पञ्चम सुमन · प्रकरण 24
प्रातः भूमिवन्दन
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325है । इसीलिए वेदानुसारी पुराणोंने भी ' समुद्रवसने देवि! पर्वतस्तनमण्डिते! विष्णु - पत्नि! नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ' उसे नमस्कार करके उस पर पांव रखनेकी क्षमा चाही है । इससे हम भारत - भूमिके भक्त भी बने रहेंगे, विलायती भूमियोंके प्रेमी
बनेंगे ।
उठते ही पृथिवीपर एकदम पाँव रखना लौकिक दृष्टिसे भी ठीक नहीं, क्योंकि - सारी रात हम खाट पर सोते हैं; उसमें भी शीतकाल में रजाईसे अपने आपको ढककर सोते हैं । इस कारण निद्राके सबब से हमारे अन्दर उष्णता पर्याप्त होती है, विशेषकर पैरोंमें; क्योंकि तब पांव प्रायः ढके रहते हैं; उस समय ठण्डे परमाणुओंसे युक्त भूमिमें एकदम ही पाँव रखना ठीक नहीं; क्योंकि — गर्मी - सर्दी पांवके ही द्वारा हमारे शरीरमें तत्क्षण संक्रांत होती है । अतः कुछ देर तक खाट पर बैठकर निद्रा पूर्णतया दूर करके जब अधिक ऊष्मा हटकर उसका समीभाव हो जाता है, तब पांवका भूमि पर रखना ठीक होता है ।
इसके अतिरिक्त भारतभूमि हमारी माता है, हम उसके पुत्र हैं, जैसे कि अथर्ववेदसंहितामें कहा है- ' माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः ' ( १२।१।१२ ) और भूमि देवतारूप भी है । अतः उस पर पांव रखना उचित नहीं दीखता; पर अनिवार्य होनेसे कुछ समय तक उससे पादस्पर्शकेलिए क्षमा मांगना उचित भी है । ' हम जड़ पृथिवीसे प्रार्थना क्यों करें; तब हमें मूर्तिपूजक बनना पड़ेगा ' ऐसा सोचना अपने आपको वेदानभिज्ञ सिद्ध करना है । अथर्व ० 326के १२ वें काण्डका प्रथमसूक्त ही उसमें पृथिवीसूक्त है; उसमें पृथिवीसे विविध प्रार्थनाएँ की गई हैं । पृथिव्यभिमानी देवता चेतन हुआ करती है; पृथिवीसे प्रार्थना करना उसी चेतन - देवता से प्रार्थना करना है । मूर्ति - पूजक होना भी कुछ बुरा नहीं; क्योंकि— वेदका उस पक्ष पर अनुग्रह है - इस बातको जाननेकेलिए ' श्रीसनातन- धर्मालोक ' चतुर्थ- पुष्पमें ' मूर्तिपूजा - रहस्य ' विषय देखें | वास्तु
क्षमा प्रार्थना करने तक हमारी निद्रा बहुत कुछ दूर हो जाती है; तब तक शयनकालीन शारीरिक ऊष्मा भी यथावस्थित हो जाती है । तब शौचार्थ बाहर जाकर शुद्ध वायुका सेवन करके प्रातः- कालीन शुद्ध वायुसे पवित्र तुषारयुक्त तृणप्रदेशपर, बिना जूता पहने घूमना आंखों के लिए लाभकर हो जाता है, क्योंकि पांवकी निचली नसोंका आंखकी ज्योतिसे विशेष सम्बन्ध होता है । ऐसा करनेसे पीलिया ( पाण्डु ) रोग भी नहीं होता । पर भूमिमें लात मारना ठीक नहीं; क्योंकि—- पांव के तलवों में चोट लगने से अपनी ही भीतरी हानि होती है । इसलिए भूमिपर पांवकी ठोकर मारना पापजनक माना गया है ।
आरम्भ में हमने जो पृथिवीसे क्षमा - प्रार्थना करनेवाला पौराणिक पद्य लिखा है कि- ' समुद्र - वसने देवि! पर्वतस्तनमण्डिते! विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं ' यह पुराणका होनेसे उपहास - योग्य भी नहीं माना जा सकता । इसमें भारतभूमिकी रक्षाकेलिए तरीके से · प्रेरित किया जा रहा है ।
इसमें भारतभूमिका वसन ( वस्त्र ) समुद्रको बताया गया है; 327अर्थात् यदि भारतीयोंने समुद्रको अपने आधिपत्यमें न रखा; तो वह भारतमाताको वस्त्रविहीन नंगा करवा बैठेंगे । यही अब आप देख रहे हैं कि कराचीका समुद्र हमारे हाथमें नहीं है; आज वहां पाकिस्तानका अधिपत्य है; इससे भारतमाताका एकदेश नङ्गा हो रहा है यह स्वयं अनुभवकी बात है । अतः भारतीयताके प्रेमियोंको संघटन करके उस भागपर इस तरीकेसे आधिपत्य कर लेना चाहिये; जिससे हमारी भारतमाताको नग्नता दूर हो । हमारा ' हिन्दु ' नाम भी इसी ' सिन्धु ' के कारण हुआ था । इस बातको जाननेके लिये ' श्रीसनातनधर्मलोक ' चतुर्थ - पुष्पको मँगाकर उसमें ' हिन्दुशब्द की वैदिकता ' देखें |
फिर इस भारतमाताके स्तन पर्वत बताये हैं । माताके स्तन जैसे वालकको दूध देते हैं; वैसे ही हिमालयादि पर्वत भी हमें वर्षा आदि ऋतुएँ, गङ्गा आदि नदियां दे रहे हैं । यदि यह पर्वत भी अभारतीयोंके हाथमें पड़ गये; तो यह अपनी माताका दूसरोंसे कुचग्रहण होना होगा, क्या ऐसी बात सह्य होगी?
