पञ्चम सुमन · प्रकरण 66

उपवास एवं एकादशी व्रत विज्ञान

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545( ६४ ) उपवास एवं एकादशी - विज्ञान ।

प्रत्येक पुरुष कभी आवश्यकता से अधिक खा जाता है; तब उसके अन्दर व्यर्थ पढ़ार्थ निरन्तर इकट्ठे होते रहते हैं; वे ही रोगों के मूल कारण बनते हैं । मुनियोंने उन रोगों के उपशमनार्थं समय- समय पर उपवास एवं एकादशीके दिन नियमतः व्रतका विधान नियमित किया था । कोई समय था कि - जब एकादशीव्रत पर उपहास किया जाता था; उसका नियमन ' कसाईपना ' बताया जाता था, पर विज्ञानने जन्म लेकर और उसे प्रश्रय देकर उन आते- प्ताओंको अल्पश्रुत सिद्ध कर दिया है । हमारे प्राचीन महानुभाव वैज्ञानिक - शिरोमणि थे- इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । उन्होंने हमारे लिए कर्तव्यता - रूपसे जो - जो बताया है, उसका रहस्य यद्यपि उन्होंने उस समय प्रकट नहीं किया; तथापि आजके विद्वान् उनके नियमनमें बहुत लाभ होते हुए देखकर उनकी बुद्धि पर

प्रकट करते हैं ।

उपवास करनेसे अन्दर इकट्ठे हुए सब व्यर्थ पदार्थ भस्म हो जाते हैं । हमारी जठराग्नि चुन - चुनकर उन दूषित पदार्थोंको जला दिया करती है । इस प्रकार शरीर नवीन हो जाता है । उन पदार्थों के भीतर रहने तक हमें वास्तविक भूख नहीं लगती । क्षयादि- रोगोंसे अतिरिक्त उपवास प्रायः सभी रोगोंको निर्मूल करता है । इस प्रकार शरीर - स्वच्छताविधायक उपायोंमें उपवास सबसे श्रेष्ठ है ।

अपने उद्धारार्थ भगवान्का ध्यान भी करना पड़ता है । तब 546अनन्यमनस्कता अपेक्षित होती है, जैसा कि गीता में माना है ( ८ | १४, ६।१३,३०, १३।१० ) । छानन्य- ध्यान के लिए जहाँ शरीरकी स्वच्छता अपेक्षित होती है, वहाँ मनकी भी । जैसे शरीरकी स्वच्छता उपवाससे, आहार त्यागसे होती है, वैसे मनकी स्वच्छता मनके आहार - त्याग से होती है । मनका आहार होता है विषयविलास- चिन्तन | उसके त्याग अर्थात् मानसिक - उपवाससे निर्विषय मन स्वच्छ हो जाता है 1

। निर्विषय - मन से भगवानका ध्यान अनन्यता से होता है । मन ही बन्ध एवं मोक्षका कारण होता है । जैसे कि ' पञ्चदशी ' - स्थित यह वचन प्रसिद्ध है- ' मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासङ्ग, मोक्षे निर्विषयं मनः ' ( ११।११७ ) अर्थात् विषयासक्त मन बन्धका कारण होता है, और विषयरहित मन मुक्ति - दायक होता है । तब अपने उद्धारक, मुक्तिके उपायभूत अनन्य - ध्यानकी निष्पत्तिकेलिए मनकी निर्विषयता आवश्यक होती है । उसका उपाय है कि - त्रतवाले दिन निराहार रहा जावे ।

सतत - आहारसे हमारी इन्द्रियोंमें ऊष्माका वेग बढ़ जाता है, तव उनमें उत्तेजना एवं विषयैषणा उत्पन्न हो जाती है । जब विषयैषणा हुई, तो भगवान्का अनन्य - ध्यान कैसे सम्भव हो? उसकी रक्षार्थ भगवान् ने हमपर अनुग्रह करके यह उपाय बताया है कि- ' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ' ( गीता २५६ ) अर्थात् निराहार - पुरुषकी विषय - निवृत्ति हो जाती है । निर्विषयता हो जानेपर अनन्य भक्तिमें कोई बाधा नहीं बच पाती, वह भक्ति ठीक हो पाती है ।

547तब प्रश्न उठता है कि- निराहार होने से विषय चाहे छूट जावे, तथापि उनका रस तो नहीं छूटता । त्रिषय - रस न छूटनेसे भगवान् का अनन्य ध्यान फिर कैसे हो? ' इस पर यह उत्तर है कि यह ' कोई नवीन प्रश्न नहीं है । भगवान् ने इसे पहले से ही जान रखा है । अतः उन्होंने कहा है- ' विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्यं देहिनः । रस - वर्जंम् ' ( २।५ ९ ) । तब विषयरस हटने का क्या उपाय है? वह उपाय भगवान् ने इस प्रकार अपने श्रीमुखसे कहा है- ' रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवतेते ' ( २५६ ) अर्थात् निराहारता रूप व्रत हो; और फिर हो भगवान्‌की बाँकी - झाँकीका दर्शन । इस प्रकार विषय और विपयरस छूटकर हमारी अनन्यचित्ततामें सहायक बनेंगे । जब अनन्यचित्तता होगई; तो हमें जगत्का उत्तम लाभ मिलेगा । यही है व्रतोपवासका विज्ञान ।

उपवासका इसीसे महत्त्व समझिये कि — जब कोई ज्वर वा रोग जारी हो; तो वैद्य पहले उसके पेटकी सफाईकेलिए उसे लङ्घन ( उपवास ) कराते हैं; तभी उसकी चिकित्सा करते हैं । इससे वह ज्वर वा रोग जल्दी हट जाता है । वैज्ञानिकोंने अनुसन्धान करके पता लगाया है कि - उपवाससे ज्वर, सन्निपात ( नमोनिया ) प्रतिश्याय ( जुकाम ), जलोदर, हैजा, कुष्ठ, स्वप्नदोष, खांसी, दमा, सूजन आदि रोग शीघ्र हट जाते हैं । उपवाससे लाभ केवल शरीरका ही नहीं होता, वल्कि – मनका भी लाभ हो जाता है । अतः उपवास मानस - रोगोंके लिए भी उपयोगी सिद्ध है, क्योंकि- उपवाससे शरीरकी विकृति हटने से मनमें भी स्वास्थ्य हो जाता 548है । मन के स्वस्थ होनेपर ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' इस प्रकार बुद्धिका संस्फुरण, तथा ध्यानैकतानता भी होती है— जैसे कि - भगवद्गीताके वचनसे हम पहले बता चुके हैं ।

