पञ्चम सुमन · प्रकरण 76

श्रीव्यास पूर्णिमा

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651हुए बीज देश - काल - भेदसे भिन्न हो जाया करते हैं; इस प्रकार पुराणोंमें वैदिक सिद्धान्त देश, काल, पात्रके भेदसे विभिन्न प्रतीत होते हैं, पर वहां होती है वास्तविकता ।

बृहन्नारदीय पुराण में ठीक ही कहा है - ' न वेदे ग्रहसंचारो

न शुद्धिः कालबोधिनी । तिथिवृद्धिक्षयो वापि न पर्वग्रहनिर्णयः ॥

इतिहासपुराणैस्तु कृतोऽयं निर्णयः पुरा । यन्न दृष्टं हि वेदेषु तत् सर्वं लक्ष्यते स्मृतौ ॥ उभयोर्यन्न दृष्टं हि तत् पुराणैः प्रगीयते । वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्थं महेश्वरि! ' अर्थात् वेदमें ग्रहसंचार, ग्रहण आदिका निर्णयादि जो नहीं है, वह सब पुराणों में है । वेदमें जो बातें नहीं हैं, वह स्मृति में हैं — जो वेद और स्मृतिमें. नहीं है, वह पुराणोंमें है । यह है पुराणोंका महत्त्व । अन्यत्र भी कहा है- ' श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् ' । एकेन हीनः काणः स्याद् द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः । पुराण हीनाद् हृच्छून्यात् कारणान्धावपि तौ वरौ ' । वेद और स्मृति दोनों नेत्र हैं, पुराण हैं हृदय, एकसे हीन काणा और दोनोंसे हीन अन्धा होता है, पुराण से ही हृदय - शून्य होता है ।

पुराणोंकी महिमाका वर्णन करना समूचे आकाशको मुट्ठी में बन्द करना है, आजतक जो हिन्दु -

जाति अपने स्वरूपमें उपस्थित है, इसे विदेशी जातियां तथा भिन्न - सम्प्रदाय अजगर वा मगरमच्छ होते हुए भी जो निगल न सके, यह अकम्प अनुकम्पा पुराणों- की ही है, यह आजके पुराणोंका खण्डन करनेवाले अर्वाचीन सम्प्रदाय भी जानते एवं मानते हैं । इसमें थोड़ी भी अत्युक्ति 652II श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

नहीं । पुराणोंका विषयमहत्त्व कैसे वर्णित किया जाय? पुराणों में समग्र - विषयों का वर्णन है, जिनसे हमें भुक्ति भी मिले, और मुक्ति भी । जीविका भी चले, परमार्थ भी सिद्ध हो । यदि पुराणोंका नाम ' विश्व - काव्य ' रख दिया जाय, उन्हें ' गागर में सागर ' कह दिया जाय; तो इसमें किसी भी निष्पक्ष विद्वान्का ननु नच, किन्तु परन्तु नहीं हो सकता ।

पुराणोंमें ज्योतिष, सामुद्रिक, शकुनशास्त्र, आयुर्वेद, विषचिकित्सा, राजनीति, ग्रहगति, भूगोल - खगोल विद्या, मूषक- पतंगा आदिको हटाने के उपाय, कृषि बढ़ानेकी विद्या, वृक्षोंको बिना ऋतुके फल - फूल लगें - इसके उपाय, सर्प - विद्या, स्वप्नोंसे भविष्यका निर्णय, पर्वत, द्वीपों, समुद्रों तथा विशेष - नदियों और उनके उद्गमस्थलोंका वर्णन, भुवनोंका वर्णन, स्वर्ग - नरक आदि लोकोंका वर्णन, स्त्री - पुरुषोंके लक्षण, छहों दर्शन, साहित्य - अलंकार शास्त्र, व्याकरण, छन्दः - शास्त्र, शब्दकाव्य, सृष्टिका उत्पत्ति - प्रलय- वर्णन, पदार्थविज्ञान ( सायन्स ), वैदिक - रहस्य, योगप्रक्रिया, सामान्यधर्म - विशेषधर्म, गृहस्थ - शिक्षा, धर्मनीति, समाज - नीति, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक ज्ञान, भक्ति, कीर्तन, तपस्या, सभी प्रकारकी विद्याएँ, विविध कला - कौशल, गृहस्थ सम्बन्धी गुप्त - योग यदि हजारों विषय बताये गये हैं, जिनमें वेद भी चुप किये हुए हैं । इन्हीं पुराणस्थ - विषयोंको अवलम्बन करके हजारों स्वतन्त्र ग्रन्थ बनाये जा सकते हैं । जिनसे प्रणेताओंको वृत्ति तथा उज्ज्वल यश भी प्राप्त हो सकता है ।

653इन्हीं पुराण- इतिहास आदि के द्वारा ही अर्वाचीन- सम्प्रदायोंके उपदेशक लोग अपने व्याख्यानको विस्तीर्ण तथा रोचक बना लेते हैं! ब्रह्मचर्य की महिमा बताने में भीष्म, हनूमान, लक्ष्मण आदिका, बलिष्टता बताने में भीम आदिका, धर्म एवं राजनीति वर्णन करने में श्रीराम, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, श्रीव्यास आदिका, तपस्याके वर्णनार्थं विश्वामित्र आदिका, पतिव्रतके महत्त्व में सीता, सावित्री आदिका इतिहास बतानेकेलिए सभी सम्प्रदाय पुराणों का आश्रय लेते हैं ।.

