सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 371–380

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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तेल- नियमका विज्ञान. ३४३ कहा है - ' अपामग्नेश्च संयोगाद् हैमं रौप्यं च निर्वभौ ' ( ५/११३ ) इधर चन्द्रमाका पुत्र होनेसे चन्द्रमाके जलकी शीतलता से भी युक्त है अतः सौम्य - ग्रह प्रसिद्ध है । - तव वह धनोत्पादक हो - इसमें कुछ भी असम्भव नहीं । बृहस्पति विद्याका ग्रह है; इस दिन भी यदि तेल-मालिशमें लगे रहे; तो हानि स्वतः होगी ही । शुक्र में तैलमर्दन में शुक्रमें. उष्णता पहुँचनेसे दुःख पहुँचेगा ही । शनि तेलका प्यासा ग्रह है; इसीलिए शनिग्रह की मूर्ति पर भी तेल डालते हैं । तब शनिके दिन उसका प्रिय तेल लगाने पर वह भी सुख ही देगा, क्योंकि शनिमें शीतलता भी होती है, तभी वह ' मन्द ' होता है । पर हानि पहुँचाने वाले वारोंके दिन भी यदि तैलमर्दन आवश्यक हो; तो — ' अर्के पुष्पं, गुरौ दूर्वा, भूमिपुत्रे रजस्तथा । भार्गवे गोमयं दद्यात् तैलाभ्यङ्गो न दूषितः ' | रविवारको तेल में पुष्प डाल दें; वह उसकी शीतलता कर देगा; ताप नहीं होगा । भौमवार . धूलि, बृहस्पति में दूर्वा और शुक्रमें गोमय डालनेसे फिर सम्भावित हानि नहीं होती । यह भी याद रखनेकी बात है कि यह फल सूक्ष्म होते हैं; यह स्थूलरूपसे नहीं प्रतीत होते । अतः उनमें श्रद्ध न होकर मुनियोंकी बात मान लेनेसे शुभ ही उदर्क होता है । स्नानसे पूर्व तैल के लगानेके समय कानमें तेलको भी डालना कुछ देर तक कान में लिए रहना और फिर उसे निकाल देना शरीरकेलिए बहुत लाभप्रद है । इससे आँखों की ज्योति बढ़ती है । कर्णशूल नहीं होता । कानमें तेल डालना ऐसा है - जैसा कि मशीनके पुर्जों में तेल डालना ।.

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३४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( १२ ) प्रातः स्नानका विज्ञान । ' गुणा दश स्नानशीलं भजन्ते बलं रूपं स्वर - वर्णप्रशुद्धिः । स्पर्शश्च गन्धश्च विशुद्धता च, श्रीः सौकुमार्य प्रवराश्च नार्यः ' । स्नानसे शरीरकी शुद्धि होती है - ' अद्भिर्गात्राणि शुन्यन्ति ' ( मनु ० ५।१०६ ) जलके शरीरपर डालने पर भीतर ऊष्माका उद्वसन होता है; इससे भीतर के वा बाहरके हानिजनक कीटाणु दुग्ध हो जाते हैं । इसीसे रूप, तेज, बल, शौच, आयु, आरोग्य, लोभ-हीनता, दुःस्वप्ननाश, तप, मेधा इन दस गुणोंका लाभ होता है, इसीसे शरीरकी भी कुछ पुष्टि होती रहती है । मन प्रसन्न होता है । स्नानसे शीतकाल में शीत और उष्णकालमें उष्णता दूर होती है । शीतकाल में स्नान न किया जावे; तो सारा दिन सर्दी लगती रहती है । स्नानसे ऊष्मा उत्पन्न होकर उस शीतको शान्त कर देती है । रक्तमें प्रगति होती है । पूर्वोक्त दस गुणोंकी प्राप्तिमें सूर्य - चन्द्रमा भी कारण होते हैं । सारी रात जल चन्द्रमाके अमृत से सिक्त होता रहता है । सूर्योदय के बाद वह अमृत सूर्यसे खींच लिया जाता है । अतः सूर्योदय से पूर्व और प्रातः चार बजेके बाद स्नान करने पर उस अमृतका लाभ होता है । इसके अतिरिक्त सूर्योदयसे पूर्व शीतकाल में बर्फ जमी हुई होती है, उस समय स्नान से शीत नहीं लगता । सूर्योदयमें जमी हुई बर्फ पिघलती है; अतः उस समय शीत खूब लगता है । सारा दिन सूर्यरश्मिके द्वारा जो शक्ति जलमें प्रविष्ट होती है; वह भी रात्रिकी शीतलता के कारण जलके भीतर ही रहा करती है,

