पञ्चम सुमन · प्रकरण 30

तेल- नियमका विज्ञान

मुद्रित पृष्ठ 341–344 4 पृष्ठ

341वहांकी नसें बलको प्राप्त होकर नेत्रोंकी ज्योतिको बढ़ाती हैं; कोई भी नेत्र रोग नहीं हो पाता, गर्मी में अांखें आती नहीं । उनमें लालिमा नहीं रहती । पेटमें तेलकी मालिश करनेसे उदरकी वृद्धि नहीं होती, अपान वायु आदि निकलते रहने से शरीर स्वच्छ एवं स्वस्थ रहता है I । पांवों में तेल लगानेपर जूतेसे पैदा हुई पांवों की कठोरता तथा ठोकर लगने से प्राप्त हुई वेदना दूर हो जाती है । पांवोंके तलवेमें तेल लगाने से आंखोंकी ज्योति भी बढ़ती है । तैलमर्दन इन्जैक्शनकी भांति शीघ्र लाभ देनेवाला सिद्ध होता है ।

तेलोंमें सरसोंका तेल प्रायः प्रयुक्त किया जाता है । तिलके तेलकी मालिश करके सद्यः स्नान करनेसे वातकी व्याधि उठ खड़ी होती है । पर सरसों के तेल के प्रयोगमें ऐसी आशंका नहीं रहती । उससे खुजली और दाद आदि त्वचा के रोग भी शान्त हो जाते हैं । उसकी मालिशसे रक्तकी गति भी बढ़ती है । बालोंके काला रखनेकेलिए तथा मस्तिष्कके लाभार्थ आंवलेका तेल बहुत हितकारी होता है; पर वह मैशीनी नहीं होना चाहिये; क्योंकि— मशीनी तेल बालोंको शीघ्र सफेद कर दिया करते हैं, उनमें मट्टीके तेलकी पुट भी होती है । तेल लगाकर स्नान करनेसे शीत भी नहीं लगता, वातदोष भी शान्त रहता है ।

विशेष वारों में जो कि शास्त्रों में तेल लगानेका निषेध मिलता है, उसमें भी रहस्यपूर्णता होती है । उसमें निषेधका कारण उस वारके स्वामी ग्रहकी प्रकृतिका विचार होता है । प्रातःकाल उस वारके ग्रहका प्रभाव रहता है । यदि उष्ण प्रकृतिवाले ग्रहका 342वार है; तो उसका शरीर में पूर्व से ही प्रभाव होने से भीतरी ऊष्मा केलिए किया हुआ तैल प्रयोग हानि - जनक ही होगा । तथापि यदि उसका प्रयोग आवश्यक हो; तो उस समय हमारे दूरदर्शी मुनियों ने पुष्प, दूर्वा आदिके प्रयोगसे उस प्रभावका दूर होना बताया है । वैज्ञानिक हमारे पूर्वजोंने अपने तपोवलमूलक अनुभवों से प्रत्येक वस्तुका विश्लेषण करके उसकी प्रकृतिका परिचय प्राप्त कर लिया था, और उसे अपनी स्मृतियोंमें लेखारूढ कर डाला था; अतः इसमें वैज्ञानिकता ही है । उसमें उपहास करना अपनी बुद्धिका पातदर्शित्व प्रकाशित करना है ।

वे श्लोक संग्रहग्रन्थों में इस प्रकार प्रसिद्ध हैं- ' तैलाभ्यंगे रखौ तापः, सोमे शोभा, कुजे मृतिः । बुधे धनं, गुरौ हानि:, शुक्रे दुःखं, शनौ सुखम् ' रविवार तेल मालिश करने पर ताप होता है । रवि भी उष्ण है, तेल - मालिश भी; उसका परिणाम ताप स्वाभाविक है | सोम ( चन्द्र ) स्वयं शोभित होता है; अतः उस दिन तैलमर्दनमें भी शोभा बताई गई है । भौम ग्रह अग्निरूप है; और क्रूर है; अतः रक्त भी है । इधर उसकी ऊष्मा, इधर तैलमर्दनकी ऊष्मा; यह दोनों मिलकर मृति ( मृत्यु ) का कारण बन सकती हैं । मृत्यु आठ प्रकारकी होती है; उसमें कष्ट भी एक मृत्यु है । बुध बुद्धि देकर धन - प्राप्तिमें सहायक होता है; तब उस दिनकी तैल - मालिश होनेसे पुरुष पुरुषार्थी होकर धनप्राप्ति कर सकता है । अथवा बुधको अग्नि- स्वरूप माना गया है; अतः उसका मन्त्र भी अग्नि- देवतावाला प्रसिद्ध है । अग्नि सुवर्णका उत्पादक है, जैसा कि मनुस्मृतिमें भी 343कहा है - ' अपामग्नेश्च संयोगाद् हैमं रौप्यं च निर्वभौ ' ( ५/११३ ) इधर चन्द्रमाका पुत्र होनेसे चन्द्रमाके जलकी शीतलता से भी युक्त है अतः सौम्य - ग्रह प्रसिद्ध है । - तव वह धनोत्पादक हो - इसमें कुछ भी असम्भव नहीं । बृहस्पति विद्याका ग्रह है; इस दिन भी यदि तेल- मालिशमें लगे रहे; तो हानि स्वतः होगी ही । शुक्र में तैलमर्दन में शुक्रमें. उष्णता पहुँचनेसे दुःख पहुँचेगा ही । शनि तेलका प्यासा ग्रह है; इसीलिए शनिग्रह की मूर्ति पर भी तेल डालते हैं । तब शनिके दिन उसका प्रिय तेल लगाने पर वह भी सुख ही देगा, क्योंकि शनिमें शीतलता भी होती है, तभी वह ' मन्द ' होता है ।

