पञ्चम सुमन · प्रकरण 15

वैवाहिक रीतिविशेषोंका रहस्य

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265आश्वलायनगृह्यसूत्र एक प्रसिद्ध सूत्र - प्रन्थ है । स्वामी दयानन्दजीने अन्त्येष्टि कर्मकी रीतियाँ इसीसे ली हैं । उसी गृह्य- सूत्रमें विवाहकी देश वा ग्राम - सम्बन्धी एवं कुल - सम्बन्धी रस्मोंके लिए लिखा है- ' अथ खलु उच्चावचा जनपद्धर्मा ग्रामधर्माश्च, तान् विवाहे प्रतीयात् ' ( १/७/१ ) इसका गार्ग्यनारायणकी वृत्ति में इस प्रकार विवरण किया गया है - " धर्मशब्दादेव द्वितीयानिर्देशे सति अन्वये सिद्धे ' तान् ' इति वचनं ' कुलधर्मा अपि कार्या ' इत्येवमर्थम् । तान् — तादृशानित्यर्थः । विवाहाधिकारे प्रचलत्यपि विवाहग्रहणं कृत्स्ने विवाहे यथा स्युरित्येवमर्थम् इतरथा उपयमनकालाद् उत्तर- कालं विहितत्वाद् उपयमने न स्युः । उपयमनं नाम कन्यायाः स्वीकरणम् । प्रतीयात् — कुर्यात्! ”

यहाँ यह बताया गया है, कि – कन्याके स्वीकरणसे लेकर विवाहकी समाप्ति तक ग्रामधर्म किये जा सकते हैं, केवल विवाह में ही क्या, प्रत्युत सब अवसरोंमें अपने कुलधर्म - रीतियोंको करनेकी शास्त्रीय आज्ञा है; इसी कारण स्मृति में कहा गया है- ' न यत्र विधयः साक्षाद् न निषेधः श्रुतौ स्मृतौ । देशाचार- कुलाचारैस्तत्र धर्मों निरूप्यते ' । इसीलिए मनुस्मृति में ' वेद: स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ' ( २।१२ ) यहाँ श्रुति तथा स्मृति से अतिरिक्त ' सदाचार ' को भी - जो पिता- पितामह से आई हुई कुलरीतियोंका बोधकँ है — धर्मके साक्षात् लक्षणों में माना गया है । तभी तो मनु जीने कहा है-

' येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात् सतां 266मार्गं तेन गच्छन् न रिष्यते ' ( ४ | १७८ ) अर्थात् - जो बाप - दादे रीतियाँ करते आये हैं; उनके करते - आते रहने से कुछ हानि नहीं होती; क्योंकि — वे उनको तभी तो करते रहे कि —– उनको उन रस्मोंसे कोई हानि नहीं पहुँची, किन्तु कुछ लाभ ही पहुँचा । तब यहाँ उन रस्मोंकी करणीयता बता देनेसे धर्मता सिद्ध होगई । इसी लिए मनुस्मृतिमें कुलधर्म भी माने गये हैं । इसीलिए कहा है- ' देशधर्मान्, जातिधर्मान्, कुलधर्मांश्च शाश्वतान् । पाषण्डगण- धर्मांश्च शास्त्रेस्मिन् प्रोक्तवान् मनुः ' ( १।११८ ) । वृहत्पराशरस्मृतिमें भी कहा है – ' कुलाचारोपि कर्तव्य इति शास्त्रविदो विदुः । देशाचारस्तथा धर्म इति प्राह पराशरः ' ( ४ | ११७ ) यहां पर कुलाचार तथा देशाचारको भी कर्तव्य एवं धर्म बताया गया है ।

केवल इसी स्मृति में नहीं, किन्तु ' गौतमधर्मसूत्र ' में भी कहा

- ' देश जाति

- - कुलधर्माश्च आम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणम् ' ( ११।१ ) अर्थात् उन देश, जाति वा कुलकी रस्मोंका वेदसे साक्षात् विरोध न हो; तो वे भी प्रमाण हैं; और कर्त्तव्य हैं । इस प्रकार देशधर्म तथा कुलधर्मोकी कर्त्तव्यता सिद्ध हो गई । इसीलिए आश्वलायन- गृह्यसूत्रमें मुण्डन - संस्कारमें कुलकी रीतियोंका भी आदर किया है - ' तृतीय- वर्षे चौलं यथाकुलधर्मं वा ' ( १११७११ ) अर्थात् - लड़के का मुण्डन तीसरे वर्ष में करवाओ; अथवा जैसा आपके कुलका धर्म ( रीति - रिवाज़ ) हो उसी समय कराओ ।

