सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 91–100
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 91–100
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ६१ प्राप्त होगई । कहीं यह बात ब्राह्मणभागकी होनेसे प्रतिपक्षियोंको खटक न जाए; अतः उन्हें संहिता भी देख लेनी चाहिये- ' आथर्वणाय अश्विनौ दधीचे अश्व्यं शिरः प्रत्यैरयताम् ' ( ऋ ० सं ० १।११७१२२ ) ' ध्र वं दधीचो मन आविवासथो अथा शिरः प्रति वाम् ( अश्विनौ ) अश्व्यं वदत् ' ( १।११६ । ε ) फलतः उक्त वैदिक कथाकी भान्ति गज - मुखका सन्धान तथा उससे भाषणशक्तिभी असम्भव नहीं । यह भी स्मर्तव्य है कि— देवता स्वभावसे अमृताशी होते हैं । इसीलिए अथर्ववेदसं ० में कहा है- ' देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम् ' ( ११।७१ ( ५ ) । २३ ) ' यत्र देवा अमृतमानशानाः ' ( अथ ० २।१५ ) । ' येनामृतमपां मध्याद् उद्धृतं पूर्वजन्मनि । यतोऽमरत्वं संप्राप्ताः त्रिदिवाः त्रिदिवेश्वरात् ' ( सुश्रुत सं ० उत्तरतन्त्र ३६।३ ) यह उपवेदका वचन है । स्वा ० द ० जीकी संस्कारविधि ( पृ ० ५८ ) में उद्धृत ' देवा आयुष्मन्तः, ते अमृतेन आयुष्मन्तः । ( १।१६।६ ) इस पारस्करगृ ० के वचनसे अमृताशी होने पर सिर कटनेपर भी शरीर मृतक नहीं होता; इसपर राहुको नहीं भूलना चाहिये । इस प्रकार गणपतिके भी देव होनेसे अमृताशी होनेके कारण उनकी प्राणवायु भी निकल नहीं गई । वेदान्तदर्शन ( १ | ३ | ३३ ) के शांकरभाष्यमें कहा हुआ ' ऋषीणामपि [ एवं देवादीनामपि ] सामर्थ्यं न अस्मदीयेन सामर्थ्येन उपमातु ं युक्तम् ' यह वचन याद रख लेनेसे इस विषय में कोई सन्देह अवशिष्ट नहीं रहता । तब गजके शिरके सन्धानसे यथापूर्व भाषण शक्ति होगई । जैसे जरासन्धकी दोनों सन्धियोंके जरा - राक्षसी द्वारा
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६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जोड़नेपर उसकी अव्यक्त प्रारण वायु फिर व्यक्त होगई; वैसे गजके शिरके सन्धानसे भी अन्तर्हित प्राणवायु प्रकटरूपमें होगई । यह प्रश्न तो व्यर्थ है कि - ' हाथीका सिर बहुत बड़ा, वह छोटे पुरुषकी प्रीवा पर कैसे समा सका । ' गणपतिको मनुष्य-शरीर समझना भूल है । गणपति मनुष्य नहीं, किन्तु देव हैं । देवताओंके शरीर मनुष्य - इतने नहीं होते, किन्तु बहुत बड़े होते हैं । चाहे आप चित्रों में गणेशको हस्व श्राकारवाला देखें, वहां वास्तविकता नहीं होती । १३ लाख पृथिवी — इतना बड़ा सूर्यदेवता भी चित्रमें कितना छोटा होता है । हाथी भी वहांपर दिव्य समझना चाहिये; इस लोकका प्राणी नहीं । तब ' गजेन्द्रवदनं देवं ' ( भविष्य पुराण प्रतिसर्गपर्व द्वितीयभाग २०।१४० ) ' मूषकस्थं महाकार्यं ' ( २०।