पञ्चम सुमन · प्रकरण 25
प्रातः मलमूत्रका व्याग
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329कार्य करना पड़ जाता है । तब निचले भागकी स्नायु वा पेशियां मलको बाहर करने में पूर्णरूपेण सक्षम नहीं हो सकतीं, और कोष्ठकी विशुद्धि न होने से वह कोष्ठबद्धता और भीतरी गन्दी वायुका विपाक्त धुत्रां मस्तिष्क में पहुँचनेसे वे कई प्रकारके रोगोंको उत्पन्न कर दिया करते हैं । इसीलिए वैद्य एवं डाक्टर लोग रोगीसे पहले टट्टी - पेशाबके लिए ही पूछते हैं । मन परमाणुरूप होनेसे एक ही इन्द्रियसे लगता है । यदि गुदके कार्य में संलग्न होनेपर उसे अन्य ऊपरके कार्यमें खींचा
जायगा; तो गुदकी पूर्ण शुद्धि न होने से वही दोष उपस्थित होंगे
। अपने मल - मूत्रको उस समय आंख जमाकर देखना भी ठीक नहीं;
क्योंकि वे दूषित परमाणु मुख, नाक वा आंख में आ जाते हैं ।
आंखोंके अग्रभागमें सूजन - सी हो जाती है,
' जिनियारी '
कहते हैं । जिन वस्त्रोंको पहरकर शौचालय जावे;
भोजनादि भी न करे ।
उसे पहर कर
( ग ) वायु,
अग्नि, सूर्य और पूज्यके सामने शौच भी नहीं
। ऐसा करने से एक तो इन पूज्योंकी अवहेलना है । करना चाहिये
दूसरा स्वयं भी इनके सामने ठहरने से कुछ संकोच होता ही है । उस समयकी संकोचावस्था मलकी विशुद्धि पूर्णरूपसे नहीं होने देती । इसके अतिरिक्त सामनेको वायु मूत्रकी व दें जहां हमारे ऊपर डलवाएगी; वहां हमारे मलका दुर्गन्ध भी हमारी नाकमें पहुँचकर हमें हानि पहुँचावेगा । अग्नि, जल और सूर्य आदिके सामने मल - त्याग करनेसे शरीर के ऊपरकी स्नायुएँ स्वयं ही कार्य प्रारम्भ कर देती हैं; क्योंकि अत्यन्त उज्ज्वल और चंचल और 330ऊष्मावाली वस्तुओंके सामने होनेपर ऊपरकी स्नायुएँ स्वयं ही उद्दीप्त हो जाती हैं और कार्य करना शुरू कर देती हैं । जब शरीरके ऊपरी भागकी स्नायुओं में क्रिया प्रारम्भ हो जावे; तो निचले भागकी पेशियां अपने कार्यको ठीक नहीं कर पाती । तब कोष्ठविशुद्धि में बाधा आ पड़नेसे रोगोंका होना स्वाभाविक हो उठता है । सूर्य और अग्निके सामने मलत्याग करने पर हमारे तेज वा शक्तिकी क्षीणतासे मल ठीक नहीं उतरता; श्रतः शास्त्रों में वैसा करना निषिद्ध किया गया है । शास्त्र जो बात कहते हैं उसमें कोई हमारा हित ही अन्तर्निहित होता है, चाहे उसे हम न भी जान सकेँ, यह बात कभी भूलनी नहीं चाहिये ।
( घ ) टट्टी - पेशाब खड़े होकर भी नहीं करना चाहिये । खड़े होकर पेशाब करनेवाले ब्राह्मणको भी ' अब्राह्मणोयं यस्तिष्ठन् मूत्रयति ' ( महाभाष्य, नब्बूसूत्र ) इस प्रकार निन्दार्थवाद से ‘ अब्राह्मण ' कहा जाता था । उसका तात्पर्य उसकी निन्दा में है कि — ऐसा नहीं करना चाहिये । बैठकर मूत्र तथा मल विधिसे उतरते हैं; खड़े होकर करनेसे एक तो छींटे अपने पर पड़ते हैं, दूसरा जोर लगाना पड़ता है, जिससे नसोंमें हानि पहुँचती है, तीसरा गली आदिमें शिश्न पकड़कर एक दीवार पर पेशाब करना असभ्यता भी है । यह पशु - व्यवहार है; जैसे कि — कुत्ते आदि किया करते हैं । ऐसा व्यवहार पतलून पहनने वालोंने जारी किया है; क्योंकि
