सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 671–680

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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वेदमें श्रीरामावतार ६४३ ते, :, भी नी र, ॥ तो भी ल दि ६२ कारोंने भाष्य में भी मुख्यतया याज्ञिक दृष्टि रखी है । पर श्रीसायणने ' इदं विष्णुर्विचक्रमे ऋ ( ० १।२२।१६ - १७ ) मन्त्रके भाष्यमें ' विष्णोस्त्रिविक्रमावतारे पादत्रयक्रमणस्य पृथिव्यपादानम् ' इत्यादिमें वामनावतारका निरूपण करके अवतारवादको वैदिक सिद्ध कर दिया है । श्रीडवट - महीधरको साक्षी तो हम पूर्व बता ही चुके हैं । जब उन प्राचीन भाष्यकारोंके अनुसार वेदमें अवतारवादकी स्थिति सिद्ध हो गई; तब उसमें विशेष अवतारका बीज भी मिल सकता है । सो ' भद्रो भद्रया ' मन्त्र में वह बात वीजरूपसे मिल रही है । यदि यहां श्रीसायणने ' राम ' का श्याम रंग, वा अन्धकार अर्थ कर दिया है; तो श्यामवर्णवाले श्रीरामका वर्णन इसमें सिद्ध हो गया । ' यथा नाम तथा गुणः ' पूर्वके नाम गुणानुसार रखे जाते थे । अब फिर प्रश्न हो सकता है कि उक्त मन्त्रमें ' राम ' का नाम तो गया है, पर सीता तथा रावणका नाम इसमें स्पष्ट नहीं । व बीजरूपसे बताया गया; तो जबतक वेद में कहीं राजा रामका, वा उनके पिता दशरथका, उनकी नगरी अयोध्याका तथा सीता एवं रावणादिका, अन्य किसी मन्त्र में बीज न मिले; तबतक ' भद्रो भद्रया ' में उनका अर्थ कैसे संकेतित हो सकता है? ' इस पर हम उन प्रश्नकर्ताओंके सन्तोषार्थ इनके बीज भी दिखलाते हैं-' प्र तद् दुःशीमे, पृथवाने, वेने, प्र रामे वोचमसुरे ' ( ऋ ० सं ० १०।६३।१४ ) यहां राजाओं का वर्णन है; उन राजाओं में रामका नाम भी आ गया है; तब इसमें वही तो ' रघुपति, राघव, राजा - राम, सिद्ध हुए । यहां ' काला रंग ' अर्थ भी किसी भाष्यकारने नहीं

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६४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) किया | यदि कहा जाये कि - यहां ' रामे असुरे ' कहा गया है; तो किसी ' दैत्य- राम ' का वर्णन हो सकता है; वे दाशरथि राजा - राम कैसे हो सकते हैं? ' इसपर जानना चाहिये कि - ' असुर ' शब्द यहां ' राम ' का विशेषण है; और विशेषण सदा यौगिक हुआ करता है । सो ' असुर ' का अर्थ है बलवान् । वेदमें वरुण देवता ( यजुः वा ० सं ० १४।२० ) के लिए भी ' असुर ' विशेषण एतदादि - अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । जैसे कि – ' वरुण!... असुर ' ऋ ( ० ११२४ | १४ ) इत्यादि । सो बलवान् राजा - राम दाशरथि ही यहां सिद्ध हुए । अर्वाचीन विचारोंके रखनेवाले श्रीविनायक चिन्तामणि वैद्य - राव -बहादुर ने भी उक्त मन्त्रमें श्रीरामावतारका बीज माना है । जैकोबी यदि पाश्चात्य विद्वान् भी रामायणी - कथाके बीज वेद में मानते हैं । वादी भी मानते हैं कि - वेदमें आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीन प्रकार के अर्थ होते हैं; तो यदि ' राम ' का एक अर्थ अन्धकार वा श्यामवर्ण है; तो अन्य अर्थ श्यामवर्णके ईश्वरावतार ' राम ' का भी स्वतः सिद्ध है । महाभाष्यकारने ' चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादाः ' ( ऋ ० ४ | ५८ ३ ) इस अग्निदेवता वाले याज्ञिक- मन्त्रको भी शब्द - शास्त्र- व्याकरणकी ओर लगाया है । ' सुदेवो असि वरुण ' ( ऋ ० ८६६१२ ) इस मन्त्रमें सात नदियों-का वर्णन होनेपर भी भाष्यकारने इसका ' शब्दकी सात विभक्तियों ' का अर्थ लगाया है । आप्ताओं के मान्य स्वामी दयानन्दजीने ' द्वादश प्रधयः चक्रमेकं... त्रिशता न शङ्खवोऽर्पिता षष्टिः ' ( ऋ ० १।१६४।४८ ) इस मन्त्रका देवता अपने देदभाष्य में

