पञ्चम सुमन · प्रकरण 40

याचमन - विज्ञान

मुद्रित पृष्ठ 375–378 4 पृष्ठ

375अभिमन्त्रित - जलद्वारा करके — जिससे आसनके नीचे ठहरे कीटाणु दूर हो जावें, क्योंकि पृथिवीपर जल डालनेसे पृथिवीको ऊष्माका उद्वमन होनेसे कीटाणु दूर हो जाते हैं; फिर मन्त्र द्वारा आचमन किया जाता है । उसके फलके विषयमें शतपथ ब्राह्मणमें आया है — ‘ अमेध्यो वै पुरुषो यद् अनृतं वदति, तेन पूतिरन्तरतः । [ मनुष्य असत्य बोलने से भीतर से अशुद्ध है ] मेष्या वै आपः, मेध्यो भूत्वा व्रतमुपायानीति । पवित्रं वै आपः । तस्माद् वै अप उपस्पृशति, [ जल पवित्र होता है, आचमनसे पुरुष पवित्र हो जाता है ] ( १ | १ | १ | १ ) इस प्रकार द्राह्मायरणगृह्यसूत्रमें भी आया है— ' प्रत्युपस्पृश्य शुचिर्भवति ' ( १ | १ | १२ ) इससे आचमन हमारीः पवित्रता करनेवाला सिद्ध हुआ ।

यज्ञमें संस्कृतभाषाके अतिरिक्त हिन्दीभाषा बोलनेका निषेध है । जब जप आदि यज्ञों में निरत ब्राह्मणोंको अनिवार्यतावश हिन्दी में बात करनी पड़ती है; तो यह यज्ञमें विघ्न हो सकता है, क्योंकि अपभाषण से यज्ञमें अपवित्रतावश पराजय हो जाता है । महाभाष्य में लिखा है- ' तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः ' दैत्य लोग यज्ञमें अशुद्ध बोल बैठनेसे हर गये । तब हिन्दीभाषा भी संस्कृतसे अपभ्रष्ट होने से यज्ञमें विघ्नका कारण बन सकती हैं; अतः यज्ञमें असंस्कृत वाणी कभी न बोले; पर अनिवार्यतावश बोलनी पड़े तो वहां अशुद्धता हो जाती है । अशुद्धि - निवारणका उपाय मुनियोंने बताया है कि उस समय आचमन कर ले । आचमनका अभिमन्त्रित जल भीतर पहुँचकर 376ऊष्मा उत्पन्न करके उन अशुद्ध परमाणुओं को जला डालता है; तब पवित्रता स्वतः हो जाती है । यह आचमनमें विज्ञान है ।

आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीने आचमनमें विज्ञान (? ) यह बताया है कि सन्ध्या समय जो गलेमें कफ आ जावे; तो उसे आचमनसे फिर भीतर डाल लो, शुद्धि हो जावेगी । पर यह वात उचित नहीं दीखती । उस कफको वाहर निकाल देनेसे ही शुद्धि होती है, भीतर डाल देनेसे तो अशुद्धि ही होगी । और फिर कफावसिक्तत्व होनेपर तो शास्त्रों में आचमन का निषेध आया है— ' काससिक्को नाचामेत् ' ( गोभिलगृह्यसूत्र १।२।२५ ) ।

' त्रिः पिवेद् अपो गोकर्णवद् हस्तेन, त्रिराचामेद् ' ( ४ | ७ | ३ ) यह बोधायनगृह्यशेषसूत्रमें आचमनको विधि आई है कि हाथको गायके कानकी तरह करके तीन - चार जल पीवे, यही आचमन है । मनुजी ने आचमनके कई भेद लिखे हैं । वे कहते हैं कि - ब्राह्म- तीर्थसे आचमन करे, वा प्राजापत्य वा देवतीर्थसे, परन्तु पित्र्यतीर्थ से आचमन न करे ( २।५८ ) । पित्र्यतीर्थ से पितरों का तर्पण करना पड़ता है; पर आचमन देवकार्य है; अतः पित्र्यतीर्थसे आचमन करनेका निषेध है, अंगुष्ठमूलके नीचे ब्राह्मतीर्थ माना गया है, कनिष्ठा अंगुलिके नीचे प्राजापत्य तीर्थ, अंगुलिके अग्रभागमें देवतीर्थ, अंगुष्ठ और तर्जनीके मध्य में पित्र्यतीर्थ माना गया है ( मनु ० २२५ ९ ) ।