आपस्तम्बगृह्यसूत्रमें भी कुलधर्मके अनुसरणार्थ कहा गया है - ' यथर्षि शिखां निद्धाति, यथां वा एषां कुलधर्मः स्यात् ' ( ६।५।६-७, 267७ | २० | १६ ) यहां प्रवरानुसार शिखाएँ रखना कहा है; फिर कहा है - जैसा उनके कुलका धर्म हो; वैसा करें । भगवद्गीता में भी कहा है – ' उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन! नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ' ( १।४४ ) यहां कुलधर्मों के उल्लंघन करनेवालों को नरककी प्राप्ति कही गई है । ' दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकर- कारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ' ( गीता १।४३ ) वहां भी जातिधर्म तथा कुलधर्मोकी अवहेलना वर्णसंकरकारक बताई गई है । राजाओं को भी उन धर्मोंको नहीं हटवाना चाहिये । जैसे कि स्मृति में कहा है- ' यस्मिन् देशे य श्राचारः पारम्पर्य- क्रमागतः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशमुपागतः ' । यदि नया राज आते ही बलात् उन परम्परासे आये हुए देश आदिके धर्मों को हटवायेगा, वा कानूनका प्रयोग करेगा; तो उस राजाका राज्य भी चिरस्थायी नहीं हो सकता; क्योंकि इससे उन पुरुषोंकी भावनाको धक्का पहुँचता है । ' श्रद्धामयोऽयं पुरुषः यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' ( १७१३ ) यह श्रीभगवद्गीता में कहा है कि सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अन्तःकरणके अनुरूप होती है और पुरुष श्रद्धामय होता है; अतः जिसकी जिसमें जैसी श्रद्धा है, वह स्वयं भी वही बना रहता है । अतः उसे बलात् हटवाना आफत मोल लेना है ।

इससे जो कि सनातनधर्मी विवाह आदिके अवसर पर देश वा ग्राम एवं कुलकी रस्में किया करते हैं; उनमें शास्त्रीयता वा आक्षेपार्हता नहीं हो सकती । उन रीति - विशेषोंकी भी यदि ऐति- हासिक विवेचना की जावे; तो पता लगेगा कि उनके शुरू करने में 268एक विशेष उद्देश्य था, जैसे कि प्रत्येक कार्योंका होता है । मान लीजिये कि आपने एक दुर्गम अरण्यको पार करके किसी नियत स्थान में पहुँचना है । उस वनमें कोई मार्ग नहीं दीखता । उस समय आप पूर्वके विद्वानोंके परामर्शसे निश्चित दिशामें चलकर उस स्थानको प्राप्त कर लेते हैं । आपके पदचिन्ह भूमिमें बन जायेंगे, लेकिन वे स्पष्ट नहीं होते । फिर आप तथा आपके दूसरे सम्बन्धी भी उस मार्ग पर चलकर उस नियत स्थानको पहुँच जाएँगे । तब वह पद्धति ( पगडंडी ) बन जायगी । तव वे पदचिन्ह स्पष्ट हो जाएँगे । दूसरोंको वे मार्ग - प्रदर्शन करके उन्हें भी उस नियत स्थान पर पहुँचा देंगे । फिर वही पगडंडी क्रमशः छोटी सड़क, फिर बड़ी सड़क बन जावेगी । फिर भविष्यत्‌की सन्ततियोंको भी उधर जाने में सुविधा हो जायगी । यही रीति - विशेषोंका भी रहस्य हुआ करता है ।

' महाजनो येन गतः स पन्थाः ' ( महाभारत वनपर्व ३१३।११७ ) ' येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ' ( मनु ० ४।१७८ ) इन उक्तियों का भी यही रहस्य है । ऋषि - मुनियोंने वेदसे वा अपने तपोबलसे कर्त्तव्य पालनका या मुक्ति - प्राप्तिका जो कार्यक्रम नियत किया था; जनताने उसका अनुसरण करना शुरू किया । उसी कार्यक्रमका नाम ' रीति - रस्म ' हो गया । लोग पूछते हैं कि - यजमान पूर्व दिशामें मुँह क्यों करे? - विवाह में वधू सात पद ही क्यों चले? ' ऐसा कहते हुओं को पूछना चाहिये कि राजद्वारमें जाने पर इतनी दूरसे नमस्कार करनी चाहिये, इतनी बार नमस्कार करनी

