पञ्चम सुमन · प्रकरण 32

तीर्थस्थानका विज्ञान

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347( १३ ) तीर्थस्थानका विज्ञान

तीर्थ धर्मभूमि हुआ करते हैं । इनमें ऋषि - मुनियोंने विविध यज्ञ किये, तथा अनेक प्रकारकी तपस्याएँ की हैं । विष्णु - भगवान्के अवतारोंने उन्हें पवित्र किया । जैसे सूर्यकान्तमणिके द्वारा सूर्यकी आकाशस्थ किरणें इकट्ठी होकर अग्नि वन जाती हैं; वैसे ही भगवान् की सर्वव्यापक शक्ति इन पवित्र स्थानों में सचित होकर प्रकट होती है; और वह तीर्थ - नदी अपना सेवन वा स्नान करने- वालोंके शरीर - मन बुद्धियोंको कल्याण देनेवाली होती है ।

सूर्यमें उसकी शक्ति से जल पवित्र रहता है, और सूर्य द्वारा ही वृष्टि हुआ करती है — यह सुप्रसिद्ध है, और वह वृष्टि प्रायः पर्वतों में होती है; क्योंकि वे ऊँचे होते हैं, बादल भी ऊँचे स्थान रहते 1. हैं, और बरसते हैं । इसके अतिरिक्त ऊँचे पर्वतों में शुद्ध एवं लाभदायक ओषधियां भी रहती हैं; और वह जल - प्रवाह उनसे संगत होकर निरन्तर नीचे बहता है । इकट्ठा हुआ - हुआ वह गङ्गा आदि महानदियों के रूपसे हमारे भारतवर्ष में आता है ।

हमारे प्राचीन मुनियोंने उन उन नदियोंके जलका विश्लेषण करके उन - उनके पुण्यविशेषको अनुभूत करके ही शास्त्रों में उन्हें ' तीर्थ ' नाम दिया; और उनकी प्रशंसा की । गङ्गाजलकी विशेषता इसीलिए ही तो होती है कि वह सूखता नहीं और विकृत नहीं होता । यही विशेषता शरीरको लाभदायक सिद्ध होनेसे स्वयं पुण्य- संचयका कारण बनेगी । इस प्रकार उन मुनियोंने उनके पुण्यप्रदा- तृत्वमें तारतम्य भी रखा है । उन तीर्थों में स्नान करने से पुण्यके साथ 348ऐहिक लाभोंका सम्भव भी होता है । और फिर उन महानदियों में अनावृत होनेके कारण सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रोंकी पुनीत रश्मियां भी स्पष्ट अपना प्रभाव डालती है; तब उन तीर्थरूप नदियों में आवृत कूपादि - जलकी अपेक्षा अधिक पवित्रता स्वतः सिद्ध है । इस कारण ही हमारे प्राचीन - मुनि तीर्थस्नानको अधिक प्रशंसा करते थे । विशेषतया विशेष पर्वो में तो तीर्थस्नान करना ही चाहिये । वहां प्रातः जाना पड़ता है, तब प्रातःकालका भ्रमण भी साथ हो जानेसे स्वास्थ्य बहुत सुन्दर हो जाता है ।

( १४ ) प्रातः ब्राह्मणका दर्शन अशुभ और

चाण्डालका दर्शन शुभ क्यों?

प्रातःकाल होता है ब्राह्मणका सन्ध्योपासन, जप, तप आदिक काल । साढ़े चार बजे मलत्यागोत्तर स्नान करके उसे सूर्योदय तक सन्ध्या आदिकेलिए बैठ जाना पड़ता है । उस समय उसका बाहर गमन हो ही कैसे सकता है? तब घर से बाहर तिलकशून्य उसके दर्शन होनेपर स्पष्ट प्रतीत हो जाता है कि उसने आवश्यक सन्ध्योपासन, जप आदि कर्म पूर्ण नहीं किया । अतएव तब उसके दर्शनसे, व्यवहारकेलिए दूकान पर जाते हुए बनिये ' इस ब्राह्मणकी भांति हमारा काम भी पूर्ण नहीं होगा; और हमें भी आज कुछ फल न मिलेगा ' यह सोचकर उसका दर्शन अशुभ मानते हैं । पर यदि तिलकधारी ब्राह्मण उस समय उन्हें मिले; तब वे उसे अशुभ नहीं मानते; क्योंकि तिलक उसका इस बातका चिन्ह है कि यह अपनी उपासनाको पूर्ण करके बाहर आया है ।

In English

The Science of Holy Places

This text explains that holy places (tirthas) are sites where divine power is concentrated through the actions of sages and incarnations. It describes how river water becomes spiritually beneficial through its connection to mountains, medicinal herbs, and celestial rays. The text also discusses why seeing a Brahmin without a tilak in the early morning is considered inauspicious.

This chapter answers

  • What makes a place a tirtha?
  • Why is river water considered holy?
  • Benefits of bathing in a tirtha?
  • Why is seeing a brahmin without a tilak in the morning considered inauspicious?

Also written: Tirthasthanaka, Vigyana, Tirthasthanaka Vigyana, तीर्थस्थानका विज्ञान

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 347–348 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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