पञ्चम सुमन · प्रकरण 17

विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य

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293इत्यादि द्वारा वस्त्र - प्रदान करता है, वैसे ही विवाह में भी वर उक्त मन्त्रसे वधूको वस्त्र प्रदान करता है । उपनयनमें वहीं आचार्यद्वारा ब्रह्मचारीका सांगुष्ठ दक्षिणहस्त ग्रहण किया जाता है, वैसे विवाह में वर भी पत्नीका सांगुष्ठ पाणिग्रहण करता है. इत्यादि । अतः विवाह ही कन्याका द्विजत्व - सम्पादक उपनयनरूप है, इससे अलग कन्याका उपनयन संस्कार नहीं होता ।

यह दारपरिग्रह करना ही गृहाश्रम - संस्कार है, उसी विवाहाग्निको विधिपूर्वक कन्याके गृहसे मण्डपसे लाकर उस अग्निको पति अपने जीवनतक अपने घरमें रखता है । उसीमें अपने पञ्चमहायज्ञ आदि स्मार्तकर्म करता है, इसीको आवसथ्याधान वा स्मार्ताग्निपरिग्रह वा गृह्याग्नि, औपासनाग्नि वा वैवाहिकाग्नि कहा जाता है । इसीमें वैश्वदेव, नैत्यिक - होम आदि करना पड़ता है । पत्नीकी सहायतासे तथा उसको अपने साथ बैठाकर यह सब कर्तव्य करना पड़ता है । पत्नीको भी अभिन्न एवं सहायक होने से इसका फल मिलता है । पत्नीको सदा उस अग्निकी रक्षा करनी पड़ती है कि वह अग्नि बुझे नहीं, उसी अग्निसे पाक - क्रिया भी करनी पड़ती है । जैसे कि मनुस्मृतिमें कहा है- ' वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्य कर्म यथाविधि । पञ्चयज्ञविधानं च पक्तिं चान्वाहिकीं गृही | ( ३ | ६७ ) ( ' गृहस्थ वैवाहिक अग्निमें विधिपूर्वक गृह्य कर्म-

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अग्निहोत्र आदि पञ्चयज्ञका अनुष्ठान और प्रतिदिनकी रसोई करे । ' ) ' वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्य ऽग्नौ विधिपूर्वकम् । अभ्यः कुर्याद् देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम् । ( ३/८४ ) ' ब्राह्मण वैवाहिक अग्निमें 294विधिपूर्वक तैयार किये हुए विश्वेदेवसम्बन्धी अन्नका इन देवताओं- केलिए प्रतिदिन होम करे । '

इसी अग्निमें पक्षादिकर्म भी करने पड़ते हैं । इसीका दूसरा अङ्ग त्रेताग्निसंग्रह वा श्रौताधान वा वैज्ञानिक कर्म आदि हैं । इसमें दर्श, पौर्णमास आदि वैदिक यज्ञ करने पड़ते हैं । पत्नीको यज्ञशाला से भिन्न देशान्तरमें जानेका निषेध है; तभी उसका ' गृहपत्नी ' नाम सार्थक है । इस कार्य में त्रुटि न पड़े, इसलिए यहाँपर बहुपत्नीविवाह भी संकेतित होता है; क्योंकि एक ही पत्नीके होनेपर उसके भिन्न स्थान में जानेपर विवाहाग्नि नष्ट हो जाती है । फिर प्रायश्चित्तपूर्वक पुनराधान करना पड़ता है; अथवा उसी एक पत्नीके रजस्वला होनेपर यज्ञमें उपस्थिति सम्भव न होनेसे यज्ञ अपत्नीक होनेके कारण अप्रशस्त हो जाता है; उस समय अन्य पत्नी उसका कार्यनिर्वाह कर देती है । यदि एक- . पत्नीव्रत ही इष्ट हो तो सुवर्णमय सीता की तरह कुशकी स्त्री, वा स्त्रीका प्रन्थिबन्धनवाला वस्त्र ही उसका प्रतिनिधि मान लेना पड़ता है । पर उस पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर उसी अग्निसे उसका दाह . करके वह अग्नि समाप्त कर दी जाती है, फिर अन्य अग्निके आधानकरणार्थ अन्य विवाह करना पड़ता है । यदि पतिकी मृत्यु हो जाय तो उससे पतिका संस्कार कर दिया जाता है । पत्नीका स्वतन्त्र अग्न्याधान न होनेसे वह न फिर नूतन अग्न्याधान कर सकती है, न विवाह । वह वैधव्य उसका संन्यास - स्थानीय होता है । संन्यासी भी अनग्नि ( अग्नि - रहित ) होता है । 295यदि पति अपनी पत्नीकी मृत्यु हो जाने पर अन्य आधान तथा अन्य विवाह न करना चाहे तो वह गृहस्थ आश्रम में रह नहीं सकता । अग्नि न होने से वानप्रस्थ में भी नहीं रह सकता । उसे संन्यासमें चला जाना चाहिये । नहीं तो — ' एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् । दाहयेदग्निहोत्रेण ( श्रौतस्मार्ताग्निभिः ) पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च । ( मनु ० ५।१६७-१६८ ) ( ' धर्मज्ञ द्विज ऐसे चारवाली अपनी सजातीय पत्नीकी अपने से पहले मृत्यु होनेपर अग्निहोत्रकी अग्नि तथा यज्ञपात्रोंद्वारा उसका दाह - संस्कार करे । पहले मरी हुई पत्नीको अन्त्येष्टिकर्मके समय आग देकर गृहस्थ मनुष्य पुनः पत्नी - परिग्रह और अग्निस्थापन करे । ' इस प्रकार पुनर्विवाह कर यज्ञादि धर्म - कर्म में संलग्न रहे, केवल कामसे नहीं ।