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प्रातः स्नानका विज्ञान ३४५ और उसमें चन्द्रमाका अमृत भी बढ़ता रहता है । यह दोनों ही सूर्योदय से पूर्व स्नानमें मिलते हैं । इसके अतिरिक्त रोम - कूपों से भीतरी मल स्वेद - रूप में निकलता रहता है । वह सूख जानेपर शरीरको मैला कर दिया करता है और वह मैल रोम - छिद्रोंको ढक दिया करता है, जिससे भीतरी मल भीतर ही रह जाता है । फिर बाहरी शुद्ध - वायु उन छिद्रों द्वारा भीतर प्रवेश नहीं कर सकता । ऐसा होने से जहाँ शरीर मैला रहता है; वहाँ भीतरी मलके गन्ध से रोगी भी हो जाता है । जैसे नालीका गन्दा पानी बाहर न निकाला जाए, और उसमें शुद्ध पानी न सींचा जावे तो उस मलसे उत्पन्न कीटाणु जनताको रुग्ण कर दिया करते हैं; वैसे यहाँ पर भी समझा जा सकता है । नित्य स्नान न करनेवाला जब कभी शीतमें स्नान करता है; तब उसे जल हानि भी पहुँचा सकता है । वैसे स्नान न करनेकी प्रकृतिवाले पुरुषके पास दुर्गन्धवश कोई बैठ भी नहीं सकता । स्नानसे अङ्ग शुद्ध हो जाते हैं; जैसा कि पहले मनु - वचनसे हम कह चुके हैं । ' शीतकाल में तो शरीरसे पसीना नहीं निकलता; अतः तब स्नान आवश्यक नहीं ' यह भी नहीं सोचना चाहिए । शीतकाल में भी सूक्ष्म अभ्यन्तरिक दूषित वाष्पका उद्गम होता ही रहता है । इसके अतिरिक्त जैसे भोजनके समय भीतर ऊष्मा और शोष होनेपर पानी की अपेक्षा रहती है, इसी कारण प्यास लगती है, वैसे ही शयनादिसे उत्पन्न ऊष्मा भी बाह्य जलकी अपेक्षा करती है । और फिर पलभौतिक शरीर बाह्य जल आदि सजातीय भूतकी प्राप्तिसे आप्यायित हो जाता है: इस

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३४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कारण प्रातः - स्नान शरीरके श्राप्यायनकेलिए अनिवार्य ही है । इसलिए भोजन भी स्नानके बाद ही किया जाता है । पहले कर " लेने पर एक भोजनकी गर्मी, दूसरी शयनकी गर्मी; इससे शरीर हानिको प्राप्त करता है । स्नान आरम्भ करता हुआ भारतीय पुरुष ' गंगे! च यमुने! चैव गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धु कावेरि! जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु ' इस मन्त्रको पढ़ता है, यह प्रातः भूगोलका पढ़ना कैसा? यह और कुछ नहीं; यहाँ उसको भारतकी अखण्डता स्मरण करवाई गई है कि - भारतको खण्ड - खण्ड न होने देना । उस जल में वह पूर्वी भारतकी नदी - गङ्गा, यमुना, सरस्वतीको, मध्यभारतकी नदी नर्मदाको, पश्चिमोत्तर भारतकी नदी सिन्धुको; दक्षिण भारतकी नदी कावेरीको याद करता हुआ यह प्रकट कर रहा होता है कि - मैं इस सम्पूर्ण राष्ट्ररूप जलसे स्नान कर रहा हूँ । मेरा यह ग्राम जन्मभूमि नहीं; किन्तु गङ्गासे लेकर गोदावरी तक; सिन्धुसे लेकर कावेरी तक विस्तीर्ण भूभागका मैं अङ्ग हूँ । इससे उसे भारतका भक्त बनाया जा रहा है । अब इसमें सिन्धु नदी हमारे हाथ से निकल गई है; उसको हमने फिर लाना है - यह भाव इसमें निकल रहा है । अस्तु, स्नान करनेसे पूर्व सिरको तथा अङ्गको जलसे स्पृष्ट कर लेना चाहिए, पीछे सिर पर जल - प्रवाह डालें । बिना सिर आदिको थोड़ा जल लगाये एकदम सिर पर जलप्रवाह डालना हानिकारक है । यह न भूलें ।

