सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 691–700
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 691–700
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श्रीकृष्ण - जन्माष्टमीव्रत पूर्णतः वैज्ञानिक ६६३ विषयों से ' छुटकारा हो जाता है । निर्विषयता हुई, तो अनन्य भक्ति भी हो सकती है । फिर प्रश्न उपस्थित होता है कि - निराहारता से विषय भले ही छूटें, पर विषयोंका रस तो नहीं छूटता । विषयोंका रस न छूटा, तो फिर भी भगवान्का. ध्यान अनन्य - योगसे कैसे हो? इस पर हम कहते हैं कि - यह कोई आपकी नई बात नहीं है । भगवान् तो इसको पहलेसे ही जानते थे, अतः वे कह गये हैं-' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं— ( २२५६ ) तब फिर विषय - रस हटनेका उपाय क्या? यह उपाय भी भगवान् स्वयं श्रीमुख से कह गये हैं- ' रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ' ( २।५६ ) अर्थात्- निराहारतारूप व्रत हो, इसके बाद हो भगवान्की बांकी झांकीका दर्शन । तात्पर्य यह है कि - जन्माष्टमीका व्रत भी करो, साथ ही भगवान्का दर्शन भी करो । ऐसा होने से विषय तथा विषय - रस छूटकर हमें अनन्यचित्त बनायेंगे । जब हम अनन्यचित्त हुए, तो इस जगत्का उत्तम लाभ प्राप्त हुआ । इधर पूर्णिमा में सूर्य - चन्द्रमा समान रेखामें होते हैं, अमावास्यामें दोनों समान - स्थान में होते हैं, तथा अष्टमी में सूर्य - चन्द्र समान कोणमें होते हैं, उनके आकर्षण - विकर्षणका प्रभाव पृथिवीपर भी हुआ करता है । इसी कारण सबसे अधिक ज्वार - भाटा पूर्णिमामें, सबसे कम श्रमावास्यामें और मध्यम ज्वार - भाटा दोनों अष्टमियोंमें हुआ करता है । जैसे सूर्य - चन्द्रमाके आकर्षण - विकर्षण. का प्रभाव समुद्रपर पड़ता है, वैसे ही प्राणियोंके लहूपर भी पड़ता
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६६४ श्री सनातनधर्मालोक ( ५ ) है, क्योंकि लहू भी जलका ही भाग होता है । उक्त - तिथियोंमें स्त्री - पुरुषोंकी वीर्य आदि धातुए विषम होती हैं, अतः इनमें हुई-हुई उत्तेजना हानिकारक होती है, विशेषतः वर्षा ऋतु में, अतः इन तिथियोंमें ब्रह्मचर्य - पूर्वक व्रत आवश्यक हुआ करता है । इसी कारण ही अष्टमी आदिमें पहले समय के लोग यज्ञ, व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य आदिका अनुष्ठान करते थे । अष्टमी - आदिसें अध्याय भी इसी कारण हुआ करता था । यह भाद्रपद की कृष्णाष्टमी विशेष है, अतः आधीरात में कृष्ण चन्द्रोदय के अवसर तक इस व्रतका विधान रखा गया है । उस समय दर्शन, भजन, कीर्तन आदिमें लगे रहनेसे पूर्वके कहे दोष हट जाते हैं । इन्हीं वैज्ञानिक कारणों से हमें जन्माष्टमीके दिन व्रत तथा भगवानका दर्शन - कीर्तन आदि अवश्य करना चाहिये । ( ७ ) पितृश्राद्ध पक्ष । मृतक - पितरोंका श्राद्ध प्रति - अमावस्याको हुआ करता है, और पार्वण श्राद्ध भाद्रपद - पूर्णिमासे लेकर आश्विनकी अमावस्या तक होता है । पञ्चमहायज्ञान्तर्गत पितृयज्ञ प्रतिदिन होता है । हम ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाके चतुर्थ- पुष्प में ' मृतक - श्राद्धविज्ञान ' पर सुगम - प्रकार द्वारा प्रकाश डाल चुके हैं, पाठक उस पुष्पको अवश्य मंगा लें । उसमें ' मृतकश्राद्ध और ब्राह्मणभोजन, विषय पर सम्यक्तया प्रकाश डाला गया है । यहाँ भिन्न - भिन्न विद्वानोंके आशयको लेकर हम श्राद्धविज्ञान पर प्रकाश डालते हैं-
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पितृश्राद्ध पक्ष ६६५ [ यह मृतक श्राद्धका * ( २ ) मृतक शास्त्रीय विज्ञान दिखाया | जा रहा है, इसमें श्राद्धकी वास्तविकता सिद्ध होगी श्राद्धविज्ञान ] ' विघूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति ' शाखके इस प्रमाणसे मृतक-पुरुषोंके सूक्ष्म शरीर चन्द्ररश्मियोंसे आकृष्ट होकर अपने स्थानपर पहुँचनेकेलिए चन्द्रकी ओर आकाशमें चलते हैं; वहाँ ' अन्नमयं हि सोम्य! मनः, आपोमयः प्राणः, तेजोमयी वाक् ' ( छान्दो ० ६२६५ ) इत्यादि उपनिषद्के प्रमाणसे अन्न, जल, और तेजः- प्रधान अन्तः-करण ( मन ) ' चन्द्रमा मनसो जात: ' ( यजुःसं ० ३१।१२ ) इस श्रुतिके अनुसार उसकी समान जाति वाली चन्द्रकी किरणों से आकृष्ट होता है । परन्तु बहुत दूर जानेके कारण मार्गमें वायु और आप आदिके कारण उसका सोम्य अंश क्रमशः क्षीणताको प्राप्त होजाता है । तब चन्द्ररश्मियोंके आकर्षणके मूल कारण सोम - भागकी थोड़ी प्राप्तिके कारण श्राकर्षणशक्तिके ह्राससे वही अन्तःकरण चन्द्र तक न पहुँच पानेसे मार्ग में ही कहीं विलीन हो जावे; वा उसकी अन्य - दिशामें गति हो जाए, जो अनिष्ट है, ऐसी आशङ्का रहा करती है । तब नियत स्थान न मिलनेसे उस अन्तःकरणकी तथा तत्सहचारी सूक्ष्म - शरीरकी अपगतिकी सम्भावना हो सकती है । तब जौ के चूर्ण, तथा जल, घृत, दुग्ध, मधु आदिसे सम्पादित पिण्ड सूक्ष्म अंशोंसे उसी प्रकार चन्द्र - किरणोंसे समाकृष्ट होकर उसी मार्गसे ऊपर जाते हुए, बीच - बीच में चढ़ते हुए मृत - प्राणियोंके पूर्वका श्राद्धविज्ञान चतुर्थपुष्पमें देखें ।
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६६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सूक्ष्म शरीरमें सोमकी सामर्थ्य उत्पन्न करके उन्हें आप्यायित ( सबल ) करके फिर अपेक्षित सोम के अंशको उत्पन्न करते हुए मृतकके उन सूक्ष्म शरीरोंको गन्तव्य स्थान चन्द्रलोक में प्राप्त करा देते हैं - यही मृतककी सुगति होती है; इससे भिन्न गति मृतककी अपगति होती है । मृतक मनुष्य के शरीरावयवों से उत्पन्न हुए निकटके सपिण्ड पुत्र भी उसी मृतककी समान जातिके होते हैं; अतः उन पुत्रादिसे दिये हुए पिण्डों में भी उनके