पञ्चम सुमन · प्रकरण 78
श्रीकृष्ण - जन्माष्टमीव्रत पूर्णतः वैज्ञानिक
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661करके श्रदृष्टसूलक समझ कर ही किये जाते थे । दृष्ट - प्रयोजन सामने आया, तो स्वार्थ - परता भी आई । फिर वह सदाकी वस्तु नहीं रहती थी । पुरुष उसमें उपेक्षा - बुद्धि भी कर लेता था । उससे वह उस कर्मके लाभोंसे वचित भी रह जाता था । तत्तत्कर्मको अदृष्टफल माननेसे वह कर्म सदाकेलिए नियमित समयपर हुआ करता है, उसमें उपेक्षावृत्ति भी नहीं हुआ करती । तब पुरुष उनके लाभोंसे भी वश्चित नहीं रहता । और फिर देशभर में तत्तत्कर्म नियत - दिन तथा समयपर करते रहने से समस्त देशके पुरुषोंकी एकता तथा सधर्मता रहा करती है, तब किसी शत्रुको उस देशपर कुदृष्टि करने का साहस ही नहीं होता ।
अपने जो पर्व हैं, उनमें यदि प्रत्यक्ष- लाभ न दीख पड़े, तब भी उस मूल वस्तुका परित्याग नहीं करना चाहिये । यदि उसमें कालक्रमसे उल्टा - पुल्ट भी पड़ जाय तो समय पर शास्त्र देखकर उसमें सुधार भी हो सकता है; पर उसे छोड़ देने से हमसे प्राचीन भारतकी विस्मृति हो सकती हैं । उसके स्वरूप नष्ट होने पर उसके अस्तित्व के भी प्रच्युत होनेकी आशंका बनी रहती है ।
( ६ ) श्रीकृष्ण - जन्माष्टमीव्रत पूर्णतः वैज्ञानिक ।
यह भगवान् श्रानन्दकन्द- सच्चिदानन्द, श्रीनन्दनन्दनका जन्म- दिवस है । यद्यपि जन्म जीवका हुआ करता है, परमात्माका नहीं, तथापि ' जन्म कर्म च मे दिव्यम् ' ( ४६ ) इस भगवद् - चचनके अनुसार भगवानका जन्म ' दिव्य ' हुआ करता है, जिसे अवतार 662कहा जाता है । जीव कर्मबन्धनसे बद्ध होकर परतंत्रता से शरीर - ग्रहण करता है, पर परमात्मा बिना कर्मबन्धनसे, स्वेच्छा वा स्वतन्त्रतासे शरीर - ग्रहण करता है । जैसे कि — जेलखाने में कैदी किसी कर्मसे जाता है, परन्तु उसी जेलखाने में राजा अपनी इच्छानुसार केवल बद्ध - जीवका हित करनेकेलिए, या वहांकी अव्यवस्था दूर करनेकेलिए जाता है ।
उसी भगवानका जन्म - दिवस होनेसे भगवान्का अनन्य- चित्तसे ( गीता ८।१४, ६।१३-३०,१३ १०,६।२२ ) ध्यान करना पड़ता है । अनन्य - ध्यानकेलिए चाहिये निर्विषय मन, क्योंकि — मन ही बन्ध - मोक्षका कारण हुआ करता है । उपनिषद्का यह वचन पञ्चदशीमें प्रसिद्ध है — ' मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासंगि मोक्षे निर्विषयं मनः ' ( ११।११७ ) अर्थात् विषयासक्त - मन बन्धनका कारण हुआ करता है और निर्विषय मन. मुक्ति देनेवाला हुआ करता है । तब मुक्ति - प्राप्ति तथा मुक्तिके उपाय अनन्य - ध्यानकी प्राप्तिकेलिए मनका निर्विषय - विषयों से रहित होना आवश्यक है । उसका उपाय है उस दिन निराहार रहना ।
आहार करनेसे हमारी इन्द्रियोंपर ऊष्माका दबाव पड़ने से उनमें उत्तेजना - विषयैषरणा उत्पन्न हो जाती है । जब विषयैषणा उत्पन्न हुई, तो भला भगवान्का अनन्य ध्यान कैसे हो? उसकी रक्षार्थ भगवान्ने ही हम पर कृपा करके यह उपाय बताया है कि ' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ' ( २।५१ ) निराहार - पुरुषका 663विषयों से ' छुटकारा हो जाता है । निर्विषयता हुई, तो अनन्य भक्ति भी हो सकती है ।
फिर प्रश्न उपस्थित होता है कि - निराहारता से विषय भले ही छूटें, पर विषयोंका रस तो नहीं छूटता । विषयोंका रस न छूटा, तो फिर भी भगवान्का. ध्यान अनन्य - योगसे कैसे हो? इस पर हम कहते हैं कि - यह कोई आपकी नई बात नहीं है । भगवान् तो इसको पहलेसे ही जानते थे, अतः वे कह गये हैं- ' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं— ( २२५६ )