१४१ ) इत्यादि वचनों में कोई विप्रतिपत्ति नहीं रह जाती । तब क्या अश्वशिरकी आकृतिसे वैदिक ऋषि दध्यङ 7 को भी ' अनार्य ऋषि ' मान लिया जाएगा? नर सिंहकी संकीर्ण आकृति वाले नृसिंहावतारको भी, मत्स्य, कूर्म, वराह तथा हयग्रीवकी आकृतिवाले विष्णुको भी ' अनार्यदेव ' मान लिया जायगा? तुरंग-वदन किन्नरोंको भी क्या अनार्ययोनि मान लिया जायगा? ऋव्शा ० सं ० ( ८ । ८५।७ ) के अनुसार रासभवाहनवाले अश्वियोंको, तथा कृष्ण - रंग वाले श्रीकृष्ण तथा श्रीजगन्नाथमूर्तिको भी अनार्यदेव मान लिया जायगा? वस्तुतः गणनायकका गजमुख होना स्वाभाविक हो होता है — यह हम ' गणेशचतुर्थी ' पर्वमें लिखेंगे । अतः ‘ गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्ग न च वयः ' के
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ६३ अनुसार गणेशजीकी पूजा भी उनके ईश्वरत्वके कारण है, आकृति के कारण नहीं । बाहर से नारियलकी भी आकृति कठोर और कुत्सित है, पर भीतर सुन्दर है । बेरकी बाहिरसे तो आकृति अच्छी है, पर भीतरसे कठोर है । इस आकृतिसे आर्यानार्यता नहीं हो जाती, जैसाकि प्रतिपक्षी कहते हैं । ' पश्य मे पार्थ! रूपाणि ... नानावर्णाकृतीनि च ' ( गीता १११५ ) इसमें भगवान्ने अपना नाना आकृतियोंवाला विराट् रूप दिखलाया था उसमें ' गजानन ' मूर्ति भी है । ( २२ ) ३३ देवताओं में ' गणेश ' के न आनेसे भी गणेशजी अवैदिक नहीं होजाते । नहीं तो उनमें सरस्वती, ब्रह्मणस्पति आदि देवताओंके भी न होनेसे वे भी अवैदिक देवता होजाएँ; पर यह बात वादियोंको भी अनिष्ट है । गणेशजीका जब सर्वत्र प्रचार है; तब स्पष्ट है कि — भूमण्डलभर में फैले हुए आर्योंके मान्य वेदादि शास्त्रोंकी ही यह देन है । ' गजानन ' शब्द भी चारों वेदोंके अन्तिम अक्षरोंको संकेतित करता है— ' ऋग ' से ' ग ', ' यजुः ' से ' जा ', ' सामन् ' से ' न ', और ' अथर्वन् ' से ' न ' । तब यह वेदसे प्रकट हुआ ' गजानन ' देव अवैदिक वा अनार्य कैसे होसकता है? हां, अनार्यो ने हमसे सीखकर उसे कुछ विकृतरूपमें कर दिया हो; तो आश्चर्य नहीं । प्रतिपक्षियोंके एतद्विषयक अनुमान प्रायः बेसिर - पैरके एवं निर्मूल हैं । ' विघ्नराज! क्षमस्व ' यह गणपतिपूजाके अन्तमें कहना ' आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । ' पूजां चैव न जानामि
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६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) क्षमस्व परमेश्वर! ' की भान्ति पहले आवाहन करके फिर विसर्जनार्थ है, गणेशकी अनावश्यकतार्थ नहीं । यदि प्रतिपक्षिगण अंग्रेजी दृष्टिकोण छोड़ दें; और पौरस्त्य श्रद्धा ले लें; तो ' श्रद्धया सत्यमाध्यते ' ( यजुः १६।