सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 861–870

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 861–870

पृष्ठ 861

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८३३ वह पूजा इस समय में नष्ट हो जाती; पर इस शिवरात्रिके चूहेने उसे दृढ करा दिया । आज हम इसपर विचार करते हैं । ' आलोक ' पाठक इसपर पूरा ध्यान दें । १८६४ वा ६५ विक्रमी संवतकी शिवरात्रि में आर्यसमाज के जन्मदाता स्वा ० दयानन्दको १४ वर्षकी बाल्यावस्थामें महादेवकी मूर्तिपर चढ़ा हुआ और नैवेद्य खाता हुआ एक चूहा दिखाई पड़ा उसके देखनेके साथ ही बालकके चित्तमें विचार आया कि- मैंने तो महादेवकी बड़ी महिमा सुनी थी; परन्तु यह मूर्ति तो चूहेको भी हटाने में सामर्थ्य नहीं रखती; तब मेरी रक्षा क्या कर सकेगी? यदि महादेवकी इस मूर्ति में सामर्थ्य होती, तो अपने अपमान करनेवाले - मूषकको वह दण्ड देती; पर वह तो टससे मस नहीं हुई; अतः उस मूर्तिको पूजा भी ठीक नहीं ' इस साधारण - सी बातपर उस बालकके हृदयपर चोट पहुँची । उसके धैर्य और धर्म स्थिर न रह सके । उस दिनसे शुरू करके उसने पूर्वसे मुखको मोड़कर पश्चिमकी ओर मुख करना शुरू कर दिया । इसीके आधारसे दयानन्द- समाज आर्यसमाजके नामसे जारी. हुआ । आर्यसमाजी अपने व्याख्यानों में इस घटनाको नमक - मिर्च लगाकर वर्णित करते हैं । मूर्तिपूजाके खण्डनमें भी प्रबल समझकर इसी युक्तिको आगे रखते हैं । यही लीला आर्यसमाजका बीज है, दयानन्दजीके बोधका आदिम - सूत्र है, आर्यसमाजी उपदेशकोंका ब्रह्मास्त्र है, आर्यसमाजियोंका गुरुमन्त्र भी इसे कहा जा सकता है । ( १ ) अब यह विचारणीय है कि - श्रीमहादेवजी उस समय ५३ स ० Ta

पृष्ठ 862

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८३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) चूहेके साथ क्या व्यवहार करते? मनमें उस समय कैसा भाव था? न जान सकें; पर श्रीमहादेव तो बाहरका भाव जानते हैं । बालक मलिन भावको लेकर आया था? तो महादेव उससे कुपित नहीं हुए ( २ ) श्रीमहादेव विश्वम्भर हैं कौन जान सकता है कि- चूहे के अल्पज्ञता के कारण हम भले ही सर्वज्ञ हैं । वे तो सबके भीतर-दयारामने कैसे जाना कि चूहा कोई मलिनभाव नहीं था, तभी ॥ वे कई प्रकारोंसे विश्वको पालते हैं; अतः उनका भाण्डार सबके लिए खुला रहता है; उसमें किसी वस्तुकी न्यूनता नहीं । तब चूहेको वहांसे क्यों लौटाया जाता? क्या चूहा विश्वसे बाहर था? विश्वनाथकी प्रजा नहीं था? जब -भगवान् ने उसका मुख भी बनाया; बुद्धि भी तदनुसार उसके निर्वाहार्थ उसे दी; तब क्या चूहा भगवान्से नहीं ले सकता था? मनुष्य और मूषककी अवयव - रचना में बड़ा अन्तर है; जैसे- हम कोई वस्तु लेते हैं, चूहा वैसे नहीं ले सकता । तब यदि चूहेने अपनी स्वभावसिद्ध - प्रकृतिके अनुसार उछलकर वह वस्तु ले ली हो; तो उसके लिए दण्डविधान क्या? ( ३ ) कहा जाता है कि - ' जब चूहा महादेवकी मूर्तिपर चढ़ा, तब उसने भगवान्का अपमान किया; इससे चूहेको दण्ड देना चाहिये था ' इसपर यह जानना चाहिये कि - प्रत्येक कार्यके लिए मर्यादाको देखा जाता है; उसीके अनुसार व्यवहार किया जाता है । कोई नीच - पुरुष द्वेषवश प्रतिष्ठित - पुरुषकी पगड़ी उतार दे; तब उसे अपना अपमान समझ क्रोध आता है; अपमन्ताको दण्डविधान भी