पृष्ठ 375

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तीर्थस्थानका विज्ञान ३४७ ( १३ ) तीर्थस्थानका विज्ञान तीर्थ धर्मभूमि हुआ करते हैं । इनमें ऋषि - मुनियोंने विविध यज्ञ किये, तथा अनेक प्रकारकी तपस्याएँ की हैं । विष्णु - भगवान्के अवतारोंने उन्हें पवित्र किया । जैसे सूर्यकान्तमणिके द्वारा सूर्यकी आकाशस्थ किरणें इकट्ठी होकर अग्नि वन जाती हैं; वैसे ही भगवान् की सर्वव्यापक शक्ति इन पवित्र स्थानों में सचित होकर प्रकट होती है; और वह तीर्थ - नदी अपना सेवन वा स्नान करने-वालोंके शरीर - मन बुद्धियोंको कल्याण देनेवाली होती है । सूर्यमें उसकी शक्ति से जल पवित्र रहता है, और सूर्य द्वारा ही वृष्टि हुआ करती है — यह सुप्रसिद्ध है, और वह वृष्टि प्रायः पर्वतों में होती है; क्योंकि वे ऊँचे होते हैं, बादल भी ऊँचे स्थान रहते 1. हैं, और बरसते हैं । इसके अतिरिक्त ऊँचे पर्वतों में शुद्ध एवं लाभदायक ओषधियां भी रहती हैं; और वह जल - प्रवाह उनसे संगत होकर निरन्तर नीचे बहता है । इकट्ठा हुआ - हुआ वह गङ्गा आदि महानदियों के रूपसे हमारे भारतवर्ष में आता है । हमारे प्राचीन मुनियोंने उन उन नदियोंके जलका विश्लेषण करके उन - उनके पुण्यविशेषको अनुभूत करके ही शास्त्रों में उन्हें ' तीर्थ ' नाम दिया; और उनकी प्रशंसा की । गङ्गाजलकी विशेषता इसीलिए ही तो होती है कि वह सूखता नहीं और विकृत नहीं होता । यही विशेषता शरीरको लाभदायक सिद्ध होनेसे स्वयं पुण्य-संचयका कारण बनेगी । इस प्रकार उन मुनियोंने उनके पुण्यप्रदा-तृत्वमें तारतम्य भी रखा है । उन तीर्थों में स्नान करने से पुण्यके साथ

पृष्ठ 376

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३४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ऐहिक लाभोंका सम्भव भी होता है । और फिर उन महानदियों में अनावृत होनेके कारण सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रोंकी पुनीत रश्मियां भी स्पष्ट अपना प्रभाव डालती है; तब उन तीर्थरूप नदियों में आवृत कूपादि - जलकी अपेक्षा अधिक पवित्रता स्वतः सिद्ध है । इस कारण ही हमारे प्राचीन - मुनि तीर्थस्नानको अधिक प्रशंसा करते थे । विशेषतया विशेष पर्वो में तो तीर्थस्नान करना ही चाहिये । वहां प्रातः जाना पड़ता है, तब प्रातःकालका भ्रमण भी साथ हो जानेसे स्वास्थ्य बहुत सुन्दर हो जाता है । ( १४ ) प्रातः ब्राह्मणका दर्शन अशुभ और चाण्डालका दर्शन शुभ क्यों? प्रातःकाल होता है ब्राह्मणका सन्ध्योपासन, जप, तप आदिक काल । साढ़े चार बजे मलत्यागोत्तर स्नान करके उसे सूर्योदय तक सन्ध्या आदिकेलिए बैठ जाना पड़ता है । उस समय उसका बाहर गमन हो ही कैसे सकता है? तब घर से बाहर तिलकशून्य उसके दर्शन होनेपर स्पष्ट प्रतीत हो जाता है कि उसने आवश्यक सन्ध्योपासन, जप आदि कर्म पूर्ण नहीं किया । अतएव तब उसके दर्शनसे, व्यवहारकेलिए दूकान पर जाते हुए बनिये ' इस ब्राह्मणकी भांति हमारा काम भी पूर्ण नहीं होगा; और हमें भी आज कुछ फल न मिलेगा ' यह सोचकर उसका दर्शन अशुभ मानते हैं । पर यदि तिलकधारी ब्राह्मण उस समय उन्हें मिले; तब वे उसे अशुभ नहीं मानते; क्योंकि तिलक उसका इस बातका चिन्ह है कि यह अपनी उपासनाको पूर्ण करके बाहर आया है ।