हाथके सम्बन्धसे वैसे ही अतिशय उत्पन्न हो जाते हैं; जिनसे उन पुत्रादिसे दिये हुए पिण्डों से निकले हुए सूक्ष्म - सोमांश चाकर उनके पितरोंके सूक्ष्म - शरीरसे ही सङ्गत होते हैं; दूसरे अपने असम्बद्ध - मृत-पितरोंके सूक्ष्म शरीर से नहीं, क्योंकि — आकर्षणका नियम अपने सजातीय आकर्षण में प्रतिनियत होता है, भिन्न जातीय में नहीं । वर्णसङ्करतामें स्वपितृसे भिन्नके वीर्यसे उत्पत्ति होने पर वह अतिशय नहीं रह जाता; इसलिए अपने मृत पिताको वह अतिशय नहीं प्राप्त होता; तब सोम - सामर्थ्य की सहायता न मिलने से पूर्व कहे अनुसार मृतकके सूक्ष्म - शरीर की गन्तव्य स्थान चन्द्रलोक में गति न हो सकनेसे अन्यत्र अनिष्ट निम्न स्तर नरकादि- प्रेतलोकों में प्राप्ति हो जाने से पतन वा अपगति हो जाती है; इसी बात को भगवद्गीता के शब्दों में इस प्रकार कहा गया है-' अधर्माभिभवात् कृष्ण! प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय! जायते वर्णसंकरः । संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्य ेषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः । ' ( १४१-४२ ) ।
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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६६७ इसी वैज्ञानिक - रहस्यको लक्ष्य करके पिता आदिकी मृत्युमें प्रतिदिन निर्वापित किये पिण्डसे दस दिन तक दशगात्र किया जाता है; इससे मृतकके दश अङ्गों में अपेक्षित - अङ्ग वाली शक्ति हो जाती है; इसीका पारिभाषिक - नाम मृतकके अङ्गोंकी उत्पत्ति होना श्राद्ध - पद्धतियोंमें प्रसिद्ध है । न होकर वैज्ञानिक ही सिद्ध है । नियत ११-१२-१५ आदि दिनों तक एकोद्दिष्ट आदि शुद्ध - क्रिया करके करके, फिर श्राद्धमें ब्राह्मण भोजन द्वारा सहायता पहुँचाई जाती है उपपत्ति न होनेसे वह निर्मूल ही इसलिए मृतक श्राद्ध अवैज्ञानिक फिर अपने - अपने वर्णानुसार पितृक्रिया करके फिर सपिण्डन, मृतकको पूर्व - पितरोंसे सम्बद्ध करके उस मृतक पितृको पुत्रके । परन्तु जीवित - श्राद्धमें कोई सिद्ध होता है । जो कि श्विन मास के कृष्णपक्षकी मृतककी तिथिमें सभी मृतक - पितरोंके श्राद्ध किये जाते हैं; उसमें विज्ञान यह है कि इन दिनोंमें चन्द्रमा अन्य मासोंकी अपेक्षा पृथिवीके निकटतर हो जाता है । इस कारण उसकी आकर्षण शक्तिका प्रभाव पृथिवी तथा उसमें अधिष्ठित प्राणियों पर विशेष रूप से पड़ता है । तब जितने सूक्ष्म शरीर चन्द्रलोकके ऊपरी भाग में स्थित पितृलोकमें जानेके लिए बहुत समय से भी चल रहे होते हैं; वा चल पड़े होते हैं, उनका उद्देश करके उनके सम्बन्धियोंसे निर्वापित - पिण्ड अपने अन्तर्गत सोमके अंशसे उन सूक्ष्म - शरीरोंको आप्यायित करके उनमें विशिष्ट अतिशय उत्पन्न करके उन्हें शीघ्र और अनायास ही, अर्थात् बिना अपनी सहायताके ही पितृलोकमें प्राप्त कर दिया
