पञ्चम सुमन · प्रकरण 74

वानप्रस्थ - रहस्य

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617भानामधोऽधः क्रमतस्तथा ' ( १२।३० ) यहाँ कहा गया है कि — व्योम - कक्षामें ग्रह एक - दूसरेसे नीचे क्रमशः रहकर घूमा करते हैं । ग्रहों

( चन्द्र ) का आकाश में का कक्षा - क्रम यह बताया

गया है - ' मन्दाऽमरेज्य- १ शनि

परिभ्रमन्त्यधोऽधःस्थाः भौम

कक्षा - क्रम बतलाया गया भूपुत्रसूर्यशुक्रेन्दुजेन्दवः । २ गुरु

गया है । सबसे ऊपर

शनिकी कक्षा, शनिसे सिद्धविद्याधरा घनाः ४ सूर्य

नीचे गुरुकी, उससे नीचे ( १२।३१ ) यहां पर मन्द् ५ शुक्र

भौमकी, उससे नीचे ( शनि ), अमरेज्य ( गुरु ), ६ बुध

रविकी, फिर शुक्र और भूपुत्र ( भौम ), सूर्य, शुक्र, ७ चन्द्र

फिर बुधकी; सबसे नीचे इन्दुज ( बुध ), इन्दु

चन्द्रकी कक्षा है ।

फिर ' सूर्यसिद्धान्त ' में कहा है- ' मन्दादधः क्रमेण स्युः चतुर्था दिवसाधिपाः । वर्षाधिपतयस्तद्वत् तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः । ' ( १२/७८ ) ऊर्ध्वक्रमेण शशिनो मासानामधिपाः स्मृताः । होरेशाः सूर्यतनयादधोऽधः क्रमतस्तथा ' ( ७६ ) इसका यह अर्थ है कि ' शनैश्वर से नीचेके क्रमसे चौथा - चौथा ग्रह दिन ( वार ) का स्वामी होता है, और तीसरा- तीसरा ग्रह वर्षका स्वामी होता है 1

। चन्द्रसे ऊपर - ऊपरके ग्रह मासके स्वामी होते हैं । शनिसे निचले - निचले ग्रह क्रमसे दिनके प्रत्येक घण्टे के स्वामी हुआ करते हैं । ' यहांपर पूर्वका वाक्य और अन्तिम वाक्य – यह प्रकृत हैं । पहला वाक्य यह है - ' शनि से नीचे के क्रमसे चौथा- चौथा ग्रह दिनका स्वामी है ' . और अन्तिम वाक्य यह है कि- शनिसे निचले ग्रह, क्रम से एक. 618अहोरात्रके प्रत्येक - घण्टेके स्वामी होते हैं । '

अब पूर्ववाक्यानुसार गणना करनी चाहिये । कक्षा - क्रमसे शनिसे नीचेका चौथा ग्रह सूर्य है; अतः रवि ही शनिसे अगले दिनका स्वामी हुआ । सूर्य से नीचेका चौथा ग्रह चन्द्र है; अतः वही अगले दिनका स्वामी हुआ । चन्द्रसे चौथा भौम है, इसीलिए वही चन्द्रसे अग्रिम दिनका स्वामी होता है । भौमसे नीचे चौथा ग्रह बुध है; अमः भौमके बाद बुधका क्रम होता है । इस प्रकार बुधसे चौथा ग्रह गुरु, और उससे नीचे चतुर्थ शुक्र और शुक्र से चतुर्थ शनि है, अतः वही शुक्र से अग्रिम दिनका स्वामी होता है ।

