सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 681–690
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 681–690
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श्रीव्यास - पूर्णिमा ६५३ इन्हीं पुराण- इतिहास आदि के द्वारा ही अर्वाचीन- सम्प्रदायोंके उपदेशक लोग अपने व्याख्यानको विस्तीर्ण तथा रोचक बना लेते हैं! ब्रह्मचर्य की महिमा बताने में भीष्म, हनूमान, लक्ष्मण आदिका, बलिष्टता बताने में भीम आदिका, धर्म एवं राजनीति वर्णन करने में श्रीराम, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, श्रीव्यास आदिका, तपस्याके वर्णनार्थं विश्वामित्र आदिका, पतिव्रतके महत्त्व में सीता, सावित्री आदिका I इतिहास बतानेकेलिए सभी सम्प्रदाय पुराणों का आश्रय लेते हैं ।. इन्हीं पुराणोंके द्वारा सामाजिक कर्तव्य, स्मृति आदिके जटिल विधि - निषेधोंके उदाहरण, तथा भिन्न - भिन्न अधिकारियोंके भिन्न-भिन्न धर्म जाने जाते हैं । उपवास - त्रत आदिके लाभ, गंगाजलकी दूसरे जलोंसे विलक्षणता एवं पवित्रता, योग चमत्कार, राजनीति आदि विषयोंका जो आज देश - विदेश में डिण्डिम बज रहा है; यह पुराणोंने ही हमें वताया है । गोरक्षा आन्दोलनोंके जन्म देनेवाले भी ये ही पुराण हैं । देशभक्ति, धर्मभक्ति, ईश्वर भक्तिको सिखलानेवाले भी यही पुराण हैं । लोक - लोकान्तर, स्वर्ग, मुक्ति आदिको बतानेवाले भी यही हैं । यही इनकेलिए कहना सोलहों आना और चौसठ पैसा सच है कि - ' यदिहास्ति तद्न्यत्र, यन्ने-हास्ति न तत् क्वचित् ' । जो यहां है; वही अन्य साहित्यमें है, जो यहां नहीं; वह अन्यत्र नहीं । इन पुराणोंके सम्पादक श्रीव्यास ही हैं; अतः ' व्यासोच्छिष्ट ' जगत् सर्वम् ' कहना कोई अत्युक्ति नहीं | यही वेदके सरस भाष्य हैं । यदि पुराण न रहें; वा न माने
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६२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जावें; तो हिन्दु - जातिका स्वरूप ही विरूप हो जावे । इस जातिको आजकलके ग्राह ग्रस जाएंगे - इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं । इसलिए हिन्दुजाति में फूट डालनेकेलिए विदेशियोंने हमें पुराणों को निन्दा में प्रोत्साहन दिया, निर्देश दिये, साधन दिये, अपना साहित्य मुफ्त वितीर्ण किया । वस्तुतः पुराणोंपर श्रद्धा लानेसे ही हमें ' ' श्रद्धया सत्यमाप्यते ' सत्यका मार्ग मिलेगा । पुराणरूप - अर्णवको मथन करनेपर अमृत भी मिल सकता है, विष भी । रत्न भी मिल सकता है, शङ्ख भी । लक्ष्मी भी उससे मिल सकती है, कौडी भी । और यह सभी वस्तुएं समय - समयपर काम आ सकती हैं । अपने देश वा धर्म तथा जातिकी रक्षार्थ युद्ध - कला भी पुराणोंने ही सिखलाई । विविध कलाएँ, विद्याए तथा विविध वृत्तियाँ; भारतवर्षकी सीमाओं का परिचय, तथा उसकी अखण्डता पुराणोंसे ही जानी जा सकती है । वेदोंकी शाखा आदिके ज्ञानार्थ प्रतिपक्षियोंको भी पुराणोंकी ही शरण लेनी पड़ती है । इनका आश्रय न लेनेपर वेद - विषय में भी अन्धकारमें रहना पड़ेगा । वेद - विषयमें जो जनता में अगाध -श्रद्धा अब तक भी विद्यमान है, उसका मुख्य कारण भी पुराण ही · हैं । इन्हीं पुराणोंके द्वारा ही प्रतिपक्षियोंको आर्यसृष्टि - संवत्सर की गणना तथा युधिष्ठिरके बादकी राजवंशावली भी उन्हें प्राप्त हुई । इन्हीं पुराणोंका अवलम्बन लेकर प्राचीन - महा-कवियोंने बहुत से काव्य तथा बहुत नाटक बना डाले, जिनसे उनकी यशः पताकाएं आज भी दशों दिशाओं में फहरा रही हैं ।