तीन बार आचमनका फल यह कहा है- ' प्रथमं यत् पिबति, 377तेन ऋग्वेदं प्रीणाति । यद् द्वितीयं तेन यजुर्वेदं प्रीणाति, यत् तृतीयं तेन सामवेदं प्रीणाति ' ( वोधायनीयगृह्यशेषसूत्र ४ | ७१४ ) यहां तीन आचमनोंसे तीनों वेदोंकी प्रसन्नता कही है । इसीमें अन्यत्र कहा है — ' अथ अप आचम्य वाह्याभ्यन्तरतः पूतो मेध्यो यज्ञियो भूत्वा ' ( १ । ३ । १ ) यहां आचमनका फल बाहर - भीतरकी पवित्रता कही है । मनुजीने भी लिखा है - ' हृद्गाभिस्तु पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः । वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ' ( २।६२ ) यहां भी आचमनका फल शुद्धि कही है । यहां जो प्रतिवर्ण में आचमनके जलके परिमाण में न्यूनाधिकता कही है कि ब्राह्मण आचमनका इतना जल ले कि वह हृदय तक पहुँचे, क्षत्रियका कण्ठतक पहुँचे इत्यादि; उसका कारण यह है कि जिस वर्णको अधिक शुद्धि अपेक्षित है; उसके जलका परिमाण भी अधिक कहा है । जिस वर्णको बहुत अधिक शुद्धिकी आवश्यकता नहीं होती; उसकेलिए न्यून जलका उपयोग कहा है । इसमें कफकी निवृत्ति प्रयोजन बतानेवाले स्वामी दयानन्दजी से प्रष्टव्य है कि सन्ध्या आदिके समय क्या ब्राह्मण - क्षत्रियादिके कफमें भी तारतम्य होता है? यदि ऐसा है तब तो जन्म से वर्ण व्यवस्था सिद्ध हुई; क्योंकि कफका तारतम्य जन्ममूलक हुआ करता है । नहीं तो ' सन्ध्या - समय कफमें भी तारतम्य होता है ' इसमें क्या युक्ति हो सकती है? यदि प्रतिवर्ण में कफ - तारतम्य नहीं होता, तो मनुजीने वर्णोंका आचमनके जलका भेद कैसे कहा? तब स्वामी दयानन्दसे प्रोक्त गले में ठहरे कफका निवर्तन असङ्गत ही है; उसका तो बाहर 378निकालना ही ठीक है न कि जल- द्वारा उसको भीतर भेजना ।

( २६ ) शिखाबन्धनका विज्ञान ।

इसका रहस्य हम शिखारहस्य में लिख चुके हैं ।

( देखिये पृ ० १०५-१०६ )

( ३० ) प्राणायाम वा समाधिका विज्ञान ।

सन्ध्या में आचमनके बाद गायत्रीमन्त्र पढ़कर जल द्वारा अपना वेष्टन किया जाता है । इससे अपनी कीटाणुओं से रक्षा होती है । क्योंकि वे जलकण जो भूमिपर चारों ओर पड़ते हैं, भूमि में ऊष्मा होनेसे जल पड़नेसे उस ऊष्मामें उद्वमन होनेसे वाष्प उत्पन्न होती है; वह वाष्प कीटाणुओं को दूर कर दिया करती है । फिर प्राणायामका क्रम होता है ।

हिन्दुधर्ममें प्राणायाम वा समाधिके बहुत माहात्म्य सुने जाते हैं । कई लोग उन्हें अर्थवादमात्र मानते हैं; पर ऐसा नहीं है । उसमें यथार्थता है, अर्थवाद वा असत्यता उसमें नहीं । प्रत्येक द्विजाति सन्ध्याकाल में प्राणायाम करता है । प्राणायाम द्वारा अशुद्ध विकारोंको बाहर निकालकर शुद्ध वायु अन्दर घुसाई जाती है । इससे आयु तथा तेज बढ़ता है । जलसे भी वायु सूक्ष्म होती है । शारीरिक बाह्य - अवयवोंकी शुद्धि जल और मट्टीके द्वारा होती है । परन्तु शरीरके अन्तःस्थित सूक्ष्म - अवयवों तक जल नहीं जा सकता; अतः वही शुद्धि बाहरी अक्सिजन गैससे की जाती है । अतः इससे आयु बढ़ती है । वही प्राणायाम बढ़कर समाधि रूपमें आ जाता है ।

In English

The Science of Achamana and Pranayama

This text explains the ritual of achamana (sipping water) and its role in purifying the body internally. It discusses how to use water to remove impurities caused by speaking non-Sanskrit languages during sacrifice and details the specific points on the hand used for different types of purification. It also covers the benefits of pranayama for internal cleansing and longevity.

This chapter answers

  • How to perform achamana ritual?
  • Why is water used in achamana?
  • Difference between brahma tirtha and devatirtha?
  • Benefits of pranayama in sandhya?
  • Rules for purification during sacrifice?

Also written: Yachamana, Vigyana, Yachamana Vigyana, याचमन - विज्ञान

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 375–378 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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