पञ्चम सुमन · प्रकरण 75
श्रीरामनवमी ( वेद में अवतारवाद )
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627हरिश्चन्द्रके नाटकसे श्रीमोहनदास- गान्धी, पहिले सत्यप्रिय एवं कर्मवीर वने, फिर महात्मा तथा विश्ववन्द्य कहलाये ।
परमात्माने भी यही किया । केवल हमें अपना श्रव्यकाव्य वेद ही नहीं सौंपा, बल्कि उन वेदके सिद्धान्तोंका स्वयं अभिनय करके भी हमें सिखलाया कि - ' अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु सम्मनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम् ' ( अथर्वशौ ० सं ० ३।३०।२ ) अर्थात् पुत्र पिता के व्रतके अनुकूल चलने वाला बने, उसकी प्रत्येक आज्ञा, नियम तथा प्रतिज्ञाका पूर्ण करनेवाला बने, और माता चाहे वह विमाता ही क्यों न हो; उसकी मानसिक धर्म्य- आज्ञाओं का पूर्ण करनेवाला बने; उससे विमनस्क होकर न रहे । पत्नी पतिके आदर में, और उसके एक - एक संकेत के अनुसार चलनेवाली, पतिके सुखमें सुखिनी, पतिके दुःख में दुःखिनी, पतिसे मधुर बोलने वाली, अप्रिय व्यवहार करनेपर मनसे भी पतिका अनिष्ट न सोचने वाली, शान्तिप्रिय बने ।
वेदने यह भी कहा है कि - ' मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा ' ( अथर्वसं ० ३ | ३० | ३ ) अर्थात् भाई भाईसे द्वेष करनेवाला न बने, छोटा भाई बड़े भाईको पितृस्थानीय मानकर उसके संकेतानुसार चलनेवाला, और बड़ा भाई छोटेके दोषोंको न देखने वाला, उसके अप्रिय - कार्योंमें भी उससे बुरे व्यवहार करनेवाला न बने । बहिन बहिनसे प्रेम करने वाली बने, अपनी बहिनकी सौभाग्यवृद्धि देखकर जलती न रहे, ईर्ष्यालु न बने । कृष्ण - यजुर्वेद में भी कहा है- ' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव ' 628( तैत्तिरीयोपनिषद् २।११।२ ) अर्थात् माता, पिता एवं आचार्यका पुत्र एवं शिष्य, देवताकी भान्ति सत्कार - पूजा करनेवाला बने; उनकी आन्तरिक इहलोक एवं परलोकमें यश देनेवाली आज्ञाओं को पूर्ण करनेवाला बने । वेदके इसी श्रव्य निराकार- उपदेशको मूर्त - रूप देनेकेलिए निराकार - भगवान् ने स्वयं दृश्यरूप भी ग्रहण किया । भगवान्ने रामावतारका अभिनय दिखलाकर उसका यह सफल परिणाम दिखलाया कि - ' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्य- देवो भव ' |
वेद परमात्मा के लिए कहता है- ' त्वं हि नः पिता वसो! त्वं माता ' ( ऋ ० ८ | ८ | १२ ) इस मन्त्र में उस देव - देवको परम - पिता और परम- माता माना गया है, पर उसी परमपिताने भी हमें शिक्षा देनेकेलिए ही अपने माता - पिता बनवाने भी स्वीकृत किये । परमात्मा देवोंका भी देव है, ऐसा सारे सम्प्रदाय कहते हैं, तथा मानते हैं; पर उसी देव - देवने ऋग्वेदसंहिताके आरम्भ में ' अग्नि- मीले पुरोहितम् ' ( १।१।१ ) यहां अग्निदेवताकी स्तुति वा उपासना की । क्या अपने लाभके लिए? नहीं नहीं, हमें शिक्षा देनेके लिए । तभी तो उसीने राम बनकर दशरथको अपना पिता बनाया, उसकी प्रतिज्ञातज्ञा पूरी की । उसीने समुद्रके पार जानेकेलिए महादेवकी पूजा की । क्या अपने लाभकेलिए? नहीं नहीं । हमारे लाभ, कल्याण तथा हमें सिखलानेकेलिए । श्रीमद्भागवत में कहा है - ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं, रक्षोवधायैव न केवलं विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद् रमतः स्व आत्मनि, सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ' 629व ( ५।११।५ ) । अर्थात् परमात्माका मनुष्यावतार मनुष्यकी शिक्षार्थ होता है, केवल राक्षसोंके मारनेकेलिए नहीं । अन्यथा अपने - क्यों हो? यह सब मनुष्योंके शिक्षार्थ होता है कि अपनी स्त्रीके आपमें रमण करने वाले भगवान्को सीताके वियोग में भला दुःख 1 दुःखमें दुःखी बनो — उसका प्रतीकार करो - यह शिक्षा मिलती है । ल श्रीरामके अवतारका दिन ' चैत्रशुक्ला नवमी ' है । वह दिन उक्त शिक्षाओं के स्मरण करानेकेलिए प्रतिवर्ष आता है । ' जन्म कर्म च वं का जन्म, जीवकी तरह दिव्य ( बन्धन - परतन्त्र ) नहीं होता; किन्तु मे दिव्यम् ' ( ४ | ६ ) भगवद्गीता के इस प्रमाण के अनुसार भगवान् ता दिव्य ( स्वतन्त्र ) होता है । इसलिए उसका ' जन्म ' न कहकर उसका ज्ञा प्रादुर्भाव, प्राकट्य, अवतरण, अवतार कहा जाता है । ' जन्म ' शब्द वा ' जनी प्रादुर्भावे ' का वही आशय अन्तर्गर्भित होता है ।
भी जो उसके लिए प्रयुक्त किया जाता है, वहां भी प्रयोजकोंके T- यद्यपि परमात्मा निराकाररूप में सर्वव्यापक है; अतः उसका एकदेश ना में अवतरण, तथा कूटस्थ होने से अयोध्या - लङ्का आदि में गमनागमन के साधारणजनोंमें संशय उत्पन्न कर देता है, पर विद्वान् लोगोंको T, यहां कोई भी भ्रम नहीं होता । वे जानते हैं कि - अग्नि भी निराकार- ए रूपमें सर्वव्यापक होता है; परन्तु संघर्षादि - कारणवश वह एकदेश रे मैं भी प्रकट होजाता है । एकदेश में प्रकट होनेपर भी उसकी सर्व- हा व्यापकता में कोई बाधा नहीं पड़ती है, न ही उसके स्वरूप में कोई न्यूनता 1 आ पड़ती है — ‘ पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ( बृहदारण्यक ५।१।१ ) पूर्णके पूर्ण - अंश निकलनेपर भी वह पूर्ण ही रह जाता है । 630कहीं यदि अग्नि प्रज्वलित हो उठती है; तब उसका अन्य स्थलों में अभाव नहीं हो जाता; उसकी सर्वव्यापकता में कोई न्यूनता नहीं पड़ती । और वह प्रज्वलित अग्नि उस मूल निराकार - अग्नि से कोई भिन्न भी नहीं हो जाता, वा नहीं रहता । आकाश सर्व- व्यापक वा कूटस्थ होता है, वह घड़े में भी घटाकाश रूपसे