269वैवाहिक रीतिविशेपोंका रहस्य

चाहिये । राजद्वारकी पौशाक ऐसी होनी चाहिये । विश्वविद्यालयोंके चोगे नियत प्रकारके होते हैं - इस प्रकारकी रीतियां आजतक मी प्रचलित हैं । वस्तुतः कारण यह है कि विशेष रस्में कुंडुन्य या समाजके संघटनार्थ भी हैं ।

। वे जैसे ऐक्यके बाह्य साधन हैं वैसे ही दृष्ट लाभोंके लिए भी हैं । ' एका क्रिया द्र्यर्थकरो प्रसिद्धा ' ।

वे रीतियाँ धर्मकी बाहरी त्वचा होती हैं; धर्मकी रक्षा करनेवाली होती हैं । चावलोंके ऊपर धान्यकी त्वचा हुआ करती है; वह चावलोंकी रक्षार्थ हुआ करती है । उस त्वचाके विना चावलोंकी उत्पत्ति, स्थिति तथा वृद्धि नहीं हो सकती । यही त्वचा चावलकी उन्नतिमें सहायता देती है । यदि यह त्वचा न होती, तो चावलकी रक्षा भी न होती I । तो चावलकी त्वचाको निस्सार वा व्यर्थ बताना यह महामोह है | तब रस्में धर्मरूप चावलके रक्षण तथा प्रवर्धनके लिए त्वक् ( छिलका ) रूप हैं । चावलों से अलग की हुई त्वचा जैसे आपाततः निस्सार प्रतीत होती है; वैसे ही यह रीतियाँ भी धार्मिक दृष्टिकोणको छोड़कर आपाततः देखनेसे निस्सार - सी प्रतीत होती हैं; पर वस्तुतः ऐसे नहीं हैं । तब प्राच्यों से नियमित, देशकालादिमें नियमित रीतिविशेषोंका अनुसरण धर्म तथा धार्मिक संघटनके प्रसारणार्थ अत्युपयुक्त साधन है; क्योंकि – अपने वर्गवाले जिस भी देशकालमें रहते हैं — वैसी ही रोतियोंका अनुसरण करते हैं — इससे उनके संघटनका भी प्रभाव दूसरों पर पड़ता है ।

फलतः परम्परासे आई हुई कुल - रीतियोंका अनुसरण कोई प्रक्षेप्य बात नहीं । पुरुष बाहरी कामों में लगे हुए उन कुलरीतियों- 270' २७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

को भूल भी जाते हैं; पर घरकी स्त्रियाँ उन पारम्परिक रीतियोंको जान रखती हैं । इसलिए गृह्यसूत्रों में कहा है कि जिन रस्मोंको स्त्रियाँ कहें; वे भी कर लेनी चाहियें । जैसे कि - वैखानस - गृह्यसूत्र में कहा है- ' यत् स्त्रिय आहुः पारम्पर्यागतं शिष्टाचारम्, तत्तत् करोति ' ( ३।२१ ) । आग्निवेश्यगृह्यसूत्र में भी कहा है- ' यच्चात्र स्त्रिय आहुः, तत् कुर्वन्ति ' ( २ | २ | ३, ३ | ५ | ४-८, ३।६।१-३ ) ।

काठकगृह्यसूत्रमें भी कुलाचारोंकी कर्तव्यता कही है— ' आचारिकाणि ' ( २५/७ ) यहाँ देवपालने टीका की है- ' अस्मिन्नवसरे आचारिकाणि - आचारादागतानि देश - जाति- कुलधर्मतया प्रसिद्धानि कर्माणि कारयेत् ' । वहीं पर ब्रह्मबलने भी यही कहा है – ' अस्मिन् अवसरे देश - जाति - कुलोचितानाम् आचारिकाणां मङ्गल्यानां कर्मणां कालः ' । वहीं आदित्यशरणने भी लिखा है- ' अस्मिन् अवसरे आचारकाणि कर्माणि कुर्यात् देश - जाति- कुलव्यवस्थया स्थितानि । अशास्त्रार्थमिति न प्रतिवध्नीयात् ' अर्थात् - यह रस्में शास्त्रीय हैं - यह कहकर उनके करने में प्रतिबन्ध न डाले ।

यह हम थोड़ी - सी वैवाहिक - रीतियोंपर कुछ प्रकाश डालते हैं; शेष अपनी कुलरीतियोंका रहस्य स्वयं समझनेका प्रयत्न करना चाहिए ।