पर हानि पहुँचाने वाले वारोंके दिन भी यदि तैलमर्दन आवश्यक हो; तो — ' अर्के पुष्पं, गुरौ दूर्वा, भूमिपुत्रे रजस्तथा । भार्गवे गोमयं दद्यात् तैलाभ्यङ्गो न दूषितः ' | रविवारको तेल में पुष्प डाल दें; वह उसकी शीतलता कर देगा; ताप नहीं होगा । भौमवार . धूलि, बृहस्पति में दूर्वा और शुक्रमें गोमय डालनेसे फिर सम्भावित हानि नहीं होती । यह भी याद रखनेकी बात है कि यह फल सूक्ष्म होते हैं; यह स्थूलरूपसे नहीं प्रतीत होते । अतः उनमें

श्रद्ध न होकर मुनियोंकी बात मान लेनेसे शुभ ही उदर्क होता है । स्नानसे पूर्व तैल के लगानेके समय कानमें तेलको भी डालना कुछ देर तक कान में लिए रहना और फिर उसे निकाल देना शरीरकेलिए बहुत लाभप्रद है । इससे आँखों की ज्योति बढ़ती है । कर्णशूल नहीं होता । कानमें तेल डालना ऐसा है - जैसा कि मशीनके

344( १२ ) प्रातः स्नानका विज्ञान ।

' गुणा दश स्नानशीलं भजन्ते बलं रूपं स्वर - वर्णप्रशुद्धिः । स्पर्शश्च गन्धश्च विशुद्धता च, श्रीः सौकुमार्य प्रवराश्च नार्यः ' ।

स्नानसे शरीरकी शुद्धि होती है - ' अद्भिर्गात्राणि शुन्यन्ति ' ( मनु ० ५।१०६ ) जलके शरीरपर डालने पर भीतर ऊष्माका उद्वसन होता है; इससे भीतर के वा बाहरके हानिजनक कीटाणु दुग्ध हो जाते हैं । इसीसे रूप, तेज, बल, शौच, आयु, आरोग्य, लोभ- हीनता, दुःस्वप्ननाश, तप, मेधा इन दस गुणोंका लाभ होता है, इसीसे शरीरकी भी कुछ पुष्टि होती रहती है । मन प्रसन्न होता है । स्नानसे शीतकाल में शीत और उष्णकालमें उष्णता दूर होती है । शीतकाल में स्नान न किया जावे; तो सारा दिन सर्दी लगती रहती है । स्नानसे ऊष्मा उत्पन्न होकर उस शीतको शान्त कर देती है । रक्तमें प्रगति होती है । पूर्वोक्त दस गुणोंकी प्राप्तिमें सूर्य - चन्द्रमा भी कारण होते हैं । सारी रात जल चन्द्रमाके अमृत से सिक्त होता रहता है । सूर्योदय के बाद वह अमृत सूर्यसे खींच लिया जाता है । अतः सूर्योदय से पूर्व और प्रातः चार बजेके बाद स्नान करने पर उस अमृतका लाभ होता है । इसके अतिरिक्त सूर्योदयसे पूर्व शीतकाल में बर्फ जमी हुई होती है, उस समय स्नान से शीत नहीं लगता । सूर्योदयमें जमी हुई बर्फ पिघलती है; अतः उस समय शीत खूब लगता है ।

सारा दिन सूर्यरश्मिके द्वारा जो शक्ति जलमें प्रविष्ट होती है; वह भी रात्रिकी शीतलता के कारण जलके भीतर ही रहा करती है,

In English

The Science of Morning Bath and Oil Massage

This text explains the physical and astrological benefits of oil massage and bathing. It details how different oils affect the body and why certain days are considered unfavorable for oil application based on planetary influences.

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Also written: Tela, Niyamaka, Vigyana, Tela Niyamaka Vigyana, तेल- नियमका विज्ञान

मूल ग्रन्थ

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