र से यह नहीं जाना जा सकता । तब क्या उन्हें कौमार्य में ही एकान्तसेवनका आदेश दिया जायगा? वस्तुतः इस समय यदि धर्मबन्धन स्थापित न किया गया; विवाह में केवल अभिलाषामात्र ही रख दी गई; तो कुछ समयके बाद उस अभिलाषाके दूर होनेपर क्योंकि — ' नयेके नौ दिन ' यह कथन प्रसिद्ध है; तो स्वयं ही विवाहविच्छेद हो जायगा । इससे वेश्याओंकी वृद्धि अनिवार्य होगी ।

बद्ध समुद्र फिर भी मर्यादा नहीं तोड़ता; परन्तु बंधी हुई नदी तो बढ़कर अपनी मर्यादाको भी तोड़ देती है; और निकटवालेकी हानि भी कर देती है । इसी प्रकार यौवन तक अविवाहिता कुमारी भी बँधी हुई नदीकी भांति होती है । यदि नदीको बांधा न न जावे; उसका शनैः - शनैः उपयोग किया जावे; तब वह नदी स्वयं भी मर्यादामें रहती है; दूसरोंकी भी हानि नहीं करती । इस 264प्रकार कुमारीका शास्त्रानुसार १२ वर्षमें विवाह कर दिया जावे; फिर ऋतुकाल प्राप्त होनेपर उसका ऋतुमात्रगमन हो; तब उच्च यौवनमें प्राप्त भी वह हानिकारक सिद्ध नहीं होती ।

विवाह मुख्यतया धर्माचरणके उद्देश्यसे ही होता है, काम- भोगार्थं मुख्यतया नहीं । तभी कहा जाता है; ' आवसथ्याधानं दारकाले ' ( पार ० १1०1१ ) कामभोग तो अवान्तर उद्देश्य है । यदि कामभोग ही विवाहका साक्षात् उद्देश्य हो; तो सारी आयुकेलिए विवाह बन्धन ही व्यर्थ है । उसके लिए तो काममात्रफला वेश्या ही ठीक रह सकती है । इससे स्पष्ट है कि विवाहका साक्षाद् उद्देश्य विशुद्ध दाम्पत्य के प्रेमद्वारा शास्त्रादिष्ट धर्मसाधन ही है । तभी पत्नीको ' धर्मपत्नी ' कहा जाता है ' कामपत्नी ' नहीं । फलतः ऋतुकालसे कुछ पूर्व ही शास्त्रानुसार कन्या विवाह होनेपर और ऋतुकालमें ही उसका उपयोग होनेपर सभी प्रकारकी हानियों से सुरक्षा है । इस विषयपर भिन्न पुष्पमें प्रकाश डाला जायगा ।

अब कई वैवाहिक रीतियोंका रहस्य भी बताया जाता है-

वैवाहिक रीति - विशेषोंका रहस्य ।

सनातनधर्मी - विवाहों में कई देश वा कुलधर्मके अनुसार रस्में की जाती हैं, उनका श्रुति - स्मृति में उल्लेख न होनेसे अर्वाचीन लोग उस विवाहको ही अवैदिक वा अशास्त्रीय मानते हैं; परन्तु उन्हें जानना चाहिये कि — विवाह संस्कार मुख्यतासे गृह्यसूत्रका विषय है; उस गृह्यसूत्रमें उन कुलधर्मोके करनेकी अभ्यनुज्ञा दे दी गई है; तब उसमें अशास्त्रीयता कैसी?

In English

The Importance of Early Marriage

This text argues that marriage should occur at a young age to ensure the wife's adaptability and the stability of the union. It claims that marrying older women leads to a loss of unity and increases the risk of divorce or social disorder.

This chapter answers

  • Why is early marriage recommended in hinduism?
  • What are the disadvantages of marrying an older woman?
  • Is the purpose of marriage dharma or pleasure?
  • How does age affect the relationship between husband and wife?

Also written: Kanyaka, Vivaha, Kaba, Kanyaka Vivaha Kaba, कन्याका विवाह कब?

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 261–264 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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