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श्रीव्यास पूर्णिमा ६५५ इन्हीं पुराणोंकी कृपासे चार्वाकमत, तथा बौद्ध - जैन आदि मतों और ईसाई - मुसलमानादि सम्प्रदायोंका हिन्दु - जातिपर प्रभाव नहीं पड़ा और वह अर्बो साल के बाद आज भी अपनी सत्ता स्थिर किये है । इन्हीं पुराणोंके द्वारा वेदोल्लिखित ऋषियोंकी उत्पत्ति और वंशपरम्परा ज्ञात हो सकती है । यदि पुराण न हों; तो वेदप्रोक्त औशीनरि शिवि ( ऋ ० सं ० १० १७६ ), पौलोमी शची ( १०/१५६ ), वैन्य - पृथु ( १०।१४८ ), विश्वावसु- गन्धर्व ( १०११३६।४-६ ), पैजवन सुदास ( १०।१३३ ), यौवनाश्व - मान्धाता ( १०।१३४ ), जमदग्नि तथा उसका पुत्र राम ( १०।११० ), सोमका लड़का बुध ( १०।१०१ ), पुरूरवा-ऐल ( १०/६५ ), दक्षकी लड़की अदिति ( १०१७२ ), कृष्ण ( १० | ४२ ) ऐलूष - कवष ( १०।३४ ), वैवस्वत - यम ( १०।१० ), शुनःशेप ( १।२४ ), शक्तिका लड़का पराशर ( १२६७ ), कौशिक - गाधी ( ३।२१ ), नर ( ६-३५ ), नारायण ( १० | ६० ), बार्हस्पत्य - भारद्वाज ( ६७ ), गर्ग ( ६।४७ ) वैवस्वत मनु ( २८ ), भार्गव - कवि ( ६४८ ), भरद्वाज, अत्रि, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ ( ६।६७ ), वसिष्ठपुत्र - शक्ति, ( ७ ), कश्यप ( ६।११४ ) इन ऋषियोंका जिनका ऋग्वेद संहिता में अपत्य - प्रत्ययके रूपमें नाम हैं- उत्पत्तिका पता लग ही न सके । जो पुराणोंकी निन्दा करते हैं; वे अठारह पुराणोंमें केवल दो - तीन पुराणोंकी; उनका भी थोड़ासा अंश प्रकरण छिपाकर, नुपूर्वीको यागे - पीछे करके दो - चार रुपये प्राप्त करने के लिए वैसा करते हैं । वे लोग कई लाख श्लोकों में दो - तीन सौ श्लोक
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६१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) आक्षेपयोग्य मानते हैं । यदि वे दूरदर्शिता वा निष्पक्षता रखें; तो वहां भी उनकी शङ्काएं दूर होजावें; और वहां भी वेदके किसी मन्त्रकी व्याख्या ही उन्हें मिल जावे । श्राजकल कराल - कलिकालमें भी इन्हीं पुराणोंके कारण धर्मका प्रचार है, और रहेगा । इन्हींकी कृपासे वेदार्थके ज्ञानमें सहायता भी मिलती है । इसीलिए ही कहा है-' इतिहास - पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् । विभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ( महाभारत - आदिपर्व ५।१६४ ) इतिहास - पुराणों से वेदार्थ " को पुष्ट करे, क्योंकि— पुरुष इतिहास - पुराण से ही बहुश्रुत बनता है, अल्पश्रुत- पुरुषसे वेदभी डरा करता है कि यह मुझपर प्रहार करेंगा । अतः हमें दोषग्राही न बनते हुए उन पुराणोंका आदर-सम्मान सीखना चाहिये - जिससे हम ' कुछ ' बन सकें । उन्हीं पुराणोंके आविष्कर्ता श्रीव्यास हैं; अतः हमें श्रीव्यास-पूर्णिमा वाले दिन श्रीव्यासजीकी पूजा, तथा उनका गुरणानुवाद करना चाहिये । अब श्रीव्यासजी अमर होते हुए भी हमारे सामने नहीं, पर उनका साहित्य पुराण- इतिहास हमारे सामने है । हमें उन्हींका अध्ययन - मनन करना चाहिये । उन्हीं व्यासजी के प्रतिनिधि हमारे गुरुजी होते हैं । वे ही हमें विद्यादान देकर हमारी अज्ञान तिमिरान्ध - चक्षुको ज्ञानाञ्जनशलाका से उन्मीलित करते हैं । हमारा अज्ञान दूर करते हैं । हमारी वृत्ति, जीवन - निर्वाह हमें दिलवाते हैं, हमारा यश बढ़वाते हैं; हमें सुमार्ग प्रदर्शित करते हैं - जिससे हम भी हजारोंका अज्ञान दूर करते हैं; उन श्रीगुरुजीका भी इस दिन यथाशक्ति धन - वस्त्र आदि से सम्मान करके अंशतः अपनी
