पञ्चम सुमन · प्रकरण 23

प्रातः हस्तदर्शनका विज्ञान

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323भगवान् का स्मरण तथा जप करके गोविन्द को प्राप्त करते हैं । तब ' करपृष्ठे च गोविन्दः ' कहना भी ठीक हुआ ।

संसारके सर्वस्व लक्ष्मी, सरस्वती और गोविन्द जब हाथमें या गये; तो हाथ में बड़ी शक्ति सिद्ध हुई । संसार में यही तो वस्तुएँ अपेक्षित हैं, और चाहिये क्या? ऐसी शक्तिको धारण करनेवाले, हमारी संसार - यात्राके एकमात्र अवलम्ब एवं लक्ष्मी आदिके प्रति- निधि हाथका प्रातःकाल दर्शन शुभकारक ही सिद्ध हुआ; क्योंकि इसी हाथसे ही तो हमने सभी कार्य करने हैं ।

केवल पुराण ही हाथकी महत्ता बताते हों; ऐसा भी नहीं है । वेद भी उस हाथ की महत्ता इससे भी बढ़कर बताते हैं । देखिये- ' अयं मे हस्तो भगवान् अयं मे भगवत्तरः । अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः ' ( ऋ ० १०/६० । १२ ) इस मन्त्रका देवता भी ' हस्त ' है । इसमें हाथको भगवान और अतिशयितसामर्थ्ययुक्त और सब रोगोंका भेषजभूत ( दवाई रूप ) साधन - सम्पन्न स्वीकृत किया है । जो जितनी अधिक शक्तिवाला होगा; उसके हाथमें शक्ति भी उतनी ही अधिक होगी । इसलिए हम जिनकी वन्दना करके उनका आशीर्वाद चाहते हैं; वे भी अपने हाथसे ही हमारे सिरको स्पर्श करके आशीः देते हैं । मैस्मरेजम तथा हिप्नोटिज्म के अभिज्ञ अपने हाथमें शक्ति सम्भृत करके उससे अपने समक्षस्थित पुरुषको जैसा चाहे- नाच नचाते हैं, उठाते हैं — बैठाते हैं । यहाँ तक कि बेहोश भी कर देते हैं । कई योगविद्याविशारद इसी हाथके स्पर्शसे विविध रोगियोंके रोगोंको दूर कर देते हैं । कई अधिक शक्तिवाले महात्मा 324तो मरे हुए को अपने हाथके स्पर्शसे जिला देते हैं । हाथमें शक्ति होनेसे ही विवाह में दूसरेकी लड़कीके हाथको पुरुषके हाथमें दिलवाकर ( पाणिग्रहण कर ) उसे उसकी पत्नी बनवा देते हैं । हाथमें प्रेमकी भी स्थिति होनेसे मित्र मित्रोंके हाथका स्पर्श करते हैं । हाथमें अमृतके भी स्थित होनेसे गुरुओं द्वारा शिष्यको हाथ से मारने पर भी ' सामृतैः पाणिभिर्ध्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः ' यह कथन प्रसिद्ध है । इससे हाथमें हानिजनक शत्रुओं के लिए विष भी सन्निहित है - यह भी प्रतीत होता है । इस प्रकारके हमारे अवलम्बभूत, यजुर्वेद ( बृहदारण्यकोपनिषद् ) के ' सर्वेषां कर्मणां हस्तौ एकायनम् ' ( २ | ४ | ११ ) इन शब्दों में सब कर्मोंके मूल - जिसके न होनेसे हम ' निहत्थे ' कहे जाते हैं - सारी रात्रि के ग्रहनक्षत्रादि के प्रभावसे तथा प्रातःकालिक वायुसे पवित्र उस हाथके दर्शनसे हमारा शुभ होना सोपपत्तिक ही है ।

( ४ ) प्रातः भूमिवन्दन, उस पर उठते ही पांव न रखना ।

प्रातः उठते ही अपनी आश्रयभूत भारतभूमिकी वन्दना करनी श्रेयस्कर हुआ करती है । तभी कहा है- ' जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ' । जन्मभूमिको स्वर्गसे भी बढ़कर माना गया है । इसीलिए वेदने भी उसे नमस्कार करनेका आदेश दिया है- ' शिला भूमिरश्मा पांसुः सा भूमिः संधृता धृता । तस्यै हिरण्यवक्षसे, पृथिव्या अकरं नमः ' ( अथर्व ० १२ १२६ ) । ' नमो मात्रै पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यै ' ( यजु ० ६।२२ ) यहाँ पर दो बार पृथिवी माताकी वन्दुना करके वेदने अपने भक्तोंको उसकी पूजाका आदेश दे दिया

In English

The Importance of Hands and the Earth

This text explains why one should view their hands and the ground upon waking. It argues that hands are a source of power used for healing, performing rituals, and connecting with others, while the earth is a sacred foundation that deserves respect.

This chapter answers

  • Why do hindus look at their hands in the morning?
  • Significance of hands in vedic texts?
  • Why should one bow to the ground upon waking?
  • Importance of bhumi vandana?

Also written: Pratah, Hastadarshanaka, Vigyana, Pratah Hastadarshanaka Vigyana, प्रातः हस्तदर्शनका विज्ञान

मूल ग्रन्थ

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