श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 751–760
सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 751–760
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गीताजयन्ती एवं गीतोपदेशकी तिथि ७२३ P I T ], ने न के र ना म न ना नी क दिनके सम्बन्धमें विद्वानों में मतभेद हैं । महाभारतमें जो अठारह दिनोंकी लड़ाईका वर्णन है, उसपर ध्यान देने से इस विषयमें बहुत कुछ पता लग सकता है । इन वर्णनों में स्थान - स्थानपर जो नक्षत्रों और चन्द्रमाका वर्णन आता है, उसपर उस समयके भारतीय ज्योतिष - शास्त्र के अनुकूल विचार करनेसे महाभारतका युद्ध आरम्भ होनेके दिनका अनुमान हो है । भारतीय ज्योतिष शास्त्रमें और आजकलकी गणनामें बहुत अन्तर है । वैसे तो सालके ३६५ दिन बने हैं, लेकिन नाम और तरीकोंमें हेर - फेर होगया है । एक उद्धरणमें यही बात आती है कि उन दिनों महीने शुक्लपक्ष से आरम्भ होते थे और आजकल कृष्णपक्षसे आरम्भ होते हैं; गुजरात - महाराष्ट्रादिमें अब भी शुक्ल-पक्षसे आरम्भ होते हैं । इस पुरानी प्रथाका इतना ही चिह्न इधर रह गया है कि नये वर्ष का शुक्लपक्ष चैत्रमें प्रारम्भ होता है, पूर्णमासीके लिए १५ का अङ्क लिखा जाता है और अमावास्याकेलिए ३० का । अठारहवें दिन अर्थात् अन्तिम दिनके युद्धमें राजा दुर्योधनके हारनेके बाद रातको अश्वत्थामाने पाण्डवोंके डेरेपर आक्रमण किया था । इस आक्रमणका वर्णन ' रौद्री ' नामसे किया गया है । ' रौद्री ' के अर्थ हैं कृष्णपक्षकी चतुर्दशीकी रात्रिमें होनेवाली । इससे स्पष्ट प्रकट है कि युद्धका अन्तिम दिन मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी ( आजकलकी पौषकृष्ण चतुर्दशी ) था । इस दिनसे उलटे अठारह
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७२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) दिन गिननेपर महाभारतका युद्ध आरम्भ होने की तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही पड़ती है । भीष्मपर्वके सत्रहवें अध्याय में युद्धका वर्णन करते हुए संजय राजा - धृतराष्ट्र से कहते हैं कि युद्ध वड़े अशुभ समय में प्रारम्भ हुआ है; -क्योंकि - ' मघाविषयगः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत । ' ( भीष्म ० १७१२ ) उस - दिन चन्द्रमा ' मघाविषयग ' होगया था । ' मघा ' स्वयं और उसके दलके कुछ नक्षत्र बड़े अशुभ माने गये हैं । ज्योतिषके विद्वानोंके मतानुसार युद्धके प्रसङ्गमें जिस दिन भीष्म पितामह शरशय्या पर गिरे थे, उस दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्र में था और मघाके दलमेंसे केवल भरणी नक्षत्र मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशीको था । संजय मघा नक्षत्रका नाम नहीं लेते हैं; परन्तु मघाके दुलके नक्षत्रका | इससे यह मानना पड़ता है कि युद्ध आरम्भ होनेके दिन चन्द्रमा भरणी नक्षत्र में होगा और इस दिन मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही थी । वीर अभिमन्यु युद्धके तेरहवें दिन मारे गये थे । इसके दूसरे दिन अर्थात् चौदहवें दिन सूर्यास्तपर राजा जयद्रथका वध हुआ और रातभर युद्ध चलता रहा । आधी रात में घटोत्कच मारा गया । घटोत्कच - वधके बाद दोनों सेनाओंने थोड़ा विश्राम किया । इस समय चन्द्रमाके उदय, आकार और प्रकाश आदिका बड़ा चित्ताकर्षक वर्णन है । ज्योतिषियों की सम्मति में चन्द्रमाका यह दृश्य कृष्णपक्ष की दशमी के अतिरिक्त और किसी दिन नहीं पड़ता । इसके हिसाब से युद्धके चौदहवें दिन मार्गशीर्ष कृष्ण ( आजकलका