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वेदमें श्रीरामावतारं ६४५ ी न इ ग - ) क ग के रे 1 7-सें ' संवत्सरात्मा कालः ' यही माना है, है भी यही । श्रीयास्कने भी निरुक्त ( ४।२७११ ) में यही अर्थ बताया है; पर स्वामी दयानन्दजीने इन सबसे विरुद्ध इसका हवाई जहाज अर्थ कर डाला, तब आक्षेप्ता लोग अपने स्वामीको आक्षिप्त न करके हम पर इस अर्थ करने में आक्षेपके अधिकारी कैसे हो सकते हैं? सो सायणादिने वेदका भाष्य याज्ञिक दृष्टिको मुख्य रखकर किया है । पर यह कोई इयत्ता नहीं कि - श्राध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक अर्थ रखनेवाले वेदका केवल इतना ( याज्ञिक ) ही अर्थ हो । अव उक्त मन्त्रमें सीता तथा रावण आदिके अर्थ करने पर जो हमपर प्रश्न होता है कि - राम, सीता, रावण यादिका अन्य मन्त्रों में भी बीज दिखलाया जावे; तदनुसार हम वे मन्त्र भी प्रकरण होनेसे बताते हैं— हम आरम्भ में ' अनुव्रतः पितुः पुत्रो ' आदि वेदमन्त्रोंमें रामा-वतारका सामान्यरूपसे वर्णन दिखला चुके हैं । अब विशेष - बीज भी वेदमें देखिये - । अथर्ववेदसंहितामें ' अयोध्या ' नगरीका भी वर्णन आया है । जैसा कि - ' अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूः ( नगरी ) अयोध्या । तस्यां हिरण्मयः कोश: स्वर्गो ज्योतिषावृतः ' ( अथर्व ० १०।२।३१ ) यहां अयोध्या में ' ज्योति ' से आवृत, विष्णुके अवतार श्रीराम ' हिरण्यमय - कोश ' शब्दसे इष्ट हैं । ' स्वर्ग ' ह उनका विशेषण है – ' स्वः स्वर्गं गच्छतीति स्वर्गः ' । स्वर्ग में जानेकी यह उनकी कथा उत्तरकाण्डके अन्त में स्पष्ट है । ‘ सरयूः सिन्धुरूर्मिभिः ' ( ऋ ० १०।६४।६ ) यहां वेदमें ' सरयू '

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६४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नदीका वर्णन है । सरयू - नदीका अयोध्या के साथ विशेष - सम्बन्ध है । तब अयोध्यानगरी भी सत्ययुगसे सिद्ध है, उसे मनुने बनाया था ( वाल्मीकिरा ० ११५२५- ६ ) मनुका नाम भी वेद में ( ऋ ० ४।२६।१ ) स्पष्ट है | जब वेद॒में सरयू नदीका वर्णन है; तब वेदकी अयोध्या-नगरी भी वही सरयू - नदीके तट वाली सिद्ध होगी । इससे वेद पीछे के सिद्ध नहीं हो जाते । उत्तररामचरितमें कहा है- ' ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ' ( १।१० ) आद्य ऋषियों ( वेदों ) की वारणी पहले चलती है कि - ' अयोध्या '; और वह ' अयोध्या'-पदार्थ पीछे अपने समयपर होता है । जैसे कि - ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता ' ( ऋ ० १ । १६१।३ ) यहाँ वेदमें सूर्य - चन्द्रमाका नाम पहले आया है; पर वे वेदसे पीछे अपने समयपर बने । ' चत्वारिंशद् दशरथस्य शोणाः ' ( ऋ ० सं ० १।१२६ / ४ ) यहाँ पर राजा दशरथका संकेत है । जो वेद भाविनी सरयू, तथा अयोध्या को जानता है, वैसे ही राजा दशरथको तथा श्रीरामको भी जान सकता है । ' अर्वाची सुभगे! भव सीते! वन्दामहे त्वा ' ( ऋसं ० ४ । ५७१६ ) यहाँ सीताकी वन्दना आई है । यदि प्रतिपक्षी लोग ' सीता ' का अर्थ ' लाङ्गलपद्धति ( हल की रेखा ) ' मानें; तो वह जड़ है । यदि वादी उसे नमस्कार मानेंगे, तो उनके मत में ' वेदमें मूर्तिपूजा ' सिद्ध हो जायंगी । हमारे अनुसार वहाँ लाङ्गलकी अधिष्ठात्री देवता श्रीसीता ही इष्ट है । वाल्मीकि रामायणमें भी श्रीसीताका आविर्भाव लाङ्गलसे ही स्वीकार किया गया है; तभी तो उसका नाम ' सीता ' रखा गया था - ' यथा नाम तथा गुणः ' ।