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श्रावणी और रक्षाबन्धन ६५७ कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिये । यही श्रीव्यासपूर्णिमाका रहस्य है । ( ५ ) श्रावणी और रक्षाबन्धन । श्रावण - पूर्णिमाके दिन उपाकर्म श्रावणी तथा रक्षाबन्धन किया जाता है । ' आह्निक- सूत्रावली में इसका साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया गया है । प्रातः किसी नदी अथवा नाले पर जाकर - ' नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरस्सु च । स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च ' ( मनु.४।२०३ ) के अनुसार स्नान किया जाता है । शारीरिक - शुद्ध्यर्थ पञ्चगव्यका उपयोग भी किया जाता है । देवतर्पण तथा ऋषितर्पण भी किया जाता है । इसमें अरुन्धती और सप्तर्षियोंका पूजन भी किया जाता है । आज के दिन - ' श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाऽप्युपाकृत्य यथाविधि । युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोर्धपञ्चमान् ' ( ४।६५ ) । ' पुष्ये-तु छन्दसां कुर्याद् बहिरुत्सर्जनं द्विजः । माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्न प्रथमेऽह्नि ' ( ४।६६ ) । इस मनुस्मृतिके वचन के अनुसार वेदाध्ययनका आरम्भ किया जाता था और पौषी पूर्णिमाको उसका उत्सर्जन ( समापन ) किया जाता था । पर जिस प्रकार आजकल ब्रह्मचर्यकी वेदीके साथ वेदारम्भ तथा समावर्तनकी वेदी भी साथ - साथ बन जाती है, वैसे ही उत्सर्जन - कर्म भी उपाकर्मके साथ ही कर दिया जाता है । इसमें ' यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्र यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ ' इस मन्त्रसे नवीन यज्ञोपवीत धारणकर पुराने यज्ञोपवीतका - ' एतावद्विनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं! धारितं मया । जीर्णत्वात्ते परित्यागो, गच्छ सूत्र! ४२ स ० ध ०
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६२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यथासुखम् । ' इस मन्त्र से जल - प्रवाह कर दिया जाता है । इसमें अधिकारी लोग पितरोंका तिल - तर्पण भी करते हैं । श्रवरण - नक्षत्रके साथ इसका सम्बन्ध होनेसे पूर्णिमाका नाम भी ' श्रावणी ' होता है और इस कर्मका नाम भी ' श्रावणी - कर्म ' होता है । ब्राह्मणोंकी प्रधानता इसमें अवश्य है, पर है यह सभी द्विजोंका ही । इससे वेदका प्रचार तथा ब्रह्मचर्य व्रतका प्रसार तथा हिन्दु - संस्कृतिका संरक्षण बना रहता है । इसी दिन रक्षाबन्धन भी हुआ करता है । इसके करनेसे वर्षभरके अशुभोंसे रक्षा हुआ करती है । असुरोंसे पराजित इन्द्रको देखकर इन्द्राणीने इसी दिन ब्राह्मणोंको बुलाकर स्वस्ति-वाचन कराकर इन्द्रके हाथमें बृहस्पतिकी अनुमति से रक्षाकी पोटली बँधवायी थी, उसीके परिणामस्वरूप इन्द्रने दैत्योंको हरा दिया था । ऐसा वर्णन पुराण में आया है । रक्षाबन्धनके समय ' येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः । तेन त्वामभिबध्नामि रते! मा चल मा चल । ' यह मन्त्र पढ़ा जाता है । इसमें स्पष्ट है कि श्रीवामनने भी रुईके एक डोरेसे बलि राजाको बांधकर उससे देवताओंको उनकी छीनी हुई सम्पत्ति दिलवाई थी । पर साथही विष्णुको बदलेमें उसका द्वारपाल बनना पड़ा और आठवें -मन्वन्तरमें उसका इन्द्रत्व मानना पड़ा । प्राचीन समय में रक्षासूत्रमें ' अपराजिता ' नामक औषधि अभिमन्त्रित कर बांधी जाती थी, जिससे वह एक वर्षतक भयोंसे तथा शत्रुओं से अपराजित रहता था ' शकुन्तला के लड़के भरतके
