सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 281–290

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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उपनयन- रहस्य III वर्षोंमें किया जाता है । पहले जीव माता - पिताके गर्भमें शरीर-धारणार्थ आता है, फिर आचार्य के गर्भ ( आचार्यकुल ) में विद्या-शरीर प्राप्त्यर्थ जाता है; अतः यह संस्कार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका एकजत्वसे द्विजत्व - सम्पादक है । यह संस्कार आचार्यकुलमें विद्याग्रहण करनेकेलिए अधिकार पट्ट है । शूद्रको इसका अधिकार नहीं; क्योंकि उसकेलिए अन्य कठिन कार्य हैं-जिनसे वह संसारकी सेवा करता है । इधर के कठिन कार्योंमें भी प्रवृत्त होनेसे उसकी ' इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः ' की आशङ्का रहती है । देशकी भी महती हानि होती है । उपनयनमें मौञ्जी भी धारण करनी पड़ती है । वह अण्डवृद्धि रोगकी आशङ्काको दूर करनेवाली भी होती है । उपनयन द्विजत्वका विशेष संस्कार है । इस संस्कार में भिक्षा भी की जाती है; उसमें एक तो धनी - निर्धनकी समता, दूसरा देशका ऋण अपने ऊपर चढ़वाना लक्ष्य है, जिससे हम अपने आपको देशका ऋणी समझकर आगे देशका ऋण - संशोधन करने के उपलक्ष्य में देशकी सेवा कर सकें । यह संस्कार भी लड़कियोंका नहीं होता । उनका पतिके पास वैध - नयनरूप विवाह ही द्विजत्व - सम्पादक उपनयन है । वैवाहिक वरदत्त उपवस्त्रको ही विवाहतक यज्ञोपवीतकी तरह लपेटना कन्याओंका उपनयनसूत्र - धारण होता है । वैवाहिक स्वयोग्य कई मन्त्रोंका वरके आश्रयसे ( जैसे कि माणवक पहले आचार्यके आश्रय से गायत्री मन्त्रको बोलता है ) बोलना ही उनका वेदारम्भ

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२५४. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( मनु ० २२६५ ) । केशान्त में शिखातिरिक्त केशोंका छेदन इष्ट है, शिखाका छेदन इष्ट नहीं । उसका श्रीमनुके मतमें उष्ण देश - काल से भी कुछ सम्वन्ध नहीं । ' केश ' से ' शिखा ' का ग्रहण भी नहीं होता; तभी — ' केशा न शीर्षन् यशसे, श्रियै शिखा ( यजु ० १६।६२ ) । ' इस मन्त्रमें केश और शिखाको पृथक - पृथक कहा है; और ब्राह्मणादिका १६-२२-२४ वर्ष में उष्णता से कोई भी सम्बन्ध नहीं । : इस संस्कारको आश्वलायनगृह्यमें पृथक नहीं माना गया । इसीको सूत्रग्रन्थोंमें ' ' गोदान ' शब्दसे भी कहा है । ' रघुवंश ' के ३।३३ पद्यकी व्याख्यामें श्रीमल्लिनाथने ' गोदान ' का – -'गावो ' - लोमानि, केशा दीयन्ते - खण्ड्यन्तेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या ' गोदानं नाम ब्राह्मणा-दीनां षोडशादिषु वर्षेषु कर्तव्यं केशान्ताख्यं कर्म उच्यते । ' यह अर्थ किया है । यह मध्यम शिरोमुण्डन है । ( १२ ) समावर्तन ( स्नान ) संस्कार

' समाप्य वेदान् वेदौ वा वेदं वा प्रसभं द्विजः ।

• स्नायीत गुर्वभ्यनुज्ञातः प्रवृत्तोदितदक्षिणः ' ॥

( व्यासस्मृति १/४२ ) द्विज को चाहिये कि तीन, दो या एक वेदको पूर्णरूपसे समाप्त करके गुरु - दक्षिणा देकर उनसे आज्ञा ले व्रतान्त - स्नान ( समावर्तन-संस्कार ) करे । : इस संस्कार में विद्या- समाप्ति होती है । २४ वें वर्षमें आचार्य-कुलमें विशेष स्नान भी करना होता है । ब्रह्मचर्यके चिह्न मेखला आदिका त्याग करना पड़ता है । जदा - लोम आदिका छेदन करके