तब फिर विषय - रस हटनेका उपाय क्या? यह उपाय भी भगवान् स्वयं श्रीमुख से कह गये हैं- ' रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ' ( २।५६ ) अर्थात्- निराहारतारूप व्रत हो, इसके बाद हो भगवान्की बांकी झांकीका दर्शन । तात्पर्य यह है कि - जन्माष्टमीका व्रत भी करो, साथ ही भगवान्का दर्शन भी करो । ऐसा होने से विषय तथा विषय - रस छूटकर हमें अनन्यचित्त बनायेंगे । जब हम अनन्यचित्त हुए, तो इस जगत्का उत्तम लाभ प्राप्त हुआ ।
इधर पूर्णिमा में सूर्य - चन्द्रमा समान रेखामें होते हैं, अमावास्यामें दोनों समान - स्थान में होते हैं, तथा अष्टमी में सूर्य - चन्द्र समान कोणमें होते हैं, उनके आकर्षण - विकर्षणका प्रभाव पृथिवीपर भी हुआ करता है । इसी कारण सबसे अधिक ज्वार - भाटा पूर्णिमामें, सबसे कम श्रमावास्यामें और मध्यम ज्वार - भाटा दोनों अष्टमियोंमें हुआ करता है । जैसे सूर्य - चन्द्रमाके आकर्षण - विकर्षण. का प्रभाव समुद्रपर पड़ता है, वैसे ही प्राणियोंके लहूपर भी पड़ता 664है, क्योंकि लहू भी जलका ही भाग होता है । उक्त - तिथियोंमें स्त्री - पुरुषोंकी वीर्य आदि धातुए विषम होती हैं, अतः इनमें हुई- हुई उत्तेजना हानिकारक होती है, विशेषतः वर्षा ऋतु में, अतः इन तिथियोंमें ब्रह्मचर्य - पूर्वक व्रत आवश्यक हुआ करता है ।
इसी कारण ही अष्टमी आदिमें पहले समय के लोग यज्ञ, व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य आदिका अनुष्ठान करते थे । अष्टमी - आदिसें अध्याय भी इसी कारण हुआ करता था । यह भाद्रपद की कृष्णाष्टमी विशेष है, अतः आधीरात में कृष्ण चन्द्रोदय के अवसर तक इस व्रतका विधान रखा गया है । उस समय दर्शन, भजन, कीर्तन आदिमें लगे रहनेसे पूर्वके कहे दोष हट जाते हैं ।
इन्हीं वैज्ञानिक कारणों से हमें जन्माष्टमीके दिन व्रत तथा भगवानका दर्शन - कीर्तन आदि अवश्य करना चाहिये ।
( ७ ) पितृश्राद्ध पक्ष ।
मृतक - पितरोंका श्राद्ध प्रति - अमावस्याको हुआ करता है, और पार्वण श्राद्ध भाद्रपद - पूर्णिमासे लेकर आश्विनकी अमावस्या तक होता है । पञ्चमहायज्ञान्तर्गत पितृयज्ञ प्रतिदिन होता है । हम ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाके चतुर्थ- पुष्प में ' मृतक - श्राद्धविज्ञान ' पर सुगम - प्रकार द्वारा प्रकाश डाल चुके हैं, पाठक उस पुष्पको अवश्य मंगा लें । उसमें ' मृतकश्राद्ध और ब्राह्मणभोजन, विषय पर सम्यक्तया प्रकाश डाला गया है । यहाँ भिन्न - भिन्न विद्वानोंके आशयको लेकर हम श्राद्धविज्ञान पर प्रकाश डालते हैं-
665[ यह मृतक श्राद्धका
* ( २ ) मृतक
शास्त्रीय विज्ञान दिखाया
| जा रहा है, इसमें श्राद्धकी वास्तविकता सिद्ध होगी
श्राद्धविज्ञान ]
' विघूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति ' शाखके इस प्रमाणसे मृतक- पुरुषोंके सूक्ष्म शरीर चन्द्ररश्मियोंसे आकृष्ट होकर अपने स्थानपर पहुँचनेकेलिए चन्द्रकी ओर आकाशमें चलते हैं; वहाँ ' अन्नमयं हि सोम्य! मनः, आपोमयः प्राणः, तेजोमयी वाक् ' ( छान्दो ० ६२६५ ) इत्यादि उपनिषद्के प्रमाणसे अन्न, जल, और तेजः- प्रधान अन्तः- करण ( मन ) ' चन्द्रमा मनसो जात: ' ( यजुःसं ० ३१।१२ ) इस श्रुतिके अनुसार उसकी समान जाति वाली चन्द्रकी किरणों से आकृष्ट होता है । परन्तु बहुत दूर जानेके कारण मार्गमें वायु और आप आदिके कारण उसका सोम्य अंश क्रमशः क्षीणताको प्राप्त होजाता है । तब चन्द्ररश्मियोंके आकर्षणके मूल कारण सोम - भागकी थोड़ी प्राप्तिके कारण श्राकर्षणशक्तिके ह्राससे वही अन्तःकरण चन्द्र तक न पहुँच पानेसे मार्ग में ही कहीं विलीन हो जावे; वा उसकी अन्य - दिशामें गति हो जाए, जो अनिष्ट है, ऐसी आशङ्का रहा करती है । तब नियत स्थान न मिलनेसे उस अन्तःकरणकी तथा तत्सहचारी सूक्ष्म - शरीरकी अपगतिकी सम्भावना हो सकती है ।
तब जौ के चूर्ण, तथा जल, घृत, दुग्ध, मधु आदिसे सम्पादित पिण्ड सूक्ष्म अंशोंसे उसी प्रकार चन्द्र - किरणोंसे समाकृष्ट होकर उसी मार्गसे ऊपर जाते हुए, बीच - बीच में चढ़ते हुए मृत - प्राणियोंके
पूर्वका श्राद्धविज्ञान चतुर्थपुष्पमें देखें ।
666सूक्ष्म शरीरमें सोमकी सामर्थ्य उत्पन्न करके उन्हें आप्यायित ( सबल ) करके फिर अपेक्षित सोम के अंशको उत्पन्न करते हुए मृतकके उन सूक्ष्म शरीरोंको गन्तव्य स्थान चन्द्रलोक में प्राप्त करा देते हैं - यही मृतककी सुगति होती है; इससे भिन्न गति मृतककी अपगति होती है । मृतक मनुष्य के शरीरावयवों से उत्पन्न हुए निकटके सपिण्ड पुत्र भी उसी मृतककी समान जातिके होते हैं; अतः उन पुत्रादिसे दिये हुए पिण्डों में भी उनके हाथके सम्बन्धसे वैसे ही अतिशय उत्पन्न हो जाते हैं; जिनसे उन पुत्रादिसे दिये हुए पिण्डों से निकले हुए सूक्ष्म - सोमांश चाकर उनके पितरोंके सूक्ष्म - शरीरसे ही सङ्गत होते हैं; दूसरे अपने असम्बद्ध - मृत- पितरोंके सूक्ष्म शरीर से नहीं, क्योंकि — आकर्षणका नियम अपने सजातीय आकर्षण में प्रतिनियत होता है, भिन्न जातीय में नहीं । वर्णसङ्करतामें स्वपितृसे भिन्नके वीर्यसे उत्पत्ति होने पर वह अतिशय नहीं रह जाता; इसलिए अपने मृत पिताको वह अतिशय नहीं प्राप्त होता; तब सोम - सामर्थ्य की सहायता न मिलने से पूर्व कहे अनुसार मृतकके सूक्ष्म - शरीर की गन्तव्य स्थान चन्द्रलोक में गति न हो सकनेसे अन्यत्र अनिष्ट निम्न स्तर नरकादि- प्रेतलोकों में प्राप्ति हो जाने से पतन वा अपगति हो जाती है; इसी बात को भगवद्गीता के शब्दों में इस प्रकार कहा गया है-
' अधर्माभिभवात् कृष्ण! प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय! जायते वर्णसंकरः । संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्य ेषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः । ' ( १४१-४२ ) ।
In English
The Science of Krishna Janmashtami and Ancestral Rites
This text explains the scientific reasoning behind observing the Krishna Janmashtami fast, focusing on how fasting helps control sensory desires. It also discusses the importance of maintaining traditional rituals to preserve cultural identity and touches upon the timing of ancestral rites.
This chapter answers
- Why is krishna janmashtami considered scientific?
- How does fasting help in meditation?
- What is the connection between lunar cycles and human biology?
- Why should one observe brahmacharya on ashtami?
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