पञ्चम सुमन · प्रकरण 45
मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान
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411किसी शक्ति- विशेषका ज्ञान है, वे उसका उपयोग भी कर सकते हैं । शक्तिके उपयोगका नाम ही कर्म है । जिसे जितना अधिक ज्ञान है, वह उतने ही अल्प- साधनों से अपना काम पूरा कर सकता है | उसे काम में वह उद्विग्नता नहीं होती; जो एक अल्पज्ञके कार्य में होती है । इस प्रकार जो सर्वज्ञ है, वह सर्व कर्ता भी हो सकता है । उसे ही ' सिद्ध ' कहा जाता है ।
क्रिश्चियन वैज्ञानिक रोगीकी शय्याके पास कुछ पाठ किया करते हैं । उससे वे बिना ही औषधिके प्रयोगके उसको स्वस्थ कर देते हैं । यह भी एक मान्त्रिक- सिद्धि हुआ करती है । प्रत्येक मन्त्र कईं नियत - ध्वनियोंका समूह होता है 1 । मन्त्रमें अर्थकी विशेष आवश्यकता नहीं हुआ करती हैं । नहीं तो मन्त्रकी अपेक्षित - शक्ति नष्ट हो जाती है; क्योंकि — अर्थ ध्यान में रहनेसे शब्दके यथावत् उच्चारणमें अपेक्षित बल नहीं रह जाता । इसलिए उसमें शब्दको स्वरवर्णादिदोषरहित शुद्ध बोलनेकी आवश्यकता रहा करती है । इसीलिए ही महाभाष्यके पस्पशाह्निकमें कहा है— ' याज्ञे कर्मणि [ प्रयोग - ] नियमः ' अर्थात् यज्ञकर्म में अर्थज्ञानका नियम नहीं होता, किन्तु उस शब्दके प्रयोगमात्रका नियम होता है । विवाह - संस्कारके मन्त्रोंके शब्दों से कन्या संस्कृत होती है, परन्तु मन्त्रोंके अनुवाद में वह शक्ति कैसे हो सकती है?
वेद मन्त्रों के संग्रह हैं । मन्त्र निरुक्तमें नियतः आनुपूर्वीवाले तथा नियतपदप्रयोगपरिपाटी वाले कहे गये हैं । इसीलिए काव्य- प्रकाश आदि में वेदको शब्द - प्रधान माना गया है । कौत्समुनि वेदः 412मन्त्रोंको अनर्थक मानते हैं । अनर्थकका यह भाव नहीं कि उनका कुछ भी अर्थ नहीं । इसका यह भाव है कि मन्त्रका उच्चारण - विशेष में ही सामर्थ्य है । अर्थ में ध्यान देनेसे शव्दकी शक्ति मारी जाती है, उसमें कुछ रुकावट पड़ जाती है । इस प्रकार प्रत्येक मन्त्र - विशेषके शक्तिविशेष के विषयमें भी जानना चाहिए । बीजमन्त्र अर्थहीन ही तो होते हैं । ऐं, ह्रीं क्लीं आदि बीजमन्त्र कितना प्रभाव रखते हैं- यह जानना चाहते हो; तो चिन्तामणि- मन्त्र के उपासक श्रीहर्षका ' नैषधचरित ' महाकाव्य तथा उसका १३ वाँ सर्ग देखना चाहिए ।
जब किसी वस्तुमें किसी कारण से कम्पन होता है; तब उस कम्पनके कारण हमारी कर्णेन्द्रिय पर विशेष प्रभाव पड़ता है, जिसे ' ध्वनि ' कहा जाता है । प्रत्येक वस्तुकेलिए एक कम्पनकी संख्या नियत होती है, जो उसके गुरुत्व और आकारपर निर्भर होती है । यदि वह वस्तु कम्पनको प्राप्त होती है, तो स्वर निकलता है । यदि उसके पास वह स्वर प्रतिध्वनित हो; तो वह वस्तु भी कम्पित होगी । प्रयोगशालाओं में इनके अनेक प्रयोग होते हैं । इसलिए ध्वनिमापक यन्त्र ( सोनोमीटर ) बनाया जाता है ।
एक शीशेका गिलास लिया जाता है, उसका नियत स्वर उसके पास बजाया जाता है; उसके परिणाममें गतिबद्धता - वश कम्पनके वेगसे गिलास टूट जाता है । पर्याप्त गवेषणा से उपयुक्त ध्वनियोंके प्रयोगसे अर्थात् मन्त्रविशेषके द्वारा बड़े किले या पर्वत गिराये जा सकते हैं 1 । इङ्गलेण्डमें ' स्टोन हैब्ज ' में ' टुइड ' - धर्मोका जो अवशेष 413है, उसमें पत्थर एक - दूसरे पर इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि — उनके पास मध्यम स्वरसे बजाने से वे कांपते हैं । कुछ समय तक वैसा होनेपर उनके गिरनेकी शङ्का भी हो सकती है । इस कारण वहां गाना निषिद्ध है । इस प्रकार वैज्ञानिक तथ्योंके आधारसे कहा जा सकता है कि - ध्वनिसमूह ( मन्त्र ) द्वारा बहुतसे विचित्र कार्य किये जा सकते हैं ।