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श्रीगीतोपदेशकी तिथि और गीताकी महत्ता ७२५ T 3 के 7 I T T पौष - कृष्ण ) दशमी पड़ती है । चौदह दिन पीछे गिननेसे युद्ध आरम्भ होनेकी तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही ठहरती है । भीष्मपर्वमें एक और भी पद्य आता है । उसका ठीक - ठीक अर्थ तभी लगता है, जब हम यह मान लेते हैं कि युद्ध मार्गशीर्ष - शुक्ल-एकादशीको आरम्भ हुआ । वह श्लोक यह है- ' श्वेतो ग्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति । श्रभावं हि विशेषेण कुरूणां तत्र पश्यति ' ( भीष्म ० ३।१२ ) यह युद्धके चौदहवें दिनका वर्णन मालूम होता है । इसी दिन अर्जुन, भीम, घटोत्कच आदिने कौरवोंका विशेष - नाश और नुकसान किया था । इसी दिन ' श्वेत ' ग्रह चित्रा नक्षत्र में आया, ऐसा मालूम होता है । इसी मार्गशीर्ष शुक्ल - एकादशीके दिन युद्ध आरम्भ होनेसे पहले भगवान् श्रीकृष्णने अपने प्रिय सखा भक्त अर्जुनको गीताका उपदेश दिया था । इसी दिन अर्जुनको जीवन्मुक्ति प्राप्त हुई थी । इसीलिए तो इस एकादशीको ' मोक्षदा ' कहते हैं । ( १२ ) श्रीगीतोपदेशकी तिथि और गीताकी महत्ता । यह प्रश्न होता है कि - ' श्रीगीताजयन्ती मार्गशीर्ष शुक्ला ११ को ही क्यों मनायी जाती है? इसी दिन भगवान् श्रीकृष्णाने अर्जुनके प्रति गीताका उपदेश दिया था, इसका क्या प्रसारण है '? इसके लिए हमें महाभारतके युद्धारम्भ एवं पितामह भीष्मके परलोकगमनके कालपर दृष्टिपात करना आवश्यक है । महाभारत, भीष्मपर्वके अध्याय २, श्लोक २३-२४ में लिखा है कि कार्तिककी पूर्णिमाके चन्द्रमाको देखकर श्रीवेदव्यासजीने धृतराष्ट्रसे कहा कि निकट
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७२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भविष्य में बड़ा भयंकर युद्ध होनेवाला है; क्योंकि चन्द्रमाका रूप अग्निके समान लाल, कान्तिहीन और लक्ष्य दिखाई पड़ता है । महाभारत, अनुशासनपर्वके १६७ वें अध्यायके २७ वें -२८ वें श्लोकोंमें वर्णन आता है कि भीष्मजीने माघ शुक्ला अष्टमी के दिन अपने शरीरका परित्याग किया था । श्री भीष्मजी बहुत दिनों तक शरशय्या पर पड़े रहे । इस हिसाब से माघशुक्लपक्षमें तो गीताजयन्ती हो नहीं सकती, प्रत्युत मार्गशीर्ष में ही हो सकती है । यदि शुक्लपक्ष न मानकर कृष्णपक्ष ही गीताजयन्तोका काल मान लिया जाय तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि महाभारत, द्रोण-पर्व में वर्णन है कि चौदहवें दिन की रात्रिमें जो संग्राम हुआ था, उस समय घोर - अन्धकार था, प्रज्वलित दीपकों ( मशालों ) के प्रकाश में ही वह युद्ध हुआ था ( देखिये अ ० १६३ ); वहाँ अंधेरे में अपने-परायेका ज्ञान न रहनेसे लोग अपने पक्षके वीरोंका भी संहार करने लगे । तब अर्जुनने युद्ध बन्द करके विश्राम करनेकी आज्ञा. दे दी ( देखिये ० १८४ ) । इस प्रकारकी अन्धकारमयी रात्रि कृष्णपक्ष में ही रहती है । इस हिसाब से गीता के प्राकट्य का समय कृष्णपक्ष नहीं हो सकता; क्योंकि गीता युद्धारम्भके कुछ पहले ही कही गई थी और उक्त चौदहवें दिनकी रात्रिके युद्धके समय में से तेरह दिन घटानेपर शुक्लपक्ष ही सिद्ध होता है । यदि कहें कि ' एकादशी के दिन ही गीता कही गई, इसका क्या प्रमाण है '? तो इसका उत्तर यह है कि उक्त चौदहवें दिनकी रात्रि में आधी रात के पश्चात् चन्द्रमाके उदय होनेपर पुनः युद्ध