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६६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) करते हैं । तब वे पितर भी उनकी ऐसी सहायता पाकर उन्हें हृदयसे समृद्धि तथा वंशवृद्धिका आशीर्वाद देते हैं । जो सूक्ष्म शरीर पितृलोकमें प्राप्त हो जाते हैं; उसमें निर्वापित किये हुए पिण्डों वा ब्राह्मण भोजनके सूक्ष्मांश उनके पास प्राप्त होकर उनको आप्यायित करते हैं, जिनसे वे सूक्ष्म शरीर रूप पितर मस्त ( प्रसन्न ) हो जाते हैं, और पुत्रोंको आशीर्वाद देते हैं । जो कि प्रतिवर्ष क्षयाह के मास एवं तिथिमें श्राद्ध किया जाता है; उसमें कारण यह है कि — तिथि होती है चान्द्रमासके तथा चन्द्र-गतिके अनुसार; उसमें चन्द्रलोक में वे पितर उसी मार्ग वा स्थान में स्थित होते हैं; जब वे मरकर उसी तिथिमें उस मार्ग वा स्थानको प्राप्त हुए थे । तब वे सूक्ष्माग्निसे प्राप्त कराये हुए उस श्राद्धकें सूक्ष्मांशको अनायास प्राप्त कर लेते हैं । इसीलिए याज्ञवल्क्य -स्मृति में कहा है- ' मृतेऽहनि तु कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम् । प्रतिसंवत्सरं चैवमाद्य एकादशेऽहनि ' ( आचाराध्याय - श्राद्धप्रकरण २५६ पद्य ) । ' वर्षे वर्षे मृततिथौ श्राद्धं कुर्यात् ' ( बोधायनीय- पितृ-मेधशेषसूत्रके ३ य खण्डमें ) । ( ३ ) मृतक श्राद्ध - विज्ञान [ इस निबन्धमें श्राद्धमें किये जानेवाले कर्त्त व्यकी विज्ञान-पूर्णता सिद्ध होगी । ] श्राद्धके समय पृथिवी पर कुश रखे जाते हैं; और कुशों पर यव - अक्षत आदिके पिण्ड रखे जाते हैं । पिण्डों में जौ, तिल, दूध, मधु और तुलसीपत्र डाले जाते हैं । तब श्राद्धकर्ता वसु, रुद्र, और
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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६६६ आदित्य इन तीन नित्य - पितरोंका, यम और परमेश्वरका ध्यान करता है, और आचार्य वेदमन्त्रोंका गम्भीर - खरसे उच्चारण करता है । इस पर यह जानना चाहिये कि - चावलों में ठण्डी विजली, और जवोंमें भी ठंडी - विजली होती है । तिलोंमें गर्म - बिजली, दूध में भी गर्म - विजली होती है । तुलसीपत्रमें दोनों प्रकारकी विद्युत् होती है । साधारण मनुष्य जब साधारण वचन बोलता है; तो उसके शरीर में न्यून - विद्युत् उत्पन्न होती है; पर जब कोई वेदवित् - कर्मकाण्डी तथा ज्ञानी - विद्वान् नियतपद - प्रयोगपरिपाटी वाले तथा नियत श्रानुपूर्वीवाले पितृगणोंसे सम्बद्ध वेदमन्त्रोंको पढ़ता है, तब नाभिचक्र से उठी हुई वायु पुरुषके शरीर में उष्ण - विद्युत्को उत्पन्न करके उसे शरीरसे बाहर करता है । इधर वेदके शब्दोंके द्वारा विद्वान् ब्राह्मणके शरीरसे अलौकिक वैदिकक्रिया - सिद्ध विद्युत् भी पिण्डों में प्रवेश करती है । '. इस प्रकार बिजलियोंके समूह हो जानेपर मधुकी