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वेद में श्रीरामावतार जैसे कि - ' अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः । क्षेत्रं शोचवता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ' ( १।६६।१४ ) सूर्यमण्डलाधिष्ठाता देवको भी ' सूर्य ' कहा जाता है, इस प्रकार सीताधिष्ठात्री देवताको भी ' सीता ' । इस कारण उत्तरकाण्डके अन्तमें भी सीता उसी पृथिवीमें प्रविष्ट हो गई हुई दिखलाई है । ' इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाऽनुयच्छतु ' ( ऋ ० ४ | ५७७ ) यहाँ श्रीरामद्वारा सीताकी निग्रह - कथा; तथा पूषा ( अग्निदेवता ) द्वारा उस सीताको वापिस लौटाना सूचित किया है । यहाँ पर ' इन्द्र ' से ' रामावतार ' इष्ट है, जैसा कि - उवट -महीधरके भाष्य द्वारा इन्द्रका कुचरत्व - अवतार लेना हम बता चुके हैं । ' ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः ' ( अथर्व ० ४।६।१ ) यहाँ पर दश - मुख- रावणका संकेत है । फलतः वेदमें अवतारवाद तथा श्रीरामावतार भी सिद्ध होने से श्रीरामनवमी वैदिक - पर्व सिद्ध हुआ । ' नौ'का अङ्क ब्रह्मका प्रतिनिधि होता है, ' सीताराम ' भी ब्रह्म हैं एतदादि - वर्णन हम ' मालाकी मणियाँ १०८ ' ( पृ ० ४०१ ) में कर चुके हैं, सो ब्रह्मके अवतार श्रीरामने ' मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः । कुतोऽन्यथा स्याद् रमतः स्व आत्मनि सीताकृतानि व्यसना-नीश्वरस्य ' ( श्रीमद्भागवत ५।१६।५ ) इस कथनसे अवतार लेकर जहाँ राक्षसोंका वध किया है, वहाँ ' मर्त्यशिक्षण ' भी किया है, सो मनुष्योंको इस अवतारसे शिक्षा भी ग्रहण करनी चाहिये । श्रीरामने अपने अवतार से कई शिक्षाएँ भी दी हैं । उन्होंने

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६४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सूचित किया है कि - अपनी स्त्री तथा धन आदिका अपहर्ता आततायी होता है; अपने बलको बढ़ाकर अपने भ्राताओं वल्कि -बन्दरों - तककी सहायतासे भी उसके देशकी ईंट से ईंट बजाकर उसका वध कर देना चाहिये; उसके आगे भूख हड़तालों वा अपने प्राण देने से कोई लाभ नहीं होगा; क्योंकि इन बातोंका प्रभाव सहृदयोंपर ही पड़ता है । आततायी सहृदय नहीं होता, कठोर होता है, उसका हृदय ही नहीं होता । अतः उसपर इन भूख - हड़तालोंका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता । श्रीरामने अपनी नीति से यह भी सिद्ध कर दिया कि – अपने भाइयों तथा अपनी जातिवालोंके साथ सौमनस्य रखना चाहिये । ' कंटकेनेव कंटकम् ' यह नीति ( यहां विभीषण- द्वारा रावणके रहस्यको प्राप्तकर उसका वध कर देना - यह उदाहरण है, ) शत्रुका छलसे भी मारना ( इसमें लवणासुरके वधकी कथा याद रख लेनी चाहिये ) अनधिकार - चर्चामें लगे हुएको दण्ड देना ( इसमें शम्बूककी कथा याद कर लेनी चाहिये ) इनको पूरा करना चाहिये । इन्हींके फलस्वरूप आज तक ' रामराज्य ' प्रसिद्ध है । क्या आजके राजनीतिक नेता --' जो अपनी जाति वालोंके निग्रहणमें, तथा अपने तथा देशके द्रोही भिन्न जाति वालोंकी छोटी - छोटी बातोंके पूर्ण करनेमें लगे हुए हैं, जो ' त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा येन बाह्याश्चाभ्यन्तरीकृताः । स मृत्युमुख-माप्नोति यथा राजा ककुद्रुमः ' इस अशुद्ध नीतिको अपनाने में लगे हुए हैं - इधर ध्यान देंगे १? यदि उन्होंने श्रीरामको राजनीति स्वीकार नहीं की; ‘ अन्यैः सह विवादे तु वयं पश्चोत्तरं शतम् ' की

