सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 651–660
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 651–660
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वार - क्रम - रहस्य ६२३ , न I पड़ा करती है यह हम पहले सूचित कर चुके हैं; जब तक राशियों-का ज्ञान न हो; तबतक ग्रहण कैसे निकले? पर हमारे पूर्वज ग्रहणको जानते थे, जिसका वेदादि - शास्त्रों में निरूपण आया है; अतः स्पष्ट है कि उन्हें राशि - ज्ञान तथा ग्रह चार ज्ञान भली - भांति था । बृहद् - विष्णु स्मृति, एक प्रसिद्ध धर्मशास्त्र ग्रन्थ है; इसमें श्राद्ध-वर्णन ७८ अध्याय में ' सततम् आदित्ये ऽन्हि श्राद्धं कुर्वन्नारोग्यमाप्नोति, सौभाग्यं चान्द्र े , समरविजयं कौने ( भौमे ), सर्वान् कामान् बौधे विद्यामभीष्टां जैवे ( गुरौ ), धनं शौक्रे; जीवितं शनैश्चरे, इसमें सातों वारोंका नाम स्पष्टतया उल्लिखित है । इस प्रकार प्राचीन गर्ग-संहिता में भी लिखा है ' नक्षत्रे चन्द्रवारे तु ' ( बृहत्संहिता पृष्ठ १२५४ ) । आर्यसमाजके प्रसिद्ध अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्तजी बी. ए. ने अपने ' भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' ( प्रथम भाग पृ ० १५०-१५१ ) में लिखा है - ' जर्मन देशोत्पन्न वैचर और उसके समकालिक अनेक पाश्चात्य संस्कृत - अध्यापकोंने इस बातका प्रचार किया कि - पुरातन सात वारोंको नहीं जानते थे । वारों आदिका व्यवहार कालडिया वालों से चला और भारतीय आर्यों तक पहुँचा । यह जर्मन लेखकों की अविद्याका फल है । इतना ठीक है कि — भारत में यज्ञ आदि कर्मों में तिथि नक्षत्रका प्रयोग अधिक होता था; पर वार प्राचीन - भारत में अज्ञात थे - यह असत्य है । कालडिया वालोंने प्राचीन आर्योंसे ये नाम सीखे थे । जब कालडिया वालोंमें वैदिक यज्ञोंका प्रचार लुप्त हुआ; तो उन्होंने तिथि नक्षत्रका प्रयोग छोड़ दिया, और वार आदिका आश्रय लिया । आर्यों में वार आदिका
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६२४ श्रीसनातन धर्मालोक ( ५ ) प्रयोग ' विष्णुस्मृति ' ( २७०० विक्रमपूर्व ) में तथा इसी कालकी ज्योतिषशास्त्र विषयक गर्गसंहिता में स्पष्ट है । ' तिथ्यादिज्ञानके सम्बन्धमें भी उक्त अनुसन्धाताने लिखा है-' महाभारतमें तिथि और नक्षत्रोंका क्रमशः वर्णन अनेक घटनाओं के सम्बन्धमें किया गया है ' । ( भारत ० इतिहास पृ ० २५ ) । फिर वे ही उक्त इतिहासके १०८ पृष्ठ में लिखते हैं- " पाश्चात्य लेखकोंका कहना है कि विक्रमशती दूसरी - तीसरीसे पहले भारतमें चन्द्रवार आदि वारोंका प्रयोग नहीं होता था । गर्गसंहिता में वारोंका प्रयोग ( बृहत्संहिताकी भट्टोत्पल टीका पृ ० १२५४ ' नक्षत्रे चन्द्रवारे तु ' । स्मरण रहे वृद्ध गर्गका प्रधान शिष्य भागुरि भारत युद्धकालका व्यक्ति था बृहत्संहिता पृ ० ५८२ ) स्पष्ट रूपसे बताता है कि-विक्रमसे तीन सहस्र वर्षं पहले भी यहां वार प्रयोग में आते थे, यद्यपि थोड़े " । इससे उक्त मत - प्रचारकों का मत खण्डित होगया । जब हमारा भारतवर्ष ग्रहोंको सृष्टिके आरम्भ से ही जानता तथा मानता था; तब वह इन ग्रह - वारोंको यूनानसे उधार ले-वह अश्रद्धेय बात है । वेदमें ' शं नः सूर्यः ' ( अ ० १६।