उस - उस ग्रह से चतुर्थ ही उस दिनका स्वामी कैसे है - यह जानने के लिए अब पूर्वोक्त दो पद्योंके अन्तिम वाक्यको लीजिये किं शनैश्चरसे नीचे - नीचेका ग्रह क्रमसे एक दिनरातकी प्रत्येक होराका स्वामी होता है । अहोरात्रका चौबीसवां भाग ' होरा ' कहाता है । ' अहोरात्र के आदिम और अन्तिम अक्षरको लुप्त करके ' होरा ' शब्द बनता है । अब ' होरा ' का अर्थ हुआ --- ' घंटा ' । अहोरात्रके २४ होरा ( घण्टे ) होते हैं । उक्त कक्षावाले ग्रह एक- एक होराके क्रमशः स्वामी होते हैं; तब जो ग्रह २४ वें घण्टेका स्वामी है; उससे अग्रिम - होराका जो स्वामी सूर्योदय के समय बनता है; वही उस दिनका स्वामी माना जाता है । अब पाठकगंग इसकी गणना करें ।

हम कह चुके हैं कि - १ शनि, २ गुरु, ३ भौम, ४ रवि, ५ शुक्र, ६ बुध, ७ चन्द्र यह है ग्रहोंका कक्षा - क्रम । मान लीजिये कि - आज.. 619सूर्योदय में पहली होराका ( ६ वजेसे ७ बजे तक ) स्वामी ' शनि ' है । तब २ री, ३ री, ४ थी, ५ वीं, ६ ठी ७ वीं होराके स्वामी गुरु, भौम, रवि, शुक्र, बुध, चन्द्र हुए । यह पहला चक्र १ बजे मध्याह्न तक समाप्त हुआ ।

फिर वें घण्टेका स्वामी दो बजे मध्याह्नमें पुनः शनि हुआ । ६, १०, ११, १२, १३, १४ घण्टेके स्वामी क्रमसे गुरुसे लेकर चन्द्र तक हुए । यह दूसरा चक्र रात्रिके ८ बजे तक समाप्त हुआ । फिर १५ ब घण्टेका स्वामी नौ बजे रात्रिमें फिर शनि हुआ । फिर १६, १७, १८, १६, २०, २१ घंटेके स्वामी क्रमसे गुरुसे लेकर चन्द्र तक हुए, यह सात ग्रहोंका तीसरा चक्र रात्रिके तीन बजे समाप्त हुआ । अब चौथे चक्रमें २२ वें घटेका स्वामी पुनः शनि हुआ । २३ वेंका गुरु, २४ वेंका भौम हुआ ।

इस प्रकार यह अहोरात्र प्रातः छः बजेसे कुछ पूर्व समाप्त हुआ । फिर दूसरे दिनके प्रथम घंटे ( २५ ) में ६ बजे सूर्योदय हुआ । उसमें भौमके आगे रविका क्रम हुआ । इस प्रकार शनिके २४ वें घण्टेकी समाप्ति के बाद अगले दिन प्रथम घण्टेका स्वामी रवि हुआ; इसी कारण शनिवार के आगे रविवार आता है । वारका अर्थ होता है ' क्रम ' | रविवारके आगे सोमवार क्यों आता है; इसपर फिर आगे भी गणनाक्रम पूर्वकी भांति जानना चाहिये । सूर्योदय में पहले घण्टेका स्वामी रवि तो हुआ ही । तब द्वितीय चक्रमें पवेंका, तृतीय चक्रमें १५ वें का, चतुर्थ चक्रमें २२ वें घण्टेका स्वामी भी रवि ही हुआ 1

। फिर २३ वें घंटेका स्वामी शुक्र, 620२४ वेंका बुध हुआ । फिर दूसरे दिनके प्रथम घंटेका स्वामी बुधका अगला चन्द्र ही हुआ, जो रविसे चतुर्थ होता है । इसलिए रविवारके आगे चन्द्रवार आता है ।

भाव यह है कि — - वें, १५ वें, २२ वें घण्टेका स्वामी तो वही ग्रह होता है । फिर २२ से २४ वें घरटे तक अपने से तीसरा ग्रह रहता है । अग्रिम दिनके प्रथम ( २५ वें ) घण्टे में अपनेसे चौथा ग्रह आ जाता है । इसी कारण यह वारोंका क्रम जो आज प्रचलित है; यह सोपपत्तिक और विज्ञानपूर्ण ही सिद्ध है । न यह आकस्मिक है, न स्वेच्छा - कल्पित । यह तो आकाशको देखकर रखा गया है ।