पशुओं और मनुष्योंपर ध्वनियोंका जो प्रभाव पड़ता है; उसे सभी जानते हैं । ऋतुविशेष या समयविशेषमें जो ध्वनि - समूह कार्य करते हैं; वे हमारी राग - रागनियोंके आधार हैं । रोगियोंके ऊपर भी ध्वनियोंका प्रभाव अनुभवसिद्ध है । उपयुक्त ध्वनिराशि शरीर, मस्तिष्क और नसोंके क्षोभको शान्त करके उसमें पुनः साम्यावस्था ला सकती है, जिसका पर्याय शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य है । इस प्रकार उपयुक्त ध्वनियोंकी आवृत्ति अर्थात् मन्त्रविशेषोंके जपसे मस्तिष्कके उपयोगी केन्द्रोंको कम्पित किया जा सकता है, और उनके द्वारा चित्तके चौथे स्तर अचेतनके
विशेषको प्रबुद्ध किया जा सकता है, जिनसे योगी सिद्धियों
जब कि - आजकल निरर्थक, मुसलमान आदियोंके
- मन्त्र भी को प्राप्त कर सके ।
सांप - बिच्छू आदिके दमनमें सफलता पाते हुए देखे जाते हैं; तब जगद्गुरु भारतवर्षके जगद्गुरु ब्राह्मणोंसे समाधि - द्वारा दृष्ट वा सृष्ट मन्त्र - तन्त्रशास्त्रके मन्त्र भला कैसे झूठे हो सकते हैं? इस- लिए महाभाष्यके पस्पशाह्निकमें ' ज्ञान - कर्मके धर्माधर्माधिकारण ' में 414कहा है- ' यथा वेदशब्दा नियमपूर्वमधीताः फलवन्तो भवन्ति ' इससे वेदमन्त्रोंके नियमबद्ध जपनसे फल प्रदान - शक्ति सिद्ध होती है । इसलिए उनका प्रभाव कारीरीयज्ञमें बादलोंपर भी पड़ता है, वृष्टि भी हो जाती है । पुत्रेष्टियज्ञमें स्त्रीके गर्भाशय पर भी पड़ता हैं, जिससे उसमें शुक्र स्थिर होकर सन्तान भी हो जाती है । वेदके मन्त्र स्वयम्भूका वचन होनेसे साक्षात् फलशाली होते हैं । पुराणोंके तथा तन्त्रशास्त्रोंके मन्त्र भी पुराणोंके अनादि होने से अनादिकाल से चले आ रहे हैं; वे भी वेदानुसारी होने से वेदवाला - फ़ल रखते हैं ।
कई मन्त्र वेद वा पुराणसे भिन्न भी होते हैं; उनमें मन्त्रके : आविष्कर्ताओं की तपस्याका बल फलदायक होता है; वा वे विविध देवोंकी कृपासे प्रसूत होनेसे उनके बलसे फलदायक हुआ करते हैं । कई पौरुषेय मन्त्र भी उनके अनुयायियों में सफलता प्राप्त करते हुए देखे जाते हैं; वहाँ पर आविष्कर्ताओं की तपस्या तथा उनके अनुयायिओंका पूर्ण विश्वास फलदायक बनता है । वह ' उनकी तपस्या यावत्कालावस्थायिनी रहेगी, तब तक वे मन्त्र भी सफल होते रहेंगे; बादमें वे निष्फल वा निष्प्रभाव हो जायेंगे । पर वेदमन्त्र सदा ही सफल होते हैं; पर उसका प्रयोक्ता शास्त्रोक्त अधिकारी, निष्ठावान् तथा शुद्ध उच्चारणवाला होना चाहिए ।
इस प्रकार याज्ञिक मन्त्रों द्वारा वशीकृत देवशक्ति हम पर. अनुग्रह करती है । वह उच्चयोनि तथा लोकोत्तर- बलशालिनी होने से हमें अपने मनोरथोंकी पूर्ति में सुगम सुझाव देती है । उन
415-परिक्रमाका विज्ञान
४१२ मन्त्रोंके प्रकम्पनोंका प्रभाव हमारे शरीरपर होनेसे वे हमारे रोग • आदिके परमाणुओं को भी बहिष्कृत करने में समर्थ हो जाते हैं । • मानसिक एवं शारीरिक अस्वास्थ्य दूर हुआ; तो लोककल्याण स्वयं उपस्थित हो जाता है ।
( सं ० नं ० )
( ३५ ) परिक्रमाका विज्ञान