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श्रीरामनवमी ६४६ नीति स्वीकार न की; तो वे अपने हाथमें आये भारतके राज्यको नष्ट करवा बैठेंगे । ' इतो भ्रष्टास्ततो नष्टाः ' इस नीति के उदाहरण बन जाएँगे । इस प्रकार श्रीरामने धर्म एवं नीतिको इस शैली से अपनाया कि आज मरनेके भी समय ' राम - राम सत्य है ' यह कहा जाता है । गो ० तुलसीदासने श्रीरामका वर्णन करते हुए कितने सुन्दर शब्द लिखे थे- ' प्रसन्नतां या न गताभिषेकतः, तथा न मम्लौ वनवास-दुःखतः । मुखाम्बुज- श्री रघुनन्दनस्य सा, सदास्तु मे मंजुलमङ्गलप्रदा ' अर्थात् श्रीराम राज्याभिषेक सुनकर प्रसन्न नहीं हुए, वनवास उपस्थित देखकर म्लान नहीं हुए । यही बात वाल्मीकि रामायण में भी आई है - ' हूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च । न मया-लोकितः तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः ' । कितना कठिन कार्य है यह । आज तो अपूर्ण राज्यकी प्राप्तिमें भी गर्दन अकड़ जाती है । पहले की की हुई प्रतिज्ञाएँ ( गोवध करना आदि ) भूल जाती हैं । जादूकी कुर्सी जनताको भुला देती है । क्या श्रीरामकी उस बातको कि- ' स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ' ( उत्तररामचरित १।१२ ) आजके नेता कह सकते हैं? आज तो अपनी अध्यक्षताको स्थिर करने के लिए कितनी गलत नीतियां बरती जाती हैं । कई जनहानिप्रद उपाय भी किये जाते हैं । जिस जाति के मतदान ( वोट ) से वा जिसकी हार्दिक उद्योग-परम्परासे शासकोंको स्वराज्य मिला, उसीकी सबसे बढ़कर उपेक्षा की जाती है; उसी जातिके धर्मपर प्रहार किया जाता है, उसके

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६५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) आर्तनाद पर ध्यान भी नहीं दिया जाता । रामराज्य में ऐसा नहीं था । तभी सुराज्यका नाम भी ' रामराज्य ' हुआ करता है । उस

रामराज्यमें सभी प्रसन्न थे ।

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज्य नहिं काहुहिं व्यापा ॥

सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलत स्त्रधर्म - निरत श्रुति नीति ॥

क्या वर्तमान शासकोंसे भी हम ऐसी आशा कर सकते हैं? यही प्रतिवर्ष स्मरण कराने के लिए ' श्रीरामनवमी ' आया करती है । क्या हमारे शासक एवं बन्धु श्रीरामके सम्पूर्ण चरित्रका मनन करेंगे? ऐसा करनेसे ही गोस्वामीजीकी उक्त चौपाई पूर्ण होगी । ( ४ ) श्रीव्यास - पूर्णिमा । आषाढकी पूर्णिमा श्रीव्यास - पूर्णिमा तथा गुरु पूर्णिमा मानी जाती है । श्रीवेदव्यासने अनादिसे आ रहे हुए पुराण- ज्ञानको ग्रन्थबद्ध करके जो संसारका उपकार किया है; उसे छोटी - सी लेखनी वर्णित नहीं कर सकती । आजके कराल - कलिकाल में इन्हीं पुराणोंके कारण धर्मका प्रचार है और रहेगा । वेद बीजरूप हैं; इसलिए कठोर होते हैं; पर पुराण उसके फल हैं; फलका माधुर्य तथा कोमलता स्वाभाविक है । काव्य, नाटक, उपन्यास आदि इन्हीं पुराणोंको ही प्रमुखता से अवलम्बन करके बनाये गये हैं, तथा बनाये जाते हैं । फलोंके आस्वादमें पृथिवी, जल, वायु आदिकी विचित्रतासे विचिन्त्रता भी उत्पन्न हो जाती है । श्रीमनुजीने कहा है - ' भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीवलैः । नानारूपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः ' ( ६३८ ) किसानोंसे एक ही खेत में बोये