इसीलिए ही योगी एवं तपस्वी बड़े - बड़े उपवासोंको किया करते थे । उसी उपवासको सनातन हिन्दुधर्ममें ' व्रत ' नामसे कहा जाता है । व्रतमें उपवासका नियम होता है । उपवास में पहले लघु- भोजन, फिर एक बार मुनिधान्य - श्यामाक ( सांवक ) आदिका उपयोग करना पड़ता है । उसमें उन्नति करनेपर दूध, तब जल, फिर वायु- भोजन करना पड़ता है । व्रतमें पुरुष धर्म समझकर उस दिन पापसे घृणा करता है । दूसरेके धन वा परखीमें कुदृष्टि नहीं करता, असत्य नहीं बोलता, या मौनी रहता है, दूसरेका धन नहीं चुराता, दूसरोंको धोखा नहीं देता । धर्मके पहले अङ्ग धृतिको, फिर क्षमाको आश्रित करता है, मनका दमन और इन्द्रियोंका निग्रह करता है, क्रोध नहीं करता है, शुचि ( पवित्र ) रहता है । स्वाध्याय करता है, भगवान् का ध्यान करता है । कथा सुनता है । भगवान्‌का कीर्तन करता है । इस प्रकार ऐहिक जीवन उत्तम हो जाता है, पुण्य उपार्जित हो जाता है, जिससे पारलौकिक गति भी सुप्राप्य हो जाती है । यही तो एकादशीका व्रत है ।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि - शुक्ल तथा कृष्ण दोनों पक्षों में एकादशी तिथि आया करती है । उसमें हमारे पूर्वजोंने • उपवासका आदेश दे रखा है । उसके माहात्म्य भी उन्होंने बताये हैं । कार्तिक माहात्म्यमें लिखा है- ' तपो नानशनात् परम् ' ( १७।२५ ) 549उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है । ' व्रतं नैकादशीसमम् ( १७।२७ ) एकादशीके समान अन्य कोई व्रत नहीं है । फिर वहां लिखा है--

' एकादशीव्रतं नाम सर्वकामफलप्रदम् । एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥ मातेव सर्वबालानामौषधं रोगिणामिव । रक्षार्थं सर्व - लोकानां निर्मितैकादशी तिथिः ॥ एकादशेन्द्रियैः पापं यत् कृतं येन वा द्विजाः! नरो निर्धूय तन्नूनं श्रीतः स्वर्गतिमान् भवेत् ॥ महापातकयुक्तोपि युक्तोपि ह्युपपातकैः । एकादश्यां निराहारः स्थित्वा याति परं पदम् ' ( १७१३, ४, ५, १० ) यहाँ पर एकादशीको बच्चों के- लिए माताकी तरह, रोगियों केलिए औषधके समान, सबके रक्षार्थ बनी हुई माना है । ग्यारह इन्द्रियोंसे किये हुए पापोंसे हटकर व्रतीका स्वर्ग में जाना बतलाया है । महापातकोंका भी दूर हो जाना माना है ।

अर्वाचीन पुरुष पहले इन फलोंपर उपहास करते थे, व्रतों का विरोध करते थे, और व्रत - उपवासोंको नियत करनेमें प्राचीन महानुभावोंकी क्रूरता एवं निर्दयता मानते थे पर पाश्चात्य - वैज्ञानिकों ने जब इन लाभोंका अनुमोदन किया; तब अर्वाचीन लोग प्राचीनोंके विज्ञानपर नतमस्तक होगये ।

उपवास मनुष्योंकेलिए बिना दवाईका श्रौषधालय है । वह रोगके बीजोंको जला डालता है । सचित - मलको अन्दर से निकाल कर शरीरका संशोधन कर देता है । पाचनक्रियाओं को शक्ति देता है । वास्तविक भूख उत्पन्न करता है । मनको शुद्ध एवं प्रसन्न कर देता है । हम जो कुछ खाते हैं, उसका अपकांश जब तब अन्दर

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बच जाया करता है । तदन्तर बार - बार खाते रहने से शारीरिक अन्तड़ियों पर बड़ा भार पड़ जाता है, इससे कामोत्तेजना भी प्रारम्भ हो जाती है । अन्तड़ियोंको विश्राम न मिलने से भीतर विष उत्पन्न होकर सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है । उसका धुआँ मस्तिष्क में पहुँचता है, जो शारीरिक शक्तिका ह्रास कर देता है । इससे श्वास, कास, कुष्ठ, स्वप्नदोष और दुर्बलता आदि नाना रोग उत्पन्न होकर शरीरको सर्वथा अस्वस्थ कर देते हैं, और मनकी एकाग्रता हट जाती है ।

मनुष्य रोगाक्रान्त होकर भांति - भांति की विदेशी ओषधियाँ सेवन करता है । वे ओषधियाँ उस रोगको बलात् दूर करती हैं । उनसे भीतरी रोग शान्त नहीं होता, अपितु उन श्रोषधियोंका अपना विष भी भीतर सचित हो जाता है, जो हमें निर्बल बना देता है और कालान्तर में विभिन्न रोग हमपर फिर आक्रमण कर बैठते हैं । ऐसी स्थिति में उपवास ही एकमात्र सर्वोत्तम उपाय है । तभी तो रोगावस्थामें वैद्य लोग भी पहले लंघन ही कराया करते हैं । कहा गया है - ' ज्वरादौ लङ्घनं प्रोक्तं ज्वरमध्ये तु भेषजम् । ज्वरान्ते पाचनं विद्यात् ' ।

उपवासका महत्त्व पशु - पक्षी भी जानते हैं, अचेतन पदार्थ भी जानते हैं । जब कोई पशु - पक्षी रोगी होता है; तब उसे.. खानेको दीजिये, वह कुछ भी नहीं खायेगा । अब अचेतन पृथिवीको लीजिये । जिस पृथिवीका कृषिकेलिए सदा ही उपयोग किया जाता है, उसे विश्रामका अवसर नहीं दिया जाता;

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तो उसकी उत्पादन - शक्ति धीरे - धीरे क्षीण हो जाती है । तब उसकी स्वाभाविक शक्तिके उत्पादनार्थ उसे भी उपवास कराया जाता है । पृथिवीके बड़ी होनेसे उसका उपवास भी बड़ा होता है । एक साल या छः मास उसे उपवास कराये जाने पर उसकी उत्पादन - शक्ति बढ़ जाती है । फिर उसे बहुत खाद तथा बहुत पानी देनेकी आवश्यकता भी नहीं रह जाती । इस प्रकार हमें भी पक्ष पक्ष में एक - एक उपवास ( एकादशी व्रत ) करने से हमारे पाचन - क्रिया करने वाले अङ्गोंका कार्य भी थोड़ा हो जाता है । विश्राम प्राप्त हो जाने से उन अङ्गों में शक्तिका सञ्चय हो जाता है I