इन्हीं पुराणोंके द्वारा सामाजिक कर्तव्य, स्मृति आदिके जटिल विधि - निषेधोंके उदाहरण, तथा भिन्न - भिन्न अधिकारियोंके भिन्न- भिन्न धर्म जाने जाते हैं । उपवास - त्रत आदिके लाभ, गंगाजलकी दूसरे जलोंसे विलक्षणता एवं पवित्रता, योग चमत्कार, राजनीति आदि विषयोंका जो आज देश - विदेश में डिण्डिम बज रहा है; यह पुराणोंने ही हमें वताया है । गोरक्षा आन्दोलनोंके जन्म देनेवाले भी ये ही पुराण हैं । देशभक्ति, धर्मभक्ति, ईश्वर भक्तिको सिखलानेवाले भी यही पुराण हैं । लोक -

लोकान्तर, स्वर्ग, मुक्ति आदिको बतानेवाले भी यही हैं । यही इनकेलिए कहना सोलहों आना और चौसठ पैसा सच है कि - ' यदिहास्ति तद्न्यत्र, यन्ने- हास्ति न तत् क्वचित् ' । जो यहां है; वही अन्य साहित्यमें है, जो यहां नहीं; वह अन्यत्र नहीं । इन पुराणोंके सम्पादक श्रीव्यास ही हैं; अतः ' व्यासोच्छिष्ट ' जगत् सर्वम् ' कहना कोई अत्युक्ति नहीं |

यही वेदके सरस भाष्य हैं । यदि पुराण न रहें; वा न माने 654जावें; तो हिन्दु - जातिका स्वरूप ही विरूप हो जावे । इस जातिको आजकलके ग्राह ग्रस जाएंगे - इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं । इसलिए हिन्दुजाति में फूट डालनेकेलिए विदेशियोंने हमें पुराणों को निन्दा में प्रोत्साहन दिया, निर्देश दिये, साधन दिये, अपना साहित्य मुफ्त वितीर्ण किया । वस्तुतः पुराणोंपर श्रद्धा लानेसे ही हमें ' ' श्रद्धया सत्यमाप्यते ' सत्यका मार्ग मिलेगा ।

पुराणरूप - अर्णवको मथन करनेपर अमृत भी मिल सकता है, विष भी । रत्न भी मिल सकता है, शङ्ख भी । लक्ष्मी भी उससे मिल सकती है, कौडी भी । और यह सभी वस्तुएं समय - समयपर काम आ सकती हैं । अपने देश वा धर्म तथा जातिकी रक्षार्थ युद्ध - कला भी पुराणोंने ही सिखलाई । विविध कलाएँ, विद्याए तथा विविध वृत्तियाँ; भारतवर्षकी सीमाओं का परिचय, तथा उसकी अखण्डता पुराणोंसे ही जानी जा सकती है ।

वेदोंकी शाखा आदिके ज्ञानार्थ प्रतिपक्षियोंको भी पुराणोंकी ही शरण लेनी पड़ती है । इनका आश्रय न लेनेपर वेद - विषय में भी अन्धकारमें रहना पड़ेगा । वेद - विषयमें जो जनता में अगाध - श्रद्धा अब तक भी विद्यमान है, उसका मुख्य कारण भी पुराण ही · हैं । इन्हीं पुराणोंके द्वारा ही प्रतिपक्षियोंको आर्यसृष्टि - संवत्सर की गणना तथा युधिष्ठिरके बादकी राजवंशावली भी उन्हें प्राप्त हुई । इन्हीं पुराणोंका अवलम्बन लेकर प्राचीन - महा- कवियोंने बहुत से काव्य तथा बहुत नाटक बना डाले, जिनसे उनकी यशः पताकाएं आज भी दशों दिशाओं में फहरा रही हैं । 655इन्हीं पुराणोंकी कृपासे चार्वाकमत, तथा बौद्ध - जैन आदि मतों और ईसाई - मुसलमानादि सम्प्रदायोंका हिन्दु - जातिपर प्रभाव नहीं पड़ा और वह अर्बो साल के बाद आज भी अपनी सत्ता स्थिर किये