इस प्रकार अपने नित्य - नैमित्तिक कर्तव्य करते रहनेसे- ' महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ' ( मनु ० २।२८ ) ( ' पञ्च महा- यज्ञों तथा ज्योतिष्टोमादि - यज्ञों द्वारा यह शरीर ब्रह्मप्राप्तिके योग्य बनाया जाता है । ' ) ब्राह्मी गति ( मुक्ति ) प्राप्त होती है । इसके अतिरिक्त यज्ञोंसे वृष्टि आदि होनेपर अन्नकी समृद्धि होने से देशका तथा अपना उपकार होजाता है । अङ्गरूप देवपूजा से अङ्गी महान् देवकी पूजा भी हो जाती है । गृहाश्रम २५ वर्षसे लेकर ५० वर्ष तक अवलम्बन करना पड़ता है । ब्रह्मचर्यमें संहिताओंका अध्ययन करना पड़ता है; आचार्यकी अग्निमें केवल समिदाधान करना पड़ता है, गृहस्थ 296में वेदके ब्राह्मण - भागका अभ्यास तथा तत्प्रोक्त अनुष्ठान, संहिताहोम आदि करना पड़ता है । इसमें यथासमय पूर्वोक्त गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन संस्कार द्वारा सन्तानकी प्राप्ति करके उनका पालन - पोषण, लड़केका यथासमय आचार्य - कुलमें प्रेषण तथा लड़कियोंका रजःकालसे पूर्वतक पोषण, संरक्षण, गृहकार्यशिक्षण तथा यथासमय उनका विवाह कर देना पड़ता है । यहाँ तक १६ संस्कारोंकी विधि पं ० श्री भीमसेनजी - इटावाप्रणीत ' पोडश संस्कार- विधि ' में देख लेनी चाहिये ।

असवर्णाविवाह निषेध - सवर्णाविवाहकी व्यवस्था के प्रश्नको आजके आलोचक वेदशास्त्रोंके प्रमाणोंसे नहीं मानते; वैज्ञानिक अन्वेषणाओं अनुसन्धानोंसे कदाचित् मान जायँ । उसमें असवर्णाविवाहके निषेधके विषय में वेदादि - शास्त्रों के प्रमाणों से उपनिबद्ध निबन्ध अन्य पुष्पोंमें प्रकाशित होगा । यहांपर उसके विषय में विज्ञानके नवीनानुसन्धानको रखते हैं ।

शिकागो नगरके डाक्टर इब्राहीम जगत्के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक हैं । अमेरिकाके ' न्यूसाइन्स भूफिटिङ्ग ' नामक पत्र में उनके लेख प्रकाशित हुआ करते हैं । उन्होंने सवर्णा- असवर्णाविवाहकी व्यवस्थाके विषयमें पर्याप्त विचार किया । २५ साल प्राणियोंकी रक्तपरीक्षाके बाद उन्होंने अद्भुत बातोंके ज्ञापक यन्त्र बनाये । रक्तकी प्रथम परीक्षासे उन्होंने अनुसन्धान किया कि काम, क्रोध, लोभ, मोहकी अवस्थामें भी इनका परिवर्तन हो जाता है । उससे मनुष्यका विषयीपन, क्रोधीपन, अथवा ईर्ष्या - द्वेष पहिचाना जाता 297है । कभी किसीके रुधिरमें लवणका परिमाण अधिक होता है; किसीके रक्तमें कम । इससे मानुषिक प्रेमकी परीक्षा ठीक - ठीक हो सकती है ।

दूसरी परीक्षा रक्तके मिश्रणसे होती है । उक्त वैज्ञानिकने ' आसीलोखोट ' नामक यन्त्रका आविष्कार किया है । अमेरिकाके न्यायालय इस यन्त्रका प्रयोग करते हैं । इस यन्त्र से जाना जा सकता है कि अमुक पुरुष अपने पिताकी सन्तान है, या नहीं? अथवा उसकी माताके व्यभिचारसे उसके रक्तमें संकर है क्या? अर्थात् यह परीक्षा हो सकती है कि छामुक स्त्री सती है या व्यभिचारिणी?