' विष्णुपत्नी ' कहने से इस पृथिवीके पति विष्णु भगवान् बताये गये हैं, इससे भारतमाताका सौभाग्यवती होना और हमारा सपितृक होना भी सिद्ध है । इससे भारतीयको नास्तिकताका अबलम्बन न करना चाहिये, किन्तु विष्णु भगवान्का भक्त भी रहना चाहिये; तभी भारतीयता सम्पन्न होगी, यह सूचित हो रहा है । फलतः भूमिपर पांव रखने के समय हमें उससे क्षमा - प्रार्थना सोपपत्तिक है; तभी हम भारतभक्त बन सकते हैं ।
328( ५ ) प्रातः मलसूत्रका त्याग और उसके नियम ।
( क ) सब रोगोंका मूल मल हुआ करता है; और इसके विसर्जनका, युक्त समय प्रातःकाल है । उस समय मलमूत्र त्याग से शरीर स्वस्थ रहता है । यदि प्रातः पहले यही कार्य न करके पुरुष अन्य कार्य में लग जाय; तब उस समय मल - अवतरणकी प्रकृति भी धीरे - धीरे हट जाती है, और मलका दूषित रस रक्त में मिलकर मलको कठोर कर देता है, जिससे सब रोगोंकी जननी. बद्धकोष्ठता ( कब्ज़ ) उत्पन्न हो जाती है । मलका दूषित रस रक्त में मिलने पर रक्तविकार भी हो जाते हैं । रक्तदोष हो जाने पर खुजली, फोड़े आदि हो जाते हैं । शरीर और मुखमें दुर्गन्ध रह जाती है । प्रातः भी यदि हम मल- विसर्जन नहीं करते, तो वह मल भीतर पड़ा रहता है; फिर हम स्नान करने पर भी अशुद्ध रहते हैं । उस अशुद्धावस्थामें सन्ध्यावन्दन आदि ठीक नहीं जंचता । उसके बाद भोजनका क्रम आता है, पेट खाली न होनेसे किया गया वह भोजन रोगोंकी उत्पत्तिका कारण बन जाता है, अतः प्रातः मलमूत्र का त्याग बहुत ठीक होता है । उस समय वेग न होने पर भी जाने से फिर मल त्यागकी उस समय प्रकृति बन जाती है ।
( ख ) मल - त्याग के समय सिर आवृत ( ढका हुआ ) रहना चाहिये । उस समय बोलना और थूकना भी ठीक नहीं; क्योंकि मलके परमाणु मुख- द्वारा भीतर जाकर हानि पहुँचाते हैं । उस समय खाते रहना, वा मुख चलाते रहना भी अच्छा नहीं; क्योंकि वैसा करनेसे पूर्वोक्त हानिके अतिरिक्त शरीर के ऊपरकी स्नायुओंको
In English
Respect for the Earth and Morning Hygiene
This text explains why one should ask the Earth for forgiveness before stepping on it, citing both physical health and spiritual reasons. It also discusses the importance of timely morning excretion to prevent various diseases and maintain bodily purity.
This chapter answers
- Why do hindus pray to the earth before stepping on it?
- Is there a connection between feet and eyesight?
- What are the health benefits of morning bowel movements?
- How does constipation affect the blood?
- Why should one cover their head while defecating?
Also written: Pratah, Bhumivandana, Pratah Bhumivandana, प्रातः भूमिवन्दन