- रहता है, कोई पुरुष घड़े को लेकर भाग रहा होता है, तो घट वा घटाकाश भी भाग रहा हुआ मालूम होता है; उसका परिमाण भी उस समय हो जाता है; पर यह सब स्थूल दृष्टियाँ हैं, सूक्ष्म - दृष्टि- वाले जानते हैं कि – आकाशमें घड़ा जा रहा है; वह आकाश भाग नहीं रहा । सिनेमामें लोग भागते हुए मालूम होते हैं; वस्तुतः भाग नहीं रहे होते; किन्तु चित्रपर चित्र प्रकट होते जाते हैं, वहां भागना मालूम होता है । इस प्रकार विचार - दृष्टि रखने पर कोई भ्रमका अवकाश नहीं रहता । लोगोंकी शंकाएं वा भ्रम कुछ स्थूल दृष्टिवश, और कुछ अवहुश्रुतता वा अज्ञान, तथा कुछ अपने एकदेशी - पक्षके आग्रह -वश हुआ करते हैं । सनातनधर्मकी सूक्ष्मतम दृष्टि रखनेपर वे सब शंकाएं वा कुतर्क हट जाते हैं । अस्तु ।
निराकाररूपमें यद्यपि वह अग्निदेव सर्वव्यापक रहता है; तथापि वह सर्व - साधारणके उपयोग में नहीं आ सकता । प्रज्वलित अप्रज्वलित अग्नियोंका वास्तवमें तो भेद नहीं होता, परन्तु वह प्रज्वलित होकर ही सर्वसाधारणके उपयोग में आता है, और सेवनीय होता है । यह ठीक है कि सूक्ष्ममें स्थूलकी अपेक्षा अधिक शक्ति होती है, पर 631संसारी प्राणियोंके स्थूल होनेसे वे सूक्ष्मसे वह काम नहीं ले सकते । उन्होंने रोटी पकानी है; वे सूक्ष्म अग्निसे नहीं पका सकते; वहां उन्हें स्थूल - अग्नि अपेक्षित होती है ।
यही बात भगवान्केलिए भी जाननी चाहिये । तब वह अग्निरूप- देव यद्यपि यहां प्रज्वलित होकर फिर पृथ्वी से तिरोभूत हो जाता है; तथापि दिव्यतावश उसकी वह प्रकट हुई हुई शक्ति भी इस पृथिवीमें अक्षुण्ण रहा करती है; और वह शक्ति वेदमन्त्र- प्रतिष्ठित पार्थिव मूर्तिद्वारा विशेष आयतनमें दुही जा सकती है । वही दुही हुई प्रज्वलित शक्ति भक्तोंके मनोरथोंको पूर्ण करती है; और अधिकारियों द्वारा उसकी उपासना की जा सकती है । मूर्तिपूजा करनेका रहस्य भी यही है ।
परमात्मा के निराकार होनेका भी यह भाव नहीं है कि- उसका कुछ भी आकार नहीं; वैसा इष्ट होनेपर तो परमात्मामें शून्यतापन्ति हो जावेगी । वस्तुतः उसका अर्थ है कि — अनिर्वचनीय आकार वाला । अत्यन्त - सूक्ष्मतावश हम उसे न देख सकते हैं; न उसका किसी भी भांति वर्णन कर सकते हैं; न जान पाते हैं; अतः वह निर्विकल्पकज्ञान - ग्राह्य हो जाता है । इसी अनिर्वचनीय- आकारवश ही उसे निराकार कहा जाता है, किसी भी प्रकारके आकारके अभाव के कारण नहीं । इसी कारण सनातनधर्मी परमात्माको साकार भी कहते हैं । परमात्माकी केवल निराकारता आर्यसमाजके स्वा ० दयानन्दजीने चलाई है; पर उन्हें भी परमात्मा सूक्ष्मतम आकारवाला मानना ही पड़ा है ।
632' सत्यार्थप्रकाश ' के प्रथम संस्करण ( १७-१८ पृष्ठ ) में ' निराकार ' का ' निर्गत श्राकारो यस्मात् ' यह विग्रह किया था; परन्तु जनताने स्वामीजीको लज्जित किया कि इस विग्रहसे परमात्मा पहले साकार सिद्ध हो जाता है; क्योंकि उसमें पहले आकार था, तभी तो निकल गया । यदि उसमें कोई आकार नहीं था, तो निकल क्या गया? | तब स्वामीने अपने सिद्धान्तके भङ्गके डर से स ० प्र ० के द्वितीय संस्करण ( पृ ० १० ) में पूर्वके बहुव्रीहि - विग्रहको बदलकर तत्पुरुष समासका विग्रह क्रिया- ' निर्गत आकारात् स निराकारः । पर ' भक्षितेपि लशुने न शान्तो व्याधिः ' ( निषिद्ध लहसुन खाया भी सही कि यह व्याधि दूर हो जावे; पर व्याधि गई भी नहीं ) इस न्याय से इस विग्रहमें भी परमात्माकी साकारता सिद्ध रही । ' आकारसे निकला हुआ ' - इससे भी उसका आकार सिद्धं ही रहा । बल्कि इस विग्रहमें त्रुटि भी हो जाती है । वह यह कि - द्रव्यसे तो गुण होता है, पर गुणसे द्रव्य नहीं होता । परमात्मा द्रव्य है, और आकार गुण; तब परमात्मासे तो आकार निकल सकता है; पर गुण - आकारसे द्रव्यरूप परमात्मा कैसे निकले? | यह स्वामीने स ० प्र ० में स्वयं भी स्वीकृत किया है- ' गुणसे द्रव्य कभी नहीं बन सकता ' ( १३ समु ० ३०० पृष्ठ ) । तब ' निराकार ' शब्दसे भी उस परमात्मा का आकार सिद्ध हो रहा है ।
स्वा ० दयानन्दजीने परमात्माकेलिए लिखा है- जब ' वह ( परमात्मा ) प्रकृतिसे भी सूक्ष्म और उसमें व्यापक है ', ( स ० प्र ० ८ समु ० १३३ पृष्ठ ) यहां परमात्माको प्रकृतिकी अपेक्षा भी सूक्ष्म 633बतानेसे उसका सूक्ष्मतम आकार सिद्ध कर दिया गया । केवल निराकार इष्ट होने पर अपेक्षाकृत सूक्ष्मत्व भी परमात्मामें नहीं हो सकता । इस प्रकार स्वामीने अन्यत्र भी कहा है- ' जो स्थूल होता है, वह प्रकृति और परमाणु जगत्का उपादान कारण है, और वे ( प्रकृति, परमाणु ) सर्वथा निराकार नहीं; किन्तु परमेश्वरसे स्थूल और अन्य कार्यसे सूक्ष्म आकार रखते हैं; ( पृ ० १३३ ) यहां स्वामीने कार्यको प्रकृतिकी अपेक्षा स्थूल माना है, और प्रकृतिको परमात्माके आकारकी अपेक्षा स्थूल कहा है । इस प्रकार परमात्माके प्रकृतिकी अपेक्षा भी सूक्ष्म कहने से वह सूक्ष्मतम श्राकारयाला, अतः साकार तो