सन्ध्याके जप - विज्ञानपर प्रकाश सम्यक् पड़ चुका है; अब उसका अन्तिम श्रङ्ग परिक्रमा रह रही है; कुछ उसपर भी विचार कर लेना अप्रासङ्गिक नहीं होगा । सन्ध्या जब की जाती है; तो एक विशेष दिशाकी ओर मुख करके की जाती है; पर परमात्मा- जिसका हम ध्यान कर रहे होते हैं, वह है सर्वतो व्याप्त 1 । हमें भी उसका सर्वतः सम्मान करना चाहिए । यद्यपि जैसा वह अखण्ड है; हम वैसे अखण्ड होकर व्यापक नहीं; तथापि यथाशक्ति अभि- नयरूप से सही -हम उसकी परिक्रमा कर लेते हैं, इससे हमें यह • ध्यान रह जाता है कि परमात्मा सर्वव्यापक है । आर्यसमाज तो यह समझकर कि - हम परमात्माका अन्त कैसे पा सकते हैं - उसकी ' मानसिक - परिक्रमा ' कर लिया करता है । सनातनधर्मी भी यह जानते हैं; वे यह भी जानते हैं कि उस अनन्त तथा असीमितकी तो पूजा भी नहीं हो सकती; तथापि मूर्तिपूजाके ढंगसे उसकी वे उपासना कर लेते हैं; तथा शारीरिक परिक्रमा भी । क्योंकि पुरुषके अधिकारमें जितना सम्भव हो सकता है, वह उतना ही करता है । अस्तु ।
यह परिक्रमा भी प्राचीनकालका एक सम्मान है । आज भी 416श्राद्धों के समय श्रद्धालु लोग ब्राह्मणोंकी भी परिक्रमा करते हैं । यज्ञमें अग्निकुण्डकी परिक्रमा तो सभी करते ही हैं, आर्यसमाजी भी विवाह के समय यज्ञकुण्डकी एवं अग्निकी परिक्रमा करते ही हैं । आजकल जैसे मोटरोंवाले, सिपाहीकी दाहिनी ओर परिक्रमा करके जाते हैं यह एक कानून है; नहीं तो सिपाही उनका चालान कर देता है; वह उस समय हाथ ऐसे रखता है, जैसे आशीर्वाद देनेवाले करते हैं । दिलीपने स्वर्ग से आते समय कामधेनुकी परिक्रमा नहीं की थी— इसलिए उसने उसका चालान कर दिया . था; अर्थात् शाप दे दिया था कि तुम्हारे लड़का नहीं होगा । अस्तु ।
यह परिक्रमा सन्ध्याके अन्त में भी होती है एक मूर्तिको स्थिर करके । देवमन्दिरमें भी होती है । परिक्रमासे उस स्थान- विशेष में प्रसृत दिव्य तेज में प्रवेश हो जाता है । उसमें कारण यह है कि चक्राकार गतिसे आकर्षण और विकर्षणका योग होता है । इसी कारण सूर्य और चन्द्रमा आदिकी परिक्रमा हुआ करती है । सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि अपनी कक्षा में परिक्रमा ही तो किया करते हैं । आजकलके मतमें भूमि भी तो सूर्यकी परिक्रमा किया करती है । सूर्य भी किसी और सूर्य की । तब यह परिक्रमा प्राकृतिक - व्यवहार सिद्ध हुआ । जब कोई जादूगर अपना खेल शुरू करता है; तो जनता उसे चारों ओर घेरकर बैठती है । जब कोई लैकचरार लैकचर देता है; तब भी जनता उसे घेरकर बैठती है । यह भी परिक्रमाका ही स्वरूप है । ऐसा क्यों? वह इसलिए कि हमने जिसकी उपासना करनी होती है; उससे योगकरणार्थं
In English
The Science of Mantras and Sound Vibration
This text explains that mantras derive their power from specific sound vibrations rather than their literal meanings. It argues that correct pronunciation can influence physical matter, human health, and mental states through resonance.
This chapter answers
- Why is the meaning of a mantra not important?
- How do mantras work through sound vibration?
- Can sound frequency break glass?
- What is the difference between vedic mantras and other mantras?
- How do mantras affect human health?
Also written: Mantrasiddhika, Sukshma, Vigyana, Mantrasiddhika Sukshma Vigyana, मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान