पञ्चम सुमन · प्रकरण 77

श्रावणी और रक्षाबन्धन

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657कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिये । यही श्रीव्यासपूर्णिमाका रहस्य है ।

( ५ ) श्रावणी और रक्षाबन्धन ।

श्रावण - पूर्णिमाके दिन उपाकर्म श्रावणी तथा रक्षाबन्धन किया जाता है । ' आह्निक- सूत्रावली में इसका साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया गया है । प्रातः किसी नदी अथवा नाले पर जाकर - ' नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरस्सु च । स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च ' ( मनु.४।२०३ ) के अनुसार स्नान किया जाता है । शारीरिक - शुद्ध्यर्थ पञ्चगव्यका उपयोग भी किया जाता है । देवतर्पण तथा ऋषितर्पण भी किया जाता है । इसमें अरुन्धती और सप्तर्षियोंका पूजन भी किया जाता है ।

आज के दिन - ' श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाऽप्युपाकृत्य यथाविधि । युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोर्धपञ्चमान् ' ( ४।६५ ) । ' पुष्ये- तु छन्दसां कुर्याद् बहिरुत्सर्जनं द्विजः । माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्न प्रथमेऽह्नि ' ( ४।६६ ) । इस मनुस्मृतिके वचन के अनुसार वेदाध्ययनका आरम्भ किया जाता था और पौषी पूर्णिमाको उसका उत्सर्जन ( समापन ) किया जाता था । पर जिस प्रकार आजकल ब्रह्मचर्यकी वेदीके साथ वेदारम्भ तथा समावर्तनकी वेदी भी साथ - साथ बन जाती है, वैसे ही उत्सर्जन - कर्म भी उपाकर्मके साथ ही कर दिया जाता है । इसमें ' यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्र यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ ' इस मन्त्रसे नवीन यज्ञोपवीत धारणकर पुराने यज्ञोपवीतका - ' एतावद्विनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं! धारितं मया । जीर्णत्वात्ते परित्यागो, गच्छ सूत्र! 658यथासुखम् । ' इस मन्त्र से जल - प्रवाह कर दिया जाता है । इसमें अधिकारी लोग पितरोंका तिल - तर्पण भी करते हैं ।

श्रवरण - नक्षत्रके साथ इसका सम्बन्ध होनेसे पूर्णिमाका नाम भी ' श्रावणी ' होता है और इस कर्मका नाम भी ' श्रावणी - कर्म ' होता है । ब्राह्मणोंकी प्रधानता इसमें अवश्य है, पर है यह सभी द्विजोंका ही । इससे वेदका प्रचार तथा ब्रह्मचर्य व्रतका प्रसार तथा हिन्दु - संस्कृतिका संरक्षण बना रहता है ।

इसी दिन रक्षाबन्धन भी हुआ करता है । इसके करनेसे वर्षभरके अशुभोंसे रक्षा हुआ करती है । असुरोंसे पराजित इन्द्रको देखकर इन्द्राणीने इसी दिन ब्राह्मणोंको बुलाकर स्वस्ति- वाचन कराकर इन्द्रके हाथमें बृहस्पतिकी अनुमति से रक्षाकी पोटली बँधवायी थी, उसीके परिणामस्वरूप इन्द्रने दैत्योंको हरा दिया था । ऐसा वर्णन पुराण में आया है । रक्षाबन्धनके समय ' येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः । तेन त्वामभिबध्नामि रते! मा चल मा चल । ' यह मन्त्र पढ़ा जाता है । इसमें स्पष्ट है कि श्रीवामनने भी रुईके एक डोरेसे बलि राजाको बांधकर उससे देवताओंको उनकी छीनी हुई सम्पत्ति दिलवाई थी । पर साथही विष्णुको बदलेमें उसका द्वारपाल बनना पड़ा और आठवें -मन्वन्तरमें उसका इन्द्रत्व मानना पड़ा ।

प्राचीन समय में रक्षासूत्रमें ' अपराजिता ' नामक औषधि अभिमन्त्रित कर बांधी जाती थी, जिससे वह एक वर्षतक भयोंसे तथा शत्रुओं से अपराजित रहता था ' शकुन्तला के लड़के भरतके 659हाथमें महामुनि - श्रीमारीचने ऐसा रक्षासूत्र बांधा था, जिससे वह पांच वर्षका होता हुआ भी शेरके बच्चोंको चपेट मारकर मुँह खोलने के लिए बाध्य करता था, और उनके दांत गिनता था, शेर- शेरनीभी उसे कुछ कष्ट नहीं दे सकते थे- यह रक्षासूत्रका ही प्रभाव था । महाकवि श्रीकालिदासने अपने प्रसिद्ध नाटक ' अमि ज्ञान - शाकुन्तलके सप्तम अङ्कमे दुष्यन्त से — ' अर्धपीतस्तनं मातुरामक्लिष्टकेसरम् । प्रक्रीडितु ं सिंहशिशु करेणैवात्र कर्षति ' ( ७/१४ ) । यह पद्य कहलवाया है । इसीके साथ तापसी - द्वारा उसका विवरण भी दिया है कि यदि वह रक्षासूत्र छूट जाय तो उस लड़के के माता - पिताके अतिरिक्त उसे कोई भी उठा नहीं सकता था । उठाने पर वह रक्षासूत्र उसे सांप बनकर डंसता था ।