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सिद्ध हो ही गया । इसलिए स्पष्ट हैं कि - ' निराकार ' शब्दमें ' निर ' ' अनुदा कन्या'के नचूकी तरह अल्पार्थक, अस्फुटार्थक ही सिद्ध है, निषेधार्थक नहीं, नहीं तो परमात्मामें शून्यतापत्ति हो जावेगी ।
इस प्रकार ' जीवका स्वरूप... अल्प अर्थात् सूक्ष्म है और परमेश्वर अतीव सूक्ष्मात् सूक्ष्मतर... स्वरूप है ' ( स ० प्र ० ७ पृ ० ११६ ) यहां भी स्वामीजीने परमात्माका स्वरूप आत्मा के आकार की अपेक्षा मी सूक्ष्मतर माना है; तब परमात्मा साकार भी सिद्ध हो ही गया । इस प्रकार अन्यत्र भी स्वामी ने कहा है- ' परमेश्वर अतिसूक्ष्म और जीव उस [ परमात्मा ] से कुछ स्थूल होनेसे इनका स्वरूप भी भिन्न है ' ( स ० प्र ० ७ पृ ० १२३ ) यहां भी परमात्माका आकार आत्माकी अपेक्षा सूक्ष्मतर कहने से उसका आकार सिद्ध हो ही गया । इसलिए स्पष्ट हैं कि - ' निराकार ' शब्दमें ' निर'का ' अनुदरा कन्या, अन मित्रो राजा, अजातशत्रुर्युधिष्ठिरः, निर्मक्षिकम् आदिको 634भांति ' अल्प ' अर्थ ही है । आकाश और जीवको निराकार कहा जाता है; पर स्वामी आकाश तथा जीवको परमात्मासे कुल स्थूल मानते हैं; तब जेसे वे सूक्ष्म आकारवाले होनेसे ' निराकार ' कहे जाते हैं; वैसे परमात्मा भी सूक्ष्मतम चाकार वाले होनेसे ' निराकार ' कहा जाता है, आकार के अभाव होने से नहीं ' । अस्तु ।
जो कि यह आशय कहा जाता है कि - ' परमेश्वर सबसे बड़ा एवं निराकार है, वह मनुष्य आदियों के लघु - शरीरमें और अत्यन्त- लघु- गर्भाशयों में कैसे प्रवेश कर सकता है; अतः परमात्माका अवतार नहीं हो सकता ' इसपर जानना चाहिये कि आकाश भी सब संसारी वस्तुओंसे महान् है, और निराकार है, ईश्वरकी अपेक्षा महास्थूल है; क्योंकि परमात्माके लिए ' सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ' कहा गया है । इस प्रकार उसकी अपेक्षा स्थूल भी प्रकाश घट आदि छोटे - छोटे पदार्थोंमें पूर्णतया प्रविष्ट होकर घटमें घटाकाश नामसे, तथा मठ आदि में मठाकाश आदि नामों से प्रसिद्ध होता है । घट आदि उपाधिके हटने से उस आकाशका नाश नहीं होता, तब आकाशसे भी महासूक्ष्म परमेश्वर भी यदि माताके गर्भाशय में प्रविष्ट हो जाता है और दिव्य रूप से अवतीर्ण हो जाता है; तो इसमें श्राश्चर्य क्या?
तब धर्मको क्षीयमाण देखकर जिस प्रकार से उसकी रक्षा
* इस विषय में विशेष - स्पष्टता श्रीसनातनधर्मालोक - चतुर्थ पुप्पमें ' अवतारवाद - रहस्य ' में देखें । इस पुष्पका मूल्य ४ । ) है । पाठक हमसे मंगा सकते हैं । डाकव्यय पृथक् ।
635देखता है; उसी ही प्रकारसे देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदिके शरीरोंमें प्रकट होकर धर्मकी रक्षा करता है, और अपने स्वरूप में भी । तथाभूत ही स्थित रहता है । जैसे आकाश घटके भीतर . विद्यमान होकर घटाकार दीखता है, घटाकृतिके दूर होनेपर वही घटाकाश अपने स्वरूप में आ जाता है, घटरूप उपाधिके योगमें भी आकाशमें कोई विकार नहीं रहता; वैसे परमात्माके अवतारके विषय में जान लेना चाहिये ।
उसी भगवान्के अवतार श्रीरामका चरित्र जाननेकी यदि इच्छा हो तो वाल्मीकि रामायण देखना चाहिये I । वहां पता लगेगा कि- आदिकविने किस मधुरिमा से और किस मार्दवसे रामचरित्र अङ्कित किया है । परन्तु आजका समय विचित्र है । वह कहता है कि- ' तुलसी- रामायण ( मानस ) में तो श्रीरामको भगवान् वा उसका अवतार स्पष्टरूपसे कहा है; पर वाल्मीकि रामायण में ऐसा नहीं है । वहां तो श्रीरामको पूर्ण मानव ही प्रसिद्ध किया गया है, ईश्वर नहीं । तब बाल्मीकि रामायणके आधारसे बनाये हुए ' मानस ' में गोस्वामी तुलसीदासने अपनी ही निर्मूल कल्पनाएँ डाल दी हैं; जिनका वाल्मीकि रामायणसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं । वाल्मीकि ० में श्रीराम के मुखसे स्पष्ट कहलवाया गया है - ' आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् ' ( ६।११६।६ ) ।
इस प्रकारके वक्ता सचमुच दयनीय हैं । राम परमात्माके अवतार सिद्ध न हो जाएँ; इस कारण उसकी अवतारताकी स्पष्टता बतानेवाले उत्तरकांडको वे रामायण से काटते हैं कि वह
636श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