पृष्ठ 863

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८३५ 7 वहाँ आवश्यक है । पर यदि भोलाभाला हृदयका आधार, स्नेहकी मूर्ति, उसी प्रतिष्ठित - पुरुषका बच्चा उसकी गोदपर उछलता हुआ चढ़ जावे; और उसके हाथसे उस पुरुषकी पगड़ी गिर पड़े, वा वह बच्चा ही पगड़ीको खींचकर गिरा दे; तो उसकेलिए न तो उस प्रतिष्ठित - पुरुषको कोई क्रोध आता है, न ही कोई कानून के अनुसार उस बच्चे के लिए कोई दण्ड नियत है; न ही दण्ड उसे दिया जाता है । हम प्रतिदिन देखते हैं कि - बच्चे अपने पिता - आदिके सिर पर भी चढ़ जाते हैं; वे कुछ खा रहे हों, तो उनसे छीनकर खा भी लेते हैं; इससे न तो उस बच्चेपर थप्पड़ रसीद किया जाता है, न ही उसे जेलखाने में भेजा जाता है । बल्कि उससे क्रोध भी न करके पिता उस बच्चेसे स्नेह ही करता है । उसका कारण यह है कि — सब बातों में मानसिकभाव ही देखा जाता है । यदि मानसिक-पवित्रता हो; तो शरीर द्वारा मर्यादालंघनको भी उपेक्षित ही किया जाता है । बच्चा अपनी उस अवस्था में इसी तरहसे ही तो अपने प्रेमको प्रकाशित करता है । वह उस समय पिताका प्ररणामादि-द्वारा सम्मान करना नहीं जानता; बल्कि उसपर पेशाब - टट्टी भी कर दिया करता है; पर इससे पिता उस बच्चेको दण्डविधान - नहीं करता । योगवासिष्ठमें श्रीवसिष्ठजीने श्रीरामको कहा था - ' -'मनः कृतं कृतं राम! न शरीरकृतं कृतम् । येनैवालिङ्गिता कान्ता तेनैवालिङ्गिता सुता ' अर्थात्– मनसे जो किया जाता है; वही ' किया हुआ ' माना

पृष्ठ 864

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८३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जाता है, शरीर से किया हुआ ' किया हुआ ' नहीं माना जाता । देखिये – कोई पुरुष उसी शरीरसे अपनी प्रियाका भी आलिङ्गन करता है; उसी शरीरसे अपनी लड़कीका भी आलिङ्गन करता है । शारीरिक क्रियाके समान होनेपर भी मनोभावके भेदसे उन लिङ्गनोंको एक नहीं माना जाता । कोई पुरुष किसीके शरीर में चाकू चुभोकर उसका कोई ' अवयव काट ले; इस पर उसे दंड मिलता है, पर एक डाक्टर तेज़ चाकूसे किसीके शरीरका अवयव काटता है; तो ब्रणित - द्वारा उस डाक्टरको दण्ड नहीं दिलवाया जाता । यदि कोई किसीको विष खिला दे; तो उसे अपराधी मानकर दण्ड विधान होता है । पर यदि कोई वैद्य किसी रोगीको उस रोगमें उपयुक्त विष खिलावे; इससे वैद्यको दण्डविधान नहीं होता । कोई भिन्न- पुरुष बागीचे में वृक्षके पत्तोंको काटे, तो स्वामी उसपर क्रोध करता है, पर माली पत्ते तो क्या, शाखाओं तकको भी काट देता है; इससे स्वामी उसपर क्रोध नहीं करता । कहां तक इन भावनाओं को गिना जावे, संसार इस - प्रकारकी घटनाओं से परिपूर्ण ही है । उसी कार्यको एक करता है; तो दूसरेको उससे प्रसन्नता होती है, और दूसरा ' उसीको करे; तो उसको उससे क्रोध होता है । काम बराबर होनेपर भी फलभेदका एकमात्र कारण मानसिक भावकी भिन्नता ही है । जब-हम किसी व्यवहारमें प्रसन्न होते हैं; तब हम उसको करने वाले के शरीरपर दृष्टि न डालकर उसके मनका अध्ययन करते हैं । इस प्रकार यहां भी जानना चाहिए कि - भगवान् सबके पिता