। आगेका भोजन अनायास पच जाया करता है और शरीर नीरोग रहता है ।

उपवाससे शरीरका शोधन होता है । निर्जीव यन्त्रोंका भी उपवाससे संशोधन किया जाता है । इससे वे स्थायी तथा अधिक कार्य करने वाले सिद्ध होते हैं । दो यन्त्र हों; एक वह जिसका संशोधन समय पर हो; और दूसरा वह जिसका संशोधन कभी भी न किया जाय । दोनोंके कार्य - निरीक्षणसे पता चलेगा कि— जिस यन्त्रका उपवासपूर्वक शोधन किया गया है, वह स्वस्थ है, और दूसरा रोगी है, उसका कार्य शिथिल - गति से होता है ।

इसी प्रकार शरीर भी हमारा यन्त्र है । अन्य यन्त्रोंमें तो शोधनकी यह सुविधा है कि उनके अङ्गको पृथक् - पृथक् करके उनका संशोधन कर फिर उन्हें अपने - अपने स्थान पर फिट कर दिया जाता है, पर हमारे शरीर के अङ्गोंका पृथक् करना सम्भव नहीं । उनको पृथक करना तो दूर रहा; उनमें हमारी दृष्टि भी

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नहीं पहुँचती । तब शरीर के भीतरी छोटे -

छोटे अवयवों तथा सूक्ष्म • स्नायुओं का संशोधन कैसे हो? तो क्या प्रकृतिने हमारे शरीरकी अन्तः - शुद्धिकेलिए कोई मार्ग न रखकर सूर्खता की है? नहीं नहीं । हमारे भीतरी भाग के शोधनार्थ की जानेवाली उपाय - राशिका नाम ही उपवास है । उसके द्वारा शरीर के भीतरी अङ्ग - प्रत्यङ्गों के शोधनका कार्यं सहजही हो जाता है ।

घरकी सजावटकेलिए जब - तब विशिष्ट स्वच्छता की आवश्यकता भी पड़ती है, तभी वहां दीमक चूहे आदि से बचाव होता है; और उस घरकी आयु बढ़ती है; इसी प्रकार शरीररूपी घरकी भी प्रत्येक पक्षमें शुद्धि करनेसे भीतरी अग्नि अवशिष्ट दोषों को दग्ध कर देती है; इससे शरीर निर्मल हो जाता है, आयु भी उसकी बढ़ जाती है । शरीरकी निर्मलता से मन भी निर्मल होता है । निर्मलताको प्राप्त मन ही धर्म - कर्म तथा उपासनाके योग्य सिद्ध होता है, और लौकिक अर्थ - कामकी सिद्धिमें भी सामर्थ्यवान् सिद्ध होता है ।

व्रतका एक लौकिक लाभ यह भी है कि यदि घरके सभी व्यक्ति पक्ष - पक्ष में विधिपूर्वक व्रत करें; तो युद्धादिमें राशनिंग सिस्टम में राशनकी कमी मिट जाती है । अथवा बचा हुआ अन्न भूख से पीड़ित भाइयोंके उपयोग में भी आ सकता है । इससे देश में अन्न का अभाव कम हो जाता है । ' व्रतका अभ्यास होजानेपर कहीं विदेश वा स्वदेशमें समयपर भोजन न मिलनेसे व्याकुलता नहीं हो पाती । इसके अतिरिक्त स्वयं भूखका कष्ट सहने से ही हम दूसरे भूखे- नंगे व्यक्तिोंका कष्ट जान सकते हैं; अन्यथा नहीं । ' हि

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५५३ वन्ध्या विजानाति गुर्वीं प्रसववेदनाम् ' । एक दिन भी जिसने उपवास नहीं किया; वह प्रतिदिन फांका करनेवाले चुत्पीड़ित प्राणियोंका कष्ट कैसे जान सकता है?

इधर भूखे रहने से यदि कुछ कष्ट होता भी है; तो यह एक तपस्या है । इससे पिछला पाप नष्ट होता है । पापका परिणाम ही दुःख हुआ करता है | जब हम क्रमशः दुःखको झेलते रहेंगे, तब क्रमशः हमारा पाप भी क्षीण होता रहने से हमारे पुण्यकी अभिवृद्धि होगी । कष्ट सहनेका नाम तप है । चान्द्रायण, कृच्छ, आदि व्रत इसीलिए ' तप ' कहाते हैं । अतः एकादशी व्रत भी एक तपस्या है ।

व्रत तथा उपवास यद्यपि जब - तब किया जा सकता है; तथापि उसमें कोई नियम नहीं रहता । नियमके अनुवर्तन से शरीर उसका अभ्यासी होकर सदा प्रकृतिस्थ स्वस्थ रहता है । इस कारण मुनियोंने हमारे लिए साधारण -उपवास एकादशी में आदिष्ट किया है । ' एकादश ' शब्दसे एकादश इन्द्रियों के विशिष्ट विषयोंका उपवासभी सूचित होता है । जैसे कि ' कार्तिकमाहात्म्य में कहा है- ' श्रोत्रत्व घ्राणदृग् - जिह्वा - वाग् - दो- ( भुज ) मेंढाङ्घ्रि- पायवः । इतीन्द्रियाणि मनसा वश्यान्येकादशैव हि ' ( १७१७ ) इससे मल - मूत्र, दर्शन स्पर्शन आदि अनिवार्य विषयोंका निषेध इष्ट नहीं, किन्तु उन इन्द्रियोंसे वैषयिक - आस्वाद, कामवश कामिनीरूपदर्शन, कामसम्बद्ध- बातोंका श्रवण, अश्लील बातोंका कथन, कामचरितार्थतार्थ स्त्रीका आलिङ्गनादि स्पर्श, एतन्निमित्तक इत्र आदि सुगन्धित वस्तुओंका लगाना वा सूघना, स्वादकेलिए विविध रसोंका खाना, किसी रमणीके घर

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जानेकेलिए पांओं का उपयोग, इस प्रकार गुप्त - इन्द्रियका वैषयिक कार्योंमें उपयोग — आदिका निरोध करना चाहिये - यह सूचित होता है ।