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श्रीव्यास पूर्णिमा ६५१ हुए बीज देश - काल - भेदसे भिन्न हो जाया करते हैं; इस प्रकार पुराणोंमें वैदिक सिद्धान्त देश, काल, पात्रके भेदसे विभिन्न प्रतीत होते हैं, पर वहां होती है वास्तविकता । बृहन्नारदीय पुराण में ठीक ही कहा है - ' न वेदे ग्रहसंचारो

न शुद्धिः कालबोधिनी । तिथिवृद्धिक्षयो वापि न पर्वग्रहनिर्णयः ॥

इतिहासपुराणैस्तु कृतोऽयं निर्णयः पुरा । यन्न दृष्टं हि वेदेषु तत् सर्वं लक्ष्यते स्मृतौ ॥ उभयोर्यन्न दृष्टं हि तत् पुराणैः प्रगीयते । वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्थं महेश्वरि! ' अर्थात् वेदमें ग्रहसंचार, ग्रहण आदिका निर्णयादि जो नहीं है, वह सब पुराणों में है । वेदमें जो बातें नहीं हैं, वह स्मृति में हैं — जो वेद और स्मृतिमें. नहीं है, वह पुराणोंमें है । यह है पुराणोंका महत्त्व । अन्यत्र भी कहा है- ' श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् ' । एकेन हीनः काणः स्याद् द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः । पुराण हीनाद् हृच्छून्यात् कारणान्धावपि तौ वरौ ' । वेद और स्मृति दोनों नेत्र हैं, पुराण हैं हृदय, एकसे हीन काणा और दोनोंसे हीन अन्धा होता है, पुराण से ही हृदय - शून्य होता है । पुराणोंकी महिमाका वर्णन करना समूचे आकाशको मुट्ठी में बन्द करना है, आजतक जो हिन्दु - जाति अपने स्वरूपमें उपस्थित है, इसे विदेशी जातियां तथा भिन्न - सम्प्रदाय अजगर वा मगरमच्छ होते हुए भी जो निगल न सके, यह अकम्प अनुकम्पा पुराणों-की ही है, यह आजके पुराणोंका खण्डन करनेवाले अर्वाचीन सम्प्रदाय भी जानते एवं मानते हैं । इसमें थोड़ी भी अत्युक्ति

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II श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) नहीं । पुराणोंका विषयमहत्त्व कैसे वर्णित किया जाय? पुराणों में समग्र - विषयों का वर्णन है, जिनसे हमें भुक्ति भी मिले, और मुक्ति भी । जीविका भी चले, परमार्थ भी सिद्ध हो । यदि पुराणोंका नाम ' विश्व - काव्य ' रख दिया जाय, उन्हें ' गागर में सागर ' कह दिया जाय; तो इसमें किसी भी निष्पक्ष विद्वान्का ननु नच, किन्तु परन्तु नहीं हो सकता । पुराणोंमें ज्योतिष, सामुद्रिक, शकुनशास्त्र, आयुर्वेद, विषचिकित्सा, राजनीति, ग्रहगति, भूगोल - खगोल विद्या, मूषक-पतंगा आदिको हटाने के उपाय, कृषि बढ़ानेकी विद्या, वृक्षोंको बिना ऋतुके फल - फूल लगें - इसके उपाय, सर्प - विद्या, स्वप्नोंसे भविष्यका निर्णय, पर्वत, द्वीपों, समुद्रों तथा विशेष - नदियों और उनके उद्गमस्थलोंका वर्णन, भुवनोंका वर्णन, स्वर्ग - नरक आदि लोकोंका वर्णन, स्त्री - पुरुषोंके लक्षण, छहों दर्शन, साहित्य - अलंकार शास्त्र, व्याकरण, छन्दः - शास्त्र, शब्दकाव्य, सृष्टिका उत्पत्ति - प्रलय-वर्णन, पदार्थविज्ञान ( सायन्स ), वैदिक - रहस्य, योगप्रक्रिया, सामान्यधर्म - विशेषधर्म, गृहस्थ - शिक्षा, धर्मनीति, समाज - नीति, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक ज्ञान, भक्ति, कीर्तन, तपस्या, सभी प्रकारकी विद्याएँ, विविध कला - कौशल, गृहस्थ सम्बन्धी गुप्त - योग यदि हजारों विषय बताये गये हैं, जिनमें वेद भी चुप किये हुए हैं । इन्हीं पुराणस्थ - विषयोंको अवलम्बन करके हजारों स्वतन्त्र ग्रन्थ बनाये जा सकते हैं । जिनसे प्रणेताओंको वृत्ति तथा उज्ज्वल यश भी प्राप्त हो सकता है ।