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श्रीगीतोपदेशकी तिथि और गीताकी महत्ता • ७२७ नं ने I 7 त --, र य का आरम्भ हुआ था | वहाँका चन्द्रमाका वन कृष्णपक्षकी नवमीके जैसा है; क्योंकि अर्धरात्रि के बाद चन्द्रोदय अष्टमीके पूर्व हो नहीं सकता । अतः उस युद्धकी रात्रिको पौष कृष्णपक्षकी नवमी मानें तो उससे तेरह दिन घटानेपर मार्गशीर्ष शुक्ला ११ ही ठहरती है । यदि यह मानें कि प्राचीन कालकी गणना में शुक्लपक्ष पहले गिना जाता था, कृष्णपक्ष बादमें - इस न्यायसे मार्गशीर्ष कृष्ण नवमीकी रात्रिमें युद्ध हुआ, तो इसमें कोई विरोध नहीं है । उस कालसे भी १३ दिन घटानेपर तिथि मार्गशीर्ष शुक्ला ११ ही ठहरती है । इसके अतिरिक्त एकादशीका दिन पर्वकाल है और मार्गशीर्षका महीना सबसे उत्तम माना गया है, जिसके लिए स्वयं भगवान्ने गीता में कहा है- ' मासानां मार्गशीर्षोऽहम् - ( १०१३५ ) । ' इन सब प्रमाणोंके आधारपर ही अनेक पण्डितोंने यह निर्णय किया है कि मार्गशीर्ष शुक्ला ११ को ही युद्ध आरम्भ हुआ था और उसी दिन भगवान श्रीकृष्णने अर्जुनके प्रति गीतोपदेश दिया । संसारमें अध्यात्मविषयक ग्रन्थ गीता के समान और कोई नहीं है । गीतापर जितनी टीकाएं, भाष्य और अनुवाद नाना - प्रकारकी भाषाओं और लिपियों में मिलते हैं, उतने दूसरे किसी धार्मिक ग्रन्थपर नहीं मिलते । गीताकी महिमा जो पद्मपुराण में मिलती है, उसे देखनेपर मालूम होता है कि गीताके सदृश महिमा दूसरे किसी ग्रन्थकी नहीं । गीताकी महिमा महाभारतमें स्वयं वेदव्यासजी ने भी कही है- ' गीता
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७२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( i ) · सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुख-पद्माद् विनिःसृता ॥ ( भीष्मपर्व ४३ | १ ) गीताका ही अच्छी प्रकार से श्रवण, कीर्तन, पठनपाठन, मनन और धारण करना चाहिये; अन्य शास्त्रों के संग्रहकी क्या आवश्यकता है? क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ - भगवान्के साक्षात् मुखकमलसे निकली हुई है । ' ' सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः । सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्व-वेदमयो मनुः ' ॥ ( भीष्मपर्व ४३।२ ) ' जैसे मनुजी सर्ववेदमय हैं, गङ्गा सकलतीर्थमयी है और श्रीहरि सर्वदेवमय हैं, इसी प्रकार गीता सर्वशास्त्रमयी है । ' ' भारतामृतसर्वस्व गीताया मथितस्य च । सारमुद्-धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् ॥ ( भीष्मपर्व ४३ । ५ ) ' महाभारत रूपी अमृतके सर्वस्व गीताको मथकर और उसमें से सार निकाल कर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके मुखमें उसका हवन किया है । ' गीता सारे उपनिषदोंका सार है । शास्त्रमें बतलाया है-' सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ' ॥ ‘ सम्पूर्ण उपनिषद् गायें हैं, गोपालनन्दन श्रीकृष्ण उनको दुहने वाले ( ग्वाला ) हैं, अर्जुन बछड़ा है और गीताप्रेमी भगवत् जन - उनसे निकले हुए महान् गीतामृतरूपी दूधका पान करनेवाले हैं । ' सम्पूर्ण शास्त्रों में गीताको सर्वोपरि माना गया है । कहा है- ' एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एंव । एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ' | ' श्रीदेवकीनन्दन श्रीकृष्णका कहा हुआ गीताग्रन्थही एक सर्वोपरि शास्त्र है, श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वोपरि देव हैं,