वाणीका निरोध मौन है, मौन भी एक तपस्या है; इस विषय में हम पूर्व लिख चुके हैं । ' मुनेर्भावो मौनम् ' यह मौनका विग्रह हैं । मौनसे मुनित्व अनायास प्राप्त हो जाता है । हरिकीर्तन - श्रादिके अतिरिक्त और कुछ न बोलना यह मौन है । इसी कारण मुनियोंने एकादशीके दिन स्नान - दान आदि अतिरिक्त भगवत्पूजन, देव- आज्ञा दी है । जैसेकि - कार्तिक माहात्म्य में कहा है- स्नात्वा

पूजन, भगवन्नाम - गुणकीर्तन, गान - नृत्य, पुराणादिके श्रवणकी भी

' च विधिवद् विष्णुमर्चयेत् प्रयतो नरः । गन्धपुष्पादिभिः सम्यग् रान्नौ कुर्वीत जागरम् । गीतं वाद्यं च नृत्यं च पुराणश्रवणं तथा । धूपं दीपं च नैवेद्यं गन्धपुष्पानुलेपनैः ' ( १७।११-१२ ) ।

उपवासार्थ एकादशी तिथि नियमन करनेमें विज्ञान भी है । वह यह कि - एकादशीका अमावास्या और पूर्णिमा एवं दोनों अष्टमियोंके साथ विशेष योग होता है । अमावस्या में सूर्य और चन्द्रमा दोनों एक राशिमें होते हैं । पूर्णिमा में दोनों सम - रेखा में होते हैं; अष्टमी में दोनों समान कोण में होते हैं; तब उनके आकर्षण - विकर्षणका प्रभाव जल पर तथा कठोर त्वचा वाले रसयुक्त वृक्षों पर भी होता है, मनुष्य शरीरका तो कहना ही क्या? इसी कारण समुद्र में सबसे अधिक ज्वार - भाटा पूर्णिमा में, सबसे कम अमावास्या में, मध्यमरूपसे दोनों अष्टमियों में हुआ करता है ।

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जैसे सूर्य - चन्द्रके आकर्षण - विकर्षणका प्रभाव समुद्रके जलपर पड़ता है, रसदार वृक्षों पर पड़ता है; वैसे ही प्राणियों के लहू पर भी पड़ता है; क्योंकि - लहू भी जलका ही भाग होता है । उन तिथियोंमें स्त्री - पुरुषोंकी रक्त - वीर्यादि धातुएँ विषम होती हैं । उस समय भोजन करने पर हुई हुई उत्तेजना हानिकारक होती है । अतः इन तिथियोंमें ब्रह्मचर्यपूर्वक व्रत आवश्यक है । इसी कारण ही पूर्व समय में इन तिथियों में अनध्याय, यज्ञ एवं व्रत आदिके अनुष्ठान चलते थे ।

उक्त प्रकर्षरण - विकर्षरणका प्रभाव अष्टमीसे लेकर पूर्णिमा - अमावस्या तक रहा करता है । एकादशी से वह प्रभाव विशेष- रूपसे आरम्भ होता है । इन्हीं दिनों रोगके बीज भी शुरू होते हैं । तब हमारे ऋषि - मुनियोंने अष्टमी में साधारण व्रत निर्दिष्ट करके एकादशी के दिन उपवास बताया । उसकी विधि यह थी कि अष्टमी के दिन साधारण व्रत किया जावे, फिर नवमीके दिन भोजन किया जावे । फिर दशमीकी रात्रि में उपवास वा लघु - भोजन किया जावे । एकादशीके दिन दिन - रात पूर्ण उपवास किया जावे । फिर द्वादशीके दिन ब्राह्मण भोजन तथा दान - दक्षिणा देकर स्वयं लघु- भोजन किया जावे । रात्रिमें फिर उपवास करके वा मृदु भोजन करके फिर प्रदोष व्रत करके, चतुर्दशी में नियमानुसार भोजन करके फिर पूर्णिमा में ' श्रीसत्यनारायण व्रत ' किया जावे । सायं उसका प्रसाद लिया जावे । श्रमावास्या में अपराह्न तक निराहार पितृपूजन करके फिर पितृश्राद्धमें ब्राह्मणको निमन्त्रित करके

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जिमाकर उसका शेष भोजन करे ।

फलतः अमावस्या तक पूर्णिमा में सूर्य और चन्द्रमाका आपस में विशेष - सम्वन्ध होनेसे उसका पृथिवीपर प्रभाव पड़ता है । उससे हमारी जठराग्निपर प्रभाव पड़ता है । उससे रोग सम्भव होता है, परन्तु दशमीकी रात्रिमें भोजन न करने वा लघु - भोजन करनेसे दूसरे दिन एकादशीमें उपवास करने से, फिर द्वादशीमें लघुभोजन वा प्रदोष व्रत करनेसे शरीरकी शुद्धि हो जाती है । यही कार्तिक- माहात्म्यमें कहा है – ' उपवासफलं लिप्सुर्जह्याद् भुक्ति चतुष्टयम्, पूर्वापरदिने रात्र्यामहोरात्रं च मध्यमे ( १७१८ ) इसीकी स्पष्टता अग्रिम पद्यमें की गई है - ' भवेद् दशम्यामेकाशी द्वादश्यां च मुनी- श्वराः! एकादश्यां निराहारः स्थित्वा याति परं पदम् ' ( १७ । १० ) ।

इस प्रकार करनेपर ' छिन्न े मूले नैव शाखा न पत्त्रम् ' इस न्याय से रोगके बीज दग्ध हो जाते हैं । इन अवसरों पर ब्रह्मचर्य भी करना पड़ता है, निराहार भी रहना पड़ता है । इससे शरीर की निर्मलता हो जाने से सम्भावित शारीरिक एवं मानसिक हानि सर्वथा नहीं हो पाती, क्योंकि उपवास मनुष्योंकेलिए बिना दवाका औषधोपचार होता है । ऐसा करने से हमारा शरीर स्वस्थ रहेगा, शरीर स्वस्थ होने पर हमारा चित्त स्वस्थ रहेगा 1

। चित्त स्वस्थ होने पर बुद्धि - स्फुरण होगा । बुद्धि - स्फूर्ति से हम संसारोपकारक कार्य कर सकेंगे ।

इस भयको अपने मनसे सदाकेलिए निकाल देना चाहिये कि उपवास हमारेलिए मारक वा निर्बलताकारक सिद्ध होगा ।