( २ )

अब जो लोग राशि, वार आदिकी प्रवृत्तिका यूनानियों द्वारा भारतको सिखाना मानते हैं - वे अंग्रेजी भाषासे प्रभावित होने से अंग्रेजोंके मानसिक दास ही हैं । वस्तुतः जिस समय से हमारे वेदादि - शास्त्र हैं; उसी समय से राशि, और वार आदिकी प्रवृत्ति है । सनातनधर्म के मत में वेद अपौरुषेय हैं, प्रत्येक सृष्टिकी आदि में यथापूर्वं प्रकट होते हैं । अर्वाचीनों के मत में भी वेद आदिम ग्रन्थ माने जाते हैं । अथर्ववेद ( शौ ० ) संहिता में ' शं नो दिविचरा ग्रहाः ' ( १६६६६७ ) ' शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शम् यादित्यश्च राहुणा ' ( अ ० १६/६/१० ) यहां ग्रहोंका संकेत दिया है । यद्यपि सूर्यादि ग्रह राहु - केतु के साथ नौ हैं; तथापि दृश्य- ग्रह सात ही हैं; वे ही धारके स्वामी होते हैं ।

621' अतः जगद्गुरु भारतवर्ष ही सर्वादिम, अतः सब देशोंका गुरु और समस्त विद्याओंका प्रवर्तक है । उसीसे भिन्न - भिन्न देशके रहनेवालोंने भिन्न - भिन्न विद्याएं सीखीं । पाश्चात्य लोग जो कि भारतवर्षको सभी विद्याओं का श्रेय नहीं देते, उसका कारण यह है कि- वे यूनानसे प्राचीन इतिहास मानते ही नहीं । पर वस्तुतः यह महामोह है । जब कि वेद पूर्व कहे मन्त्रसे तथा ' यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाऽविध्यदासुरः " ( ५/४०१६ ) इस ऋग्वेदसं ० के मन्त्रसे ग्रहण बताता है; तब ग्रहणका ज्ञान राशि- मण्डलके ज्ञानके बिना और सूर्य - चन्द्रादि ग्रहों के वारोंके ज्ञानके बिना असम्भव है । तब राशिविद्याका प्रतिपादक वेद ही सिद्ध हुआ; और वार आदि भी वैदिक काल से ही सिद्ध हुए ।

यदि प्राचीन पुस्तकों में राशिवर्णन वा वारादिवर्णन स्पष्ट न मिले, तो इससे प्राचीनोंको उसका अज्ञान सिद्ध नहीं होता । सर्वसाधारणतः प्रचलित सभी बातें स्पष्ट रूपसे नहीं भी कही गई जावें — यह सम्भव हुआ करता है । वेदादिमें धोतीका बान्धना यदि स्पष्ट न मिले तो क्या मानना पड़ेगा कि हमें धोती बांधना भी यूनानियोंने सिखाया? वेद - संहिताओं में तो आचार्यकुल, वा गुरुकुल शब्द भी सुनाई नहीं पड़ता, उसमें परमात्मा - शब्द भी नहीं आता; तब क्या यह सब शब्द हिन्दु यूनानियोंसे सीखे?! वाह!!! हमारे बहुत से प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हैं; उनमें उनकी सत्ता प्राप्त हो सकना सम्भव है ।

' सूर्य - सिद्धान्तमें ' हम बता चुके हैं कि - वारोंका तथा राशियों- 622का वर्णन है; और वह ग्रन्थ सत्ययुग में बनाया गया है; इसे हम पूर्व लिख चुके हैं । तभी तो उसमें अन्य ज्योतिषके ग्रन्थोंकी तरह तीन संख्या में कहीं ' राम ' शब्द नहीं दिया, नौ संख्यामें ' नन्द ' ' शब्द नहीं दिया । २४ संख्या में ' सिद्ध ' शब्द नहीं दिया । उसमें वारोंका वर्णन मिल रहा है; तब कौन कह सकता है कि - भारतने यवनोंसे वार वा राशि सीखे?

