पञ्चम सुमन · प्रकरण 33

स्नानादिके बाद व्यायाम

मुद्रित पृष्ठ 349–356 8 पृष्ठ

349चाण्डाल ( भंगी ) का दर्शन इसलिए श्रेष्ठ माना जाता है कि वह अन्त्यज उस समय अपने कार्य झाड़ने- बुहारने आदिमें लगा हुआ होता है । अपने कार्यको समाप्त करके बल्कि पुरीषके पात्रको अपने सिरपर उठाकर आता हुआ वह शुभ समझा जाता है । वह रहस्य यह है कि जिस प्रकार वह अपने कार्यको पूरा करके लौट रहा है, इस प्रकार हम भी अपने कार्यको पूरा करके और धनको सञ्चित करके वापिस लौटेंगे, इस प्रकार उनके मन की प्रसन्नतासे शुभ होना स्वाभाविक है ।

( १५ ) स्नानादिके बाद व्यायाम

स्नान - सन्ध्याके बाद ' व्यायाम भी लाभजनक है । स्नानसे पहले व्यायाम करने पर उस समय बहुत देर विश्राम करना पड़ता है; पर स्नान - सन्ध्याके बाद विश्रामकी आवश्यकता नहीं होती । व्यायाम से शरीर विभक्त एवं सुदृढ अवयवों वाला हो जाता है । चर्बी कम हो जाती है । शरीर फुर्तीला हो जाता है । परन्तु व्यायाम भी लघु होना चाहिये । व्यायामके करनेपर अन्नके परिपाकवश पुरुष कभी भी बीमार नहीं होता; यह अनुभवसाक्षिक बात है, इसमें अर्थवाद नहीं है; क्योंकि व्यायाम प्रातःकालीन शुद्ध वायु में होनेपर फेफड़े शुद्ध हो जाते हैं । तिल्ली और जिगर समतामें रहनेसे उनकी वृद्धिस्वरूप होनेवाले रोगोंकी आशङ्का नहीं रह पाती । शरीर स्वस्थ होनेपर सारे पुण्यकार्य होते हैं; अतः व्यायाम का उपयोग भी धर्मजनक ही है - ' शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ' । 350३५०. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

( १६ ) खड़ाऊँ पहननेका विज्ञान

खड़ाऊँ पहिनना भी हिन्दुधर्म में महत्त्वपूर्ण माना जाता है; विशेष करके ब्रह्मचारीगण पहिले इन्हें पहरा करते थे । इसमें भी विज्ञानशून्यता नहीं है । हमारे पूर्वज जिस - जिस वस्तु की प्रशंसा करते थे, और उनका प्रयोग करते थे; उस - उसमें उन्होंने निगूढ विज्ञान सोचा था । बाहर वे उस विज्ञानको इसलिए प्रकट नहीं करते थे कि ऐसा होनेसे उस नियमका महत्त्व हट जाता है । परन्तु आजका समय उन नियमोंका रहस्य जानना चाहता है । इससे विवशतासे हमें भी उसे बताना पड़ता है । नहीं तो यह समय तो उन नियमोंको व्यर्थ और उनके नियामकों को मूर्ख मानने को भी तैयार हो जाता है ।

खड़ाऊँ इसलिए रखे जाते थे कि - अहिंसाप्रिय हमारे प्राचीन जानते थे कि — अधिकाँश गाय आदिका वध जूतों के कारण भी हुआ करता है; जो आजकल प्रत्यक्ष है । और फिर लोग कोमल चमड़ा चाहते हैं कि पाँव नर्म रहें । इसी कारण जीवित पशुओं की दुर्दशा करके, उन्हें हण्टर मारकर - भगाकर फिर हिंसा की जाती है, जिससे उनका चमड़ा फूल जाए और नर्म हो जाय । इस हिंसा को दूर करनेकेलिए पूर्वजोंने खड़ाऊँ नियमित किये थे । मृतकके चर्मके स्पर्शसे शरीर भी अशुद्ध रहता है- यह वे जानते थे ।

वे यह भी जानते थे कि – खड़ाऊँपर ठहरे हुए पुरुषके ऊपर बिजली नहीं गिरती । जूता पहरे हुए पुरुष यदि प्रमादसे बिजलीको छुए; तो बिजली उसमें संक्रान्त होकर उसे मार देती है;

351प्रातः पुष्प चयन ३५१. परन्तु खड़ाऊं पहिरे हुए पर उसका उतना प्रभाव नहीं होता । स्नान करके उसे पहिरने वालेके शरीर में पृथिवीकी बिजली भी संक्रान्त नहीं होती; इससे शरीर स्वस्थ रहता है ।

इसके अतिरिक्त खड़ाऊंकी कीलसे पांवके अंगूठेकी नस दबी रहती है; इससे ब्रह्मचारीको कामोत्तेजना नहीं रहती; परन्तु जूता पहरनेसे पांवके अंगूठे वा पृष्ठकी जो नस दवती है; वह काम बढ़ाती है । स्त्रियोंमें कामशक्ति प्रबल होती है पुरुषकी अपेक्षा; अतः स्त्रियाँ जूता पहनकर प्रतिपल कामातुर होकर उन्मार्गगामिनी न हों; एतदर्थ प्राचीन लोग उनका जूता पहनना अच्छा नहीं समझते थे; और उनके पांव के अंगूठे में चांदी की आंटी और पांवों में चांदी की कड़ियां पहनाते थे, जिससे उनकी काम जनक नस दबी रहे ।

( १७ ) सन्ध्या एवं मूर्तिपूजार्थ प्रातः पुष्प - चयनका विज्ञान ।

सन्ध्या काल में देवपूजनार्थ प्रातः फूल चुने जाते हैं; इससे जहां देवताओंकी वैध पूजा होती है; वहां हमारा लाभ भी हो जाता है । उसमें विज्ञान यह है कि हमें फूल चुनने बगीची में जाना पड़ता है, वहीं तुलसीपत्र तथा दूर्वा आदि भी हम लेते हैं । सारी रात्रि चन्द्रके अमृत तथा तारोंकी किरणों एवं प्रातःकालकी शुद्ध वायु पाकर पुष्प आदि अमृतमय हो जाते हैं; अतः उनके स्पर्शसे शरीरको स्वास्थ्य तथा मनको शक्तिका लाभ हो जाता है; और फिर प्रातःकालकी हरियाली नेत्रोंको विकसित कर देती है, दृष्टि तीव्र रहती है । तुलसी, दूर्वा, बिल्व आदिके पत्तों में मलेरिया आदि रोगोंके दूर करनेमें अद्भुत क्षमता होती है; अतः प्रातः पुष्पोंका 352चयन बहुत लाभप्रद है ।

( १८ ) विविध आसनोंका विज्ञान ।

सन्ध्योपासनाके समय विविध आसनोंपर बैठना पड़ता है । भगवान् ने गीता में आसन कहा है- ' चैलाजिनकुशोत्तरम् ' ( ६।११ ) नीचे चैल - अर्थात् रेशमी वस्त्र विद्यावे; उसके ऊपर जिन - मृगचर्म बिछावे; और ऊपर कुशासन विछावे । व्याघ्रासन भी बिछाया जाता है । कुशासन तथा रेशमी आसनपर बैठनेसे विद्युत्का प्रभाव नहीं पड़ता । अब भी विद्युत्प्रवाहके प्रभावको रोकने के लिए बिजली की घरमें स्थित तारको रेशमकी तन्तुओंसे ढकना पड़ता है । राखी बान्धनेके समय भी रेशम से बनाये हुए रक्षा - सूत्रका हाथों में बांधना भी इसीलिए है । रेशम पवित्र भी इसीलिए माना जाता है कि उसके वस्त्र पहिरनेसे दूसरेकी विद्युत हममें संक्रान्त नहीं होती । जो छुवाछूतके विचार वाले सर्वसाधारणका स्पर्श अपने साथ नहीं होने देना चाहते कि दूसरेसे अपना स्पर्श न हो जाय और दूसरे को उससे रोकनेमें उसका चित्त भी नहीं दुखाया चाहते अथवा जहां सर्वसाधारणका अपने से स्पर्श अनिवार्य देखते हैं; वे समझदार लोग रेशमी तथा शीतकाल में ऊनी वस्त्र धारण कर लिया करते हैं । इससे उनकी भी इष्टसिद्धि हो जाती है, दूसरेका चित्त भी नहीं दुखता । प्राचीन वैद्य लोगोंके पास जब भंगी भी अपनी नाड़ी दिखाने आया करते थे; तब वे उन्हें निषेध नहीं कर देते थे, किन्तु रेशमी दस्तानेको पहिनकर उनकी नाड़ी देख दिया करते थे, रेशमकी मंहगाईका कारण भी यही है । अस्तु । नीचे रेशमी

353कुशासनका वैदिक विज्ञान

३१३ आसन विल्लानेसे उपासनाके समय पार्थिव विद्युत् हमारे शरीर में संक्रान्त नहीं हो सकती, इसीलिए हमारे ध्यान में विघ्न भी नहीं पड़ सकता ।