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नहीं, कभी नहीं । अपितु सर्वदा खाते रहना, अन्तड़ियों वा इन्द्रियोंको थोड़ा भी विश्रामका अवसर न देना ही निर्बलताकारक वा मारक सिद्ध होता है, व्रत वा उपवास नहीं । अवकाश सबको दिया जाता है | सरकारने विद्यालयों में साप्ताहिक अवकाश रखा - हुआ है । दुकानों में भी साप्ताहिक अवकाश रखा है । इञ्जन आदि यन्त्रोंको भी समय - समय पर अवकाश देना पड़ता है । इसका प्रयोजन है इनको विश्रामका अवसर देना । विश्रामसे आगे स्वास्थ्य बढ़ता है । आगेका कार्य भी द्रुतगतिसे, स्फूर्तिसे होता है । सतत अशनादिक्रिया होने से भीतरी

अन्तड़ियोंको अवकाश न मिलने से उनपर दबाव बढ़ जाता है,

और वे निर्बल पड़ जाती हैं । अतः सतत अन्नाशन ही मारक

सिद्ध होता है । अजीर्णता आदि सब रोग इसी सतत अशनके ही

परिणाम हैं । अजीर्णताकी वृद्धि शरीरको जर्जर करके नष्ट कर

देती है, उपवास नहीं ।

कर देता है । मृत्युका उपवास तो इन सब दोषों को दूर

ज्ञात होगा कि उपवाससे म्युनिसिपैलिटीका रजिस्टर देखने पर

उतने पुरुष नहीं मरते, जितने अवैध वा

सतत - भोजनसे । व्रत एवं तपके अनुष्ठानमें लगे हुए हमारे मुनियोंकी अकालमृत्यु कहीं सुनी नहीं गई है । प्रत्युत उनकी दीर्घ आयु ही सुनी जाती है । इसी कारण कोई भी रोग क्यों न हो, उसे दूर करनेकेलिए वैद्य लोग रोगियोंसे उपवास कराते हैं; तभी उनकी चिकित्सा सफल होती है ।

फलतः उपवास ही पाचक ओषधि है । उसीसे हमारे भीतरी. अवयव प्रत्यवयव रविवारकी भांति अवकाश पाकर फिर नये हो

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जाते हैं; और नवीन शक्ति प्राप्त करके भावी रोगोंसे मुकाबला करके उन्हें हटा सकते हैं । उपवाससे भीतरी विष या मल निकल • जाता है | दमा आदि रोगोंको दूर करने के लिए लग्ने उपवासों की - आवश्यकता पड़ती है; परन्तु प्रत्येक पक्ष में एकादशीव्रत करने पर विशिष्ट रोगोंकी उत्पत्ति ही नहीं हो पाती । अतः आगे दीर्घ- : उपवासों की आवश्यकता भी नहीं पड़ती ।

कभी भी व्रत न करने वाले और सदा ही खाने - पीने में लगे हुए पुरुषों की चर्बी बढ़ जाती है, कफ बढ़ जाता है; शरीर में मल ' व्याप्त हो जानेसे विकारपूर्णता सढ़ा स्थित रहती है, स्फूर्ति नहीं रह ' जाती, सदा उदासीनता - सी बनी रहती है । कोई भी वायु- मूलक रोग जब - तव शरीर में अधिष्ठित रहता है, मनकी वृत्ति दूषित रहती है । परमात्मा या तपस्याके प्रति प्रवृत्ति नहीं हुआ करती । हृदय सदा भोगवासना से वासित तथा कलिकल्मप - कलुषित होकर - दुष्प्रवृत्तियुक्त रहता है । पाचनक्रियामें निर्बलता हो जाती है । तब - खाया हुआ अन्न जीर्ण ( हजम ) नहीं होता, चित्तमें सदा उद्वेग रहता है । ऐसा पुरुष सदा दूसरों पर झल्लाया ही करता है; सदा दूसरोंके प्रति तना ही रहता है । पास पड़ा हुआ धन धीरे - धीरे वैद्योंके औषधालयों में सचित होता जाता है । निर्बलता के कारण किसी भी सत्कार्य में प्रवृत्ति नहीं हुआ करती ।

निर्बलताके दूरीकरणार्थ वह वैद्योंसे पुष्टिकारक दवाइयोंका " सेवन करता है, पर उसका फल कुछ भी नहीं निकलता; प्रत्युत ..भीतरी निर्बलतासे दुर्बल हुए - हुए अङ्ग उस श्रोषधिके भी उपयुक्त

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१५० सिद्ध नहीं होते; तब अन्दर विष व्याप्त हो जाता है । यमराजके दूत समय - समय पर दर्शन देने आते हैं । यमदूतोंको डराने वाले व्रत - उपवास द्वारा उसका प्रतिकार न करने पर क्रमशः राजयक्ष्मा आदि रोग अङ्गको आलिङ्गन कर लेते हैं, और फिर यमराज गले में पाश डालकर जीवको खींच जाते हैं ।

व्रत - उपवास आदि करने पर तो यमराजके दूत, वरुणके पाश, भूतप्रेत आदि यह सब वापिस लौट जाते हैं । तब शरीरकी निर्मलतासे मन भी प्रभावित एवं स्वस्थ हो जाता है । ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' यह कथन चरितार्थ हो जाने से बुद्धिस्फुरण होता है । मस्तिष्क उज्ज्वल हो जाता है । विचारशक्ति प्रवृत्त हो जाती है | विचारशक्ति मानसिक बलपर निर्भर है, और मानसिक बल शरीरको निर्विकारता पर निर्भर है । विकारपूर्ण शरीरमें पुरुषका मानसिक विकास नहीं हो पाता; क्योंकि- शरीरमें विकार होनेपर मानसिक शक्तियों की विचारोंके साथ संलग्नता होती ही नहीं । संलग्नता एवं तन्मयता के लिए मस्तिष्ककी जो रूपरेखा आवश्यक हुआ करती है, वह रूपरेखा पाक्षिक- व्रतके बिना मस्तिष्क में उत्पन्न नहीं हो पाती; क्योंकि तन्मयता एवं संलग्नता आहार अल्प चाहती है । व्रत - उपवास ही उस मिताहारका साधन हुआ करता है ।

जो लोग व्रत - उपवासके द्वारा शरीरके अथवा मनके अङ्गका संशोधन नहीं करते; उनमें संलग्नता एवं तन्मयता नहीं हुआ करती; क्योंकि उस समय आहारके दबाव से कामातुरता रहनेके कारण पुरुषमें तमोगुणकी वृद्धि होनेसे सात्त्विकता नहीं हो पाती;

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तब पुरुषका मन कैसे एकाग्र हो? प्राचीनकालमें तपस्वि - गण ईश्वराराधनमें अधिक तन्मयता सिद्ध करते थे, जिससे कि परमात्मा की शक्तिसे अपने - आपको मिला सकें । वे लोग मिताहार तथा एकादशी व्रत, उपवास आदिकी अपेक्षा किया करते थे ।

