पञ्चम सुमन · प्रकरण 31
प्रातः स्नानका विज्ञान
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345और उसमें चन्द्रमाका अमृत भी बढ़ता रहता है । यह दोनों ही सूर्योदय से पूर्व स्नानमें मिलते हैं । इसके अतिरिक्त रोम - कूपों से भीतरी मल स्वेद - रूप में निकलता रहता है । वह सूख जानेपर शरीरको मैला कर दिया करता है और वह मैल रोम - छिद्रोंको ढक दिया करता है, जिससे भीतरी मल भीतर ही रह जाता है । फिर बाहरी शुद्ध - वायु उन छिद्रों द्वारा भीतर प्रवेश नहीं कर सकता । ऐसा होने से जहाँ शरीर मैला रहता है; वहाँ भीतरी मलके गन्ध से रोगी भी हो जाता है । जैसे नालीका गन्दा पानी बाहर न निकाला जाए, और उसमें शुद्ध पानी न सींचा जावे तो उस मलसे उत्पन्न कीटाणु जनताको रुग्ण कर दिया करते हैं; वैसे यहाँ पर भी समझा जा सकता है । नित्य स्नान न करनेवाला जब कभी शीतमें स्नान करता है; तब उसे जल हानि भी पहुँचा सकता है ।
वैसे स्नान न करनेकी प्रकृतिवाले पुरुषके पास दुर्गन्धवश कोई बैठ भी नहीं सकता । स्नानसे अङ्ग शुद्ध हो जाते हैं; जैसा कि पहले मनु - वचनसे हम कह चुके हैं । ' शीतकाल में तो शरीरसे पसीना नहीं निकलता; अतः तब स्नान आवश्यक नहीं ' यह भी नहीं सोचना चाहिए । शीतकाल में भी सूक्ष्म अभ्यन्तरिक दूषित वाष्पका उद्गम होता ही रहता है । इसके अतिरिक्त जैसे भोजनके समय भीतर ऊष्मा और शोष होनेपर पानी की अपेक्षा रहती है, इसी कारण प्यास लगती है, वैसे ही शयनादिसे उत्पन्न ऊष्मा भी बाह्य जलकी अपेक्षा करती है । और फिर पलभौतिक शरीर बाह्य जल आदि सजातीय भूतकी प्राप्तिसे आप्यायित हो जाता है: इस 346कारण प्रातः - स्नान शरीरके श्राप्यायनकेलिए अनिवार्य ही है । इसलिए भोजन भी स्नानके बाद ही किया जाता है । पहले कर " लेने पर एक भोजनकी गर्मी, दूसरी शयनकी गर्मी; इससे शरीर हानिको प्राप्त करता है ।
स्नान आरम्भ करता हुआ भारतीय पुरुष ' गंगे! च यमुने! चैव गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धु कावेरि! जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु ' इस मन्त्रको पढ़ता है, यह प्रातः भूगोलका पढ़ना कैसा? यह और कुछ नहीं; यहाँ उसको भारतकी अखण्डता स्मरण करवाई गई है कि - भारतको खण्ड - खण्ड न होने देना । उस जल में वह पूर्वी भारतकी नदी - गङ्गा, यमुना, सरस्वतीको, मध्यभारतकी नदी नर्मदाको, पश्चिमोत्तर भारतकी नदी सिन्धुको; दक्षिण भारतकी नदी कावेरीको याद करता हुआ यह प्रकट कर रहा होता है कि - मैं इस सम्पूर्ण राष्ट्ररूप जलसे स्नान कर रहा हूँ । मेरा यह ग्राम जन्मभूमि नहीं; किन्तु गङ्गासे लेकर गोदावरी तक; सिन्धुसे लेकर कावेरी तक विस्तीर्ण भूभागका मैं अङ्ग हूँ । इससे उसे भारतका भक्त बनाया जा रहा है । अब इसमें सिन्धु नदी हमारे हाथ से निकल गई है; उसको हमने फिर लाना है - यह भाव इसमें निकल रहा है । अस्तु, स्नान करनेसे पूर्व सिरको तथा अङ्गको जलसे स्पृष्ट कर लेना चाहिए, पीछे सिर पर जल - प्रवाह डालें । बिना सिर आदिको थोड़ा जल लगाये एकदम सिर पर जलप्रवाह डालना हानिकारक है । यह न भूलें ।
In English
The Importance of Daily Bathing
This chapter explains the physiological benefits of bathing, such as removing sweat and toxins that block pores. It also describes how reciting mantras naming India's major rivers fosters a sense of national unity and belonging. The text concludes with practical instructions on how to properly wet the body before pouring water over the head.
This chapter answers
- Why is bathing important for health?
- Benefits of bathing in winter?
- Meaning of river mantra during bath?
- How to correctly pour water on head during bath?
Also written: Pratah, Snanaka, Vigyana, Pratah Snanaka Vigyana, प्रातः स्नानका विज्ञान