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युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव ७२६ i उनके जो नाम हैं, वे ही सर्वोपरि मन्त्र हैं और उन परमदेवकी सेवा ही एकमात्र सर्वोपरि कर्म है । ' : गीता गङ्गासे भी बढ़कर है । गङ्गामें स्नान करनेका फल तो अधिक - से - अधिक स्नान करनेवालेकी मुक्ति बताया गया है I । यों गङ्गामें स्नान करनेवाला तो स्वयं ही मुक्त हो सकता है, वह दूसरों को मुक्त नहीं कर सकता; किन्तु गीतारूपी गङ्गामें स्नान करनेवाला तो स्वयं मुक्त होता है और दूसरोंको भी मुक्त कर सकता है । गीताकी भाषा भी मधुर, सरल, अर्थ और भाव - युक्त है । अतएव सभी को प्रतिदिन कम - से - कम एक अध्यायका पाठ तो और भाव समझते हुए अवश्य करना ही चाहिये । ( १३ ) युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव । कई लोग ' अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्र - सम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ' ( महाभारत भीष्मपर्व २५/२० ) इस पद्यको देखकर युद्धभूमिमें युद्ध के प्रारम्भके समय भगवद्गीता-सदृश ग्रन्थका सुनाना असम्भव मानते हैं । उनका भाव यह है कि यहाँ कहा है- ' प्रवृत्ते शस्त्र - सम्पाते ' शस्त्र प्रहार शुरू होगया था-अर्जुनने भी धनुष उठा लिया था । ' प्रवृत्ते ' शब्द में भूतकाल में ' क्त ' प्रत्यय है; तब उस समय ७०० श्लोकोंकी गीताका सुनाना संम्भव नहीं । अतः ‘ भगवद्गीता ' पीछेकी रचना है, महाभारत में पीछेसे प्रक्षिप्त की गई ' । इस पर यह जानना चाहिये कि ' प्रवृत्ते शस्त्र - सम्पाते ' में ' क्त ' प्रत्यय आदिकर्म - अर्थ में है, भूतकालमें नहीं । ' आदिकर्म का भाव
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७३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यह है कि उस कर्मसे पूर्व, शस्त्र चलने की तैयारी से पूर्व 1 संस्कृतमें इसे ' प्रवर्तितुमिष्टे ' कह सकते हैं; अर्थात् शस्त्र चलना अभी भविष्यत् था; वर्तमान नहीं हो पाया था । इसके उदाहरण भी देख लीजिये ' भवत् - कृतां भूतिमपेक्षमाणाः ' ( ३ | ४६ ) इस किरातार्जुनीयके पद्य में ' कृतां ' इस ' क्त ' प्रत्ययका भूतकाल अर्थ न होकर ' भवस्करिष्य-माणां भूतिम् ' यह भविष्यत्का अर्थ है, वैसा ही टीकाकारों ने कार्य किया है | इसीलिए ' आशंसायां भूतवच्च ' ( ३ | ३ | १३२ ) इस पाणिनि-सूत्रसे ' आशंसा ' अर्थ इष्ट होनेपर भूतवत् प्रत्यय कहा गया है । प्राशंसा भविष्यत्काल - विषयक होती है । तभी तो ' योत्स्यमानान् प्रवेदये-ऽहं य एतेऽत्र समागताः ' ( गीता ० ११२३ ) इस अर्जुनके वाक्य में कौरवोंकेलिए ' योत्स्यमानं ' यह ' लृटः सद् वा ' ( पा ० ३ | ३ | १४ ) भविष्यत् - लकार लृट् कहा गया है । यदि ' प्रवृत्त ' में भूतकाल में ' क्त ' होता, तो यहाँ भविष्यत् - लकार न हो सकता | भविष्यत् - लकार होनेसे ' प्रवृत्त ' में भी भविष्यत् काल इष्ट है । ' षट् शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः । अर्जुनः सप्त-पञ्चाशत् सप्तषष्टिं तु सञ्जयः । धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते ' ( भीष्मपर्व ० ४३।४-५ ) इस महाभारत के पद्यमें भगवद्गीताका परिभारण कहा है । इसमें श्रीकृष्णके ६२० पद्य, अर्जुनके ५७, संजयके ६७, धृतराष्ट्रका १ पद्य माना गया है । मिलकर सारी संख्या ७४५ बनती है, आजकल ७०० मिलती है । धृतराष्ट्र और संजयके श्लोक तो श्रीकृष्णने कहे नहीं; तो ७४५ से ६८ लोकोंको निकाल देने पर शेष ६७७