१०८ ) ' शं नः सोमो भवति ' ( अथर्व ० १६।१०।७ ) ' प्र चन्द्रमः! तिरसे दीर्घमायुः ' ( ०७१८६ ( ८१ ) | १ ) ' सोमस्य अंशो! ' ( अ ० ७१८६ ( ८१ ) ३ ) इस मन्त्रका बुधग्रह की पूजा में विनियोग है । ' शं बृहस्पतिः ' । ( ०१६६।११ ) इत्यादि मन्त्रों में ग्रहोंसे प्रार्थना की गई है; तो वही वेद उन ग्रहोंके वारोंसे अपरिचित हो - यह श्रद्धय बात है । ' शनि - राहु - केतूरगरक्षो- ' ( ७१६ ) इस मैत्रायणीय आरण्यक के
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वार - क्रम- रहस्य ६२१ वचनमें शनि - राहु - केतु ग्रहोंका नाम भी स्पष्ट है । वाल्मीकि-रामायण - अयोध्याकाण्डमें - ' शुक्रः सोमश्च सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा । पान्तु त्वामर्चिता राम! ' ( २५५२३ ) यहां शुक्रादिकी पूजा आई है । इससे जहां ग्रह - पूजा वेदकालिक सिद्ध होती है; वहां ग्रहवादिकी अभिज्ञता भी भारतको सिद्ध होती है । ' एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ' ( २।२० ) इस मनुवचन से सिद्ध है कि जगदगुरु-भारतवर्ष से ही यूनान आदि देशोंने विविध विद्याएं सीखीं । काल-क्रमसे कई विद्याओंका भारत में ह्रास हो गया हो; और यूनान -वालोंने उसमें उन्नति करली हो- फिर भारतवासी भी वहां उस विद्याको सीखने गये हों - यह तो सम्भव हो सकता है- पर एतदादिक - विद्याओंका आदिम - श्रेय यूनानादि- देशों को नहीं दिया जा सकता । भारत में प्राचीन कालमें विमान विद्या कितनी थी- यह बात किसीसे छिपी नहीं है । पर कालक्रमसे वह विद्या लुभ हो गई, और वहां वाले अब इङ्गलेण्ड में वह विद्या सीखने जाते हैं - पर इस व्यवहारसे इङ्गलेण्ड ही विमानविद्याका आदिम - प्रचारक है-भारत नहीं - यह कहना जैसे हास्यास्पद है; वैसे ही ' राशियों तथा वारोंका ज्ञान भारतने यूनानसे प्राप्त किया ' यह कथनभी हास्यास्पद है । यह उनकी कल्पना है- जिन्होंने अपने मस्तिष्कको अंग्रेजी भाषा से प्रभावित होनेसे अंग्रेजोंके हाथ बेच दिया । अपनी निर्मूल - कल्पनाओंसे सूर्यसिद्धान्तके सूर्यांश ( १६ ) पुरुषको भी वे लोग ' यवनाचार्य ' कहा करते हैं; उस सूर्यके अंश ४० स ० ध ०