३० ) उन्हें सत्य मिल जायगा । फिर वे भ्रम में न पड़ सकेंगे । ( २३ ) सर्वत्र मङ्गलाचरणमें गणेशको न देखकर गणेशपूजन अर्वाचीन वा अवैदिक नहीं होजाता । स्वस्तिवाचनको प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वह वैदिक है । ' स्वस्ति न इन्द्रो ' यह स्वस्तिवाचन का आदिम मन्त्र है; इसीसे स्वस्तिकरूपमें गणेशजीकी उत्पत्ति हुई-यह हम पूर्व दता चुके हैं । सो जहां स्वस्तिवाचन हो रहा हो; वहां समझना चाहिये कि — वह गुप्त वा संक्षिप्त गणेश - पूजा होरही है 1 दूसरी गणेशकी मूर्ति है ' ॐ ' । ' ओम् ' जो वर्णसमुदाय है, उसमें सामने हल् प्रत्याहार न होनेपर वा अच् पड़े होनेपर ‘ म् ' को अनुस्वार नहीं हो सकता । और किसी समय में उसकी आकृति भिन्न भी हो सकती है । पर ' ॐ ' वस्तुतः गणेशजीकी मूर्ति है । आरम्भिक हिस्सा गजका शुण्डादण्ड है, ऊपरका अनुनासिक बालचन्द्र है I । दाहिनेमें गोलाकार मोदक है । किन्होंके मतानुसार प्लुतचिह्न ' ३ ' मूषक है । इसे हम पूर्व संकेतित कर चुके हैं; कुछ अन्तमें सम्भवतः ‘ ॐकारका महत्त्व ' निबन्ध में लिखेंगे । सो जो लोग सामने कुछ न होनेपर वा सामने अच् होनेपर अनुस्वारवाला ' ओं ' वा ' ॐ ' लिखते हैं; यदि वर्णसमुदाय ' ओम् ' उन्हें इष्ट है; तो वे व्याकरणकी दृष्टिले अशुद्धि करते हैं; क्योंकि जब तक सामने हल्
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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ६५ 5 : T प्रत्याहार न हो; तब तक अनुस्वार नहीं हो सकता; ॐ इस प्रकार अनु-नासिक तो हो ही नहीं सकता | ' ॐॐ ' इस आकृति में तो ' ओ ' की मात्रा भी नहीं; अतः स्पष्ट है कि यह ' ॐ ' ' ओम् ' नहीं; किन्तु गजानन - गणेशकी प्ररणवाकार संक्षिप्त मूर्ति है, जैसाकि ' गणेश-तापिनी उपनिषद् में संकेतित किया है- ' ततश्च ॐ इति ध्वनिरभूत्, स वै गजाकारः ’ । ‘ ॐकाररूपी भगवान् यो वेदादौ प्रतिष्ठितः ' ( गणेशपुराण ) । अतः ' ॐ ' वा ' ग्रों ' लिखनेवाले महाशय गुप्तरूपसे गजानन - गणेशका मङ्गलाचरण वा उसकी मूर्तिपूजा कर रहे हैं; क्योंकि मूर्तिपूजा भी वैदिककालसे ही आ रही है । यह हम ' श्रीसनातनधर्मा-लोक ' के चतुर्थ पुष्पमें स्पष्ट कर चुके हैं । गणपति अथर्वशीर्षमें भी लिखा है- ' अनेन गणपतिमभिषिञ्चति, स वाग्ग्मी भवति ' यहांपर गणपतिकी मूर्तिपर अभिषेक करनेका उल्लेख है । इसपर ‘ वैदिकधर्म'के सम्पादक ' श्रीपाददामोदर सातवलेकर ' महाशय ' पुरुषार्थ ' के गणेशाङ्कके दूसरे भागके पृष्ठ ७ पर लिखते हैं - ‘ गणपति - अथर्वशीर्षका काल । इसमें गणपति की मूर्तिपर अभिषेक करनेका उल्लेख है, अर्थात् मूर्तिपूजा शुरू होनेपर यह ( अथर्वशीर्ष ) बना है - ऐसा कह सकते हैं, किन्तु कई वर्ष पूर्व तक ‘ वैदिककालमें मूर्तिपूजा नहीं थी, वह बादमें शुरू हुई, ऐसा कई विद्वानोंका रूढ ज्ञान था; परन्तु जैसा - जैसा वेदोंका अनुसन्धान विशेष होने लगा; वैसा - पैसा उपरोक्त विद्वानोंके ज्ञानमें अन्तर पड़ने लगा है । अब अनेक यूरोपियनों को भी ऐसा जँच रहा है कि ऋग्वेदकालमें भी मूर्ति बनाकर, उस मूर्ति की रथमें सवारी निकालनेकी और पुष्पों एवं वस्त्रालङ्कारोंसे उस मूर्तिकी ५ स ० ध ०