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श्रावणी और रक्षावन्धन ६५६ हाथमें महामुनि - श्रीमारीचने ऐसा रक्षासूत्र बांधा था, जिससे वह पांच वर्षका होता हुआ भी शेरके बच्चोंको चपेट मारकर मुँह खोलने के लिए बाध्य करता था, और उनके दांत गिनता था, शेर-शेरनीभी उसे कुछ कष्ट नहीं दे सकते थे- यह रक्षासूत्रका ही प्रभाव था । महाकवि श्रीकालिदासने अपने प्रसिद्ध नाटक ' अमि ज्ञान - शाकुन्तलके सप्तम अङ्कमे दुष्यन्त से — ' अर्धपीतस्तनं मातुरामक्लिष्टकेसरम् । प्रक्रीडितु ं सिंहशिशु करेणैवात्र कर्षति ' ( ७/१४ ) । यह पद्य कहलवाया है । इसीके साथ तापसी - द्वारा उसका विवरण भी दिया है कि यदि वह रक्षासूत्र छूट जाय तो उस लड़के के माता - पिताके अतिरिक्त उसे कोई भी उठा नहीं सकता था । उठाने पर वह रक्षासूत्र उसे सांप बनकर डंसता था । जब महाकवि कालिदासने ऐसा वर्णन दिया है तो इसके वैसे प्रभावमें कोई सन्देह नहीं रह जाता । आज यदि वैसा प्रभाव नहीं मिलता तो उसका कारण है - शक्ति -हास | किसीने एक ब्राह्मणसे पूछा था कि - अब सकते? तो उसने दग्धौ प्रतिग्रहात् । दूसरोंका अन्न हाथ जल गये हैं । है, तब कलियुगमें तपस्या न रहनेसे आप लोग पहलेकी भांति शाप क्यों नहीं दे उत्तर दिया था - - ' ' परान्नेन मुखं दग्धं हस्तौ परस्त्रीभिर्मनो दग्धं कुतः शापः कलौ युगे । ' खाते - खाते मुँह जल गया है, दान लेते - लेते दूसरोंकी स्त्रियों को देखते - देखते मन जल गया शाप हम कैसे दे सकते हैं? यह ठीक है । अब मुख, हाथ और मनमें शक्ति नहीं रही । तब वे पहले जैसे चमत्कार भी नहीं रहे, पर मूल कर्मका त्याग
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६६० श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) नहीं कर देना चाहिये । ' कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ' कभी कोई तपस्वी विद्वान् निकलेगा ही । यह कर्म व्यर्थ भी नहीं है । वेदोंमें भी इसका संकेत मिलता ही है । वहां सोना, विशेष - मणियों तथा रक्षा सूत्रोंके बांधनेका माहात्म्य मिलता है । उपवेद आयुर्वेद की सुश्रुतसंहिता एवं चरक-संहिता आदि ग्रन्थोंमें कई रक्षासूत्रोंका विधान आता है । अभि-मन्त्रणमें बहुत शक्ति मानी जाती है । छातः आजकल रक्षासूत्रों में भी सोनेका अंश गोटे - किनारी त्रादिके जड़नेका रिवाज है, जिस से रक्षा रहे । रक्षाबन्धनके दिन यजमान अपने पुरोहित - ब्राह्मणोंसे, शिष्य अपने गुरुओंसे, भाई बहिनसे, पिता अपनी लड़की से रक्षासूत्र वन्धवाता है । उनकी दक्षिणा भी दी जाती है । राजपूती - समय में लड़कियां किसी अन्य राजाको भी राखी बांध दिया करती थीं । इसमें तात्पर्य यह था कि मैं तुम्हारी बहिन या लड़की हूँ । तुम्हारी रक्षा चाहती हूँ, तुम भी मुझे उसको दक्षिणा दो । यहां दक्षिणा अभयदान, या शत्रुसे उसका संरक्षण इष्ट होता था । तब वे राजा प्राणपणसे उसका संरक्षण करते थे । जैसे कि महारानी कर्णवतीने गुजरातके बादशाह बहादुरशाह के आक्रमणसे चित्तौड़की रक्षार्थ मुगल वंशीय राजा हुमायूँ को राखी भेजी थी । उसने भी अपने सैन्यबलसे सहायता पहुँचाकर भाई - बहन के पवित्र सम्बन्धको चार चाँद लगा दिये थे । प्राचीनकालमें हमारे सब कर्म किसी प्रयोजनको लक्ष्य में न