प्राचीन पुस्तक ' वैखानसगृह्यसूत्र में सब ग्रहोंका नाम तथा तर्पण आया है I

। जैसेकि - ' आदित्यं तर्पयामि सोमं... अङ्गारकं... बुधं..., बृहस्पतिं, शुक्रं, शनैश्चरं, राहु, केतु ग्रहान् तर्पयामि ' ( १।४ ) यह ग्रह - तर्पण आया है । अब उसी गृह्यसूत्रमें वारका नाम भी देखिये- ' बुधवारे तिथिं गृह्णाति ' ( २।१२ ) यहाँ बुधवारका नाम लिया गया है । इस प्रकार स्मृतिचन्द्रिका, वीरमित्रोदय आदि बहुत निबन्ध प्रन्थों में वारोंका विचार प्राचीन पुस्तकों से संगृहीत किया गया है |

जो लोग महाभारतमें राशि वा वारका वर्णन नहीं मानते, वे निम्न - प्रमाणोंको देखें । वहाँ — ' यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती । एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् ' ( वनपर्व १६० / ६०,६१ ) यहाँ ' राशि ' शब्द प्रत्यक्ष है । ' वक्रानुवक्रं कृत्वा च ' श्रवणं पावक - प्रभः । ब्रह्मराशिं समाश्रित्य लोहिताङ्गो व्यवस्थितः ' ( भीष्मपर्व ६।३।१८ ) वहाँ तो भौमका और ब्रह्मकी राशिका वर्णन भी आया है । सूर्यसिद्धान्त में तो राशियों का वर्णन स्पष्ट है, ग्रहण सिद्ध करनेमें राहु, केतु, सूर्य और चन्द्रकी राशियों की आवश्यकता 623पड़ा करती है यह हम पहले सूचित कर चुके हैं; जब तक राशियों- का ज्ञान न हो; तबतक ग्रहण कैसे निकले? पर हमारे पूर्वज ग्रहणको जानते थे, जिसका वेदादि - शास्त्रों में निरूपण आया है; अतः स्पष्ट है कि उन्हें राशि - ज्ञान तथा ग्रह चार ज्ञान भली - भांति था । बृहद् - विष्णु स्मृति, एक प्रसिद्ध धर्मशास्त्र ग्रन्थ है; इसमें श्राद्ध- वर्णन ७८ अध्याय में ' सततम् आदित्ये ऽन्हि श्राद्धं कुर्वन्नारोग्यमाप्नोति, सौभाग्यं चान्द्र

, समरविजयं कौने ( भौमे ), सर्वान् कामान् बौधे विद्यामभीष्टां जैवे ( गुरौ ), धनं शौक्रे; जीवितं शनैश्चरे, इसमें सातों वारोंका नाम स्पष्टतया उल्लिखित है । इस प्रकार प्राचीन गर्ग- संहिता में भी लिखा है ' नक्षत्रे चन्द्रवारे तु ' ( बृहत्संहिता पृष्ठ १२५४ ) ।

आर्यसमाजके प्रसिद्ध अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्तजी बी. ए. ने अपने ' भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' ( प्रथम भाग पृ ० १५०-१५१ ) में लिखा है - ' जर्मन देशोत्पन्न वैचर और उसके समकालिक अनेक पाश्चात्य संस्कृत - अध्यापकोंने इस बातका प्रचार किया कि - पुरातन