जब महाकवि कालिदासने ऐसा वर्णन दिया है तो इसके वैसे प्रभावमें कोई सन्देह नहीं रह जाता । आज यदि वैसा प्रभाव नहीं मिलता तो उसका कारण है - शक्ति -हास | किसीने एक ब्राह्मणसे पूछा था कि - अब

आप लोग पहलेकी भांति शाप क्यों नहीं दे सकते? तो उसने

उत्तर दिया था - - ' ' परान्नेन मुखं दग्धं हस्तौ दग्धौ प्रतिग्रहात् ।

परस्त्रीभिर्मनो दग्धं कुतः शापः कलौ युगे । '

दूसरोंका अन्न

खाते - खाते मुँह जल गया है, दान लेते - लेते हाथ जल गये हैं ।

दूसरोंकी स्त्रियों को देखते - देखते मन जल गया

शाप हम कैसे दे सकते हैं? यह ठीक है । है, तब कलियुगमें

अब मुख, हाथ और मनमें शक्ति नहीं रही । तपस्या न रहनेसे

तब वे पहले जैसे चमत्कार भी नहीं रहे, पर मूल कर्मका त्याग 660नहीं कर देना चाहिये । ' कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ' कभी कोई तपस्वी विद्वान् निकलेगा ही ।

यह कर्म व्यर्थ भी नहीं है । वेदोंमें भी इसका संकेत मिलता ही है । वहां सोना, विशेष - मणियों तथा रक्षा सूत्रोंके बांधनेका माहात्म्य मिलता है । उपवेद आयुर्वेद की सुश्रुतसंहिता एवं चरक- संहिता आदि ग्रन्थोंमें कई रक्षासूत्रोंका विधान आता है । अभि- मन्त्रणमें बहुत शक्ति मानी जाती है । छातः आजकल रक्षासूत्रों में भी सोनेका अंश गोटे - किनारी त्रादिके जड़नेका रिवाज है, जिस से रक्षा रहे ।

रक्षाबन्धनके दिन यजमान अपने पुरोहित - ब्राह्मणोंसे, शिष्य अपने गुरुओंसे, भाई बहिनसे, पिता अपनी लड़की से रक्षासूत्र वन्धवाता है । उनकी दक्षिणा भी दी जाती है । राजपूती - समय में लड़कियां किसी अन्य राजाको भी राखी बांध दिया करती थीं । इसमें तात्पर्य यह था कि मैं तुम्हारी बहिन या लड़की हूँ । तुम्हारी रक्षा चाहती हूँ, तुम भी मुझे उसको दक्षिणा दो । यहां दक्षिणा अभयदान, या शत्रुसे उसका संरक्षण इष्ट होता था । तब वे राजा प्राणपणसे उसका संरक्षण करते थे । जैसे कि महारानी कर्णवतीने गुजरातके बादशाह बहादुरशाह के आक्रमणसे चित्तौड़की रक्षार्थ मुगल वंशीय राजा हुमायूँ को राखी भेजी थी । उसने भी अपने सैन्यबलसे सहायता पहुँचाकर भाई - बहन के पवित्र सम्बन्धको चार चाँद लगा दिये थे ।

प्राचीनकालमें हमारे सब कर्म किसी प्रयोजनको लक्ष्य में न

In English

Shravani and Raksha Bandhan

This chapter explains the rituals of Upakarma and Raksha Bandhan performed during the Shravana full moon. It details the procedures for changing the sacred thread (yagnopavita), studying the Vedas, and performing offerings to ancestors. It also describes the historical and mythological significance of the protective thread used to ward off evil and enemies.

This chapter answers

  • How is upakarma performed?
  • What is the ritual for changing the yagnopavita?
  • Why is raksha bandhan tied?
  • What are the benefits of wearing a raksha sutra?
  • How did bharata use the power of the raksha thread?

Also written: Shravani, Aura, Rakshabandhana, Shravani Aura Rakshabandhana, श्रावणी और रक्षाबन्धन

मूल ग्रन्थ

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