वाल्मीकि - प्रणीत नहीं; वा उसका अङ्ग नहीं । परन्तु इस प्रकारके वक्ता वस्तुतः परप्रत्ययनेय - बुद्धि हैं । वाल्मीकि - रामायणमें तो स्थल - स्थल में श्रीरामको परमात्माका अवतार कहा और माना गया है । हां, यह अवश्य है कि जैसे श्रीकृष्ण गीताके श्लोक - श्लोकमें अपनेको स्पष्टतया परमात्मा घोषित करते हैं; वैसे श्रीराम नहीं । उसका कारण यह है कि — श्रीकृष्ण में दिव्यांश अधिक है, जिसके कारण उन्हें षोडश - कलासम्पूर्ण माना जाता है— उनमें लोकोत्तरता भी कुछ आगई है । इसलिए उनके कई चरित्र भी लोकोत्तर होने से सर्वसाधारणके अनुकरण - योग्य नहीं ठहरते । परन्तु श्रीराम के सम्बन्धमें ऐसा नहीं । उनमें श्रीकृष्णकी अपेक्षा कुछ न्यून ( बारह ) कला होने से वे लोकानुकरणीय चरित्र हो गये हैं । इस- लिए उन्हें संसार में ' मर्यादा पुरुषोत्तम ' माना जाता है । इसलिए उन्होंने अपने श्रीमुख से अपनी ' भगवत्ता ' सुस्पष्ट नहीं बताई । परन्तु रामायणमें उन स्थलोंकी न्यूनता नहीं है— जहां उन्हें भगवान्का अवतार संकेतित किया गया है । बल्कि रामायणके आरम्भसे अन्ततक यह बात भरी हुई है । इस विषय में विस्तार से हम अन्य पुष्पमें लिखेंगे । अब यहां कुछ उद्धरण दिये जाते हैं ।
जब महाराज दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे; तभी दूसरी ओर देवतागण भगवान् को दाशरथिरूप में अवतार लेकर रावण वधार्थ प्रार्थना कर रहे थे कि - ' राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो! ' ( १।१५१६ ) अस्य पुत्रत्वमागच्छ कृत्वात्मानं चतुर्विधम् । तंत्र. एवं मानुषो भूत्वा प्रवृद्ध लोककएटकम् ' ( २१ ) अवध्यं दैवतैर्विष्णो! 637समरे जहि रावणम् ' ( २२ ) यहां श्रीरामकी भगवदवतारता स्पष्ट है । ' त्वं ब्रह्मा त्वं च वै विष्णुः, त्वं रुद्रस्त्वं प्रजापतिः ' ( ७१७ ) मैत्र्युपनिषत् के इस प्रमाणमें परमात्माको ' विष्णु ' कहा है । महाभारतमें विश्व- रूपधारी हरिने ' सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च । अहं दाशरथी राम्रो भविष्यामि जगत्पतिः ( शान्तिपर्व ३३६।८५ ) रामको अपना अवतार कहा है ।
विश्वामित्रने भी दशरथको यह संकेत किया था - ' शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा । ' ( १ । १६ । ६ ) राक्षसा ये विकर्तारः तेषामिह विनाशने ' ( १० ) यहां सोलहवर्षसे छोटी आयुवाले श्रीराम का दिव्य तेज बताकर उसे विष्णुका अवतार सूचित कर दिया है । नहीं तो दुर्दान्त - राक्षसोंके मारनेकेलिए महारथी दशरथको न ले जाकर एक - चालक रामका अपने साथ लेजाना विश्वामित्रका और क्या अर्थ रखता है?
परशुरामने पराजित होकर रामको स्पष्ट कहा था- ' अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम् ' ( १२७६/१७ ) इससे अधिक अवतारताकी स्पष्टता कैसी हो? अयोध्याकाण्डके प्रथम - सर्गमें भी इसकी चर्चा है - ' स हि देवैरुदीर्णेस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ' ( १७ ) यहां श्रीरामको स्पष्ट सनातन - विष्णु कहा है । ' सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ' ( २।४४।१५ ) दैवतं देवतानां च ' ( २।४४ । १६ ) इस सुमित्राके वाक्यमें भी श्रीराम की अवतारता स्पष्ट है ।
अरण्यकाण्ड में भी जब शरभङ्गमुनि अपनी तपस्या से अर्जित 638लोक श्रीरामको अर्पण करते हैं, तब श्रीरामने कहा था- - ' ' अहमेवा- हरिष्यामि स्वयं लोकान् महामुने! ' ( ३ | ५ | ३३ ) यहां श्रीरामने मुनिको स्वर्गादिलोक - प्रदान कहकर अपनेको अवतार सिद्ध कर दिया है । इस प्रकार सुतीक्ष्णमुनिके प्रकरण में भी । इस प्रकार ' त्वयि देववरे राम! ' ( ३।७४ । १२-१३ ) इस शवरीके वाक्यमें भी श्रीरामको ' देव- वर ' कहकर और उनकी पूजासे शवरीकी स्वर्गप्राप्ति कहकर श्री - वाल्मीकिने श्रीरामको अवतार सिद्ध कर दिया है ।
इस प्रकार सुन्दरकाण्ड में भी ' ब्रह्मा स्वयम्भूः चतुराननो वा, रुद्रस्त्रिनेत्रः त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुन शक्ता युधि राघवस्य ' ( ५१।४४ ) इस हनुमान् के वचनमें भी अवतारता स्पष्ट है । युद्धकाण्ड में तो श्रीरामका अलौकिक - प्रभाव बहुत स्थलों में स्पष्ट है । रावणवध के बाद मन्दोदरीने भी रावणको लक्ष्य करके कहा था कि — तुम्हारे सामने आया हुआ देवराज इन्द्र भी डरता था; तब मनुष्यने तुम्हें कैसे मार डाला, यह मुझे बड़ा आश्चर्य है! अन्तमें उसने कहा था- ' व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः । अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान् । तमसः परमो, धाता शङ्ख- चक्रगदाधरः ' ( ६।११३।११-१२ ) मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्य- पराक्रमः ' ( १३ ) यहां श्रीरामको भगवान्का अवतार कहा है । इस प्रकार युद्धकाण्डके अन्तिम ( ११७ ( ११६ ) सर्गमें भी श्रीरामकी अवतारता स्पष्ट है ।
इस प्रकार ३ | १ | १८ आदि पद्योंमें ऋषियोंका रामके प्रति अञ्जलि करना भी श्रीरामकी भगवदवतारता बता रहा है; नहीं तो 639वे क्षत्रियको नमस्कार क्यों करते? अन्यान्य भी इस विषय में बहुत प्रमाण हैं । ' आत्मानं मानुषं मन्ये ' ( ६।११६६ ) यह श्रीरामका कथन तो अपनी मर्यादा पुरुषोत्तमता प्रदर्शनार्थ है, अवतारत्वके हटानेके लिए नहीं । नहीं तो मनुष्यका अपने आपको मनुष्य कहना क्या अर्थ रखता है? फलतः श्रीवाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम परमात्मा केही अवतार हैं ।