है ।

इन्हीं पुराणोंके द्वारा वेदोल्लिखित ऋषियोंकी उत्पत्ति और वंशपरम्परा ज्ञात हो सकती है । यदि पुराण न हों; तो वेदप्रोक्त औशीनरि शिवि ( ऋ ० सं ० १० १७६ ), पौलोमी शची ( १०/१५६ ), वैन्य - पृथु ( १०।१४८ ), विश्वावसु- गन्धर्व ( १०११३६।४-६ ), पैजवन सुदास ( १०।१३३ ), यौवनाश्व - मान्धाता ( १०।१३४ ), जमदग्नि तथा उसका पुत्र राम ( १०।११० ), सोमका लड़का बुध ( १०।१०१ ), पुरूरवा- ऐल ( १०/६५ ), दक्षकी लड़की अदिति ( १०१७२ ), कृष्ण ( १० | ४२ ) ऐलूष - कवष ( १०।३४ ), वैवस्वत - यम ( १०।१० ), शुनःशेप ( १।२४ ), शक्तिका लड़का पराशर ( १२६७ ), कौशिक - गाधी ( ३।२१ ), नर ( ६-३५ ), नारायण ( १० | ६० ), बार्हस्पत्य - भारद्वाज ( ६७ ), गर्ग ( ६।४७ ) वैवस्वत मनु ( २८ ), भार्गव - कवि ( ६४८ ), भरद्वाज, अत्रि, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ ( ६।६७ ), वसिष्ठपुत्र - शक्ति, ( ७ ), कश्यप ( ६।११४ ) इन ऋषियोंका जिनका ऋग्वेद संहिता में अपत्य - प्रत्ययके रूपमें नाम हैं- उत्पत्तिका पता लग ही न सके ।

जो पुराणोंकी निन्दा करते हैं; वे अठारह पुराणोंमें केवल दो - तीन पुराणोंकी; उनका भी थोड़ासा अंश प्रकरण छिपाकर,

नुपूर्वीको यागे - पीछे करके दो - चार रुपये प्राप्त करने के लिए वैसा करते हैं । वे लोग कई लाख श्लोकों में दो - तीन सौ श्लोक 656आक्षेपयोग्य मानते हैं । यदि वे दूरदर्शिता वा निष्पक्षता रखें; तो वहां भी उनकी शङ्काएं दूर होजावें; और वहां भी वेदके किसी मन्त्रकी व्याख्या ही उन्हें मिल जावे । श्राजकल कराल - कलिकालमें भी इन्हीं पुराणोंके कारण धर्मका प्रचार है, और रहेगा । इन्हींकी कृपासे वेदार्थके ज्ञानमें सहायता भी मिलती है । इसीलिए ही कहा है- ' इतिहास - पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् । विभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ( महाभारत - आदिपर्व ५।१६४ ) इतिहास - पुराणों से वेदार्थ " को पुष्ट करे, क्योंकि— पुरुष इतिहास - पुराण से ही बहुश्रुत बनता है, अल्पश्रुत- पुरुषसे वेदभी डरा करता है कि यह मुझपर प्रहार करेंगा । अतः हमें दोषग्राही न बनते हुए उन पुराणोंका आदर- सम्मान सीखना चाहिये - जिससे हम ' कुछ ' बन सकें ।

उन्हीं पुराणोंके आविष्कर्ता श्रीव्यास हैं; अतः हमें श्रीव्यास- पूर्णिमा वाले दिन श्रीव्यासजीकी पूजा, तथा उनका गुरणानुवाद करना चाहिये । अब श्रीव्यासजी अमर होते हुए भी हमारे सामने नहीं, पर उनका साहित्य पुराण- इतिहास हमारे सामने है । हमें उन्हींका अध्ययन - मनन करना चाहिये । उन्हीं व्यासजी के प्रतिनिधि हमारे गुरुजी होते हैं । वे ही हमें विद्यादान देकर हमारी अज्ञान तिमिरान्ध - चक्षुको ज्ञानाञ्जनशलाका से उन्मीलित करते हैं । हमारा अज्ञान दूर करते हैं । हमारी वृत्ति, जीवन - निर्वाह हमें दिलवाते हैं, हमारा यश बढ़वाते हैं; हमें सुमार्ग प्रदर्शित करते हैं - जिससे हम भी हजारोंका अज्ञान दूर करते हैं; उन श्रीगुरुजीका भी इस दिन यथाशक्ति धन - वस्त्र आदि से सम्मान करके अंशतः अपनी

In English

The Importance of the Puranas

This text explains that while the Vedas and Smritis provide essential guidance, the Puranas contain practical knowledge not found in those texts. It argues that the Puranas cover a vast range of subjects—from science and politics to social duties—and serve as the heart of Hindu identity and culture.

This chapter answers

  • What is the difference between vedas and puranas?
  • Why are puranas important for hinduism?
  • What subjects are covered in the puranas?
  • How do puranas help preserve hindu culture?

Also written: Shrivyasa, Purnima, Shrivyasa Purnima, श्रीव्यास पूर्णिमा

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 651–656 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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