- मृगचर्म तथा व्याघ्रचर्म पर स्थिति भी शुद्धि देने वाली है । मृगचर्म पर बैठनेसे उसकी शीतलतावश कामोत्तेजना नहीं होती, जो ध्यान में विघ्नकारिणी होती है और भगन्दर आदि रोग नहीं होते । यदि हों; तो नष्ट हो जाते हैं । मृगोंमें जो तेज होता है, जिससे वे पवित्र माने जाते थे, और मुनियोंके आश्रमों में रहते थे; मृगचर्म पर बैठने से वही तेज उस पर बैठनेवाले ब्रह्मचारी आदिको प्राप्त होता है । मृगचर्म इतना शीतल होता है, और कामोत्तेजनाको इतना दबाता है कि हमें नपुंसकता भी शीघ्र प्राप्त हो सकती है । ब्रह्मचारियोंके लिए, वानप्रस्थी वा संन्यासियों- केलिए केवल मृगचर्म पर स्थिति भी लाभदायिनी होती है; पर गृहस्थोंके लिए, तथा ब्रह्मचारी जिन्होंने आगे गार्हस्थ्य लेना है; केवल मृगचर्म पर स्थिति भी ठीक नहीं, अतः उसके ऊपर उन्हें कुशासन वा रेशमी आसन रख देना पड़ता है । उससे उत्तेजना तो दूर रहती है; पर नपुंसकता नहीं आती ।

व्याघ्रचर्म पर सर्प - वृश्चिक आदि विषयुक्त प्राणी नहीं चढ़ते; इसलिए व्याघ्रचर्म पर बैठकर ध्यान करनेसे निश्चिन्तता रहती है ।

( १६ ) कुशासन का वैदिक विज्ञान 1.

सनातनधर्मके प्रत्येक कर्मोंमें कुशका उपयोग दीखता है; परन्तु अर्वाचीन लोगोंकी इधर आस्था नहीं दीखती; अतः वे उसका 354उपयोग नहीं करते । कुशोपयोग शास्त्रीय ही है । महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलि ने श्रीपाणिनिमुनिकी अष्टाध्यायी निर्माण के समय में भी उनका, हाथोंमें कुश के पवित्रे पहिनना दिखलाया है | देखिये- ' प्रमाणभूत आचार्यो दर्भपवित्रपाणिः शुचौ अवकाशे, प्राङ्मुख उपविश्य, महता प्रयत्नेन सूत्राणि प्रणयति स्म । तत्राशक्यं वर्णेनापि अनर्थकेन भवितुम्; किं पुनरियता सूत्रेण ' ( महाभाव्य १११११ सूत्र तृतीय आह्निक ) यहां श्रीपाणिनिका पूर्वमुख होने तथा दर्भसे पवित्र हाथवाला होने से उनके सुन्न प्रणयनकर्मकी सफलता तथा निरर्थकताका अभाव दिखलाया है । तभी तो पारस्कर आदि गृह्यसूत्रों में यज्ञ आदिके समय कुशकण्डिका प्रसिद्ध है । वेदमें भी उसका वर्णन दीखता है-

' दर्भो य उग्र ओषधिः, तं ते बध्नामि आयुषे ' ( १६ | ३२ | १ ) अथर्ववेदके इस मन्त्रमें दर्भके धारणसे ओषधि जैसा प्रभाव तथा

युकी वृद्धि सूचित की गई है । उसमें रहस्य यह है कि- कुश से भूतप्रेत आदि की बाधा दूर होती है - यह आयुर्वेदकी संहिताओं में स्पष्ट है । इसलिए श्रीवाल्मीकिमुनिने कुशों से लवकुशकी उत्पत्तिके समय रक्षा की थी । जैसे कि रामायण में— ' कुशमुष्टिमुपादाय लवं चैव स तु द्विजः । वाल्मीकिः प्रददौ ताभ्यां रक्षां भूतविनाशिनीम् ' ( ७१६६७ ) यहाँ पूरे कुशसे श्रीरामके बड़े लड़केकी रक्षा की गई; इसीलिए उसका नाम भी कुश रखा गया । छोटेकी रक्षा कुशके लव ( अंश ) से की गई, इसलिए उसका नाम ही ' लव ' हो गया; और दोनोंकी आयु भी बड़ी होगई ।

355कुशासनका वैदिक विज्ञान

३१२-

' त्वं भूमिमत्येषि ओजसा, त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे । त्वां पवित्रमृषयो भरन्त त्वं पुनीहि दुरितानि अस्मत् ' ( अथर्व ० १६।३३।३ ). इस मन्त्रमें कुशकी लोकोत्तर - शक्ति, पवित्र करनेकी योग्यता और पापको दूर कर देनेकी क्षमता बताई है; और उसका यज्ञकी वेदीमें उपयोग भी वताया है, ' स्तृणीत बर्हिः ' ( १।१३।५ ) इस मन्त्रमें भी यही बताया है; तब यज्ञोंमें गृह्यसूत्रप्रोक्त कुशकण्डिकाकी वैदिकता भी सिद्ध हुई; वेदका विषय यज्ञ भी सिद्ध हुआ । इसी कारण ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( गीता १०/२५ ) इस यज्ञस्वरूप जप वा ध्यानादिके अवसर पर भगवान् ने ' चैलाजिनकुशोत्तरम् ' ( ६।११ ). कुश वा उसका आसन सबसे ऊपर रखवाया है । ' भूमिमत्येषि ओजसा ' ( अथर्व ० १६।३३।३ ) इस पूर्वोक्त मन्त्रके अंशसे कुशोंकी भूमिकी विद्युत्के निरोध में क्षमता संकेतित की गई है । तभी तो ध्यानके समय भूमिकी विद्युत् से विघ्न न हो, अतः भूमिपर रखे हुए आसनपर भगवान्ने कुशका निवेश भी आवश्यक माना है । इसी कारण पिण्डपितृयज्ञमें पिण्डोंके नीचे भी कुश रखे जाते हैं ।