विद्युत् उनका मिश्रण करनेवाली बनती है । मधुकी विद्युत् चावल, जौ, दूध, तिल, तुलसीपत्र, तथा वेदमन्त्रोंकी विद्युतोंको मिला देती है । नीचे कुश इस कारण रखे जाते हैं कि - पिण्डोंसे उत्पन्न विद्य त् पृथिवीमें संक्कान्त न हो जावे । कुशाएं पिण्डोंकी विद्य तोंको पृथिवी में नहीं जाने देतीं । इसलिए भगवान् कृष्णने ध्यानके समय ध्यानकर्ता की विद्युत्की रक्षाकेलिए ' चैलाजिनकुशोत्तरम् ' ( ६।११ ) कुशाका आसन ऊपर रखवाया है । मधुने मिलाकर जो अलौकिक - विद्युत् पैदा की थी; वह श्राद्धकर्ताकी मानसिक - शक्ति
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६७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) द्वारा उधर ही जाती है, जिधर उसका मन जाता है । और मन नित्य- पितरों वा, अपने पितरों तथा यम एवं परमेश्वरके ध्यानसें लगा होता है । तब वह बिजली भी इनके पास चमकती है; तब यम वा नित्य - पितर सर्वज्ञ होनेसे श्राद्धकर्ताके पुत्रके किये हुए श्राद्धके – त्राह्मणकी वैश्वानर - अग्नि से सूक्ष्मीकृत अन्नको मृत-पितरोंके पास तदनुकूल करके भेज देते हैं, चाहे वे पितृलोकसें हों; वा अन्य लोक में, वा किसी अन्य योनिमें हों । ( ४ ) मृतक - श्राद्ध - विज्ञान । [ इस निबन्धमें भी श्राद्धीय - पदार्थोंकी वैज्ञानिकता सिद्ध होगी, जिससे श्राद्ध - विषय अशङ्कनीय सिद्ध होगा । ] सबसे पहले अखंड दीपक जलाना चाहिए; जो पितृ- मृत्युके दिन से लेकर दस दिन तक जलता रहना चाहिए । कुशास्तरण बिछाकर ' इदं पितृभ्यः प्रभरामि बर्हिः ' ( अथर्व ० १८ | ४ | ५१ ) ' एदं बर्हिरसदो मेध्योऽभूः ' ( १८ | ४ | ५२ ) ' येऽस्माकं ' पितरस्तेषां बर्हिरसि ' ( १८ | ४ | ६८ ) इन मन्त्रोंके आधार से उन कुशासनों पर तीन पिण्ड रखने चाहियें । तिल, चावल, कुश यह तीन वैद्य त पदार्थ होते हैं । इनकी सहायता के लिए अखण्ड दीपक रहता है । अन्नके उष्ण पिण्ड, अथवा दुग्धमय मेवेके पिण्ड देशकालानुसार क्रिया-द्वारा निर्वापित करके उन्हें जलमें डालते हैं, जिससे वाष्प ( भाप ) निकले । भाप ही विद्युत - शक्ति से सूक्ष्म होकर सूर्य किरणके द्वारा चन्द्रमंडलके ऊपरके भागमें पितृलोकमें ठहरे हुए पितरोंको तृप्त करती है । यह विशेष -विधि है । दूसरी विधि है हवन; तीसरी
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मृतकश्राद्ध - विज्ञान ६७१ विधि है ब्राह्मण भोजन । हवनमें अग्नि उस कव्यको सूक्ष्म करके स्वयं भी सूक्ष्म होकर महाऽग्निके साथ मिलकर सूर्यलोकमें पहुँचा देती है, और सूर्य अपनी सुषुम्णा - किरणके द्वारा उसे पितृ ( चन्द्र ) -लोकमें इष्ट - पितृके पास पहुंचा देता है । ब्राह्मण भोजनमें ब्राह्मणकी ` वैश्वानराग्नि उस कव्यको सूक्ष्म कर महाग्निके साथ मिल जाती है । उसका मित्र वायु उसे आकाशाभिमुख ले जाता है । वह अग्नि उस अन्नको पूर्वकी