पृष्ठ 377

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स्नानादिके बाद व्यायाम ३४६ चाण्डाल ( भंगी ) का दर्शन इसलिए श्रेष्ठ माना जाता है कि वह अन्त्यज उस समय अपने कार्य झाड़ने- बुहारने आदिमें लगा हुआ होता है । अपने कार्यको समाप्त करके बल्कि पुरीषके पात्रको अपने सिरपर उठाकर आता हुआ वह शुभ समझा जाता है । वह रहस्य यह है कि जिस प्रकार वह अपने कार्यको पूरा करके लौट रहा है, इस प्रकार हम भी अपने कार्यको पूरा करके और धनको सञ्चित करके वापिस लौटेंगे, इस प्रकार उनके मन की प्रसन्नतासे शुभ होना स्वाभाविक है । ( १५ ) स्नानादिके बाद व्यायाम स्नान - सन्ध्याके बाद ' व्यायाम भी लाभजनक है । स्नानसे पहले व्यायाम करने पर उस समय बहुत देर विश्राम करना पड़ता है; पर स्नान - सन्ध्याके बाद विश्रामकी आवश्यकता नहीं होती । व्यायाम से शरीर विभक्त एवं सुदृढ अवयवों वाला हो जाता है । चर्बी कम हो जाती है । शरीर फुर्तीला हो जाता है । परन्तु व्यायाम भी लघु होना चाहिये । व्यायामके करनेपर अन्नके परिपाकवश पुरुष कभी भी बीमार नहीं होता; यह अनुभवसाक्षिक बात है, इसमें अर्थवाद नहीं है; क्योंकि व्यायाम प्रातःकालीन शुद्ध वायु में होनेपर फेफड़े शुद्ध हो जाते हैं । तिल्ली और जिगर समतामें रहनेसे उनकी वृद्धिस्वरूप होनेवाले रोगोंकी आशङ्का नहीं रह पाती । शरीर स्वस्थ होनेपर सारे पुण्यकार्य होते हैं; अतः व्यायाम का उपयोग भी धर्मजनक ही है - ' शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ' ।

पृष्ठ 378

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३५०. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( १६ ) खड़ाऊँ पहननेका विज्ञान खड़ाऊँ पहिनना भी हिन्दुधर्म में महत्त्वपूर्ण माना जाता है; विशेष करके ब्रह्मचारीगण पहिले इन्हें पहरा करते थे । इसमें भी विज्ञानशून्यता नहीं है । हमारे पूर्वज जिस - जिस वस्तु की प्रशंसा करते थे, और उनका प्रयोग करते थे; उस - उसमें उन्होंने निगूढ विज्ञान सोचा था । बाहर वे उस विज्ञानको इसलिए प्रकट नहीं करते थे कि ऐसा होनेसे उस नियमका महत्त्व हट जाता है । परन्तु आजका समय उन नियमोंका रहस्य जानना चाहता है । इससे विवशतासे हमें भी उसे बताना पड़ता है । नहीं तो यह समय तो उन नियमोंको व्यर्थ और उनके नियामकों को मूर्ख मानने को भी तैयार हो जाता है । खड़ाऊँ इसलिए रखे जाते थे कि - अहिंसाप्रिय हमारे प्राचीन जानते थे कि — अधिकाँश गाय आदिका वध जूतों के कारण भी हुआ करता है; जो आजकल प्रत्यक्ष है । और फिर लोग कोमल चमड़ा चाहते हैं कि पाँव नर्म रहें । इसी कारण जीवित पशुओं की दुर्दशा करके, उन्हें हण्टर मारकर - भगाकर फिर हिंसा की जाती है, जिससे उनका चमड़ा फूल जाए और नर्म हो जाय । इस हिंसा को दूर करनेकेलिए पूर्वजोंने खड़ाऊँ नियमित किये थे । मृतकके चर्मके स्पर्शसे शरीर भी अशुद्ध रहता है- यह वे जानते थे । वे यह भी जानते थे कि – खड़ाऊँपर ठहरे हुए पुरुषके ऊपर बिजली नहीं गिरती । जूता पहरे हुए पुरुष यदि प्रमादसे बिजलीको छुए; तो बिजली उसमें संक्रान्त होकर उसे मार देती है;