संस्कारका महत्त्व

संस्करण - संशोधनका नाम संस्कार होता है । अपने शरीर पर की जानेवाली क्रियाओंसे जो एक अतिशय हो जाता है, यही संस्कार हो जाता है । पूर्व विद्यमान पदार्थोंके दोषोंको हटाकर

271संस्कारका महत्त्व २७१. गुणाधान करनेसे उनको ठीक - ठीक कर देनेके कारण संस्कार आवश्यक हैं । असंस्कृत हुआ हुआ सोना कभी कामिनियोंके कमनीय कण्ठमें, और कामुकोंके कमनीय करमें कान्तिको नहीं द़िया करता, जब तक सुवर्णको अग्निमें शुद्ध न किया जावे और उसके कर्षण - घर्षण आदि संस्कार न हों । जैसे यहाँ पर संस्कारकी आवश्यकता है, वैसे ही मानवको मानव एवं चारु बनानेकेलिए भी संस्कार आवश्यक हैं । यह सब विचारकर परम अनु- कम्पायुक्त पारस्कर आदि आचार्योंने स्थूल- बुद्धि पुरुषोंके उपकारार्थ संस्कारोंकी प्रक्रिया बनानेवाले ग्रन्थोंको बनाया था । उनमें कई संस्कार दोष हटानेवाले हैं, और दूसरे गुण डालने वाले हैं । उनमें विवाह - संस्कार प्रधान है; क्योंकि — उसे सभी करते हैं; और दूसरे संस्कारोंका, वर्णोंका तथा आश्रमोंका बल्कि समस्त सृष्टिका मूल है । दूसरे संस्कारोंमें एक ही संस्कृत होता है, परन्तु इस विवाह में दो व्यक्ति संस्कृत होते हैं - इस लिए भी प्रधान है ।

हमारे यहां वैध वैदिक संस्कारसे स्त्री - पुरुषका जोड़ा पक्का हो जाता है; पर विदेशों वा भिन्न - सम्प्रदायों में केवल कामुकता होने से वहांका जोड़ा कच्चा रह जानेसे विवाहोच्छेद आदि करना पड़ जाता है; जिससे उनका विवाह असफल हो जाता है । हमारे गृहसूत्रोक्त संस्कार दम्पतिके आत्मा, मन, प्राण, शरीर — जिसमें अस्थि, त्वचा आदि आ जाते हैं, सबका एकीकरण हो जाता है, बल्कि उसका दूसरे जन्म तक सम्बन्ध भी रहता है- ' सती न योषित् प्रकृतिश्व निश्चला, पुमांसमभ्येति भवान्तरेष्वपि, ' 272( शिशुपालवध १ सर्ग ) पर दूसरे सम्प्रदाय चाहे एक - दूसरे को देख - दिखलाकर कार्य करते हैं, तब भी साधारण ही कारणोंमें उनका विवाह विच्छिन्न हो जाता है । यह है हमारे शास्त्रीय संस्कारका महत्त्व ।

वाग्दान

जैसे प्रस्ताव की पहले - पहले भूमिका प्रारम्भ होती है; जैसे अनुमान करनेकेलिए पांच अवयवों में पहले प्रतिज्ञांकी आवश्यकता होती है; वैसे ही विवाहका आरम्भ ' वाग्दान ' से होता है । मनुस्मृति में लिखा है- ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( ५/१५२ ) अर्थात् जब लड़कीका, किसी कुल - शीलवाले अपने से देखे - भाले हुए लड़के को उसके पिता आदि सम्बन्धियोंकी उपस्थिति में वाणी द्वारा दान कर दिया जाता हैं; यह बात लड़कीको भी पता लग जाती है; उस दिनसे वह उस पितृ - प्रदत्त पुरुषको अपना पति मान लेती है । उस दिन से माता - पिता आदि उस वरकी प्रशंसा आदि करते रहते हैं— जिससे उस लड़कीका उस लड़के के प्रति आकर्षण हो जाता ' है । गणेशपूजा आदि तथा फलप्रदान, मिष्टान्नपान आदि द्वारा परस्पर दोनों वर - वधू पक्षवालोंका पारस्परिक विश्वास एवं प्रेम तथा एक - दूसरेसे सुख - दुःखमें सहानुभूति उपस्थित हो जाती है । और दोनों पक्ष विवाहकी तैयारी भी प्रारम्भ कर देते हैं ।