जो कभी भी भोजन नहीं छोड़ते, शारीरिक बल के लिए सतत बहु - भोजनमें लगे रहते हैं, उनमें मस्तिष्कचल या प्रतिभावल नहीं रह जाता । हमारे उज्ज्वल - मस्तिष्कवाले ऋषि - मुनि बहुत मोटे - ताजे या सतत - बहुभोजनशाली नहीं हुआ करते थे, किन्तु आभ्यन्तरिक बलधारी और मनोबल - सम्पन्न होते थे । उसमें मिताहार और जब - तब व्रत - उपवासका उनका नियम प्रधान कारण था । बाहरसे हृष्ट - पुष्ट और भीतर से क्षीण एवं रोगी मस्तिष्क - बल तथा प्रतिभा- शालिताको कभी प्राप्त नहीं करते । न वे भविष्य में यशकी स्थापना करनेवाले सद्ग्रन्थोंके निर्माण आदिका कार्य ही कर सकते हैं ।

जो लोग हिन्दु धर्मपर यह आक्षेप करते हैं कि- ' इनके तो ३६५ दिनों में ३०० व्रत ही निकल पड़ते हैं । तब हिन्दुधर्मके अनुसार चलना भूखों मरना है, अपनी स्त्रीको अपने से विरक्त . करके दूसरोंकी ओर प्रवृत्त करना है ' यह सब आक्षेप अज्ञानवश हैं । सब व्रतों में पूरा उपवास नहीं होता I

। वे तो मितभोजन में सहायक हुआ करते हैं । यदि नियमानुसार स्वयं भी व्रत किये जावें; अपनी स्त्रीको भी इस लाईन में प्रवृत्त किया जावे; तो दोनों का संयमी जीवन सुखसे बीतेगा । पुरुष जैसे बनेगा, स्त्री भी वैसी बनेगी; बल्कि उससे बढ़ी हुई सिद्ध होगी । ' अश्वः शस्त्रं शास्त्रं 561वाणी वीणा नरश्च नारी च । पुरुष - विशेषं प्राप्ता भवन्ति योग्या अयोग्याश्च ' यह नीतिकारोंका कथन सर्वथा सत्य है । स्त्रीको यदि संयमका मार्ग प्रदर्शित किया जावे तो वह पुरुषसे भी बढ़ जावेगी । यदि उसे व्रत - उपवास आदिकी ओर प्रवृत्त किया जावे तो वह उसमें पुरुष से भी बाज़ी मार ले जाएगी । पुरुषोंसे अधिक धर्म- कर्ममें लगी हुई स्त्रियां ही हमने देखी हैं । तीन - तीन चार चार

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दिन तक निरन्तर उपवास करनेवाली स्त्रियां हमने देखी हैं ।

यदि स्त्रीको भोगवासनाके मार्ग में बलात् प्रवृत्त किया जावेगा; तब प्रच्छन्न अष्टगुरणा कामशक्ति जब उसकी संधुक्षित होकर प्रज्वलित होगी; तब उसका एक पति तो क्या, छः पुरुष भी आकर उसकी उस प्रवृद्ध - भोगलालसाकी तृप्ति नहीं कर सकते । जब वही पुरुष उसमें अपनी निर्बलताके कारण ढील करेगा, तो वही स्त्री दूसरों की ओर मुख करेगी, कुलटा बनकर आपके कुलको कलङ्कित करेगी; परन्तु पुरुषको इस रास्ते पर अपनी पत्नीके लानेका उत्तरदायित्व न लेना चाहिये । ' आहारो मैथुनं निद्रा सेवनात्तु विवर्धते ' यह आहार, मैथुन, निद्रा आदि जितने बढ़ाए जावें, बढ़ेंगे । मनुजीने ठीक ही कहा है कि — कामों के भोगसे कामकी शान्ति नहीं होती; वह तो उल्टे बढ़ती है- ' न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति 1

। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ' ( २६४ ) अग्नि हवि डालते रहने से बढ़ती ही तो जाती है; परन्तु यह असंयमका रास्ता अपने तथा अपनी पत्नीकेलिए विपत्ति- कारक है — ' आपदां कथितः पन्था इन्द्रियाणामसंयमः । तज्जयः 562सम्पदां मार्गे येनेष्टं तेन गम्यताम् ' ।

संयमका मार्ग ही सम्पत्तिका मार्ग है; उसकी प्राप्ति होगी एकादशी व्रतसे । इससे यह भय हटा लेना चाहिये कि हम नपुंसक हो जायेंगे । यह सचमुच भारी - भूल है । उपवास स्वयं करो, पत्नीको कराओ; और उससे पूर्व दिन, उस दिन, उसके बाढ़का दिन ब्रह्मचारी रहो; फिर संयम से अपना निर्वाह करो । इससे तुममें भोगशक्तिं घटेगी नहीं; बल्कि बहुत समय तक रहेगी । भोगका आस्वाद भी तुम्हें तब ही प्राप्त होगा । भूख न होनेपर भोजन करनेसे क्या कभी आस्वाद आता है? आस्वाद तो भूख लगने पर भोजन करनेसे श्राता है, यही बात यहां पर भी है । विषयास्वाद भी संयमी - जीवन से आयगा । विषयास्वाद शुक्रकी गाढता से आता है, शुक्रकी गाढता संयमी - जीवनसे होती है । असंयमी- जीवनसे, सतत भोगविलासों में लगे रहने से, उन्हींके चिन्तन करते रहने से, शुक्र तरल हो जाता है, फिर शीघ्रपतनादि प्रारम्भ हो जाते हैं, वैसा पुरुष दिनमें आठ बार भी भोगमें लगा हुआ अपनी पत्नीकी तृप्ति नहीं कर सकता । प्रकरणवश यह बात हमने कह डाली है । उसी संयम - जीवनकी प्राप्ति आपको नियमित व्रत - उपवास से मिलेगी । यह हमारे कथनका आशय है । विलासका आनन्द भी आपको इसी व्रत आदि से मिलेगा ।