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श्रीकृष्ण - जन्माष्टमीव्रत पूर्णतः वैज्ञानिक ६६१ करके श्रदृष्टसूलक समझ कर ही किये जाते थे । दृष्ट - प्रयोजन सामने आया, तो स्वार्थ - परता भी आई । फिर वह सदाकी वस्तु नहीं रहती थी । पुरुष उसमें उपेक्षा - बुद्धि भी कर लेता था । उससे वह उस कर्मके लाभोंसे वचित भी रह जाता था । तत्तत्कर्मको अदृष्टफल माननेसे वह कर्म सदाकेलिए नियमित समयपर हुआ करता है, उसमें उपेक्षावृत्ति भी नहीं हुआ करती । तब पुरुष उनके लाभोंसे भी वश्चित नहीं रहता । और फिर देशभर में तत्तत्कर्म नियत - दिन तथा समयपर करते रहने से समस्त देशके पुरुषोंकी एकता तथा सधर्मता रहा करती है, तब किसी शत्रुको उस देशपर कुदृष्टि करने का साहस ही नहीं होता । अपने जो पर्व हैं, उनमें यदि प्रत्यक्ष- लाभ न दीख पड़े, तब भी उस मूल वस्तुका परित्याग नहीं करना चाहिये । यदि उसमें कालक्रमसे उल्टा - पुल्ट भी पड़ जाय तो समय पर शास्त्र देखकर उसमें सुधार भी हो सकता है; पर उसे छोड़ देने से हमसे प्राचीन भारतकी विस्मृति हो सकती हैं । उसके स्वरूप नष्ट होने पर उसके अस्तित्व के भी प्रच्युत होनेकी आशंका बनी रहती है । ( ६ ) श्रीकृष्ण - जन्माष्टमीव्रत पूर्णतः वैज्ञानिक । यह भगवान् श्रानन्दकन्द- सच्चिदानन्द, श्रीनन्दनन्दनका जन्म-दिवस है । यद्यपि जन्म जीवका हुआ करता है, परमात्माका नहीं, तथापि ' जन्म कर्म च मे दिव्यम् ' ( ४६ ) इस भगवद् - चचनके अनुसार भगवानका जन्म ' दिव्य ' हुआ करता है, जिसे अवतार
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६६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कहा जाता है । जीव कर्मबन्धनसे बद्ध होकर परतंत्रता से शरीर - ग्रहण करता है, पर परमात्मा बिना कर्मबन्धनसे, स्वेच्छा वा स्वतन्त्रतासे शरीर - ग्रहण करता है । जैसे कि — जेलखाने में कैदी किसी कर्मसे जाता है, परन्तु उसी जेलखाने में राजा अपनी इच्छानुसार केवल बद्ध - जीवका हित करनेकेलिए, या वहांकी अव्यवस्था दूर करनेकेलिए जाता है । उसी भगवानका जन्म - दिवस होनेसे भगवान्का अनन्य-चित्तसे ( गीता ८।१४, ६।१३-३०,१३ १०,६।२२ ) ध्यान करना पड़ता है । अनन्य - ध्यानकेलिए चाहिये निर्विषय मन, क्योंकि — मन ही बन्ध - मोक्षका कारण हुआ करता है । उपनिषद्का यह वचन पञ्चदशीमें प्रसिद्ध है — ' मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासंगि मोक्षे निर्विषयं मनः ' ( ११।११७ ) अर्थात् विषयासक्त - मन बन्धनका कारण हुआ करता है और निर्विषय मन. मुक्ति देनेवाला हुआ करता है । तब मुक्ति - प्राप्ति तथा मुक्तिके उपाय अनन्य - ध्यानकी प्राप्तिकेलिए मनका निर्विषय - विषयों से रहित होना आवश्यक है । उसका उपाय है उस दिन निराहार रहना । आहार करनेसे हमारी इन्द्रियोंपर ऊष्माका दबाव पड़ने से उनमें उत्तेजना - विषयैषरणा उत्पन्न हो जाती है । जब विषयैषणा उत्पन्न हुई, तो भला भगवान्का अनन्य ध्यान कैसे हो? उसकी रक्षार्थ भगवान्ने ही हम पर कृपा करके यह उपाय बताया है कि ' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ' ( २।५१ ) निराहार - पुरुषका