सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 831–840

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 831–840

पृष्ठ 831

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श्रीमहीधरा अर्थ ८०३ ' क्षकामा देवाः प्रत्यक्षविद्विषः ' ( शतपथ ०७।५।१।२२ ) परोक्षवाद देवता एवं ऋषि - मुनियोंको बहुत प्रिय होता है । वेद में भी तो यही तरीका है । देखिये –'पिता दुहितुर्गर्भमाधात् ' ( ऋ ० १।१६४ । ३३ ) ' जार आ भगम् ' ( ऋ ० १०।११।६ ) ' वीर्यं मयि घेहि ' ( यजुः १६।६ ) ‘ वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( यजुः २३।२० ) ' मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसु-र्जारः शृणोतु नः ' ( ऋ ० ६ ५५ ५ ) दिधिषु - दूसरे पतिको कहते हैं, ( माँका दूसरा पति ) ' सुयभ्या कन्या कल्याणी ' ( अथर्व ० २०।१२८ । ६ ) ' योनिरुलूखलं शिश्नं मुसलम् ' ( शत ० ७१५ | १ | ३८ ) ' यदा स्थूलेन पससाऽणौ मुष्कौ उपावधीत् ' ( अथर्व ० २० । १३६।२ ) इत्यादि । क्या. यह बाहर से उद्वेजक शब्द नहीं?? फिर तन्त्रग्रन्थों वा महीधरभाष्य पर आक्षेप क्यों? यह वाममार्ग जितेन्द्रियोंके लिए कहा गया है, विषय -लोलुपोंके -लिए नहीं । जैसे कि- ' अयं सर्वोत्तमो मार्गः शिवोक्तः सर्वसिद्धिदः । जितेन्द्रियस्य सुलभो नान्यस्यानन्तजन्मभिः ' ( पुरश्चर्यार्णव ) ' परद्रव्येषु योऽन्धश्च परस्त्रीषु नपुंसकः । परापवादे यो मूकः सर्वदा विजितेन्द्रियः । तस्यैव ब्राह्मणस्यात्र वामे ( वाममार्गे ) स्यादधिकारिता ' । तब बिना सोचे - विचारे वाममार्गकी भी निन्दा फैला देना एक अक्षम्य अपराध है । इसलिए ' भावचूडामणि ' नामक तन्त्रग्रन्थ में लिखा है कि तन्त्र तिगूढ हैं । ' तन्त्राणामतिगूढत्वात् तद्भावोप्यतिगोपितः । ' ब्राह्मणो वेदशास्त्रार्थ - तत्त्वज्ञो बुद्धिमान् वशी । गूढतन्त्रार्थभावस्य निर्मध्योद्धरणे क्षमः ' अर्थात् तन्त्रशास्त्रका ज्ञान वेदशास्त्रार्थज्ञ विद्वान् ब्राह्मण ही कर सकता है, आपाततोदर्शी नहीं ।