वेदमें अवतारवाद ।
वेद में भी वीजरूपसे अवतारवाद तथा रामावतारका वर्णन मिलता है | ‘ प्र तद् विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठा: ' ( यजु: ५।२० ) इस मन्त्र में विष्णु भगवान्को ' कुचर ' ( कौ पृथिव्यां चरति ) कहा है । उस सर्वव्यापकका भी कुचर— पृथिवीपर संचरण कहना उसकी अवतारता सिद्ध करता है । इसी को इन्द्रके लिए मानकर श्रीउवटने ' सर्वैरेतैर्मृगादिभिः पदैः इन्द्रो विशिष्यते । स हि विष्णोरुपमानं भवितुमर्हति । मृगो न - मृजूष् शुद्धौ । शुद्धोऽपहतपाप्मा इन्द्रः... कुचरः - कौ पृथिव्यां चरतीति कुचरः, मत्स्यकूर्मादिरूपेण ' तथा श्रीमहीधरने- ' कुचरः - मत्स्यकूर्मादि- रूपेण इन्द्रः पृथिव्यां चरति ' यह लिखकर वेदमें अवतारवादकी स्थिति बता दी है । ' मत्स्यकूर्म आदि ' यहांपर आदि शब्दसे रामावतार भी स्वयं गृहीत हो जाता है — क्योंकि — उनमें उसकी गणना भी है ।
' प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ' ( यजुः वा ० सं ० ३१।१६ ) इस मन्त्र में प्रजापति - परमात्माका गर्भमें 640सञ्चरण करते हुए भीतर से साधारण - पुरुषकी भांति उत्पत्ति न कहकर कई ढंगसे विशेष प्राकट्य कहा है । ' विजायते ' का अर्थ स्वा ० दयानन्दजीने भी ' विशेषकर प्रकट होना ' कहा है । सो ' विशेषकर प्रकट होना ' ही तो ' अवतार ' होता है, वैसे वह अप्रकट- रूपमें तो सर्वत्र व्यापक रहता ही है । ' स एव पुरुषः प्रजापतिः अस्य गर्भस्य अन्तः अजायमानः चरति, स एव बहुधाऽनेकप्रकारं विजायते ' यहां श्रीउवटने ' स सर्वात्मा प्रजापति: अन्तर्हृदि स्थितः सन् गर्भमध्ये प्रविशति, यश्च अनुत्पद्यमानो नित्यः सन् बहुधा कार्यकारणरूपेण विजायते - मायया प्रपञ्चरूपेण उत्पद्यते ' यहां श्री- महीधरने भी वही अवतारका अर्थ किया है । सर्वात्माका कार्य- कारणरूपसे अपनी मायासे उत्पन्न होना ही तो अवतार होता है ।
इसी वेदमन्त्रकी स्पष्टता करनेवाले अन्य भी वेदमन्त्र देखिये - ' एषो ह देवः प्रदिशोऽनुसर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्टति सर्वतोमुखः ' ( वा ० यजु ० ३२।४ ) ' रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव, तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरूष ईयते ' ( ऋ ० ६।४७११८ ) इन मन्त्रों में उसी परमात्माको गर्भके भीतर जाने वाला, और उसको प्रकट होनेवाला एवं पुरुरूप - बहुरूप कहा है । यही तो अवतारवाद है ।
इन्हीं वेदमन्त्रोंका भगवान् श्रीकृष्णने भगवद्गीता में अपने श्री- मुखसे यह अनुवाद किया है - ' जोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ' ( ४।६ ) । ' बहू
व्यतीतानि जन्मानि ( ४ | ५ ) ' जन्मकर्म च मे दिव्यं ' ( ४ | १ ) अब उक्त
641वेदमन्त्र गीता - श्लोक
वेदमन्त्र तथा इन गीता - पद्योंकी ' आलोक ' के पाठकगण तुलना देखें- अजायमानः जोपि सन्
प्रजापतिः, देवः, इन्द्रः भूतानामीश्वरोपि सन्
जातः जनिष्यमाणः, गर्भे अन्तः वहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि बहुधा विजायते, चरति गर्भे अन्तः सम्भवामि ( संभवति )
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते सम्भवाम्यात्ममायया
जन्म कर्म च मे दिव्यम्
वेद अपौरुषेय भगवद् - चाणी है, और भगवद्गीता पौरुषेय- भगवद् - वाणी; तब दोनों स्थलों में पूर्ण- तुलना हो जानेसे अवतार- वाद वैदिक सिद्ध होगया । जब ऐसा है; तो वेदमें अवतार- विशेषके वीज भी मिल सकते हैं । -
' भद्रो भद्रया सचमान आगात् स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात् । सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितिष्ठन् उशद्भिर्वर्णैः अभि राममस्थात् ' ( ऋ ० १०।३।३ ) । रामभद्र श्रीरामका नाम ' उत्तररामचरित ' आदिमें बहुत प्रसिद्ध है । ' विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपद- लोपः ' ( ' अप्रत्यये तथैवेष्टः ' वा ० ५२३ | ८३ ) इस वार्तिकसे ' सत्यभामा, भामा, सत्या ' की तरह ' रामभद्रः, भद्रः, रामः ' यह प्रयोग बन सकते हैं । सो उक्त मन्त्रमें ' भद्रः ' राम - शब्दके लोप होने से ' रामभद्र ' का वाचक है, और उक्त मन्त्रके अन्त में ' राम ' में ' भद्र'का उक्त वार्तिकसे लोप हो गया है ।
' अब उक्त मन्त्रका अर्थ यह हुआ, ' भद्रः - रामचन्द्रः, भद्रया- 642+६४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
सीतया सह गात् वनं प्राप्तः । स्वसारं - सीतां ग्रहीतु जार: - रावणः, पश्चात् —रामपरोक्षे अभ्येति श्रागतः । ततो रावणे हते,
द्युभिः - रामदारैः सीतया सह - इत्यर्थः, अग्निः – अग्निदेवता,
श्रीरामभद्रस्य अभिमुखम् अस्थात् - स्थितः ' । राममभि— श्यामवर्णस्य
हो रहा है कि - श्रीराम सीताके साथ वनमें यह अर्थ कैसा अन्वित
रावण आया ( सीता को ले गया, रावणके पहुँचे, श्रीरामके पीछे
रामकी खीके साथ श्रीराम के सामने मरनेपर ) अग्नि - देवता
उपस्थित हुआ ।