सात वारोंको नहीं जानते थे । वारों आदिका व्यवहार कालडिया वालों से चला और भारतीय आर्यों तक पहुँचा । यह जर्मन लेखकों की अविद्याका फल है । इतना ठीक है कि — भारत में यज्ञ आदि कर्मों में तिथि नक्षत्रका प्रयोग अधिक होता था; पर वार प्राचीन - भारत में अज्ञात थे - यह असत्य है । कालडिया वालोंने प्राचीन आर्योंसे ये नाम सीखे थे । जब कालडिया वालोंमें वैदिक यज्ञोंका प्रचार लुप्त हुआ; तो उन्होंने तिथि नक्षत्रका प्रयोग छोड़ दिया, और वार आदिका आश्रय लिया । आर्यों में वार आदिका 624प्रयोग ' विष्णुस्मृति ' ( २७०० विक्रमपूर्व ) में तथा इसी कालकी ज्योतिषशास्त्र विषयक गर्गसंहिता में स्पष्ट है । '

तिथ्यादिज्ञानके सम्बन्धमें भी उक्त अनुसन्धाताने लिखा है- ' महाभारतमें तिथि और नक्षत्रोंका क्रमशः वर्णन अनेक घटनाओं के सम्बन्धमें किया गया है ' । ( भारत ० इतिहास पृ ० २५ ) । फिर वे ही उक्त इतिहासके १०८ पृष्ठ में लिखते हैं- " पाश्चात्य लेखकोंका कहना है कि विक्रमशती दूसरी - तीसरीसे पहले भारतमें चन्द्रवार आदि वारोंका प्रयोग नहीं होता था । गर्गसंहिता में वारोंका प्रयोग ( बृहत्संहिताकी भट्टोत्पल टीका पृ ० १२५४ ' नक्षत्रे चन्द्रवारे तु ' । स्मरण रहे वृद्ध गर्गका प्रधान शिष्य भागुरि भारत युद्धकालका व्यक्ति था बृहत्संहिता पृ ० ५८२ ) स्पष्ट रूपसे बताता है कि- विक्रमसे तीन सहस्र वर्षं पहले भी यहां वार प्रयोग में आते थे, यद्यपि थोड़े " । इससे उक्त मत - प्रचारकों का मत खण्डित होगया ।