पृष्ठ 832

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६०४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यही आक्षिप्त वाममार्गका श्लोक ही देखिये- ' मातृयोनिं परित्यज्य विहरेत् सर्वयोनिषु ' ( स ० प्र ० ) यहां भाव था कि मातृ-' वंशकी लड़की से विवाह न करे, अन्य वंशवालीका उतना विचार न करे; पर इस पद्यपर बहुत उपहास किया जाता है, देखिये स ० प्र ० । इस मार्गमें भग - लिङ्गकी पूजा गौरीशङ्करकी पूजा इष्ट है । जो इस मार्ग में कई उद्वेजक बातें चालू हो गई हैं, वह सद्गुरु-द्वारा ज्ञान न प्राप्त करनेके ही कारण हैं । पर विद्वान्का कर्त्तव्य है कि उसके अन्तस्तल में घुसकर उसका तत्त्व जाने । आपाततः देखकर उसपर उपहास न करे । ( १८ ) यदि आक्षेप्ताकी आपात दृष्टि में यही वाममार्ग है; तो वह • अपने सम्प्रदायको भी ' वाममार्ग ' बना देगा | आक्षेप्ताने लिखा है - ' जिन नीच स्त्रियों को छूना नहीं [ लिखा ]; उनको वासमार्गियोंने अतिपवित्र माना है । जैसे — शास्त्रों में रजस्वला [ चाण्डाली, चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी ] आदि स्त्रियोंके स्पर्शका निषेध है; उनको वाममार्गियोंने अतिपवित्र माना है, ( स ० प्र ० ११ पृ ० १७७ ) इस प्रकार आक्षेप्ताका सम्प्रदाय भी चाण्डाल आदि से स्पर्श मानता है । ' चाण्डाल ' का अर्थ क्षेप्ताने अपने ग्रन्थों में ' भंगी ' माना है; तब चाण्डाल आदिका स्पर्श करनेवाले याक्षेप्ता के अनुयायी भी वाममार्गी बन जाएँगे । ( ख ) और कहा है – जब भैरवीचक्र हो; तब उसमें ब्राह्मणसे लेकर चाण्डाल - पर्यन्तका नाम द्विज होता है ' ( पृ ० १७८ ) इस प्रकार जब इनका ' शुद्धिचक्र ' चलता है; तब ' अब्दुलगफूर ' आदि भी ' धर्मपाल शर्मा ' बन जाते हैं; उस चक्रसे

पृष्ठ 833

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श्रीमहीधरका अ पृथक् होनेपर फिर मुसलमान वा भङ्गी वन जाते हैं । ( ग ) ' अहं भैरवः, त्वं भैरवी, आवयोरस्तु सङ्गमः ' कहकर चाहे कोई पुरुष हो, वा स्त्री हो, समागम करने में दोष नहीं मानते, ( स ० प्र ० ) इस प्रकार वे ' नियोग ' के आवरण में किसी भी स्त्री-पुरुषके समागम में दोष नहीं मानते । ( घ ) वहीं वाममार्गियोंका अभक्ष्य भक्षण माना है । आक्षेप्ताने चाण्डाल आदि तथाकथित -नीचोंका भोजन निषिद्ध कर रखा है । जैसे कि - ' ब्राह्मणादि उत्तम - वर्णोंके हाथका खाना, और चाण्डालादि नीच भङ्गी - चमार आदिका न खाना ' ( स ० प्र ० १० पृ ० १६६ ) पर आक्षेप्ता के सम्प्रदायमें इनका भोजन किया जाता है - यह ' अभक्ष्यभक्षण ' है । ( ङ ) इस प्रकार ' अप्राप्ताम् ' ( ८ ) इस मनुपद्यका ' अप्राप्त-विवाहकालाम्, द्वादशवर्षेभ्योपि न्यूनाम् ' यह अर्थ था; उसका सं ० वि ० में ' माताकी छे पीढ़ीके भीतर भी विवाह ' ( पृ ० १२७ ) अर्थ करके भगिनीसे समागम, और ' इमं ते उपस्थं मधुना स सृजामि प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयम् ' इस मन्त्रसे स्त्रीके उपस्थको मन्त्र- द्वारा मधुसंयुक्त अभिप्रेत करके अपनी वाममार्गिता सिद्ध कर दी गई है । पर आक्षेप्ताके भाष्य की कसौटी शतपथ ब्राह्मणके अनुसार अर्थ करनेवाले श्रीमहीधराचार्यपर वाममार्गिताका आक्षेप कैसे हो सकता है? क्या ' शतपथ ब्राह्मण ' वाममार्गियों का ग्रन्थ है? चाहिये तो यह था कि महीधरभाष्यका वास्तविक अर्थ बताया जाता; जैसे कि हम पूर्व निर्देश दे चुके हैं; परन्तु इससे विपरीत श्रीमहीधरको शतपथसे विरुद्ध अर्थ करनेवाला लिख दिया!!! परन्तु