दूसरा यन्त्र है सीतापरीक्षा । विवाहसे पहले इस यन्त्रकी परीक्षा होती है । इस यन्त्रमें दो विभाग हैं; वे सदा कांपते रहते हैं । उनमें से एक में पुरुषका रक्त, और दूसरे में स्त्रीका रक्त रखकर परीक्षा की जाती है 1

। रक्तवाले दोनों भाग जब आपस में मिलते हैं; तो उसमें तीन प्रकारके परिणामका पता चलता है । ( १ ) जब निकटतम सम्बन्धी स्त्री - पुरुषोंके रक्तको इसमें रखा जाता है; तो उनके मिश्रण के बाद उन रक्तोंका स्पन्दन शान्त हो जाता है । ( २ ) सर्वथा असम्बद्ध स्त्री - पुरुषोंका रक्त जब रखा जाता है; तब उनकी गति तीव्र हो जाती है । ( ३ ) यदि समान जातिवाले स्त्री - पुरुष हों; परन्तु निकट सम्बन्धी न हों; तो उनके रक्त - संयोग होने पर कांपते हुए वे विभाग जब मिलते हैं; तो दोनोंकी गति पूर्ववत् चालू रहती है, कुछ भी उनमें परिवर्तन नहीं होता ।

298इन परिणामोंका अभिप्राय डाक्टर महाशय यह बताते हैं कि जहां निकट - सम्बन्ध में विवाह हो; वहां पुत्र अथवा पौत्र, अथवा प्रपौत्रको भयानक रोग हो जायेंगे । दो - तीन पीढ़ियोंके बाद उस वंशका उच्छेद हो जावेगा । ( हमारे पूर्वजोंने भी इसीलिए प्राचीन- कालसे इसका निषेध कर रखा था - ' असपिण्डा च या मातुरस- गोन्ना च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ' ( मनु ० ३।५ ) यहां माताकी छः - सात पीढ़ियां, तथा पिताके गोत्रवाली लड़कीके साथ विवाह निषिद्ध किया है । जहां सर्वथा भिन्न वर्णके स्त्री - पुरुषों का विवाह होगा; वहां कुछ समय के बाद रक्त अपवित्र - विकृत हो जायगा । माता - पितामें जो नीच होगा, उसके कारण से सन्तान नीच होगी । सन्तानमें उससे भी अधिक दोष होंगे । ( इसीलिए कदाचित स्मृतियोंमें वैसी सन्ततियोंका बहिष्कार प्रायः देखा गया है ) । उक्त डाक्टरने इन बातोंसे यह सिद्धान्त प्राप्त किया था कि विवाहार्थ समान जातिवाले स्त्री - पुरुष होवें; पर वे निकट - सम्बन्धके न हों, वही उचित विवाह है । परन्तु हमारे धर्मशास्त्रोंने तो लाखों वर्षोंसे पहले ही सपिण्ड - सगोत्र विवाहका निषेध कर रखा है ।

( १४ ) वानप्रस्थ वा वनवासका रहस्य

गृहाश्रमके बाद ५१ वर्षसे ७५ वर्ष तक वानप्रस्थाश्रम - संस्कार करना पड़ता है । इसमें घरका भार आचार्य कुल से लौटे हुए प्रथम पुत्र पर डालकर पत्नीके साथ अपनी गृह्य अग्निको लेकर वन में निवास करना पड़ता है, जिससे संन्यासकी योग्यता प्राप्त हो सके । यह एक शान्त जीवन होता है । इसमें शहर से दूर रहकर

In English

The Householder Stage and Marriage

This chapter explains the duties of the householder stage (grihasrama), focusing on the importance of the domestic fire and the role of the wife. It discusses marriage regulations, including the necessity of same-caste unions to prevent bloodline degradation, and introduces the transition to the forest-dweller stage (vanaprastha).

This chapter answers

  • What are the duties of a householder in hinduism?
  • Why is the domestic fire important in grihasrama?
  • What happens if a wife dies during marriage?
  • Why does shastra prohibit marrying close relatives?
  • How do you transition from householder to vanaprastha?

Also written: Vivaha, Tatha, Agnyadhanaka, Rahasya, Vivaha Tatha Agnyadhanaka Rahasya, विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 293–298 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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