वैवाहिक कङ्कण

कङ्कण बन्धनका यह तात्पर्य होता है कि मैं इस गृहस्थ- आश्रममें बद्ध होगया वा होगई हूँ । उसमें तीन गांठोंका यह 273निष्कर्ष है कि — मैं ऋषिऋण, देवऋण, पितृऋणसे बंध गया हूं । अव इन्हें उतारूंगा । यदि पांच गांठें हों, तो देशॠण तथा जातिऋण भी साथ समझ लेने चाहियें । कई उस कङ्कणमें मरिणस्थानापन्न मोती भी बांधे जाते हैं, उनका भाव है - शरीरसे उनका स्पर्श होता रहे । वे स्पर्शसे विशेष लाभ पहुँचाते हैं । अथर्ववेदसंहितामें मणियोंका • प्रभाव बहुत वर्णित किया गया है । तब परम्परासे लोगोंको पता होता है कि अमुक मोती लाभदायक है; उसे भी कङ्कणके साथ

जाता है ।

देवाह्वान, नवग्रही, तेल आदि: -

विवाह में देवताओं की कृपा अपेक्षित होती है, अतः गणपति- पूजा - पूर्वक सब देवताओं का आह्वान तथा पूजा की जाती है । स्त्रियाँ घड़ा भर लाती हैं । कुम्भस्थापन होता है । फिर ग्रहोंसे सम्बन्ध होनेसे नवग्रहोंकी पूजा की जाती है; उन्हें पूड़ी आदिकी बलि दो जाती है - इसमें नौ ब्राह्मणों को जिमाया जाता है । जितने दान दिये जाते हैं; दानका अधिकारी पुरोहित ब्राह्मण माना गया है; अतः देवसम्बन्धी भोजन भी उसे कराया जाता है । मनुस्मृति में देवकार्य में तथा पितृकार्य में ब्राह्मणको ही भोजन कराना लिखा है - ' तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमाः ' ( ३।१२४ ) ' द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीन् एकैकमुभयत्र वा । भोजयेत ' ( ३।१२५ ) पारस्कर- गृह्यसूत्रमें प्रत्येक संस्कारादि - कर्म में ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ' कहकर ब्राह्मणका विधान कहा है । अतः इसमें कोई सन्देहका अवकाश नहीं ।

274फिर सुगन्धित तैल लड़की लड़के के सिरपर लगाया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि — ब्रह्मचर्यमें उत्तेजक होने से सुगन्धित तैलों के प्रयोगका निषेध था, पर अब ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त होनेसे गृहस्थावस्थामें तो इसका सेवन करना ही चाहिये, जिससे चित्त प्रसन्न हो; और उद्दीपन भी होवे । लड़कीको सौभाग्यवती स्त्रियाँ तेल लगाती हैं, जिससे यह भी सौभाग्यवती रहे ।

मुकुट, घुड़चढ़ी

फिर वरको मुकुट पहिराया जाता है । कारण यह है- उस समय वरको राजा जैसा बनाया जाता है । इसीलिए उसे म्यानमें एक तलवारके स्थानापन्न छुरी रखनी पड़ती है । इसीलिए ही घोड़ी पर चढ़ना पड़ता है । साथके लोग सैनिकों - जैसे होते हैं । घोड़े है । इससे उससे गिरने की आशंका नहीं होती पर न चढ़कर घोड़ी पर चढ़नेके रहस्य भी कई हैं । एक तो यह स्वयं जाना जा सकता है रहती । दूसरा भी रहस्य कि - घोड़ा बहुत चंचल होता है; घोड़ी अपेक्षाकृत शान्त

कि उसका काम घोड़ेपर सवार होना नहीं, किन्तु घोड़ीपर सवार होना है और उस घोड़ीको अपने कण्ट्रोल में रखना है । राजा जैसा होने से वाजे - गाजे भी खूब बजते हैं । मार्गमें शमीवृक्षका पूजन करके वर उस छुरीसे शमी के वृक्षके पत्ते उतारता है । उस शमीकी परिक्रमा करता है । यह शमीके पत्र फिर लाजाहोम में काम आते हैं । शमी न हो तो किसी देवमन्दिरमें जाता है; देवको नमस्कार करता है, दक्षिणा चढ़ाता है । पीछेसे बहन वरके वस्त्रोंपर केसर डालती आती है । अन्य सम्बन्धिनियाँ 275माङ्गलिक भजन गाती आती हैं । पुरोहित घीका चौमुखा दीपक थाली में रखकर चलता है । एक तो प्रयोजन पूजाका होता है । दूसरा घोड़ी पर चढ़े हुए इसी कारण ऊँचे हुए - हुए बरको घृतके परमाणु प्राप्त होवें । यदि कुत्सित वायु हो तो उसका ज्ञान हो जाय; इससे घृतका दीपक बुझ जाता है । बाज़ारोंमें वरको घुमाया जाता है— जिससे उसे उधरका मार्ग ज्ञात हो जावे ।