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६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) तथा रथकी पूजा करनेकी प्रथा थी । ' इन्द्रकी मूर्ति इतना मूल्य लेकर दूरंगा और इतना मूल्य मिला; तो भी नहीं दूंगा ' ऐसे मन्त्र मिल जाने से इन्द्रादि देवों की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं, यह मत बहुधा सर्व विद्वानों को मान्य होने लगा है । तदनुसार वेद में सर्व देवोंके वर्णन हैं, वे देवता विग्रहवान् होने जैसे ही हैं । उन वर्णनोंकी उपपत्ति उनकी मूर्तियाँ माने बिना नहीं लगती । ऐसे अनेक कारणों से ' वैदिक काल में मूर्तिपूजा नहीं थी ' यह मत अब उतना मान्य नहीं रहा । इसलिए गणपति पर अभिषेक करनेका उल्लेख होनेसे ' यह अथर्वशीर्ष अर्वाचीन है ' ऐसा नहीं कह सकते । " फलतः यह गणेशजी की प्रणवाकार मूर्ति है । तदनुसार हमने भी वैदिक मङ्गलाचरणमें सबसे पूर्व श्रीगणेशजीकी संक्षिप्त मूर्ति ' ॐ ' देकर श्रीगणेशजीका मन्त्र - त्राह्मणात्मक वेदोंके मन्त्रोंसे मङ्गलाचरण किया है । इस निबन्धमें श्रीपं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठी तथा श्रीकृष्णजीके निबन्धसे भी कई निर्देश प्राप्त किये गये हैं । गणेशजीके १२ पौराणिक एवं वैदिक नामों का रहस्य हम ' गणेश-चतुर्थी ' ' पर्व में कहेंगे । हिन्दुधर्म का आचार होनेसे हमने श्रीगणेशजीका मङ्गलाचरण किया । उस पर जो प्रतिपक्षियोंने उनकी अवैदिकता फैला रखी है, उसका समाधान कर दिया । ' गणानां त्वा ' इस यजुर्वेदसं ० ( २३ | १ ९ ) के गणपतिके मन्त्रके महीधरभाष्य - प्रोक्त अर्थसे आज की जनतामें बहुत बड़ा भ्रम फैला हुआ है, यहाँपर स्थान न होने से हम उसका विशदीकरण सम्भवतः ' गणेशचतुर्थी ' में करेंगे 1 । अब पहले हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध आचारोंका निरूपण तथा उनका वैज्ञानिक रहस्य विवृत किया जावेगा, फिर हिन्दु - पर्वोका निरूपण होगा ।
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[ i हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध आचार ( ३ ) शिखा की वैज्ञानिक - रहस्यपूर्णता ।
' सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च ।
विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत्कृतम् ' ॥