जब हमारा भारतवर्ष ग्रहोंको सृष्टिके आरम्भ से ही जानता तथा मानता था; तब वह इन ग्रह - वारोंको यूनानसे उधार ले- वह अश्रद्धेय बात है । वेदमें ' शं नः सूर्यः ' ( अ ० १६।१०८ ) ' शं नः सोमो भवति ' ( अथर्व ० १६।१०।७ ) ' प्र चन्द्रमः! तिरसे दीर्घमायुः ' ( ०७१८६ ( ८१ ) | १ ) ' सोमस्य अंशो! ' ( अ ० ७१८६ ( ८१ ) ३ ) इस मन्त्रका बुधग्रह की पूजा में विनियोग है । ' शं बृहस्पतिः ' । ( ०१६६।११ ) इत्यादि मन्त्रों में ग्रहोंसे प्रार्थना की गई है; तो वही वेद उन ग्रहोंके वारोंसे अपरिचित हो - यह श्रद्धय बात है । ' शनि - राहु - केतूरगरक्षो- ' ( ७१६ ) इस मैत्रायणीय आरण्यक के 625वचनमें शनि - राहु - केतु ग्रहोंका नाम भी स्पष्ट है । वाल्मीकि- रामायण - अयोध्याकाण्डमें - ' शुक्रः सोमश्च सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा । पान्तु त्वामर्चिता राम! ' ( २५५२३ ) यहां शुक्रादिकी पूजा आई है । इससे जहां ग्रह - पूजा वेदकालिक सिद्ध होती है; वहां ग्रहवादिकी अभिज्ञता भी भारतको सिद्ध होती है । ' एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ' ( २।२० ) इस मनुवचन से सिद्ध है कि जगदगुरु- भारतवर्ष से ही यूनान आदि देशोंने विविध विद्याएं सीखीं । काल- क्रमसे कई विद्याओंका भारत में ह्रास हो गया हो; और यूनान - वालोंने उसमें उन्नति करली हो- फिर भारतवासी भी वहां उस विद्याको सीखने गये हों - यह तो सम्भव हो सकता है- पर एतदादिक - विद्याओंका आदिम - श्रेय यूनानादि- देशों को नहीं दिया जा सकता । भारत में प्राचीन कालमें विमान विद्या कितनी थी- यह बात किसीसे छिपी नहीं है । पर कालक्रमसे वह विद्या लुभ हो गई, और वहां वाले अब इङ्गलेण्ड में वह विद्या सीखने जाते हैं - पर इस व्यवहारसे इङ्गलेण्ड ही विमानविद्याका आदिम - प्रचारक है- भारत नहीं - यह कहना जैसे हास्यास्पद है; वैसे ही ' राशियों तथा वारोंका ज्ञान भारतने यूनानसे प्राप्त किया ' यह कथनभी हास्यास्पद है । यह उनकी कल्पना है- जिन्होंने अपने मस्तिष्कको अंग्रेजी भाषा से प्रभावित होनेसे अंग्रेजोंके हाथ बेच दिया । अपनी निर्मूल - कल्पनाओंसे सूर्यसिद्धान्तके सूर्यांश ( १६ ) पुरुषको भी वे लोग ' यवनाचार्य ' कहा करते हैं; उस सूर्यके अंश 626पुरुषका देवयोनिके भेद मय - दैत्यको सौरविद्या बताकर ' प्रविवेश स्वमण्डलम् ' ( १४/२४ ) फिर अपने मण्डलमें प्रविष्ट हो जाना लिखा है; तो क्या यवनाचार्य ही सूर्यमंडल में घुसा बैठा था; जो वहां से निकला और फिर उसीमें घुस गया? वस्तुतः यह सब कथन अटकलपच्चू हैं; तभी तो ' मयोऽथ दिव्यं तज्ज्ञानं ज्ञात्वा साक्षाद, विवस्त्रतः, ( १४१२५ ) इस सूर्यसिद्धान्त- के पद्य में सूर्यांश पुरुषको साक्षात विवस्वान् ( सूर्य ) ही माना है । तब उसी सूर्यसे बताया गया वारादि - क्रमज्ञान जिसे हम आरम्भमें सूर्यसिद्धान्त से बता चुके हैं, यह भारत से ही उपज्ञात सिद्ध हुआ; यूनानसे नहीं । आदि - काव्य वाल्मीकि रामायण में राशियोंका नाम तो रामादिके जन्मके समय प्रत्यक्ष है ।

( ३ ) श्रीरामनवमी ।

परमात्माने वेद द्विजोंको दिया । द्विजों में ब्राह्मणोंने वेदप्रोक्त- धर्मका प्रचार सारे संसारके हृदयभूत- केन्द्र भारतवर्ष में कर दिया । वह श्रव्य काव्य था; परन्तु श्रव्य - काव्यका प्रभाव जनता पर वैसा नहीं पड़ता जैसा कि दृश्य - काव्यका । ' सत्यं वद, धर्मं चर ' ( कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीयोपनिषद् १।११।१ ) यह वेदने आदेश दे दिया; परन्तु श्रव्यकाव्यकी इस आज्ञाका साधारण जनता पर भला क्या प्रभाव पड़ सकता है? परन्तु जब वही श्रव्यकाव्यका अर्थ दृश्यकाव्य ( अभिनय ) द्वारा ' सत्यहरिश्चन्द्र ' - नाटकके रूप में दिखलाया जाता है; तो उसका प्रभाव साधारण जनतापर भी ठीक -

ठीक पड़ता है, और जनता उसके अनुसरणार्थ उद्यत भी होजाती है । इसी सत्य-

In English

The Order of Planetary Orbits and Timekeeping

This text describes the descending order of planetary orbits in space, starting from Saturn down to the Moon. It explains how this hierarchy determines which planets rule specific days, months, and hours.

This chapter answers

  • What is the order of planetary orbits from highest to lowest?
  • Which planet rules each day or hour according to the sequence?
  • How do planets govern months and years in this system?

Also written: Vanaprastha, Rahasya, Vanaprastha Rahasya, वानप्रस्थ - रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 617–626 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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