फलतः भीतरी अपक्कांशको दग्ध करने और सचित मलको नष्ट करने और भविष्यत् में जठराग्निको प्रदीप्त करनेमें व्रत - उपवास रामबाण औषध है, एक अपूर्व अचूक योग ( नुस्खा ) है । इसके 563अवलम्बन करनेपर न तो आपको डाक्टरोंकी आवश्यकता रहेगी, न अस्पतालों में रहने की, न दवाइयोंकी, न जुलावकी, न किसी अन्य साधनकी! इसमें कुछ खर्च भी नहीं होता, अपितु कुछ बचत ही होती है । पर इतना ध्यान रहे कि उपवासके समाप्त हो जानेपर फिर भोजन पर टूट न पड़ो, कलकी कसर न निकालो; किन्तु प्रतिदिनसे पर्याप्त कम भोजन करो; फिर रात्रिको उस प्रातःके भोजनसे कुछ अधिक । फिर दूसरे दिन स्वाभाविक - भोजन करो । यदि ऐसा नहीं किया जावेगा, तो इससे शारीरिक बहुत भारी हानि हो सकती है ।

इस व्रत आदिमें स्नान, दान, भजन - पूजन तथा ध्यान आदि भी आवश्यक अङ्ग हैं, यह कभी न भूलना चाहिये । जैसाकि हम पहले कार्तिक माहात्म्य के पद्यसे पूर्व सूचित कर चुके हैं । इनका लाभ बच्चेसे लेकर बूढ़े तक समानभावसे होता है । इस प्रकारका व्रतकर्ता ही प्राणियों में सद्भावना रखता है, विश्वके कल्याणमें एवं उपकार - वृत्ति में रहता है । वह दूसरोंका धन हड़पने में नये - नये आविष्कारोंकी खोज में नहीं रहता । वह सदा सत्य - व्यवहारमें निरत रहता है । जो बात धर्मनिरपेक्ष राजकीय - कानूनोंसे लाख सिर पटकनेपर भी नहीं होती; वह शुक्तवृत्ति, सात्त्विकता इसी धार्मिक नियमके अवलम्बन से अनायास सम्पन्न हो जाती है ।

इस प्रकारके महान् लाभदायक, नवजीवन- सचारक, व्रतोप- वासका एकादशी तिथिमें नियमतः अवलम्बन करना हम सबके लिए आवश्यक है । जो पहिले इसमें कठिनता अनुभव करें; वे

564श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

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उस दिन अन्न तथा ओदन ( चावल ) तो अवश्य छोड़ दें । ' एका- दश्यामन्ने पापानि वसन्ति ' यह बात सूर्य - चन्द्रके आकर्षण - विकर्षण आदिके प्रभावके कारण सर्वथा सत्य है; इस पर उपहास करना अपने अल्पश्रुतत्वको प्रकट करना है— इन्हीं दिनोंके अन्नवैषम्यके कारण मृत्युएँ भी प्रायः इन्हीं तिथियों में होती हैं । इस दिन मुनि - धान्य श्यामाक ( सांवक, समांके चावल ), कूटू का आटा, अथवा फल आदिका उपयोग करना चाहिये । फिर क्रमशः उपवासका अभ्यास भी करना चाहिये । दूसरे दिन लघु तथा मित भोजन करना चाहिये । इस प्रकार करनेसे पूर्व कहे हुए लाभ अनायास प्राप्त हो सकेंगे । हमें ' आलोक ' के पाठकों से आशा है कि वे एकादशीव्रतका नियमतः अवलम्वन करके अपने तथा दूसरोंका लाभ करने में सक्षम हो सकेंगे । इसमें आपके भीतरी अवयव- प्रत्यवयव अवकाश पाकर फिर नवीन हो जाएंगे; नवीन शक्तिको पा कर भावी रोगों से मुकाबला करके उन्हें हरा देंगे । तब विशिष्ट रोगोंकी उत्पत्ति न होने से निर्वलता, चित्तकी उद्विग्नता आदि हटकर चित्त सात्त्विक रहेगा । सत्त्वगुणकी वृद्धि होनेपर भगवान् के ध्यानमें मग्नताकी शक्ति होनेसे हमें सद्गति मिलेगी । यही एकादशीव्रतका विज्ञान है - यही ' श्रीसनातनधर्मालोक का सन्देश है । कार्तिक - माहात्म्यमें ठीक ही कहा है – ' तपो नाऽनशनात् परम् ' ( १७।२५ ) ' व्रतं नैकादशीसमम् ' ( १७१२७ ) । यह भोजनका प्रकरण होने से हमने एकादशीव्रत के विषय में कहा है ।

565विशेष- विशेष तिथियोंमें उपवासका विज्ञान

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६५. विशेष - विशेष तिथियों में उपवासका विज्ञान ।

एकादशी तिथिमें उपवासार्थ हम लिख चुके; शास्त्रों में अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि में भी व्रत - उपवास कहे गये हैं । उनमें सूर्य - चन्द्र आदिके आकर्षण - विकर्षणका तारतम्य ही कारण है । अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा आदि में पृथिवीपर चन्द्रके आकर्षण का बहुत प्रभाव पड़ता है । जल तरल पदार्थ है; इसलिए इन तिथियों में समुद्र के जलमें उद्वेलन हुआ करता है । शरीर में भी कफ, रक्त, मस्तिष्क आदि जो जलीय पदार्थ हैं, उक्त - तिथियोंमें इनमें भी उछाल आना स्वाभाविक है । चन्द्रमाके इस प्रकारके आकर्षण से ही एकादशी, पूर्णिमा, अमावास्या आदि तिथियोंमें वातरोग और कफ आदिकी वृद्धि होती है । अतः इन तिथियोंमें कम खाना चाहिये । अथवा सूखी वस्तुएँ खानी चाहियें; अथवा रात्रिमें नहीं. खाना चाहिये । ठीक तो यह है कि - दिन - रात उपवास किया जाय ।

उपवाससे देहके रसका शोष होने से शरीर में चन्द्रके आकर्षण का प्रभाव नहीं पड़ता । तब उसकी अधिकता से आशङ्कित रोग भी नहीं होते । चन्द्रमा मनका देवता होता है; अतः इन तिथियों में उसके आकर्षणका प्रभाव मनपर होता है, जिससे मन चञ्चल हो जाता है । उन दिनों उपवास एवं भगवान् के ध्यानसे, दुर्बल हुआ मन शान्त हो जाता है और विषय - वासनाएँ न्यून हो जाती हैं ।