( कात्यायन स्मृति १४ ) श्रीगणेशके मङ्गलाचरण तथा उनका वैदिक देव होना वेदादि से सिद्ध करके हम हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध श्राचार ' शिखा ' पर पहले लिखना उचित समझते हैं, क्योंकि - हिन्दुजातिका बाह्य मुख्य चिह्न शिखा है | आजकलके हिन्दु नवयुवक शिखाके रखनेसे बहुत घबराते हैं, और उसके रखनेके वैज्ञानिक प्रयोजन पूछा करते हैं । लार्ड मैकाले अनुयायी । ( १ ) सन् १८३५ में लार्ड मैकाले हिन्दुस्थानमें अंग्रेजी शिक्षाकी योजना बना रहे थे I । उस समय उनके ये शब्द थे— " हमें अपनी सब शक्ति लगाकर अवश्य ही ऐसा उद्योग करना चाहिये-- जिससे इस देशमें एक ऐसी जनश्रेणी पैदा होजाय, जो हमारे और उन करोड़ों व्यक्तियोंके बीच मध्यस्थका काम करे, जिनपर हम शासन कर रहे हैं । अंग्रेजी शिक्षा - द्वारा एक ऐसा मनुष्यदल तैयार होगा, जो हाड़, मांस और लहूमें भले ही हिन्दुस्तानी रहे, किन्तु आचार - विचार, खान - पान, रुचियों, रहन-सहन तथा दिल - दिमाग और बुद्धिमें बिल्कुल अंग्रेज होगा ' । ( Quoted in C, H. I, Vol VIP, 111 )
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६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यह सोचकर लार्डने भारतवर्ष में अंग्रेजी शिक्षा प्रारम्भ की । उसका फल उसने अपने पिताको लिखा था कि वह शिक्षापद्धति जिसका आरम्भ भारतीयोंको दोगले अंग्रेज बनाने के लिए किया गया था, कितनी सफल होरही है । लार्डने लिखा- ' जो भी हिन्दु अंग्रेजी - शिक्षा ग्रहण कर लेता है, वह अपने धर्म में सम्बी श्रद्धा खो बैठता है । कुछ लोग केवल दिखावे के लिए उसे मानते हैं, अधिक-तर एकेश्वरवादी और कुछ ईसाई होजाते हैं । यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि — यदि हमारी शिक्षाकी योजनाका पूरी तरह अनुसरण किया गया; तो अबसे तीस वर्ष बाद हिन्दुस्तान में अच्छे - अच्छे घरानों में एक भी हिन्दु मूर्तिपूजक नहीं रहेगा । ' ' भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' ( प्रथम भाग ) पृष्ठ ६३ में आर्य-समाजके अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्तजी ने लिखा है- ' लार्ड वेण्टिङ्क उन दिनों भारतका गवर्नर जनरल था । उसने मैकाले के प्रस्तावके साथ पूर्ण सहानुभूति प्रकट की । अन्ततः मैकालेकी नीतिके अनुसार भारतमें शिक्षाका प्रकार चलने लगा । अंग्रेज और जर्मन अध्यापक और महोपाध्याय भारत में आने लगे । उन्होंकी बताई विद्या • वास्तविक विद्या मानी जाने लगी । जो कोई सज्जन, भारतीय ढंगकी बात करता था; उसे तर्क - विरुद्ध, विद्या- विरुद्ध, इतिहास - विरुद्ध, बुद्धिविरुद्ध, प्रमाण- शून्य कहानी, अथवा मिथ्या कथा कहा जाने लगा । ये शब्द विदेशीय लेखकों और अध्यापकोंने अधिकाधिक प्रयुक्त किये ।.... इसमें सन्देह नहीं- मैकालेने भारतीयताको नष्ट करनेकी जो कूटनीति बर्ती थी, वह प्रभावशालिनी सिद्ध हुई ।