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६२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पुरुषका देवयोनिके भेद मय - दैत्यको सौरविद्या बताकर ' प्रविवेश स्वमण्डलम् ' ( १४/२४ ) फिर अपने मण्डलमें प्रविष्ट हो जाना लिखा है; तो क्या यवनाचार्य ही सूर्यमंडल में घुसा बैठा था; जो वहां से निकला और फिर उसीमें घुस गया? वस्तुतः यह सब कथन अटकलपच्चू हैं; तभी तो ' मयोऽथ दिव्यं तज्ज्ञानं ज्ञात्वा साक्षाद, विवस्त्रतः, ( १४१२५ ) इस सूर्यसिद्धान्त-के पद्य में सूर्यांश पुरुषको साक्षात विवस्वान् ( सूर्य ) ही माना है । तब उसी सूर्यसे बताया गया वारादि - क्रमज्ञान जिसे हम आरम्भमें सूर्यसिद्धान्त से बता चुके हैं, यह भारत से ही उपज्ञात सिद्ध हुआ; यूनानसे नहीं । आदि - काव्य वाल्मीकि रामायण में राशियोंका नाम तो रामादिके जन्मके समय प्रत्यक्ष है । ( ३ ) श्रीरामनवमी । परमात्माने वेद द्विजोंको दिया । द्विजों में ब्राह्मणोंने वेदप्रोक्त-धर्मका प्रचार सारे संसारके हृदयभूत- केन्द्र भारतवर्ष में कर दिया । वह श्रव्य काव्य था; परन्तु श्रव्य - काव्यका प्रभाव जनता पर वैसा नहीं पड़ता जैसा कि दृश्य - काव्यका । ' सत्यं वद, धर्मं चर ' ( कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीयोपनिषद् १।११।१ ) यह वेदने आदेश दे दिया; परन्तु श्रव्यकाव्यकी इस आज्ञाका साधारण जनता पर भला क्या प्रभाव पड़ सकता है? परन्तु जब वही श्रव्यकाव्यका अर्थ दृश्यकाव्य ( अभिनय ) द्वारा ' सत्यहरिश्चन्द्र ' - नाटकके रूप में दिखलाया जाता है; तो उसका प्रभाव साधारण जनतापर भी ठीक - ठीक पड़ता है, और जनता उसके अनुसरणार्थ उद्यत भी होजाती है । इसी सत्य-
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श्रीरामनवमी ६२७ T । ; T द हरिश्चन्द्रके नाटकसे श्रीमोहनदास- गान्धी, पहिले सत्यप्रिय एवं कर्मवीर वने, फिर महात्मा तथा विश्ववन्द्य कहलाये । परमात्माने भी यही किया । केवल हमें अपना श्रव्यकाव्य वेद ही नहीं सौंपा, बल्कि उन वेदके सिद्धान्तोंका स्वयं अभिनय करके भी हमें सिखलाया कि - ' अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु सम्मनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम् ' ( अथर्वशौ ० सं ० ३।३०।२ ) अर्थात् पुत्र पिता के व्रतके अनुकूल चलने वाला बने, उसकी प्रत्येक आज्ञा, नियम तथा प्रतिज्ञाका पूर्ण करनेवाला बने, और माता चाहे वह विमाता ही क्यों न हो; उसकी मानसिक धर्म्य-आज्ञाओं का पूर्ण करनेवाला बने; उससे विमनस्क होकर न रहे । पत्नी पतिके आदर में, और उसके एक - एक संकेत के अनुसार चलनेवाली, पतिके सुखमें सुखिनी, पतिके दुःख में दुःखिनी, पतिसे मधुर बोलने वाली, अप्रिय व्यवहार करनेपर मनसे भी पतिका अनिष्ट न सोचने वाली, शान्तिप्रिय बने । वेदने यह भी कहा है कि - ' मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा ' ( अथर्वसं ० ३ | ३० | ३ ) अर्थात् भाई भाईसे द्वेष करनेवाला न बने, छोटा भाई बड़े भाईको पितृस्थानीय मानकर उसके तुव न्य ३, संकेतानुसार चलनेवाला, और बड़ा भाई छोटेके दोषोंको न देखने वाला, उसके अप्रिय - कार्योंमें भी उससे बुरे व्यवहार करनेवाला न बने । बहिन बहिनसे प्रेम करने वाली बने, अपनी बहिनकी सौभाग्यवृद्धि देखकर जलती न रहे, ईर्ष्यालु न बने । कृष्ण - यजुर्वेद में भी कहा है- ' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव '
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६२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ( तैत्तिरीयोपनिषद् २।११।२ ) अर्थात् माता, पिता एवं आचार्यका पुत्र एवं शिष्य, देवताकी भान्ति सत्कार - पूजा करनेवाला बने; उनकी आन्तरिक इहलोक एवं परलोकमें यश देनेवाली आज्ञाओं को पूर्ण करनेवाला बने । वेदके इसी श्रव्य निराकार- उपदेशको मूर्त -रूप देनेकेलिए निराकार - भगवान् ने स्वयं दृश्यरूप भी ग्रहण किया । भगवान्ने रामावतारका अभिनय दिखलाकर उसका यह सफल परिणाम दिखलाया कि - ' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्य-देवो भव ' । वेद परमात्मा के लिए कहता है- ' त्वं हि नः पिता वसो! त्वं माता ' ( ऋ ० ८ | ८ | १२ ) इस मन्त्र में उस देव - देवको परम - पिता और परम- माता माना गया है, पर उसी परमपिताने भी हमें शिक्षा देनेकेलिए ही अपने माता - पिता बनवाने भी स्वीकृत किये । परमात्मा देवोंका भी देव है, ऐसा सारे सम्प्रदाय कहते हैं, तथा मानते हैं; पर उसी देव - देवने ऋग्वेदसंहिताके आरम्भ में ' अग्नि-मीले पुरोहितम् ' ( १।१।१ ) यहां अग्निदेवताकी स्तुति वा उपासना की । क्या अपने लाभके लिए? नहीं नहीं, हमें शिक्षा देनेके लिए । तभी तो उसीने राम बनकर दशरथको अपना पिता बनाया, उसकी प्रतिज्ञातज्ञा पूरी की । उसीने समुद्रके पार जानेकेलिए महादेवकी पूजा की । क्या अपने लाभकेलिए? नहीं नहीं । हमारे लाभ, कल्याण तथा हमें सिखलानेकेलिए । श्रीमद्भागवत में कहा है - ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं, रक्षोवधायैव न केवलं विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद् रमतः स्व आत्मनि, सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य '
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श्रीरामनवमी ६२६ व ( ५।११।५ ) । अर्थात् परमात्माका मनुष्यावतार मनुष्यकी शिक्षार्थ होता है, केवल राक्षसोंके मारनेकेलिए नहीं । अन्यथा अपने आपमें रमण करने वाले भगवान्को सीताके वियोग में भला दुःख - क्यों हो? यह सब मनुष्योंके शिक्षार्थ होता है कि अपनी स्त्रीके 1 दुःखमें दुःखी बनो — उसका प्रतीकार करो - यह शिक्षा मिलती है । ल श्रीरामके अवतारका दिन ' चैत्रशुक्ला नवमी ' है । वह दिन उक्त शिक्षाओं के स्मरण करानेकेलिए प्रतिवर्ष आता है । ' जन्म कर्म च मे दिव्यम् ' ( ४ | ६ ) भगवद्गीता के इस प्रमाण के अनुसार भगवान् वं का जन्म, जीवकी तरह दिव्य ( बन्धन - परतन्त्र ) नहीं होता; किन्तु ता दिव्य ( स्वतन्त्र ) होता है । इसलिए उसका ' जन्म ' न कहकर उसका ज्ञा प्रादुर्भाव, प्राकट्य, अवतरण, अवतार कहा जाता है । ' जन्म ' शब्द भी जो उसके