कुशोंका महत्त्व और भी देखिये- ' त्वामाहुर्देव वर्म! त्वां दर्भ! ब्रह्मणस्पतिम् । त्वामिन्द्रस्य आहुर्वर्म, त्वं राष्ट्राणि रक्षसि ' ( अथर्व ० १६ | ३० | ३ ) इस मन्त्र में कुशोंको देवताओंका कवचरूप माना गया है; तब उनकी भूत - प्रेतोंकी बाधाको दूर करने में क्षमता भी सिद्ध होगई । कई व्यक्ति भूतप्रेतोंको कीटाणुरूपमें मानते हैं; तब इनकी कीटाणुओं को दूर करने की शक्ति भी सिद्ध होगई । ब्राह्मरण- भागात्मक वेद- शतपथ ( वाजसनेयक ) में भी कहा है- ' या वै वृत्राद 356बीभत्समाना आपो धन्व दृभन्त्य उदायन, ते दर्भा अभवन् [ यहाँ दर्भों की उत्पत्ति बतलाई गई है ] यद् हसन्त्य उदायन्, तस्माद् दर्भाः । ता ह एताः शुद्धा मेधा आपो वृत्राभिप्रक्षरिता यद् दर्भा, यदु दर्भा:, तेन श्रोषधयः ' ( १२।३।२ ) यहां पर पापों तथा रोगोंकी दूर करनेकी शक्ति दर्भ में कहकर उन्हें ओषधिस्वरूप बताया गया है ।

दर्भ ( कुश ) के धारणसे पवित्रता भी बताई गई हैं । जैसे कि ' अमेध्यो वै पुरुषो यद् अनृतं वदति, तेन पूतिरन्तरतः [ यहाँ मनुष्यको असत्यभाषी होने से भीतर से अपवित्र बताया गया है । उसकी भी पवित्रता कुशों से बताते हैं- ] मेध्या वै दर्भाः, मेध्यो भूत्वा दीक्षै इति । पवित्रं वै दर्भाः । पवित्रपूतो दीक्षै इति । तस्माद् एनं दर्भ - पवित्रेण पावयति ' ( शतपथ ३ | १ | ३ | १८ ) यहांपर यज्ञकी दीक्षा में कुशोंका पवित्रा ( अंगूठी ) पहिनना कहा है ।

कुशमें एतदादिक विज्ञान भरे होनेसे ही सनातन हिन्दुधर्मके प्रत्येक कर्मोंमें — चाहे मृतककर्म हो, चाहे विवाहादि शुभ कर्म हों- कुशोंका उपयोग आदिष्ट किया गया है । वेद में अन्य भी इसके लिए कहा है- ' स नोऽयं दर्भः परिपातु विश्वतो देवो मणिरायुषा संसृजाति नः ' ( अथर्व ० ११६।३३।३ ) ' दर्भे य उग्र ओषधिः तं ते बध्नामि आयुषे ' ( अ ० १६।२२।१ ) इसमें कुशको आयु देनेवाला कहा गया है — उसमें कारण शरीरको दूषित करनेवाले कीटा- ओंका दूर करना ही है । इसी कारण सूर्य - चन्द्र आदिके ग्रहणके अवसर पर जब कीटाणुओंका प्रावल्य हो जाता है - उनके

In English

The Science of Vedic Rituals

This text explains the practical and scientific reasoning behind various Hindu daily observances. It covers the benefits of exercise after bathing, the reasons for wearing wooden sandals instead of leather shoes, the advantages of picking morning flowers, and the use of specific seating mats during prayer.

This chapter answers

  • Benefits of exercise after bath?
  • Why wear khadaun instead of shoes?
  • Science behind picking morning flowers?
  • Purpose of different asanas in worship?
  • Why silk is used to prevent electric currents?

Also written: Snanadike, Bada, Vyayama, Snanadike Bada Vyayama, स्नानादिके बाद व्यायाम

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 349–356 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

पृष्ठ 349 से मूल ग्रन्थ पढ़ें →