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शिखाकी वैज्ञानिकता ६६ आज भारतमें अंग्रेजीशिक्षा प्राप्त लोगोंकी एक श्रेणी है, जो विचार और रुचि आदिमें आमूलचूल अंग्रेज है । उस श्रेणीमें भारतके अनेक गण्यमान्य नेताओं की गणना हो सकती है । ' इसी पाश्चात्य शिक्षा में दीक्षित लोग यूरोपकी सभ्यताके दास बन चुके हैं । इन्हें सिर पर चोटी रखनेसे लज्जा आती है । गले में यज्ञोपवीत पहननेसे भार दीखता है । देवदर्शनार्थ देवमन्दिरमें जाना इनके मतमें मूर्खताकी पराकाष्ठा है । चन्दन आदि अन्य हिन्दुचिह्न रखते घबराते हैं । नाम भी अपने जे. पी. चौधरी आदि अंग्रेजी शैलीके रखते हैं । शिखा यज्ञोपवीत आदि धार्मिक चिह्नोंके लिए जो श्रद्धा एक गँवार भारतीय में है; वह बी ० ए ० ग्रैजुएट में नहीं । यह लोग पवित्र संस्कृत भाषाको मृतभाषा ( DeadLanguage ) कहते हैं । अपने आपको इस देशके आदिम निवासी न मानकर वैदेशिक मानते हैं । भारतीय होते हुए भी भारत से उनका प्रेम नहीं रहा । इस सारे अनर्थका मूल पाश्चात्य शिक्षा है | जिस कामको औरङ्गजेबकी तलवारकी धार न कर पाई, वही इस पाश्चात्य शिक्षासे अनायास होरहा है । लोगोंका अपने धर्मसे विश्वास, अपनी भाषा एवं प्राचीन वेष - भूषामें आस्था दिनों-दिन घटती जा रही है । अंग्रेज चले गये पर अंग्रेजियत सुव्यवस्थित है । इसीलिए आज शिखा तथा यज्ञोपवीत आदिके प्रयोजनोंको पूछने के लिए तरह - तरहके प्रश्नोंकी झड़ी लगा दी जाती है । उस जिज्ञासाकी पूर्त्यर्थ हमारी यह पुस्तक है । इसमें हम प्राचीन-
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७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अर्वाचीन सब प्रकार के विचारोंका सङ्कलन करेंगे । ( २ ) हमारे प्राचीन लोग पहले समय से धार्मिक चिह्नोंके प्रयोजनोंको न बताकर उनका अवलम्बन ' धर्म ' कह दिया करते थे । उनका आशय यह था कि - प्रयोजन बता देने पर नवीनता - प्रिय लोगों के दृष्टिकोणमें उस नियम में कोई नवीनता नहीं रह जाती । उन लाभोंको मानकर भी उन नियमोंके अवलम्बनमें उपेक्षा हो जाया करती है । इसका उदाहरण भी देख लीजिये । धार्मिक नियम यह था कि- रजस्वला स्त्रीका स्पर्श नहीं करना चाहिये । धार्मिक दृष्टि स्थापित करनेवालोंने इस नियमका यथावत् पालन किया; परन्तु नवशिक्षितोंने जब इस अस्पृश्यता के प्रयोजन पूछे और उनको उन्हें बतलाया गया; तब वे कहने लगे ये तो ठीक हैं, परन्तु हम उस स्त्रीका स्पर्श क्यों न करें? उसके द्वारा रोटी क्यों न पकवावें? हम उसका अन्य उपयोग न लेंगे; परन्तु यह बात भी कुछ समय चली । फिर उसका विपरीत उपयोग होने लगा । फिर यथापूर्व उपयोग करके हानियोंका विचार हटा दिया गया । इस प्रकार सनातनधर्मानुसार हिन्दुजातिके सिर पर शिखा रखना वास्तव में अदृष्टमूलक ही है, उसमें दृष्ट प्रयोजनोंकी आव-श्यकता सर्वथा नहीं; पर आजकलके अविश्वासी लोग बिना प्रयोजन जाने शिखा रखना छोड़कर सनातनधर्मको हानि पहुँचानेवाले न सिद्ध होजावें, यह विचारकर उनकी जिज्ञासापूर्त्यर्थं यथाशक्ति प्रयत्न किया जाता है ।