लिए प्रयुक्त किया जाता है, वहां भी प्रयोजकोंके वा ' जनी प्रादुर्भावे ' का वही आशय अन्तर्गर्भित होता है । T- यद्यपि परमात्मा निराकाररूप में सर्वव्यापक है; अतः उसका एकदेश ना में अवतरण, तथा कूटस्थ होने से अयोध्या - लङ्का आदि में गमनागमन के साधारणजनोंमें संशय उत्पन्न कर देता है, पर विद्वान् लोगोंको T, यहां कोई भी भ्रम नहीं होता । वे जानते हैं कि - अग्नि भी निराकार-ए रूपमें सर्वव्यापक होता है; परन्तु संघर्षादि - कारणवश वह एकदेश रे मैं भी प्रकट होजाता है । एकदेश में प्रकट होनेपर भी उसकी सर्व-हा व्यापकता में कोई बाधा नहीं पड़ती है, न ही उसके स्वरूप में कोई न्यूनता 1 आ पड़ती है — ‘ पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ( बृहदारण्यक ५।१।१ ) पूर्णके पूर्ण - अंश निकलनेपर भी वह पूर्ण ही रह जाता है ।
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६३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कहीं यदि अग्नि प्रज्वलित हो उठती है; तब उसका अन्य स्थलों में अभाव नहीं हो जाता; उसकी सर्वव्यापकता में कोई न्यूनता नहीं पड़ती । और वह प्रज्वलित अग्नि उस मूल निराकार - अग्नि से कोई भिन्न भी नहीं हो जाता, वा नहीं रहता । आकाश सर्व-व्यापक वा कूटस्थ होता है, वह घड़े में भी घटाकाश रूपसे - रहता है, कोई पुरुष घड़े को लेकर भाग रहा होता है, तो घट वा घटाकाश भी भाग रहा हुआ मालूम होता है; उसका परिमाण भी उस समय हो जाता है; पर यह सब स्थूल दृष्टियाँ हैं, सूक्ष्म - दृष्टि-वाले जानते हैं कि – आकाशमें घड़ा जा रहा है; वह आकाश भाग नहीं रहा । सिनेमामें लोग भागते हुए मालूम होते हैं; वस्तुतः भाग नहीं रहे होते; किन्तु चित्रपर चित्र प्रकट होते जाते हैं, वहां भागना मालूम होता है । इस प्रकार विचार - दृष्टि रखने पर कोई भ्रमका अवकाश नहीं रहता । लोगोंकी शंकाएं वा भ्रम कुछ स्थूल दृष्टिवश, और कुछ अवहुश्रुतता वा अज्ञान, तथा कुछ अपने एकदेशी - पक्षके आग्रह -वश हुआ करते हैं । सनातनधर्मकी सूक्ष्मतम दृष्टि रखनेपर वे सब शंकाएं वा कुतर्क हट जाते हैं । अस्तु । निराकाररूपमें यद्यपि वह अग्निदेव सर्वव्यापक रहता है; तथापि वह सर्व - साधारणके उपयोग में नहीं आ सकता । प्रज्वलित अप्रज्वलित अग्नियोंका वास्तवमें तो भेद नहीं होता, परन्तु वह प्रज्वलित होकर ही सर्वसाधारणके उपयोग में आता है, और सेवनीय होता है । यह ठीक है कि सूक्ष्ममें स्थूलकी अपेक्षा अधिक शक्ति होती है, पर