श्लोक बचते हैं । इनके विचारपूर्वक पाठ में डेढ घण्टा लगता है ।
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युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव ७३१ यही संवाद एक घण्टे में हो सकता है । इतने समयकी प्राप्ति इस धर्म - युद्ध में असम्भव भी नहीं, क्योंकि — महाभारतीय युद्ध कई नियमों से होता था; उन नियमोंका दिग्दर्शन मनुस्मृति ( ७/६०, ६३ ) में है कि — उसमें रथी - रथीसे, सवार सवारसे, हाथी पर चढ़ा हाथी - चढ़े से, पैदल - पैदलसे युद्ध करता था । प्रातः सन्ध्या - पूजा-पाठादिके बाद युद्ध शुरू होता था । जब तक दोनों ओर से वीर युद्धकेलिए तैयार न हों, तब तक युद्ध शुरू नहीं होता था । एक पक्षका वीर किसीसे बात - चीत के लिए गया हुआ हो; तब तक युद्ध शुरू नहीं होता था । इसके अतिरिक्त यहाँ तो सेनाकी व्यवस्थितिके समयमें भी युद्ध शुरू नहीं हुआ था । उस समय गीता शुरू हुई थी । तब उसके भी बाद जब अर्जुन गाण्डीव धनुषको तैयार कर ठहरा; तब ' ततो युधिष्ठिरो दृष्ट्वा युद्धाय समवस्थिते । ते सेने सागरप्रख्ये मुहुः प्रचलिते नृप! ' ( भीष्मपर्व ४२।११ ) विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वरायुधम् । अवरुह्य रथात् क्षिप्रं पद्भ्यामेव कृताञ्जलिः ' ( १२ ) पितामहमभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । वाग्यतः प्रययौ येन प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् । ' ( १३ ) यहाँ युधिष्ठिर कवच खोलकर अपने अस्त्र - शस्त्र छोड़कर शत्रु - सेना में भोष्मकी ओर चल पड़े; तो शत्रुयोद्धाओं ने उन्हें युद्धसे डरा देखकर उनकी निन्दा की । अर्जुन - भीम आदि तथा श्रीकृष्ण भी युधिष्ठिरको युद्धसे विरत जानकर उन्हें समझानेकेलिए उनके पीछे गये । परन्तु युधिष्ठिरने कहा कि- मैं युद्धकी आज्ञा तथा आशीर्वाद ग्रहणार्थं भीष्मद्रोणादि
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७३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गुरुओं के पास जाता हूँ । तब भीष्मके पास जाकर युधिष्ठिरने कहा कि - ' आमन्त्रये त्वां दुर्धर्ष! त्वया योत्स्यामहे सह । अनुजानीहि मां तात! आशि-षश्च प्रयोजय ' ( भीष्म ४३ ४७ ) अर्थात् मुझे युद्ध की आज्ञा तथा आशीर्वाद दीजिये । तब भीष्सने इससे अपनी प्रसन्नता प्रकट की, कहा — ' यद्येवं नाभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते! शपेयं त्वां महाराज! पराभावाय भारत! ' ( ३८ ) प्रीतोऽहं पुत्र! युध्यस्व जयमाप्नुहि पाण्डव! ( ३६ ) कि - यदि तुम न आते; तो मैं तुम्हारी हार मनाता । फिर युधिष्ठिर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य आदिके पास भी युद्धार्थ आज्ञा लेने गये । उनसे आज्ञा लेकर तब अपने रथ में बैठे । इसी बीच में श्रीकृष्ण भी कर्णके पास पाण्डवोंकी ओर से युद्ध करनेकी प्रार्थना करने गये; पर उसने स्वीकार न किया । तब वे लौट आये । पीछे युधिष्ठिरने ( भीष्मपर्व ४३।६४-६६ ) जोरसे घोषणा की कि — जो कौरवोंकी सेनासे हमारे आश्रय में आना चाहे; वह आ सकता है । तब कौरवोंकी सेनासे धृतराष्ट्रका लड़का युयुत्सु पाण्डव - सेनामें आया । पटह बजाकर उसकी घोषणा कर दी गई । उसके बाद युधिष्ठिरने कवच धारण किया और शस्त्रास्त्रोंको उठाया । इसके पीछे ही युद्ध शुरू हुआ । तब भीष्म, द्रोण, शल्य, कर्ण आदिके पास जाने, उन्हें नमस्कार करने, प्रार्थना करने, और उनसे आशीर्वाद लेनेमें थोड़ा समय नहीं बीता होगा; क्योंकि - यह वीर एक - दूसरे के निकट