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प्रातः पुष्प चयन ३५१. परन्तु खड़ाऊं पहिरे हुए पर उसका उतना प्रभाव नहीं होता । स्नान करके उसे पहिरने वालेके शरीर में पृथिवीकी बिजली भी संक्रान्त नहीं होती; इससे शरीर स्वस्थ रहता है । इसके अतिरिक्त खड़ाऊंकी कीलसे पांवके अंगूठेकी नस दबी रहती है; इससे ब्रह्मचारीको कामोत्तेजना नहीं रहती; परन्तु जूता पहरनेसे पांवके अंगूठे वा पृष्ठकी जो नस दवती है; वह काम बढ़ाती है । स्त्रियोंमें कामशक्ति प्रबल होती है पुरुषकी अपेक्षा; अतः स्त्रियाँ जूता पहनकर प्रतिपल कामातुर होकर उन्मार्गगामिनी न हों; एतदर्थ प्राचीन लोग उनका जूता पहनना अच्छा नहीं समझते थे; और उनके पांव के अंगूठे में चांदी की आंटी और पांवों में चांदी की कड़ियां पहनाते थे, जिससे उनकी काम जनक नस दबी रहे । ( १७ ) सन्ध्या एवं मूर्तिपूजार्थ प्रातः पुष्प - चयनका विज्ञान । सन्ध्या काल में देवपूजनार्थ प्रातः फूल चुने जाते हैं; इससे जहां देवताओंकी वैध पूजा होती है; वहां हमारा लाभ भी हो जाता है । उसमें विज्ञान यह है कि हमें फूल चुनने बगीची में जाना पड़ता है, वहीं तुलसीपत्र तथा दूर्वा आदि भी हम लेते हैं । सारी रात्रि चन्द्रके अमृत तथा तारोंकी किरणों एवं प्रातःकालकी शुद्ध वायु पाकर पुष्प आदि अमृतमय हो जाते हैं; अतः उनके स्पर्शसे शरीरको स्वास्थ्य तथा मनको शक्तिका लाभ हो जाता है; और फिर प्रातःकालकी हरियाली नेत्रोंको विकसित कर देती है, दृष्टि तीव्र रहती है । तुलसी, दूर्वा, बिल्व आदिके पत्तों में मलेरिया आदि रोगोंके दूर करनेमें अद्भुत क्षमता होती है; अतः प्रातः पुष्पोंका

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३५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) चयन बहुत लाभप्रद है । ( १८ ) विविध आसनोंका विज्ञान । सन्ध्योपासनाके समय विविध आसनोंपर बैठना पड़ता है । भगवान् ने गीता में आसन कहा है- ' चैलाजिनकुशोत्तरम् ' ( ६।११ ) नीचे चैल - अर्थात् रेशमी वस्त्र विद्यावे; उसके ऊपर जिन - मृगचर्म बिछावे; और ऊपर कुशासन विछावे । व्याघ्रासन भी बिछाया जाता है । कुशासन तथा रेशमी आसनपर बैठनेसे विद्युत्का प्रभाव नहीं पड़ता । अब भी विद्युत्प्रवाहके प्रभावको रोकने के लिए बिजली की घरमें स्थित तारको रेशमकी तन्तुओंसे ढकना पड़ता है । राखी बान्धनेके समय भी रेशम से बनाये हुए रक्षा - सूत्रका हाथों में बांधना भी इसीलिए है । रेशम पवित्र भी इसीलिए माना जाता है कि उसके वस्त्र पहिरनेसे दूसरेकी विद्युत हममें संक्रान्त नहीं होती । जो छुवाछूतके विचार वाले सर्वसाधारणका स्पर्श अपने साथ नहीं होने देना चाहते कि दूसरेसे अपना स्पर्श न हो जाय और दूसरे को उससे रोकनेमें उसका चित्त भी नहीं दुखाया चाहते अथवा जहां सर्वसाधारणका अपने से स्पर्श अनिवार्य देखते हैं; वे समझदार लोग रेशमी तथा शीतकाल में ऊनी वस्त्र धारण कर लिया करते हैं । इससे उनकी भी इष्टसिद्धि हो जाती है, दूसरेका चित्त भी नहीं दुखता । प्राचीन वैद्य लोगोंके पास जब भंगी भी अपनी नाड़ी दिखाने आया करते थे; तब वे उन्हें निषेध नहीं कर देते थे, किन्तु रेशमी दस्तानेको पहिनकर उनकी नाड़ी देख दिया करते थे, रेशमकी मंहगाईका कारण भी यही है । अस्तु । नीचे रेशमी