पृष्ठ 865

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शिवरात्रिका मृषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८३७ हैं । जलचर, स्थलचर, खेचर सब प्राणी उसीकी सन्तान हैं । हम किसीका मानसिक - भाव न पहचान सकें, यह सम्भव है; पर परमात्मा तो सर्वज्ञ होनेसे सब जानता है । तब चूहेका मानसिक-भाव भी पवित्र हो सकता है, जिसे चर्मचक्षु वालक दयानन्द ने समझ सका हो । केवल उसकी शारीरिक क्रियाको देखकर आपात-दृष्टिवाला बालक भ्रान्त हो गया हो । पर अन्तर्यामी एवं दिव्य - दृष्टि भगवान् बिना कारण ही चूहेको क्यों दण्ड देते? चूहे ने पुत्र समझकर ही अपने परमपिता पर उछल - कूद मचाई हो, और उसका भोजन ले लिया हो । क्या दयारामको निराकारके दर्बारसे कोई तार मिला था कि चूहेने महादेवकी मूर्तिपर द्वेषसे आक्रमण किया है । जब तक यह निर्णय न हो जावे कि — चुहेने दुर्भाग्य से मूर्तिपर आक्रमण किया; तब तक चूहेकी दण्डनीयता कैसे सिद्ध की जा सकती है? । ( ४ ) परमात्मापर श्रद्धा लानेवालोंका यह विश्वास है कि वह सर्वत्र व्यापक है; उसके बिना कोई स्थान भी शून्य नहीं । इसी कारण पृथिवी आदि भगवान्‌ के शरीर माने गये हैं । बृहदारण्यक -उपनिषद् में कहा है- ' यस्य पृथिवी शरीरम् J आपः शरीरम् ' ( ३७ ) । उसी पृथिवी - परमात्माके शरीरपर दयानन्दजी न केवल जूते समेत पांवको रखते थे; बल्कि — उसपर थूकते भी थे, मलमूत्र भी करते थे । किसी साधारण पुरुषके शरीर पर भी कोई थूक दे; तो वह कितना पीटता है; पर आप लोग भगवान्का इतना अपमान करते हैं, वह आपको दण्ड क्यों नहीं देता? क्या

पृष्ठ 866

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६३८ श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) मूषकका अपराध इससे भी बड़ा था? आप कह सकते हैं कि—– ' परमात्मा तो सर्वव्यापक है; हमें व्यवहारार्थ उसके शरीर - पृथिवी आदि पर चलना पड़ता है; उसके बिना हमारा निर्वाह ही नहीं ' हो सकता ' । तब आप ही चूहे पर अपना गुस्सा क्यों डालते हैं? चूहेका भी निर्वाह ऐसा किये बिना नहीं होता । आप तो ज्ञानी-मनुष्य होकर भी करें; वह ठीक हो जाए, पर दण्ड अज्ञानी- चूहेको दिया जाय? ( ५ ) यदि शङ्काकर्ता कहें कि - ' ईश्वर तो आकाशकी भांति निर्लेप है । घड़ा टूटनेपर भी घटाकाश नहीं टूटता, घड़े के अपवित्र होनेपर भी घटाकाश अपवित्र नहीं होता । वृष्टि होनेपर भी आकाश गीला नहीं होता, सूर्यकी घामसे भी नहीं तपता; तूफानकी मट्टीसे भी मैला नहीं होता; इस प्रकार ईश्वर त्रिकालमें भी एकरस रहता है; वह किसी दोष से भी लिप्त नहीं ' होता ' । तो क्या चूहे की टांग इतनी भारी थी; जिससे भगवान्‌की निर्लेपता भी टूट पड़ती? जिस प्रकार आप परमात्मापर टट्टी भी कर देते हैं; तो भी वह उससे न तो लिप्त होता है; और न आपको ही दण्ड देता है; इस प्रकार चूहेकेलिए भी समझ लें । जो परमात्मा पृथिवीमें है, वही मूर्ति में भी है, और दोनों ही स्थानों में निर्लेप है । यदि आप कहें कि -'टट्टी - पेशाब आदिके समय हमारा मानसिक भाव दूषित नहीं होता है, बल्कि - परमात्मा के अपमानका तो उस समय हमें विचार ही नहीं होता, अतः वह परमात्माका अपमान न