पृष्ठ 834

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६०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) श्रीमहीधराचार्यने शतपथके अनुसार जो शब्द लिखे थे; उन शब्दोंको अपने ही प्रकाशित शतपथमें या तो देखा नहीं जाता, या देखकर भी उन्हें छिपा दिया जाता है । हमने शतपथका वह पाठ लिख दिया है, और उसका आशय भी बता दिया है । वहां मृतक - थश्वके साथ समागमका कुछ भी गन्ध नहीं है, घतः अव श्रीमहीधराचार्यका कुछ भी दोष नहीं रहा, और कुछ भी तथाकथित अश्लीलता नहीं रही । अब उस पाठको प्रक्षिप्त वा वेदविरुद्ध बताना अपनी दुर्बलताका प्रकाशन होगा । शेष मन्त्रोंका अर्थ श्री पं ० भीमसेनजी - कृत ' आश्वमेधिकमन्त्रमीमांसा ' वा पं ० ज्वालाप्रसादजीके यजुर्वेदभाष्य में देखा जा सकता है । याज्ञिक- पश्वालम्भपर हम अन्य पुष्प में लिखेंगे, पर अश्वमेधादि कलिवर्जित हैं - यह जान रखना चाहिये । विद्वानोंको चाहिये कि इस प्रकार के भ्रमोंको साधारण जनता से ' हटवा दें । यह निबन्ध श्रीगणेशजीके ' गणानां त्वा ' इस प्रसिद्ध-मन्त्रके प्रसङ्गसे हमें आरम्भ में ' श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ' के आगे देना चाहिये था; पर कारणवश वहां इसे न देकर पूर्वप्रतिज्ञानुसार ' गणेशचतुर्थी ' के प्रकरण में दिया है । फलतः श्रीगणेश वैदिक - देवता हैं और उनका उक्त मन्त्र ठीक है, उसके अर्थ में कोई अश्लीलता वा लज्जास्पदता नहीं । श्रागे ' संकट - गणेश चतुर्थी ' पर लिखा जायगा । * पृ ० ७६३ पं ० १४ में ' गर्भ ' के स्थान ' गभ ' पढ़ें । पृ ० ६२२ में ' मधे चन्द्रमसा युक्ते सिंहे चाभ्युदिते गुरौ ' ( १।१२२।१८ ) ‘ कल्याण’से प्रकाशित - महाभारत में सिंह राशिका नाम प्रत्यक्ष है । पृ ० ७३४ पं ०२ में ' पापिनि ' के स्थानमें ' पाणिनि ' पढ़ें ।

पृष्ठ 835

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संकटनाशन - गणेशचतुर्थी ६०७ ( १६ ) संकटनाशन - गणेशचतुर्थी । चार गणेश चतुर्थियों में हम पहले आदिमका वर्णन कर चुके हैं; यह अन्तिमका वर्णन है । इसे संकट नाशनी कहते हैं - यह माघकृष्ण चतुर्थी में आती है और बहुत प्रसिद्ध है । इसकी कथा इस रूपसे प्रसिद्ध है किं- पार्वतीने गणेशको अपने शरीर के मलसे बनाया था; उसमें जीव प्रतिष्ठित कर दिया था । स्वयं अन्दर स्नान करने बैठी; और उसे बाहर बैठा दिया; और उसे किसीको अन्दर न आने देनेकी आज्ञा दे दी । महादेव जब आये; और अन्दर जाने लगे; तो उसने रोका; पर मुखसे कुछ नहीं कहा । तो महादेवजीने उसे अजनवी तथा अपनेको रोकते देख उसका सिर त्रिशूल से उड़ा दिया और भीतर चले गये । पार्वतीने अपना कोप - प्रदर्शन किया । महादेवजीने सब वृत्त कह सुनाया । पार्वती बोली - वह तो मेरा लड़का था; उसका सिर उससे जोड़कर उसे जीवित कर दीजिये; नहीं तो मैं अन्न जल -ग्रहण न करूंगी । महादेवजी ने सर्वत्र ढूढ डाला; पर उन्हें वह सिर न मिला । फिर एक दिव्य हाथी आ रहा था; उसका सिर काट कर उस कबन्धपर जोड़ दिया । पार्वतीने कहा कि यह आपने क्या किया? विचित्र आकृति बना दी । उन्होंने कहा कि - यह एकदन्त, गजबदन गणेशजी होंगे । सब कार्यों में पहले इन्हींकी पूजा होगी । हम दोनोंके विवाह में भी पहले इन्हीं की पूजा हुई थी; यह उनका दूसरा अवतार है, दूसरा संस्करण है । हमारे पूर्वके विवाह में इनकी पूजा नहीं हुई, तत्फल - स्वरूप वह विवाह असफल