बैठ नहीं सकते । पर उनकी देखादेखी पजामे वा धोती पहननेवाले भी ऐसा करने लग गए हैं — इसीका नाम ' अन्धपरम्परा ' होता है; 331यह अंग्रेजी प्रसाद हैं । अव जिस प्रकार हमने अंग्रेजोंको समुद्र पार भेज दिया है; अब उनकी रीतियोंको भी समुद्र पार ही भेजना चाहिये । वही प्राचीन धोती श्रादिका वेप, तथा नीचे टिककर टट्टी पेशाब आदि करना चाहिये । वैसा करनेसे नसोंमें बहुत जोर नहीं लगाना पड़ता । असभ्यता भी नहीं होती । छींटे आदि भी अपने कपड़ोंपर नहीं पड़ते । इन्हें देखकर अपटुडेट लड़कियों का भी खड़े होकर ऐसा व्यवहार करना सुना गया है - यह और भी बुरा है । इससे अपने कपड़ेकी अपवित्रता होती है अतः यह ठीक नहीं ।
( ङ ) ग्रामसे बाहर ही यथासम्भव मलमूत्र त्याग होना चाहिये । ऐसा होनेपर उस देश में रोग बहुलतासे नहीं हो पाते । जैसे श्मशानस्थान दुर्गन्धित परमाणुयुक्त होनेसे उस देशके लाभार्थ उस नगरसे बाहर रखा जाता है; वैसे ही मलस्थान भी बाहर ही होना उचित है; क्योंकि- – एक संकुचित स्थान होनेसे उसके दुर्गन्धका प्रभाव हम पर पड़ सकता है; पर बाहर खुले स्थान होनेसे उसका प्रभाव किसी पर नहीं पड़ता । पर शहर में ऐसा न होने से कई प्रकारके रोग घेरे रहते हैं; जिससे डाक्टरोंकी दुकानों को भी बढ़नेका अवसर प्राप्त हो जाता है । ग्रामवालोंका स्वास्थ्य नगर वालों की अपेक्षा इसीलिए अच्छा हुआ करता है, क्योंकि गांवके बाहर शोचार्थ जानेसे प्रातःकालकी विशुद्ध वायुका सेवन भी अनायास हो जाता है । घरमें बैठने से बढ़ी हुई आलस्यकी प्रवृत्ति हटकर जीवन पुरुषार्थमय भी हो जाता है । सर्दी - गर्मी से डर भी हट जाता है । इसके 332अतिरिक्त नंगे पैरोंसे तुषार - ( स ) क्लिन्न शाद्वल ( तृणयुक्त - प्रदेश ) पर घूमनेसे स्वास्थ्य बढ़ता है और नेत्ररोग हटते हैं, जिससे बाल्यकालमें चश्मे लगानेकी आवश्यकता नहीं रह पाती ।
( ६ ) लघुशंका आदिके अन्य नियम ।
लघुशंकाके बाद मूत्रयन्त्रको ताजे ठंडे जलसे धोना चाहिये, क्योंकि - मूत्र पित्त - प्रधान होता है । उसमें विषाक्त पदार्थ भी होते हैं । तब शाटिका आदिमें मूत्रांश लगने से जहां अशुद्धि रहती है, वहां कई प्रकारके रोगोंकी सम्भावना भी रहती है; अतः मूत्र- · यन्त्रका यथासम्भव प्रक्षालन उपयोगी है । उपस्थेन्द्रियके अग्र- भागमें कई ऐसी सूक्ष्म स्नायुएं होती हैं; जो थोड़ी भी उत्तेजना प्राप्त करके उत्तेजित हो उठती हैं । मूत्रोत्सर्गके समय उष्ण एवं दूषित मूत्रांशोंके स्पर्शसे उन स्नायुत्रों में उत्तेजना प्राप्त हो जाती है । जलद्वारा प्रक्षालनसे वह आशंका नहीं रहती ।
मुसलमान लघुशंका करके मूत्रांशके प्रस्रवणकी आशंकाके समय तक तत्काल उठाये हुए ढेले आदिके द्वारा शुद्धिमें लगे होते हैं । यह असभ्यता दीखती हुई भी बहुत कुछ अंश में ठीक है । हमारे पूर्वज भी उस समय उपस्थको भित्तिस्पर्श द्वारा शुद्ध करते थे । पर इन व्यवहारोंसे भी कुछ हानिकी आशंका रहती है; क्योंकि — गर्मी में उस दीवारके वा तत्काल उठाये हुए ढेलेके उष्ण होनेसे, तथा शीतकाल में उन दोनों के बहुत ठंडे होनेसे उनके स्पर्शसे उपस्थके द्वारा वह सर्दी - गर्मी अन्दर प्रविष्ट होकर उपस्थको हानि पहुँचा सकती है । अतः ताजे जलके द्वारा उपस्थ - शुद्धि ही
In English
Rules for Bodily Elimination
This text explains the physiological and ritual importance of complete bowel and bladder evacuation. It argues that improper elimination due to environmental or postural factors can lead to illness, loss of energy, or social impropriety.
This chapter answers
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