पृष्ठ 867

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शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापके २३६ होनेसे हमें दण्ड भी क्यों मिले? ' तब आपके पास क्या प्रमाण है कि चूहा द्वेषसे ही भगवान् की मूर्तिपर चढ़ा था और उसे दण्ड मिलना चाहिए था । जवतक यह सिद्ध न हो जावे; तब तक मूर्ति-पूजाको कैसे छोड़ा जा सकता है? ( ६ ) मनुष्य पुण्य - पाप जो कुछ भी करता है, उसके कर्मका फल कुछ समय के बाद ही मिलता है । कुपथ्य करनेवालेको भी फल तत्क्षण नहीं मिल जाता । बीमारको भी दवाई तत्क्षण आराम नहीं देती । विद्यार्थी परीक्षा देते हैं, उनका परिणाम भी बाद में ही निकलता है । वीजके बोनेमें अंकुर भी तत्क्षण नहीं निकल आता । पुष्प फल भी पीछे ही होते हैं, पीछे ही पकने पर खाये जाते हैं । दुकानके खोलनेके समय ही लाभ नहीं मिलने लग जाता, किन्तु कुछ समय बाद ही । जीव मनुष्य - शरीरको प्राप्त करता है, यह पूर्व जन्मके ही कर्मका फल है । इस जन्ममें जो कर्म हम कर रहे हैं, इसका फल हमें जन्मान्तरमें मिलेगा । यदि दुर्जनतोषन्याय से मान भी लिया जावे कि चूहेने महादेवजी की मूर्तिका अपमान किया; तो यह कहाँका न्याय | है कि — उसी समय चूहेके प्राणोंको निकालकर उसकी पूंछ दयानन्दजीके हाथमें दे दी जाती? क्या चूहेको दण्ड देनेका यही अवसर था? आगेकेलिए क्या भगवान्‌का दरबार बन्द होने-वाला था? ( ७ ) स्वा ० दयानन्दजीने अपनी ' संस्कारविधि ' के गृहाश्रम-• प्रकरण में यह लिखा है कि- ' नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति

पृष्ठ 868

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६४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गौरिव । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ' ( मनु ० ४।१७२ ) यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृषु । नत्वेवं तु कृतोऽधर्मः कर्तुर्भवति निष्फलः ' ( ४।१७३ ) इन पद्योंका अर्थ स्वामीजीने लिखा है- ' मनुष्य निश्चय करके जाने कि - इस संसार में जैसे गायकी सेवाका फल दूध आदि शीघ्र नहीं होता; वैसे ही किये हुए अधर्मका फल भी शीघ्र नहीं होता; किन्तु धीरे - धीरे अधर्मकर्ताके सुखोंको रोकता हुया सुखके मूलों को काट देता है । पश्चात् अधर्मी दुःख ही दुःख भोगता है । यदि अधर्मका फल कर्ताकी विद्यमानतामें न हो, तो पुत्रों, और पुत्रोंके समयमें न हो तो नातियोंके समय में अवश्य प्राप्त होता है, किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि — कर्ताका किया हुआ कर्म निष्फल होवे ' । जब अपने किये हुए मनु - पद्य के अर्थ में स्वामी धर्मका फल तत्काल नहीं मानते; तब चूहे के अधर्मका फल तत्काल क्यों दिलवाना चाहते थे? मनुजीने यह कहीं नहीं लिखा कि चूहेको अधर्म करनेपर तत्काल फाँसी दे दी जावे? हैरानी तो यह है कि - स्वामी दयानन्दकी बालबुद्धिको समझदार भी आर्यसमाजी अभी तक भी महत्त्व दिये ही जाते हैं!!! ( ८ ) शास्त्रों में यह भी लिखा है कि- ' अत्युग्र - पुण्यपापानामिहैव फलमश्नुते ' कि- अत्यन्त उग्र पापका फल यहीं शीघ्र मिल जाता है । स्वामीजीके अनुसार कथंचित् यह चूहेका उम्र - पाप और उसे शीघ्र दण्ड देना मान भी लिया जाय; तो कौन जान सकता है कि-बिल तक पहुँचने तक उसकी क्या दशा हुई होगी? पर क्या बालक दयाराम चूहोंका डाक्टर था कि - जान जाता कि चूहेपर रोगका