पृष्ठ 836

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) होगया, और तुम सतीरूपमें पिता द्वारा अपमानित होकर सती होगई । वह सिर जो गणेशजीका उड़ गया था- - कहते हैं, वह चतुर्थीके चन्द्रमाके पृष्ठभाग में पहुँच गया था; अतः न दीखा । इसलिए उस दिन चन्द्रमाका दर्शन करके उसे अर्घ्यजल देते हैं । फिर गणेश - चतुर्थीव्रतका उद्यापन करते हैं । इस कथा में कही हुई गणेशोत्पत्ति में कई लोग शंकाएं करते हैं; वह सब उनके अल्पश्रुतत्व के कारण है । संक्षेपमें उत्तर यह है कि –पञ्चभूतोंके मिश्रण - विशेष से उसमें जीव प्रतिष्ठित हो जाता है— इस विषय में बिच्छू -आदिकी उत्पत्ति देख लीजिये; और फिर देवताओं में योनिजता न होनेसे उनमें पृथिवी भूतकी अपेक्षा तेज आदि भूतोंकी प्रधानता होती है; अतः सिर कटने पर भी मृत्यु नहीं होती । जरासन्धके भी शरीरकी दो फांकोंको सर्जरी ( जरा - राक्षसी ) द्वारा जोड़नेपर उसमें रक्तप्रवाह जारी होकर जीवका प्राकट्य होगया था । उक्त कथामें शिरः सन्धानमें भी उक्त सर्जरी जानी जा सकती है । वर्तमान- विज्ञान अभी इधर अभ्यास तो कर रहा है; कदाचित् इधर सफल हो जाए । यहां दिव्यतावश ऐसी सब शंकाएं समाहित हो जाती हैं । सिर कटनेपर भी जन्मतः अमृत पिये होनेसे देवता मरते नहीं । इसमें राहु - केतु याद रख लेने चाहिएँ । दिव्यता - वश ही गजशिरः -सन्धान से कोई वेमेल नहीं हुआ । इनके वाहन मूषक केलिए इस ग्रन्थका ५२-५३ पृष्ठ देख लेना चाहिए । अब अग्रिम - निबन्ध में गणेशजीके १२ नामोंपर राजनीतिक दृष्टिकोण उपस्थित किया जायगा ।