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श्रीरामनवमी ६३१ से ता वा रा ने म छ की पि त र नर संसारी प्राणियोंके स्थूल होनेसे वे सूक्ष्मसे वह काम नहीं ले सकते । उन्होंने रोटी पकानी है; वे सूक्ष्म अग्निसे नहीं पका सकते; वहां उन्हें स्थूल - अग्नि अपेक्षित होती है । यही बात भगवान्केलिए भी जाननी चाहिये । तब वह अग्निरूप- देव यद्यपि यहां प्रज्वलित होकर फिर पृथ्वी से तिरोभूत हो जाता है; तथापि दिव्यतावश उसकी वह प्रकट हुई हुई शक्ति भी इस पृथिवीमें अक्षुण्ण रहा करती है; और वह शक्ति वेदमन्त्र-प्रतिष्ठित पार्थिव मूर्तिद्वारा विशेष आयतनमें दुही जा सकती है । वही दुही हुई प्रज्वलित शक्ति भक्तोंके मनोरथोंको पूर्ण करती है; और अधिकारियों द्वारा उसकी उपासना की जा सकती है । मूर्तिपूजा करनेका रहस्य भी यही है । परमात्मा के निराकार होनेका भी यह भाव नहीं है कि-उसका कुछ भी आकार नहीं; वैसा इष्ट होनेपर तो परमात्मामें शून्यतापन्ति हो जावेगी । वस्तुतः उसका अर्थ है कि — अनिर्वचनीय आकार वाला । अत्यन्त - सूक्ष्मतावश हम उसे न देख सकते हैं; न उसका किसी भी भांति वर्णन कर सकते हैं; न जान पाते हैं; अतः वह निर्विकल्पकज्ञान - ग्राह्य हो जाता है । इसी अनिर्वचनीय-आकारवश ही उसे निराकार कहा जाता है, किसी भी प्रकारके आकारके अभाव के कारण नहीं । इसी कारण सनातनधर्मी परमात्माको साकार भी कहते हैं । परमात्माकी केवल निराकारता आर्यसमाजके स्वा ० दयानन्दजीने चलाई है; पर उन्हें भी परमात्मा सूक्ष्मतम आकारवाला मानना ही पड़ा है ।
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६३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ' सत्यार्थप्रकाश ' के प्रथम संस्करण ( १७-१८ पृष्ठ ) में ' निराकार ' का ' निर्गत श्राकारो यस्मात् ' यह विग्रह किया था; परन्तु जनताने स्वामीजीको लज्जित किया कि इस विग्रहसे परमात्मा पहले साकार सिद्ध हो जाता है; क्योंकि उसमें पहले आकार था, तभी तो निकल गया । यदि उसमें कोई आकार नहीं था, तो निकल क्या गया? | तब स्वामीने अपने सिद्धान्तके भङ्गके डर से स ० प्र ० के द्वितीय संस्करण ( पृ ० १० ) में पूर्वके बहुव्रीहि - विग्रहको बदलकर तत्पुरुष समासका विग्रह क्रिया- ' निर्गत आकारात् स निराकारः । पर ' भक्षितेपि लशुने न शान्तो व्याधिः ' ( निषिद्ध लहसुन खाया भी सही कि यह व्याधि दूर हो जावे; पर व्याधि गई भी नहीं ) इस न्याय से इस विग्रहमें भी परमात्माकी साकारता सिद्ध रही । ' आकारसे निकला हुआ ' - इससे भी उसका आकार सिद्धं ही रहा । बल्कि इस विग्रहमें त्रुटि भी हो जाती है । वह यह कि - द्रव्यसे तो गुण होता है, पर गुणसे द्रव्य नहीं होता । परमात्मा द्रव्य है, और आकार गुण; तब परमात्मासे तो आकार निकल सकता है; पर गुण - आकारसे द्रव्यरूप परमात्मा कैसे निकले? | यह स्वामीने स ० प्र ० में स्वयं भी स्वीकृत किया है- ' गुणसे द्रव्य कभी नहीं बन सकता ' ( १३ समु ० ३०० पृष्ठ ) । तब ' निराकार ' शब्दसे भी उस परमात्मा का आकार सिद्ध हो रहा है । स्वा ० दयानन्दजीने परमात्माकेलिए लिखा है- जब ' वह ( परमात्मा ) प्रकृतिसे भी सूक्ष्म और उसमें व्यापक है ', ( स ० प्र ० ८ समु ० १३३ पृष्ठ ) यहां परमात्माको प्रकृतिकी अपेक्षा भी सूक्ष्म