द्वाराचार, स्वागत, वर- मानक्रिया, गोत्रोच्चार,

मुट्ठी खुलवाना आदि

कन्यागृहके द्वारपर वरको घोड़ीसे उतारकर उसका तथा उसके पिता आदिका स्वागत - सत्कार होता है । देवपूजा कराई जाती है । वरकी मानक्रिया ( नाप ) होती है । कन्या - पक्षवाले वरके आनेपर उसका मान ( नाप ) उसकी परीक्षार्थ करते हैं । एक दृढ सूत्रको लेकर उसका एक अग्रभाग उसके दक्षिण- स्तन पर रखना पड़ता है । शेष सूत्र ग्रीवासे लाकर वाम - स्तन पर दृढ़ रौंचकर रखना पड़ता है । इससे वक्षःस्थलकी चौड़ाई नापी जाती है । इस प्रकार सिरके पिछले भागसे लेकर माथे तक नापना पड़ता है । यदि वह सूत्र कम हो; तो वरको ब्रह्मचारी समझो कि — उसने ब्रह्मचर्यका अव- लम्वन ठीक - ठीक किया है । यदि वह सूत्र बढ़ जाय; तो वरका ब्रह्मचर्य स्खलित हो चुका है - यह ज्ञान हो जाता है ।

फिर तीन पीढ़ियोंतक दोनों पक्षोंका गोत्रोच्चार पढ़ना पड़ता है, जिससे तीन पीढ़ियोंके नामका पता लग जावे, जिनका आगे पितृ- कार्य आदि में उपयोग होता है ।

276फिर वरको अन्दर ले जाते हैं । वरका संरक्षक ( आनर, संभाला ) उसका बहनोई साथ होता है । वह उसका सचिव- स्थानीय वा अङ्गरक्षक - स्थानीय होता है । वह द्वारपर बंधी हुई एक रस्सीको वरकी छुरी लेकर उसे काटता है । कभी - कभी उसमें लोहेकी तार जड़ दी जाती है । उसे भी यथाकथंचित् तोड़ना पड़ता है । तभी अन्दर जानेका अधिकार होता है ।

फिर द्वारपर कन्या ठहरी हुई होती है । उसके हाथमें गुड़ होता है, और मुट्ठी बंधी हुई होती है । वरको उसे एक हाथ से खोलना पड़ता है । यदि उसे खोल लिया गया; तो वर शक्तिशाली माना जाता है— नहीं तो उसपर उपहास होता है कि —तुम नपुंसक हो, वा निर्बल हो । स्त्री तुमसे ज़बर्दस्त है ।

फिर भीतर कई रस्में होती हैं यह सब वरकी परीक्षाएं होती हैं, कुछ रस्में उसे कुछ गार्हस्थ्य सम्बन्धी बातें सिखलाने वाली होती हैं । फिर उषाकालमें या विशेष लग्न में विवाहसंस्कार प्रारम्भ होता है ।

गजदन्त - धारण

सबसे पूर्व कन्याके नाना वा मामाकी ओर से लड़कीको सौभाग्य- प्रतिष्ठार्थ गजदन्तकी चार और तीन कुल सात चूड़ियां पहराई जाती हैं । वैद्य लोग स्त्रीसम्बन्धी रोगमें गजदन्तके चूर्ण का प्रयोग करवाते हैं । वन्ध्यात्वदोषके दूरीकरणार्थ गजदन्तको

अत्युत्तम माना जाता है । यूनानी हकीम भी गजदन्तके चूर्णको ऋतु - संशोधक और उत्तमलाभप्रद मानते हैं । जो फल उसके खानेमें होता है,

In English

The Secret of Marriage Rituals

This text argues that family and regional customs are valid forms of dharma as long as they do not contradict the Vedas. It explains that these traditions serve to preserve social unity and provide a structured path for future generations.

This chapter answers

  • Are family customs considered dharma?
  • Why should people follow ancestral traditions?
  • What is the purpose of religious rituals?
  • Can regional customs be followed in marriage?

Also written: Vaivahika, Ritivisheshonka, Rahasya, Vaivahika Ritivisheshonka Rahasya, वैवाहिक रीतिविशेषोंका रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 265–276 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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