- रामायण तथा श्रीनीलकण्ठका भाष्य भी
इस अर्थ में मन्त्र
साक्षी है । यदि अर्वाचीन होनेसे उस भाष्यकी मान्यता मानी जावे; तो स्वामी दयानन्द आदिका भाष्य तो उससे भी अर्वाचीनतर, कलका बना होने से आक्षेप्ता को भी अमान्य मानना पड़ जायगा ।
वेद में किसी सिद्धान्त के बीज ही तो देखने पड़ते हैं; नहीं तो वेदमें वादियोंसे मान्य १६ संस्कारोंका तथा गुरुकुल आदिका भी क्रमिक एवं स्पष्ट वर्णन न होनेसे अमान्यता हो जावेगी । केवल बीज देखकर शेष बातोंका अनुमान करना पड़ता है ।
एक प्रश्न होता है कि – ' उक्त मन्त्रमें सायण आदि भाष्यकारोंने ' राम ' का अर्थ ' श्यामवर्ण ' किया है; उवट - महीधरने ' कृष्ण ' का अर्थ ' कृष्णवर्ण ' किया है, अवतारवादका अर्थ नहीं किया; आप यह अर्थ कैसे करते हैं '? इसपर निवेदन यह है वेदका मुख्य विषय यज्ञ होनेसे ( जैसे कि - न्यायदर्शन ४ । १ । ६२ यदि बहुत प्रामाणिक पुस्तकों में कहा गया है ) सायरण आदि भाष्य- 643कारोंने भाष्य में भी मुख्यतया याज्ञिक दृष्टि रखी है । पर श्रीसायणने ' इदं विष्णुर्विचक्रमे ऋ
( ० १।२२।१६ - १७ ) मन्त्रके भाष्यमें ' विष्णोस्त्रिविक्रमावतारे पादत्रयक्रमणस्य पृथिव्यपादानम् ' इत्यादिमें वामनावतारका निरूपण करके अवतारवादको वैदिक सिद्ध कर दिया है । श्रीडवट - महीधरको साक्षी तो हम पूर्व बता ही चुके हैं । जब उन प्राचीन भाष्यकारोंके अनुसार वेदमें अवतारवादकी स्थिति सिद्ध हो गई; तब उसमें विशेष अवतारका बीज भी मिल सकता है । सो ' भद्रो भद्रया ' मन्त्र में वह बात वीजरूपसे मिल रही है । यदि यहां श्रीसायणने ' राम ' का श्याम रंग, वा अन्धकार अर्थ कर दिया है; तो श्यामवर्णवाले श्रीरामका वर्णन इसमें सिद्ध हो गया । ' यथा नाम तथा गुणः ' पूर्वके नाम गुणानुसार रखे जाते थे ।
अब फिर प्रश्न हो सकता है कि उक्त मन्त्रमें ' राम ' का नाम तो
गया है, पर सीता तथा रावणका नाम इसमें स्पष्ट नहीं । व बीजरूपसे बताया गया; तो जबतक वेद में कहीं राजा रामका, वा उनके पिता दशरथका, उनकी नगरी अयोध्याका तथा सीता एवं रावणादिका, अन्य किसी मन्त्र में बीज न मिले; तबतक ' भद्रो भद्रया ' में उनका अर्थ कैसे संकेतित हो सकता है? ' इस पर हम उन प्रश्नकर्ताओंके सन्तोषार्थ इनके बीज भी दिखलाते हैं-
' प्र तद् दुःशीमे, पृथवाने, वेने, प्र रामे वोचमसुरे ' ( ऋ ० सं ० १०।६३।१४ ) यहां राजाओं का वर्णन है; उन राजाओं में रामका नाम भी आ गया है; तब इसमें वही तो ' रघुपति, राघव, राजा - राम, सिद्ध हुए । यहां ' काला रंग ' अर्थ भी किसी भाष्यकारने नहीं 644किया | यदि कहा जाये कि - यहां ' रामे असुरे ' कहा गया है; तो किसी ' दैत्य- राम ' का वर्णन हो सकता है; वे दाशरथि राजा - राम कैसे हो सकते हैं? ' इसपर जानना चाहिये कि - ' असुर ' शब्द यहां ' राम ' का विशेषण है; और विशेषण सदा यौगिक हुआ करता है । सो ' असुर ' का अर्थ है बलवान् । वेदमें वरुण देवता ( यजुः वा ० सं ० १४।२० ) के लिए भी ' असुर ' विशेषण एतदादि - अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । जैसे कि – ' वरुण!... असुर ' ऋ
( ० ११२४ | १४ ) इत्यादि । सो बलवान् राजा - राम दाशरथि ही यहां सिद्ध हुए । अर्वाचीन विचारोंके रखनेवाले श्रीविनायक चिन्तामणि वैद्य - राव - बहादुर ने भी उक्त मन्त्रमें श्रीरामावतारका बीज माना है । जैकोबी यदि पाश्चात्य विद्वान् भी रामायणी - कथाके बीज वेद में मानते हैं ।
वादी भी मानते हैं कि - वेदमें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीन प्रकार के अर्थ होते हैं; तो यदि ' राम ' का एक अर्थ अन्धकार वा श्यामवर्ण है; तो अन्य अर्थ श्यामवर्णके ईश्वरावतार ' राम ' का भी स्वतः सिद्ध है । महाभाष्यकारने ' चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादाः ' ( ऋ ० ४ | ५८ ३ ) इस अग्निदेवता वाले याज्ञिक- मन्त्रको भी शब्द - शास्त्र- व्याकरणकी ओर लगाया है । ' सुदेवो असि वरुण ' ( ऋ ० ८६६१२ ) इस मन्त्रमें सात नदियों- का वर्णन होनेपर भी भाष्यकारने इसका ' शब्दकी सात विभक्तियों ' का अर्थ लगाया है । आप्ताओं के मान्य स्वामी दयानन्दजीने ' द्वादश प्रधयः चक्रमेकं... त्रिशता न शङ्खवोऽर्पिता षष्टिः ' ( ऋ ० १।१६४।४८ ) इस मन्त्रका देवता अपने देदभाष्य में 645' संवत्सरात्मा कालः ' यही माना है, है भी यही । श्रीयास्कने भी निरुक्त ( ४।२७११ ) में यही अर्थ बताया है; पर स्वामी दयानन्दजीने इन सबसे विरुद्ध इसका हवाई जहाज अर्थ कर डाला, तब आक्षेप्ता लोग अपने स्वामीको आक्षिप्त न करके हम पर इस अर्थ करने में आक्षेपके अधिकारी कैसे हो सकते हैं? सो सायणादिने वेदका भाष्य याज्ञिक दृष्टिको मुख्य रखकर किया है । पर यह कोई इयत्ता नहीं कि - श्राध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक अर्थ रखनेवाले वेदका केवल इतना ( याज्ञिक ) ही अर्थ हो ।
अव उक्त मन्त्रमें सीता तथा रावण आदिके अर्थ करने पर जो हमपर प्रश्न होता है कि - राम, सीता, रावण यादिका अन्य मन्त्रों में भी बीज दिखलाया जावे; तदनुसार हम वे मन्त्र भी प्रकरण होनेसे बताते हैं—