पृष्ठ 869

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शिवरात्रिका मुंषक एक सम्प्रदायका स्थापक ८४ आक्रमण हुआ या नहीं? यह दयानन्दजीका चूहा दक्षिण-पश्चिमका था । दक्षिणके चूहे पर ही पहले - पहल प्लेगकी बीमारी शुरू हुई । बम्बई से फैलती हुई प्लेग पंजाब आदिमें चूहेपर ही पहुँची । अब पता नहीं लगता कि क्या दयानन्दजीकी भगवान्की कचहरी में नालिशके कारण ही उस दिनसे चूहों पर प्लेग शुरू हुई? यदि ऐसा है; तो स्वा ० दयानन्दका मूर्तिपूजा छोड़ बैठना उनकी भूल सिद्ध हुआ । ( a ) यदि कोई साधारण पुरुष कुछ अपराध करे; तो उसे • साधारण - सिपाही ही पकड़कर ले जाता है । उसे गवर्नर आदि वा राजा दण्ड देने स्वयं नहीं आते । हाँ, शासकोंका कोई अपराध हो; तो हैसियतके मुताबिक गवर्नर वा सम्राट् आदि भी दण्ड-विधानार्थ आते हैं । परन्तु अबोध बालक दयानन्दने उस चूहेका ऐसा क्या महत्त्व देखा था; जिससे ज्वर - प्लेग आदि रुद्रके दूत उस मूषकको दण्डित न करते, किन्तु त्रिलोकीके सम्राट् वे स्वयं ही उसे दण्ड देते? आधी रातका समय था । लोग निद्रा - देवीकी उपासनामें लगे थे । बालक दयानन्दपर भी निद्रादेवी अपना प्रभाव डाल रही थी । वह जलके छींटे मारकर तन्द्राको दूर करनेके प्रयत्नमें लगा था; ( यह दयानन्द - जीवन - चरित्रोंमें स्पष्ट है ) सारे दिनकी भूख भी अपना प्रभाव डाल रही थी । ऐसे समय एक छोटा- बालक अपनी दशा भी नहीं जान पाता, दूसरेकी दशा जाननी तो बहुत कठिन हो जाती है । तब वह बालक जिसे अभी तक योगदृष्टि भी नहीं

पृष्ठ 870

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८४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्राप्त थी; कैसे जान सकता कि - चूहेपर रोगका आक्रमण हो रहा वा नहीं? ( १० ) संसार में देखा जाता है कि कोई प्रतिष्ठित पुरुष अपनी · गद्दीपर बैठा हो; तो उसकी सेवामें बहुतसे नौकर इसलिए ठहरे होते हैं कि - स्वामीकी सेवा की कि- स्वामीको गर्मी न लगे । स्वामीको मक्खियाँ तंग न करें । दुष्ट स्वामीका अपमान न करे । विचार कभी नहीं आता कि -कि- वह मक्खियों को भी नहीं सकता, हम ही चुकाते हैं । वे जाए । वे स्वामीको पंखा करते हैं चमर डुलाते हैं - इसलिए कि --वे वेत लेकर ठहरते हैं कि कोई परन्तु उन नौकरोंके मनमें यह हमारा स्वामी इतना असमर्थ है हटा सकता । दीया भी नहीं बुझा स्वयं निश्चित कर लेते हैं कि-हमारा धर्म है कि- स्वामीका संकेत बिना पाये भी उसके कार्य करें । जब नौकरके उपस्थित होनेपर भी स्वामी ही स्वयं मक्खियाँ उड़ाया करे, चूहा, बिल्ली, कुत्तोंको स्वयं भगाया करे; दूसरा उसका अपमान कर डाले; ऐसे सेवकको लाख - लाख धिक्कार है । इस प्रकार यदि दयानन्द - जैसे नौकरके बैठे रहनेपर भी दुर्जन - मूषक स्वामीकी मूर्तिपर चढ़ गया; तो नौकर- दयानन्दका कर्तव्य था कि-उसे हटा देता! पर भूल उसने की कि उसे न हटाया । अपना कर्तव्य पूर्ण न करनेकेलिए उसे लज्जित होना चाहिये था; भविष्य-केलिए सावधान हो जाना चाहिये था; पर खेद, अबोध बालकने अपनी भूल न मानकर महादेव पर ही असामर्थ्यका दोष लगा दिया! ' उलटा चोर कोतवालको डांटे ' यह उक्ति ही ' चरितार्थ कर दी!