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विवाह तथा अग्न्याधानका - रहस्य २११. गार्हस्थ्यके उपयुक्त चन्दन, पुष्पमाला, पगड़ी, भूषण, शीशा देखना सुरमा लगाना, छाता करना, जूता पहनना यह नियम आचार्यकी देख - रेख में किये जाते हैं । फिर आचार्यको दक्षिणा देकर आचार्य-कुलको छोड़कर अपने घरमें आ जाना पड़ता है । ऐसा नियम. ठीक भी था । विद्याकी प्राप्ति आचार्यकुलमें जैसी हो सकती है, वैसी अपने घर में नहीं । घरमें कई विघ्न आते हैं । लड़का घरमें उतने नियम पालन भी नहीं कर सकता । पिता आदिका गुरु - इतना भय भी नहीं रहता । आचार्यकुलमें आचार्यके भयसे तथा अन्य साथियोंके देखनेसे नियमोंके अनुसरण में प्रेरणा एवं प्रोत्साहन. प्राप्त होता है । विद्या एवं व्यायामके अतिरिक्त वहाँ पर कोई कार्य नहीं करना पड़ता । गुरु - शुश्रूषा के निमित्तसे वटु स्वकार्य - पटु भी हो जाता है । घर में रहनेवाले लड़केकी भांति वह आलसी नहीं रहता । इसमें अन्तमें उपदेश दिया जाता है कि जो विद्या पढ़ी है, जो आचार - विचार सीखे हैं, जो ज्ञान लिया है, इनका ' अधीति-बोधाचरणप्रचारणैः ' से जीवनमें उपयोग लो । उनके स्वयं उदाहरण बनो, दूसरोंमें उनका प्रचार करो । इस संस्कार में ब्रह्मचर्याश्रमकी समाप्ति होती है । ( १३ ) विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य ' एवं स्नातकतां प्राप्तो द्वितीयाश्रमकाङ्क्षया । प्रतीक्षेत विवाहार्थ-मनिन्द्याऽन्वयसम्भवाम् ' ( व्यासस्मृति २1१ ) । ' अनन्यपूर्विका लघ्वीं विख्यातदशपुरुषाम् ' ( ३ ) । . इस प्रकार स्नातक होकर दूसरे आश्रम ( गार्हस्थ्य ) में प्रवेश

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२१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) करने की इच्छासे विवाह के लिए उच्चकुलकी कन्याको ग्रहण करे वह कन्या किसी दूसरेको न तो ढ़ी गयी हो और न किसीकी पत्नी ही रह चुकी हो । अवस्था में अपने से छोटी हो और उसकी ऊपरकी दस पीढ़ियों में सभी लोग अपने शुद्ध आचार - विचार के लिए विख्यात रहे हों | यह संस्कार विद्यासमाप्तिके बाद पितृऋणशोधनार्थ किया जाता है । इसमें विधिपूर्वक दारवहन — स्त्रीग्रहण किया जाता है । विवाह करके फिर विद्याग्रहण हो भी नहीं सकता । अतः विद्यार्थीको सदा विद्यास्नान समाप्त करके ही विवाह कराना चाहिये । इससे कामका केन्द्र उसकी पत्नी रहती है; अन्यत्र उसका दृकूपात वा गमन नहीं होता । काम एक स्वाभाविक वस्तु है, परमात्माकी सृष्टि बढ़ाने का एक साधन है । जो जितेन्द्रिय होकर रह सकते हैं, वे भले ही नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहें, पठन - पाठन प्रचारण आदिके द्वारा लोकोपकारका कार्य करते रहें; पर अकेला पुरुष प्रसन्न नहीं रहता । ' तस्माद् एकाकी न रमते ' ( शत ० १४ | ४ | २ | ४ ) संसारमें एक दूसरे साथीकी भी अवश्य आवश्यकता पड़ती है, जो कि हमारा शेष - पूरक हो । पुरुषका बाहर आने - जानेका रहता है; क्योंकि उसे वृत्ति भी तो करनी होती है और घर में धर्म-कर्म भी करना होता है, अतः उसे गृहपत्नी भी तो चाहिये, जो उसका सर्वकर्मका निर्वाह कर सके, उसकी सेवा कर सके, जिससे वह अपने धर्म - कर्म में निश्चिन्ततासे लगा रहे; और वृत्ति भी कर सके; और घरकी रक्षा भी हो सके, घरमें ताला बन्द न करना पड़े ।