हम आरम्भ में ' अनुव्रतः पितुः पुत्रो ' आदि वेदमन्त्रोंमें रामा- वतारका सामान्यरूपसे वर्णन दिखला चुके हैं । अब विशेष - बीज भी वेदमें देखिये - । अथर्ववेदसंहितामें ' अयोध्या ' नगरीका भी वर्णन आया है । जैसा कि - ' अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूः ( नगरी ) अयोध्या । तस्यां हिरण्मयः कोश: स्वर्गो ज्योतिषावृतः ' ( अथर्व ० १०।२।३१ ) यहां अयोध्या में ' ज्योति ' से आवृत, विष्णुके अवतार श्रीराम ' हिरण्यमय - कोश ' शब्दसे इष्ट हैं । ' स्वर्ग ' ह उनका विशेषण है – ' स्वः स्वर्गं गच्छतीति स्वर्गः ' । स्वर्ग में जानेकी यह उनकी कथा उत्तरकाण्डके अन्त में स्पष्ट है ।
‘ सरयूः सिन्धुरूर्मिभिः ' ( ऋ ० १०।६४।६ ) यहां वेदमें ' सरयू ' 646नदीका वर्णन है । सरयू - नदीका अयोध्या के साथ विशेष - सम्बन्ध है । तब अयोध्यानगरी भी सत्ययुगसे सिद्ध है, उसे मनुने बनाया था ( वाल्मीकिरा ० ११५२५- ६ ) मनुका नाम भी वेद में ( ऋ ० ४।२६।१ ) स्पष्ट है | जब वेद॒में सरयू नदीका वर्णन है; तब वेदकी अयोध्या- नगरी भी वही सरयू - नदीके तट वाली सिद्ध होगी । इससे वेद पीछे के सिद्ध नहीं हो जाते । उत्तररामचरितमें कहा है- ' ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ' ( १।१० ) आद्य ऋषियों ( वेदों ) की वारणी पहले चलती है कि - ' अयोध्या '; और वह ' अयोध्या'- पदार्थ पीछे अपने समयपर होता है । जैसे कि - ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता ' ( ऋ ० १ । १६१।३ ) यहाँ वेदमें सूर्य - चन्द्रमाका नाम पहले आया है; पर वे वेदसे पीछे अपने समयपर बने ।
' चत्वारिंशद् दशरथस्य शोणाः ' ( ऋ ० सं ० १।१२६ / ४ ) यहाँ पर राजा दशरथका संकेत है । जो वेद भाविनी सरयू, तथा अयोध्या को जानता है, वैसे ही राजा दशरथको तथा श्रीरामको भी जान सकता है । ' अर्वाची सुभगे! भव सीते! वन्दामहे त्वा ' ( ऋसं ० ४ । ५७१६ ) यहाँ सीताकी वन्दना आई है । यदि प्रतिपक्षी लोग ' सीता ' का अर्थ ' लाङ्गलपद्धति ( हल की रेखा ) ' मानें; तो वह जड़ है । यदि वादी उसे नमस्कार मानेंगे, तो उनके मत में ' वेदमें मूर्तिपूजा ' सिद्ध हो जायंगी । हमारे अनुसार वहाँ लाङ्गलकी अधिष्ठात्री देवता श्रीसीता ही इष्ट है । वाल्मीकि रामायणमें भी श्रीसीताका आविर्भाव लाङ्गलसे ही स्वीकार किया गया है; तभी तो उसका नाम ' सीता ' रखा गया था - ' यथा नाम तथा गुणः ' ।
647वेद में श्रीरामावतार
जैसे कि - ' अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः । क्षेत्रं शोचवता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ' ( १।६६।१४ ) सूर्यमण्डलाधिष्ठाता देवको भी ' सूर्य ' कहा जाता है, इस प्रकार सीताधिष्ठात्री देवताको भी ' सीता ' । इस कारण उत्तरकाण्डके अन्तमें भी सीता उसी पृथिवीमें प्रविष्ट हो गई हुई दिखलाई है ।
' इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाऽनुयच्छतु ' ( ऋ ० ४ | ५७७ ) यहाँ श्रीरामद्वारा सीताकी निग्रह - कथा; तथा पूषा ( अग्निदेवता ) द्वारा उस सीताको वापिस लौटाना सूचित किया है । यहाँ पर ' इन्द्र ' से ' रामावतार ' इष्ट है, जैसा कि - उवट -महीधरके भाष्य द्वारा इन्द्रका कुचरत्व - अवतार लेना हम बता चुके हैं । ' ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः ' ( अथर्व ० ४।६।१ ) यहाँ पर दश - मुख- रावणका संकेत है ।
फलतः वेदमें अवतारवाद तथा श्रीरामावतार भी सिद्ध होने से श्रीरामनवमी वैदिक - पर्व सिद्ध हुआ । ' नौ'का अङ्क ब्रह्मका प्रतिनिधि होता है, ' सीताराम ' भी ब्रह्म हैं एतदादि - वर्णन हम ' मालाकी मणियाँ १०८ ' ( पृ ० ४०१ ) में कर चुके हैं, सो ब्रह्मके अवतार श्रीरामने ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद् रमतः स्व आत्मनि सीताकृतानि व्यसना- नीश्वरस्य ' ( श्रीमद्भागवत ५।१६।५ ) इस कथनसे अवतार लेकर जहाँ राक्षसोंका वध किया है, वहाँ ' मर्त्यशिक्षण ' भी किया है, सो मनुष्योंको इस अवतारसे शिक्षा भी ग्रहण करनी चाहिये ।
श्रीरामने अपने अवतार से कई शिक्षाएँ भी दी हैं । उन्होंने 648सूचित किया है कि - अपनी स्त्री तथा धन आदिका अपहर्ता आततायी होता है; अपने बलको बढ़ाकर अपने भ्राताओं वल्कि - बन्दरों - तककी सहायतासे भी उसके देशकी ईंट से ईंट बजाकर उसका वध कर देना चाहिये; उसके आगे भूख हड़तालों वा अपने प्राण देने से कोई लाभ नहीं होगा; क्योंकि इन बातोंका प्रभाव सहृदयोंपर ही पड़ता है । आततायी सहृदय नहीं होता, कठोर होता है, उसका हृदय ही नहीं होता । अतः उसपर इन भूख - हड़तालोंका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता ।