पृष्ठ 837

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गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय ( २० ) गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय । ‘ गणेश'का सब स्थानोंमें तथा सबसे पूर्व पूजन किया जाता है । वेदमें प्रार्थनापूर्वक उसे कहा जाता है - हे गणपति - गणनायक! तुम गणोंमें ठीक - ठीक प्रतिष्ठित होवो । तुम बहुत मेधावी हो । तुम्हारे बिना कोई भी कार्य नहीं किया जाता ' ( ऋ ० १०।११२।६ ) ऐसे गणपति गणेशका राजनीतिक - स्वरूपभी जानना आवश्यक है । वैसे तो ' गणेश पुराण ' में ' गणेश सहस्रनाम ' में गणेशके सहस्र नाम कहे गये हैं, और वे सब राजनीतिक- रहस्यपूर्ण हैं; गणनायकके स्वरूपको परिचायित करने में अद्भुत क्षमता रखते हैं; तथापि गणेशके तीन प्रकारके बारह नाम बहुत प्रसिद्ध हैं । नामों से ही उसके कार्योंका परिचय हो सकता है । पुराणोंके अनुसार पहले बारह नाम यह हैं— " सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः । धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेत् शृणुयादपि । विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा 1 । संग्रामे सङ्कटे चैव विघ्न-स्तस्य न जायते " । यहां पर गणेशके सुमुख १, एकदन्त २, कपिल ३, गजकर्णक ४, लम्बोदर ५, विकट ६, विघ्ननाश ७, विनायक ८, धूम्रकेतु ६, गणाध्यक्ष १०, भालचन्द्र ११, गजानन १२ यह बारह नाम आये हैं । इन नामोंके अतिरिक्त भी गणेशके बारह नाम पुराणादिमें आते हैं । वे यह हैं - ' वक्रतुण्ड! महाकाय! सूर्यकोटिसमप्रभ! अविघ्नं कुरु मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा । ' ' गणेश्वरं विघ्नविनाशनं च,

पृष्ठ 838

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८१० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) लम्बोदरं मोदक - वल्लभं च । सुरासुरैर्वन्दितपूजितं च, गणेश्वरं शरणमहं प्रपद्ये । ' ‘ गजाननं भूतगणाधिसेवितं, कपित्थजम्बूफल-चारुभक्षणम् । उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर-मान्तपंकजम् ' । यहाँपर पूर्व - नामोंके अतिरिक्त गणेशके १ वक्रतुण्ड, २ महाकाय, ३ सूर्यकोटिसमप्रभ, ४ गणेश्वर, ५ विघ्नविनाशन, ६ मोदकवल्लभ, ७ सुरासुरवन्दित - पूजित, भूतगणाधिसेवित, ६ चारुभक्षण, १० उमासुत, ११ शोकविनाशकारक, १२ आत्त-पंकज - यह बारह नवीन नाम आये हैं । यह गणेशके नाम पुराणोंके आ चुके । अब वेदानुगृहीत ' गणेश पुराण ( उपासना खण्ड ) स्थित कई गणेशके नाम भी संगृहीत किये जाते हैं । ' गणेश पुराण ' के उपासना - खण्ड में गणेशसहस्रनामों में गणेशके निम्न वैदिक - नाम आये हैं- ' कविं कवीनामृषभो ब्रह्म ब्रह्मणस्पतिः । ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिः प्रियपतिः प्रियः ॥ ( ४६।१४-१५ ) ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः ' ( १०२ ) इसमें ' गणपति ' के १ कवि, २ ज्येष्ठराज, ३ ब्रह्मणस्पति, ४ बृहस्पति यह नाम आये हैं । कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयारण्यक ( १०1१ ) में तथा ' मैत्रायणी-' यजुर्वेदसंहिता ' ( २२६ | १ | ६ ) में गणेश के ८ तत्पुरुष, ६ वक्रतुण्ड, १० दन्ती, ११ कराट, १२ हस्तिमुख - यह नाम आये हैं । * यदि ' विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ' पाठ हो तो वह ' उमासुतं ' का विशेषण होगा; उसका अर्थ होगा - ' विघ्नेश्वरभूते पादपङ्कजे यस्य सः, तम् ।