पृष्ठ 285

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विवाहका रहस्य २५७ अतः विधिपूर्वक स्त्रीपरिग्रह भी आवश्यक ही है । विवाह विधि-पूर्वक स्त्रीको ग्रहण कर लेना - यह धर्मोद्द श्यसे होता है । ऐसे ही किसी स्त्रीको रख लेने से वह ' धर्मपत्नी ' नहीं वन सकती; वह ' रखेली ' कही जाती है; अतः विधिपूर्वक विवाह करनेसे ही ' धर्मपत्नीत्व ' होता है और धर्मानुष्ठान भी पुरुषका पूर्ण होता है । स्त्री स्वतन्त्र - वृत्ति न करती हुई भी जैसे पुरुषकी वृत्तिकी फल-भागिनी होती है, वैसे ही यज्ञादि - कर्म स्वतन्त्रतासे न करती हुई भी उस कार्य में सहायता देने और साथ बैठनेसे उसके फलको प्राप्त कर लेती है । तभी तो कहा जाता है - ' वसिष्ठस्य पत्नी - वसिष्ठकर्तृ कयज्ञस्य फलभोक्त्री ' । ( वसिष्ठकी पत्नी अर्थात् वसिष्ठके किये हुए यज्ञके - फलको भोगनेवाली ) इसीलिए वह विद्या प्राप्त नहीं करती; क्योंकि उसका काम सेवा करना है; सेवासे विद्यावाला मेवा उसे मिल ही जाया करता है । उसका पति ही विद्या पढ़ा होनेसे उसके विद्याकार्यका निर्वाहक हो जाता है । दाहिना हाथ लिखता है, बाँया नहीं । पर बाँया हाथ दाहिनेका सहायकमात्र होता है । न तो बलशाली होता है, न दाहिने हाथवाले सब विशिष्ट अनुष्ठानों तथा कर्मों में वह अधिकृत ही होता है । यदि स्त्री भी पुरुष - इतनी विद्या पढ़े, तो वह पुरुषकी सेवा ही न कर सके । साम्यवादमें सेवा नहीं हुआ करती । यदि उससे दोनों काम लिये जायँ, अपनी सेवा भी उससे पूरी करायें, विद्याकार्य भी उससे लें, तो यह उसपर अत्याचार होगा । देखिये, पुरुष ही विद्याकार्य करके फिर सेवा करने योग्य नहीं रहता, किन्तु अपनी सेवा कराने ही लगता है । उसे यज्ञकार्य १७ स ० ध ०

पृष्ठ 286

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२१८ श्रीसनातनधर्मालोकं ( ५ ) करना है, ग्रन्थ - प्रणयन करना है, उसे वृत्तिकेलिए जाना है, उसे सब वस्तुएँ प्रस्तुत चाहियें I । पठिता स्त्री स्वाभाविकतावश अपने उसी विद्याकार्यमें संलग्न रहनेसे उस सेवामें सक्षम नहीं हो. सकती । ' ममेयमस्तु पोष्या ' ( अथर्व ० १४ । ११५२ ) । ( यह मेरी पोष्या हो ) इस वैवाहिक मन्त्रने उसे ' पोष्या ' बताकर सिद्ध कर दिया है कि उसे स्वतन्त्र विद्याकार्य वा स्वतन्त्र वृत्तिकार्यकी कोई आवश्यकता नहीं । हाँ, आचार - विचारकी शिक्षा उसकेलिए माता - पिता द्वारा आवश्यक है । पुरुष ही उसके योगक्षेमका निर्वाहक होता है । अस्तु । विवाहसंस्कारका प्रयोजन — विवाह एक सांसारिक अव्यवस्था को दूर करनेवाला संस्कार है, इसीसे पुरुष सुसंस्कृत तथा सभ्यं एवं धर्मात्मा बनता है । यदि विवाह - संस्कार न हो तो पुरुष पशुसे भी गया - बीता हो जाय । विवाह के अभाव में न तो पुरुषकी कोई पत्नी ही होती, न मां न बहन और न उसकी कोई लड़की - लड़का आदि सन्तान होती । विवाह बन्धन के अभाव में पुरुष अपनी काम-वासनाको पूर्ण करनेकेलिए कुत्ते आदि पशुओंकी तरह स्त्रीमात्र के पीछे लगा रहता, बलात्कार करता, छीना - झपटी करता, लड़ता-झगड़ता, खून कर डालता, अपनी बुद्धिको दूसरेके विनाशमें लगाता और क्रोधके साम्राज्यको व्यापक बनाता । उससे उत्पन्न इन अवैध सन्तानोंकी कोई रक्षा न करता । उनको पशु - पक्षी खा जाते, जीवित रहते तो गली - गली ठोकरें खाते फिरते । न