श्रीरामने अपनी नीति से यह भी सिद्ध कर दिया कि – अपने भाइयों तथा अपनी जातिवालोंके साथ सौमनस्य रखना चाहिये । ' कंटकेनेव कंटकम् ' यह नीति ( यहां विभीषण- द्वारा रावणके रहस्यको प्राप्तकर उसका वध कर देना - यह उदाहरण है, ) शत्रुका छलसे भी मारना ( इसमें लवणासुरके वधकी कथा याद रख लेनी चाहिये ) अनधिकार - चर्चामें लगे हुएको दण्ड देना ( इसमें शम्बूककी कथा याद कर लेनी चाहिये ) इनको पूरा करना चाहिये । इन्हींके फलस्वरूप आज तक ' रामराज्य ' प्रसिद्ध है । क्या आजके राजनीतिक नेता -- ' जो अपनी जाति वालोंके निग्रहणमें, तथा अपने तथा देशके द्रोही भिन्न जाति वालोंकी छोटी -
छोटी बातोंके पूर्ण करनेमें लगे हुए हैं, जो ' त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा येन बाह्याश्चाभ्यन्तरीकृताः । स मृत्युमुख- माप्नोति यथा राजा ककुद्रुमः ' इस अशुद्ध नीतिको अपनाने में लगे हुए हैं - इधर ध्यान देंगे १? यदि उन्होंने श्रीरामको राजनीति स्वीकार नहीं की; ‘ अन्यैः सह विवादे तु वयं पश्चोत्तरं शतम् ' की 649नीति स्वीकार न की; तो वे अपने हाथमें आये भारतके राज्यको नष्ट करवा बैठेंगे । ' इतो भ्रष्टास्ततो नष्टाः ' इस नीति के उदाहरण बन जाएँगे ।
इस प्रकार श्रीरामने धर्म एवं नीतिको इस शैली से अपनाया कि आज मरनेके भी समय ' राम - राम सत्य है ' यह कहा जाता है । गो ० तुलसीदासने श्रीरामका वर्णन करते हुए कितने सुन्दर शब्द लिखे थे- ' प्रसन्नतां या न गताभिषेकतः, तथा न मम्लौ वनवास- दुःखतः । मुखाम्बुज- श्री रघुनन्दनस्य सा, सदास्तु मे मंजुलमङ्गलप्रदा ' अर्थात् श्रीराम राज्याभिषेक सुनकर प्रसन्न नहीं हुए, वनवास उपस्थित देखकर म्लान नहीं हुए । यही बात वाल्मीकि रामायण में भी आई है - ' हूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च । न मया- लोकितः तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः ' । कितना कठिन कार्य है यह । आज तो अपूर्ण राज्यकी प्राप्तिमें भी गर्दन अकड़ जाती है । पहले की की हुई प्रतिज्ञाएँ ( गोवध करना आदि ) भूल जाती हैं । जादूकी कुर्सी जनताको भुला देती है । क्या श्रीरामकी उस बातको कि- ' स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ' ( उत्तररामचरित १।१२ ) आजके नेता कह सकते हैं? आज तो अपनी अध्यक्षताको स्थिर करने के लिए कितनी गलत नीतियां बरती जाती हैं । कई जनहानिप्रद उपाय भी किये जाते हैं । जिस जाति के मतदान ( वोट ) से वा जिसकी हार्दिक उद्योग- परम्परासे शासकोंको स्वराज्य मिला, उसीकी सबसे बढ़कर उपेक्षा की जाती है; उसी जातिके धर्मपर प्रहार किया जाता है, उसके 650आर्तनाद पर ध्यान भी नहीं दिया जाता । रामराज्य में ऐसा नहीं था । तभी सुराज्यका नाम भी ' रामराज्य ' हुआ करता है । उस
रामराज्यमें सभी प्रसन्न थे ।
दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज्य नहिं काहुहिं व्यापा ॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलत स्त्रधर्म - निरत श्रुति नीति ॥
क्या वर्तमान शासकोंसे भी हम ऐसी आशा कर सकते हैं? यही प्रतिवर्ष स्मरण कराने के लिए ' श्रीरामनवमी ' आया करती है । क्या हमारे शासक एवं बन्धु श्रीरामके सम्पूर्ण चरित्रका मनन करेंगे? ऐसा करनेसे ही गोस्वामीजीकी उक्त चौपाई पूर्ण होगी ।
( ४ ) श्रीव्यास - पूर्णिमा ।
आषाढकी पूर्णिमा श्रीव्यास - पूर्णिमा तथा गुरु पूर्णिमा मानी जाती है । श्रीवेदव्यासने अनादिसे आ रहे हुए पुराण- ज्ञानको ग्रन्थबद्ध करके जो संसारका उपकार किया है; उसे छोटी - सी लेखनी वर्णित नहीं कर सकती । आजके कराल - कलिकाल में इन्हीं पुराणोंके कारण धर्मका प्रचार है और रहेगा । वेद बीजरूप हैं; इसलिए कठोर होते हैं; पर पुराण उसके फल हैं; फलका माधुर्य तथा कोमलता स्वाभाविक है । काव्य, नाटक, उपन्यास आदि इन्हीं पुराणोंको ही प्रमुखता से अवलम्बन करके बनाये गये हैं, तथा बनाये जाते हैं । फलोंके आस्वादमें पृथिवी, जल, वायु आदिकी विचित्रतासे विचिन्त्रता भी उत्पन्न हो जाती है । श्रीमनुजीने कहा है - ' भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीवलैः । नानारूपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः ' ( ६३८ ) किसानोंसे एक ही खेत में बोये
In English
The Concept of God as Formless and Manifest
This text explains that God takes human incarnations, such as Rama, to teach humans how to live according to Vedic social and family duties. It argues that while God is formless (nirakara), this means having an indescribable or extremely subtle form rather than no form at all, which justifies the practice of deity worship through icons.
This chapter answers
- Why does god take human incarnations?
- What are the vedic duties for family members?
- Is god truly formless or does he have a subtle form?
- Why is murti puja practiced in sanatana dharma?
- How to understand the difference between incarnation and birth?
Also written: Shriramanavami, Veda, Men, Avataravada, Shriramanavami Veda Men Avataravada, श्रीरामनवमी ( वेद में अवतारवाद )