पृष्ठ 839

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गणेश एवं गणनायकत्रे स्वरूपका परिचय ‘ गणेशाथर्वशीर्षमें ‘ एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् । अभयं वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ' यह नाम आये हैं । ' बोधायनगृह्य-शेषसूत्र ' में— ' विघ्न! विघ्नेश्वरागच्छ विघ्नेत्येव नमस्कृत! ' अविघ्नाय भवान् सम्यक् सदास्माकं भव प्रभो! ' ( ३।१०।२ ) यहां गणेशके विघ्न तथा विघ्नेश्वर यह नाम आये हैं । इनमें कई पूर्व आ चुके हैं । इनमें हमने १ मूषकवाहन, २ ब्रह्मणस्पति, ३ कवि, ४ ज्येष्ठराज, ५ बृहस्पति, ६ तत्पुरुष, ७ कराट, प्रियपति, ६ निधिपति, १० वसु अथवा वरद, ११ चतुर्भुज, १२ विघ्नेश्वर अथवा स्वस्तिक यह वारह नाम चुन लिये हैं । इन नामोंसे पूर्ण ' गणेश ' बनता है । नामोंसे कार्योंका परिचय होता है - ' यथा नाम तथा गुणः ' । यह पूर्व कहा जा चुका है कि - इन नामोंके पठन, श्रवण वा अवधारण से सभी विघ्न दूर हो जाते हैं । गणेशका मुख्य - स्वरूप गजानन होना, एकदन्त तथा लम्बोदर होना है । चूहा इनका वाहन होता है । गणेश वा गणपति गणनायकको कहते हैं । गण संघको कहते हैं । संघका नायक कैसा होना चाहिये - गणपति गणेशके स्वरूप से तथा नामों से इसका परिचय प्राप्त हो जाता है । इनका राज-नीतिक स्वरूप इस प्रकार है-१ सुमुखः -- गणनायकको सम्पत्ति तथा विपत्तिमें ' सुमुख ' रहना चाहिये, हर्ष- शोकमें एक रूप ' सुमुख ' रहे । मुखके द्वारा हर्ष - शोकको प्रकट न होने दे । इसीसे गणनायक शत्रुओंकेलिए ' विकट ' सिद्ध होता है, शत्रु उससे प्रभावित होते हैं, अपनी

पृष्ठ 840

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मे १२ श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) कार्यवाहियोंको उसपर निष्फल होता हुआ देखकर भाग खड़े होते हैं । यदि शत्रुओंकी कार्यवाहियों से गणनायकके मुखपर जरा भी खिन्नता - विचलितता दिखाई पड़ती है; तो शत्रु अपनी कार्यवाहियों की सफलता समझ कर प्रवृद्धोत्साह हो जाते हैं । ऐसे गणनायक की पराजय आशंकित हो जाती है, पर अपने विनायकत्व - विशिष्ट नायकत्वको अक्षत रखनेकेलिए उसे सदा ' सुसुख ' ही रहना पड़ता है । २. ‘ एकदन्तः ’ – गणनायकको ' एकदन्त ' ( दन्ती ) भी होना चाहिये, एक ही शुभ्र दान्त बाहर रखना चाहिये । शेष नीतिरूप दान्तोंको अन्दर अर्थात् बाहरमें अप्रकट- गुप्त रखना चाहिये; प्रसिद्ध है - ' हाथी के दांत खानेके और दिखानेके और ' तभी विघ्न-रहित होगा, तभी उसकी विजय होगी । ३. ' कपिल ' – ' कपिल ' से ' कपिल - रंग ' अभीष्ट है । जैसे कपिला गाय होती है, उसमें या तो शुभ्र रंग होता है, या लाल । काला रंग सर्वथा नहीं होता । इस प्रकार गणनायक भी यशः - शुभ्र हो, लोकानुराग - रूप रक्तवर्ण भी हो, पर उसमें कलङ्करूप- कालापन सर्वथा न हो । कलङ्ककी एक रेखा भी होने से वह ' कपिल ' न बन सकेगा । तब वह विनायक, विशिष्ट नायक भी न बन सकेगा । ४. ‘ गजकर्णकः ' — गणनायकको कान गजका रखना पड़ता है । उसे प्रतिसमय हिलाना - डुलाना पड़ता है । गजका कान बहुत कोमल होता है, गणनायकका भी । दुर्जनरूपी च्यूँटी उसमें छिद्र करनेमें सफल हो जाय, तो तत्परिणाम स्वरूप गणनायकके आत्म - विनाश