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विवाहका रहस्य २५६ उनका घर होता, न कोई उनका स्कूल - कॉलेज होता | विवाह - रहित राष्ट्र, धर्म, शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति, कला, विज्ञानसे सर्वथा शून्य एक पशुराष्ट्र ही होता, परन्तु इसी विवाह - संस्कारने मनुष्यको व्यवस्थित किया, परिवार दिया, घर वसानेकी, शिक्षा पानेकी प्रेरणा दी । विवाहसे ही हमारा यह सुनहला संसार बस पाया । मनुष्य एक स्वार्थी प्राणी है; ८४ लाख पशु - पक्षी आदियोंकी ' योनि भोगकर फिर मनुष्य योनिमें आता है; वह पशुत्व - संस्कार भी इसमें वना रहता है । जब कभी उसे अवसर मिलता है, वह अपनी पशु - प्रकृतिको पूर्ण करनेमें नहीं चूकता । अपहरण, बलात्कार, घर्षण आदि उसी पशुभावके साक्षात् उदाहरण हैं । तब उसकी कामभावनाको एक स्त्री - पुरुषमें बांध देना और शास्त्रीय नियमों द्वारा उसे धीरे - धीरे निवृत्ति की ओर ले जाना भी विवाह का प्रयोजन होता है । इसके अतिरिक्त अपने शरीरमें उसकी जितनी मोह-ममता हो सकती है, उतनी अन्य किसी वस्तुमें नहीं । विवाहद्वारा उसका स्वार्थ या अपने शरीरका ममत्व अपने शरीरसे आगे निकलकर पत्नी, पुत्र, कन्या, सगे - सम्बन्धी आदि परिवार में बंट जाता है । उस मनुष्यका स्वार्थपरक प्रेम पहले घरकी चहार-दीवारीसे प्रारम्भ होकर मोहल्ला, गली, ग्राम, नगर, प्रान्त, देश और फिर क्रमशः समस्त विश्व में व्याप्त हो जाता है । गृहस्थ में रहते हुए पति - पत्नीको एक दूसरेके हितकेलिए अपने स्वार्थका बलिदान, मनके प्रतिकूल व्यवहारमें सहिष्णुता और क्षमा, अत्यन्त

पृष्ठ 288

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२६० श्री सनातनधर्मा लोक ( ५ ) कष्टमें भी धैर्य आदि गुणोंका प्रयोग अनिवार्य होता है, उनका जीवन स्वतः ही सुनियन्त्रित हो जाता है । ये सब गुण क्रमशः विकसित होकर मनुष्यको सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करते हैं । गृहस्थके इस महाविद्यालय में त्याग - प्रेम आदिका पूर्ण अभ्यास कर जब पति - पत्नी उसी प्रेमभाव, त्यागभावका प्रयोग ईश्वरकी दिशा की ओर प्रवृत्त कर देते हैं, तब वे ईश्वरके अत्यन्त निकट पहुंच जाते हैं । यही उनके शास्त्रानुसार जीवनका परम एवं चरम लक्ष्य हुआ करता है । इस प्रकार यह विवाह - संस्कार संसार को सुव्यवस्थित करनेका एक अचूक उपाय है । कन्या का विवाह कब? शास्त्रकारोंने कन्याका विवाह ऋतुकालसे पूर्व कहा है । गुणवान् वरकी प्राप्तिमें इससे देरी हो जाने पर भी दोष नहीं माना है; पर आजकलका युग २४ वर्षकी अवस्थामें कन्याका विवाह बताता है कि युवति कन्या ही अपने अनुकूल पतिको स्वयं जान • सकेगी, पर ऐसा कथन अंग्रेजी राज्यका प्रसाद एवं सन्निपातका प्रलापमात्र है । दूसरेके स्वभाव और चरित्रका परीक्षण कोई सुगम कार्य नहीं । इसमें दूरदर्शी भी भटक जाते हैं । ' विष रस भरा - कनक घट जैसे ' कैसे तत्क्षण परीक्षित हो सकता है? २४ वर्षकी लड़कीकी तो बात ही नहीं कही जा सकती । उस अवस्था में इन्द्रिय-वृत्ति प्रबल होती है; और अनुराग एकदम उन्मुख होता है । दूसरेकी प्रकृतिकी परीक्षा में जिस धैर्य, विवेक एवं अनुभवकी प्रयोजनीयता होती है, वे तब अकर्मण्य होते हैं । एक सुतीक्ष्ण