भांति पितृलोकमें पहुँचाती है । इस प्रकार तीन प्रकारोंके द्वारा पितृगण स्वधाको प्राप्त कर लेते हैं । ( ५ ) मृतक - श्राद्ध - विज्ञान । [ इस निबन्धमें श्राद्धका शास्त्रीय तथा रहस्यपूर्ण विज्ञान दिया जायगा, पाठक इसका सावधानता से मनन करें, तो उन्हें श्राद्धकी यौक्तिकता तथा सोपपत्तिकता प्रतीत होगी । ] छान्दोग्य उपनिषद् में पञ्चमाध्यायमें पञ्चाग्नि - विद्या नामक एक प्रकरण आया है उसमें लिखा है- ' इति तु पञ्चम्यामाहुतौ आपः पुरुषवचसो भवन्ति ' अर्थात् पांचवीं आहुतिमें जल पुरुषके शरीरको धारण करते हैं । इससे पूर्व उसमें पचाग्नियोंका विस्तृत वर्णन है । यह भी वहां बताया गया है कि — यथाक्रम प्रत्येक अग्निमें व्याप्त होकर अन्तमें जल कैसे पुरुषत्वको प्राप्त करता है? इन पञ्चाग्नियों वा आहुतियोंका परिचय इस प्रकार है-सबसे पहली अग्नि द्युलोक है, सूर्य उसकी समिधा ( अग्नि दीप्त करनेका साधन ) है । इस अग्निमें देवतागण श्रद्धाकी आहुति देते हैं । इससे सोम उत्पन्न होता है । ब्रह्मसूत्र ( ३ । १ । ५ ) के भाष्य में
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६७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) स्वामी शंकराचार्यने लिखा है- ' श्रद्धाशब्दश्च अप्सु उपपद्यते, वैदिक - प्रयोगदर्शनात् — ‘ श्रद्धा वा श्रपः ' इति । इससे श्रद्धाका अर्थ जलांश | जो गृहस्थी यज्ञादि नित्य - नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान में लगे होते. हैं, उनके अग्निहोत्र आदि कमोंमें घी, दूध, दही यादि द्रव्यों में जो जलांश होता है, वह आहुति देनेपर पूर्व नामक संस्कार बनकर जीवके साथ स्वर्गादि - लोकमें जाता है; इस प्रकार पुत्रादि द्वारा पितरोंके उद्देश्यसे दिये जाते हुए खीर - पूड़ी आदिका जलांश भी वेदमें ' श्रद्धा ' नामसे कहा जाता है; शरीर त्याग हो जाने पर परलोकमें जाता हुआ जीव सूक्ष्म शरीरकी भांति इन सूक्ष्म जलीय-अंशोंसे भी परिवेष्टित होता है । वही सूक्ष्म जलीय - अंश उस मृतक जीवकी तृप्तिका साधन होता है । देवता लोग जिस श्रद्धाकी आहुति देते हैं, बस यही अपने से किये हुए यज्ञादि, तथा पुत्रादिसे किये हुए श्राद्धादिमें उपयुक्त किये जाते हुए घी, दूध, दही आदि द्रव्योंका जलीय अंश ही होता है । इसीकी अग्नि में आहुति देने पर वह सूक्ष्म रूपसे सूर्यकिरणोंके द्वारा अन्तरिक्षको प्राप्त होकर हमारे लिए वर्षा आदिका कारण बनता है; और पुत्र द्वारा पितृके उद्देश्य से ब्राह्मणरूप वैश्वानर - अग्नि में आहुत होकर वही सूक्ष्म जलांश सूक्ष्म शरीरवाले पितरोंकी तृप्ति तथा मुक्तिमें सहायक बनता है । उसी स्निग्ध वस्तुओं के जलांशको वेदमें ' श्रद्धा ' शब्द से कहा जाता है - जैसे हम पूर्व कह चुके हैं । पूर्वोक्त ब्रह्मसूत्रके प्रकरण ( ३।१।२-३-४ ) में छान्दोग्य उपनिषद्