( ६६ ) गायका दूध ।

' आलोक'के पाठक प्रातःकालकी चर्चा पूरी कर चुके । फिर 566मध्याह्नको भोजनादि भी कर चुके । अपने कार्योंका निर्वाह करके सायं - सन्ध्या से निवृत्त होकर रातको भोजन कर चुके । अब वह आपके आमाशयमें पहुँचने वाला है । अब उसके बाद आपके दूध पीनेका क्रम है । गायका दूध प्राणप्रद, रक्तपित्तनाशक, पौष्टिक रसायन है । उसमें भी काली- गायका दूध त्रिदोषनाशक, परम- शक्तिवर्धक और सर्वोत्तम होता है । गाय अन्य पशुओं की अपेक्षा सत्त्व - गुणयुक्त है, दैवी शक्तिका केन्द्रस्थान है । दैवी शक्तिके सम्बन्धसे गोदुग्धमें सात्त्विक बल है । इससे जहाँ पुष्टि होती है, वहाँ भोजनका परिपाक भी होता है । कभी रोग नहीं लगता । भैंस आदिका दूध स्थूलताकारक एवं तामस तथा शीघ्र नींद लाने वाला होता है ।

( ६७ ) काली गाय दूधकी विशेषता ।

किसी भी पदार्थका अपना रंग नहीं होता । सूर्यकी शुभ्र किरणोंमें कई किरणें पदार्थोंको हजम कर लेती है, शेष किरणें रंगको प्रकाशित करती हैं । जो रंग प्रकाशित करता है; वही उस पदार्थका रंग होता है । जो पदार्थ सब रंगोंको प्रकाशित करता है, वह सुफेद रंगका होता है । और जो सब रंगों को हज़म कर लेता है; वह काले रंगका होता है । इससे काले रंगमें सब रंग छिपे हुए होते हैं - यह बात सिद्ध होगई । इसीलिए काली गाय अपने शरीर में सूर्य की सातों किरणोंको पचा लेती है; रंगके साथ सूर्यकी आकर्षण शक्तिको भी खींच लेती है । इसी कारण काली गायके दूधमें भी बहुत शक्ति होती है । इसीलिए मूर्तिपूजामें भी 567श्रीकृष्णकी मूर्ति काली होती है । उसे काली गायके स्थानपर समझना चाहिये । उसके साथकी राधाकी मूर्ति सफेद होती है, उसे दुग्ध - स्थानीय समझना चाहिये । शालग्राम, राम, जगन्नाथकी मूर्ति इसीलिए काली होती है; वह सूर्यशक्तिकी आकर्षक होनेसे पूजनेपर हमें भी सूर्यशक्तिके लाभों को देती है ।

यद्यपि भैंस भी काली होती है; परन्तु वह तामसिक - पशु होनेसे सूर्यशक्तिको प्राप्त करके अत्युष्ण वलवाले और तमोगुण- वर्धक दूधको देती है - इसीलिए वह पहले नियमका अपवाद है । इसलिए जिसे अनिद्रा - रोग हो, उसे भैंसके दूधका उपयोग करनेकेलिए आयुर्वेद में कहा जाता है । अर्थात् भैंसके दूध से व्यक्ति- को नींद बहुत आती है । वह व्यक्ति ऊँघता रहता है; आलसी बना रहता है । इसीलिए भैंसका दूध तामस होनेसे बुद्धिको कम करने- वाला भी होता है । जो सात्त्विकता चाहते हैं; वे भैंस के दूधको छोड़कर गाय के दूधका प्रयोग करें । बकरीका दूध भी यद्यपि बहुत गुणकारी होता है, विशेष रोगों में लाभप्रद भी होता है, तथापि शास्त्रीय - संसार में उसे भी सात्त्विक नहीं माना जाता । गायमें देवनिवास आदि अन्य भी विशेषताएं हैं; अतः काली गायका दूध तो सर्वोत्तम होता है ।

( ६८ ) वस्त्रसे छाने बिना गायका दूध न पीना ।

गायके स्तनसे जब दूध दुहा जाता है; तो उसके स्तनोंपर रोम होने से घर्षणवश दूध दुहने के समय वे दूधमें गिर सकते हैं । गायके लोमके पेटमें जानेपर बड़ा पाप होता है - ऐसा हिन्दुओंका 568विश्वास है । यह ठीक भी है । किसी भी पशुका बाल यदि पेट में चला जाए, तो हानि होती है । गोलोमसे तो राजयक्ष्मा आदि रोग भी सम्भव हो सकता है । अतः गायका दूध छानकर पीना ही श्रेयस्कर होता है ।

( ६ ) घृतका दीपक जलानेका विज्ञान ।

रातका प्रकरण चला हुआ है । रात्रिके आरम्भ में कुवै आदि पर घृतका दीपक जलाना यह सनातन प्रथा है । केवल रात तो क्या, दिनको भी । इसी प्रकार देवमन्दिरों में भी दिन - रात घृतके दीपक जलानेकी प्रथा है । कहीं - कहीं तो अखण्ड - घृत का दीपक भी जला करता है । जब पहिले कुए बनाये जाते थे, वहाँ एक ऐसा स्थान बनाया जाता था; जहाँ हिन्दुलोग श्रद्धासे घृतका दीपक जलाया करते थे । एक तो उसमें वरुणदेवका पूजन भी लक्ष्य होता था । दैनिक -देवपूजन हवनमें ' इति वरुणाय, न मम ' कहकर हम वरुणको घृतकी आहुति देते हैं; तो कूपपर दीपक जलाना यह भी हमारी जलके स्वामी वरुणदेवको घृतकी आहुति - सी हो जाती थी । • इसमें लौकिक लाभ भी बहुत से हैं । रातको कू एसे जल लेना है; पुरुषोंने भी आना है, स्त्रियोंने भी आना है । कुए पर छत रहनेसे प्रायः रात - दिन उसमें अन्धकार रहा करता है । दीपकसे वहां प्रकाश रहेगा । एक यह प्रत्यक्ष लाभ है कि किसीको जलादि निकालने में असुविधा नहीं होगी । स्त्री - पुरुषोंके इकट्ठे होनेसे प्रकाशवश कोई कुत्सित - काण्ड न होंगे - यह दूसरा लाभ है । तीसरा लाभ यह है कि कुएं की वायु घृताग्निके योगसे शुद्ध रहा

In English

The Science of Fasting and Ekadashi

This chapter explains the physiological and psychological benefits of fasting and observing the Ekadashi vow. It argues that fasting cleanses the body of waste and helps steady the mind for spiritual focus, while also serving as a remedy for various physical ailments.

This chapter answers

  • Benefits of fasting for health?
  • What is ekadashi vrata?
  • How does fasting help meditation?
  • Why do hindus fast on ekadashi?

Also written: Upavasa, Evan, Ekadashi, Vrata, Vigyana, Upavasa Evan Ekadashi Vrata Vigyana, उपवास एवं एकादशी व्रत विज्ञान

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 545–568 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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