पृष्ठ 289

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कन्याका विवाह कब? ३६१ कटाक्ष, मृदु - मधुर मुस्कान तथा कुछ अङ्गलावण्यकी विचित्रता तब एकदम मनोदुर्ग पर अधिकार कर लेते हैं । स्वभाव - चरित्र आदिकी परीक्षाका अवसर भी तब नहीं मिलता । उस अवस्थामें कामभावके आधिक्य वश सात्त्विक प्रेम - भाव के चित्तसे हट जाने के कारण चित्तका मार्दव हट जाता है, और प्रकृति बहुत पुरुषोंके भावों से भावित होने से तब एक में स्थिरता नहीं रह जाती । पितृ - गृह में स्वतन्त्रता अधिक और लज्जाकी न्यूनता होनेसे अधिक आयुमें पति - वशित्व और लज्जाशीलता दुःशक होती है । पुरुष होता है अङ्गी और स्त्री अङ्ग । श्रङ्गी मुख्य होता है, और अङ्ग गौण । अङ्गाङ्गिभावसे ही एकता होती है । दोनों ही अङ्ग रहें; या दोनों ही अङ्गी रहें; तो पार्थक्य ही रहेगा, ऐक्य नहीं । इस प्रकार दोनोंका साम्यवाद पार्थक्यकारक एवं विवाद-परिवर्धक होता है, अतः स्त्रीका अधिक आयु में विवाह उसकी अङ्गता हटानेवाला होता है । जिस देशमें कन्याके अधिक वयमें विवाहका नियम होता है; वहां अङ्गाङ्गिभाव नहीं मिलता और वहीं विवाहोच्छेद- प्रथा भी होती है । यदि उस आयुमें स्वभावादिकी परीक्षा, तथा परस्पराभिलषितता -मूलक शान्ति सम्भव होती; तब इङ्गलैंड आदिमें ऐसा कैसे होता? यहां भी ' शारदाविल ' पास हो चुका है; अतः ' तलाक बिल ' भी पास करना पड़ा है । फलतः अन्धानुराग - प्रणोदित विवाहके बन्धनमें सत्य प्रेमकी उत्पत्तिकी सम्भावना अतिकठिन होती है । इस कारण साधारण-सी बात में वह बन्धन स्वयं ही विच्छिन्न हो जाता है । अब उन्हीं

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२६२ श्रीसनातनधर्मांलोक ( ५ ) देशों में इसके परिणामसे तंग आकर लोग विवाह प्रथाको हो बन्द करनेकेलिए तैयार हो गये हैं । यदि वहां अधिक वयस्क, परस्परा-भिलषित विवाह सुखजनक सिद्ध होता; तब उस सुखके हटानेके लिए वहां वालोंका इतना यत्न वा आग्रह क्यों होता? इस प्रकारके उपप्लव अधिक वयस्क विवाह के ही फल हैं - इसमें न तो कोई अत्युक्ति है, न असत्य । यदि आजकल के शिक्षितम्मन्य यहां भी उस सरणिमें चलना चाहते हैं; तो उन्हें विवाहोच्छेद आदि कांटोंसे समाजके अङ्ग - भङ्गकेलिए भी सतत उद्यत रहना चाहिये । इधर लड़कीकी पक्की आयुवाली हो जानेसे उसे अपने पीछे चलाना भी कठिन हो जाता है । पक्की शाखाको हम अपनी ओर मोड़ें, तो वह टूट जाती है, हमारी ओर नहीं मुड़ती । पर छोटी कोमल शाखाको अपनी ओर अनायास ही मोड़ लेते हैं । इस प्रकार पति छोटी आयुवाली अपनी पत्नीको अपने अनुकूल चला सकता है; २०-२४ वर्षवाली पत्नीको नहीं । यदि दोनोंकी केवल स्वतन्त्रता वा परस्पराभिलषितता रखी जावे; तो कुरूप स्त्री - पुरुषोंकी क्या व्यवस्था बनेगी? कुरूपा भी सुरूप को चाहेगी; कुरूप भी सुरूपाको चाहेगा । तब यदि माता-पिताके हाथ में यह काम न रखा जावे, तब क्या कुमार कुमारियाँ -आमरण ब्रह्मचर्य रखें? क्योंकि कुरूपोंकी परस्पराभिलषितता कभी होगी ही नहीं । ' कन्या वरयते रूपम् ' ( शुक्रनीति ३।१६८ ) यदि वह किसी निर्धन वा अकुलीन सुरूप वरको वरण कर ले; तब रूपमात्रमें मस्त वह भविष्यत्- निर्वाह के विषय में कैसे सोच