सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 641–650
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 641–650
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मास एवं वारोंका नामक्रम - विज्ञान ६१३ ( २ ) मास एवं वारोंका नामक्रम - विज्ञान । हम ' संवत्सर ' के विषय में बता चुके । संवत्सरके बारह मास एवं १२ राशि होते हैं; और ३६० दिन, तथा सात वार । कुछ इस विषय में भी जानकारी रखनी चाहिए - प्रसंगवश हम इस विषयमें भी कुछ विशदीकरण करते हैं । बारह मासोंके नाम १ वैशाख, २ ज्येष्ठ, ३ आषाढ़, ४ श्रावरण, ५ भाद्रपद, ६ आश्विन, ७ कार्तिक, ८ मार्गशीर्ष, ६ पौष, १० माघ, ११ फाल्गुन, १२ चैत्र– यह हैं । इन्हीं की १२ राशि हुआ करती हैं । उनके नाम हैं -१ मेष, २ वृष, ३ मिथुन, ४ कर्क, ५ सिंह, ६ कन्या, ७ तुला, वृश्चिक, ६ धनुः, १० मकर, ११ कुम्भ, १२ मीन । सात वारोंके नाम यह हैं - १ रवि, २ चन्द्र, ३ भौम, ४ बुध, ५ बृहस्पति, ६ शुक्र, ७ शनैश्चर । मासों तथा वारोंके यह नाम क्यों रखे गये हैं? र इनका यह क्रम क्यों है - इस विषय में बहुत महाशयोंको कुछ भी जानकारी नहीं है । वे लोग हमारे इन महीनोंके नामोंको जनवरी, फर्वरी आदिकी भांति आकस्मिक रखा हुआ मानते हैं । वारों के विषयमें उनका यह कथन है कि - इन ७ वारों तथा १२ राशियोंके नाम भारतवर्षने यूनान से सीखे हैं । यह अंग्रेजोंके मानसिक - दास आधे - आर्यसमाजी, सुधारकोंके अनुयायी कतिपय-पौरस्त्योंका मत हैं । अन्य व्यक्तियोंका वारोंके विषयमें यह प्रश्न होता है कि रविवारके श्रागे चन्द्रवार, चन्द्रवार के आगे भौम-बार — इत्यादि क्रम क्या निनिमित्तक ( आकस्मिक ) है, वा सनिमित्तक?
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६१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इस विषय में हम प्रकरणवश कुछ बतावेंगे, आशा है- ' आलोक ' के पाठकगण इधर ध्यान देंगे । यूनानसे भारतने यह सीखा — इस विषय पर तो हम इस निबन्ध के अन्त में प्रकाश डालेंगे; पर पहले हम पूर्व - विषयपर विचार करते हैं । मास - नाम - रहस्य | हमारे मासोंके चैत्र, वैशाख आदि नाम अंग्रेजी मासोंकी तरह आकस्मिक नहीं कि — मिस्टर जुले इस मास में पैदा होगए; तो इस मासका नाम ' जुलाई ' रख दिया गया । हमारे महीनों के नाम तो आकाशको देखकर रखे गये हैं । पाठकगण जानते होंगे कि— नक्षत्र २७ माने जाते हैं । उनके नाम अथर्ववेद संहिता ( १ । ७१२-३-४-५ ) में कृत्तिकासे भरणी तक आते हैं । उसमें उत्तराषाढा तथा श्रवणके मध्य में अभिजितका नाम भी आया है । वे नाम यह हैं -१ अश्विनी, २ भरणी, ३ कृत्तिका, ४ रोहिणी, ५ मृगशिराः, ६ आर्द्रा, ७ पुनर्वसु, पुष्य, ६ आश्लेषा, १० मघा, ११ पूर्वा फाल्गुनी, १२ उत्तरा फाल्गुनी, १३ हस्त, १४ चित्रा, १५ स्वाति, १६ विशाखा, १७ अनुराधा, १८ ज्येष्ठा, १६ मूल, २० पूर्वाषाढा, २१ उत्तराषाढा, ( ख ) अभिजित्, २२ श्रवण, २३ धनिष्ठा, २४ शतभिषा, २५ पूर्वा भाद्रपदा, २६ उत्तरा भाद्रपदा, २७ रेवती । . यह नक्षत्र चन्द्रमाके साथ भ्रमण किया करते हैं । प्रत्येक पूर्णिमाको एक नक्षत्र जो चन्द्रमाके साथ होता है; उससे अग्रिम पूर्णिमामें उस पूर्व - नक्षत्रके आगे का एक नक्षत्र छूटकर उसके आगे-
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मास - नाम - रहस्य ६१२ वाला नक्षत्र चन्द्रमाके साथ आ जाता है । इसी प्रकार फिर आगेकी पूर्णिमामें उसका भी अग्रिम एक नक्षत्र छूटकर उस छूटे हुए का अगला नक्षत्र चन्द्रमा के साथ आ जाता है । किसी - किसी मासमें दो नक्षत्र छूटकर उनसे अग्रिम - नक्षत्र चन्द्रमाके साथ आ जाता है । जो नक्षत्र पूर्णिमामें चन्द्रके साथ होता है, उसी नक्षत्रके नामसे उस मासका नाम रखा जाता है । पूर्णिमावाले दिन उसी नक्षत्रसे मास पूर्ण होता है; अतः उसे पूर्णमासी कहा जाता है । अब ' आलोक ' पाठकगरण इस बातको सम । - जिस दिन पूर्णिमाको चन्द्रमाके साथ अश्विनी नक्षत्र होता है, उस मासका नाम ६ आश्विन होता है । ं व्याकरणानुसार ' अश्विनी ' से अणू - प्रत्यय होकर पूर्व अचूको वृद्धि करके अन्तिम ' ई ' को लुप्त करके ‘ आश्विन ’ बनता है । फिर उससे अग्रिम मासकी पूर्णिमा में भरणी नक्षत्र छूटकर कृतिका आ जाता है । उस मासका पूर्ववत् व्याकरणानुसार ७ कार्तिक नाम होता है । फिर उससे अभिम - पूर्णिमा में रोहिणी -नक्षत्र छूटकर मृगशिर आ जाता है, उस मासका नाम ८ मार्गशीर्ष होता है । उससे आगेकी पूर्णिमा में आर्द्रा और पुनर्वसु यह दोनों नक्षत्र छूटकर पुष्य नक्षत्र आ जानेसे ६ पौष मास नाम रखा जाता है । उसके बादकी पूर्णिमामें आश्लेषा छूटकर मघा जानेसे १० माघ, उसके बादकी पूर्णिमामें पूर्वाफाल्गुनी छूटकर उत्तरा फल्गुनी आ जाता है; तो ११ फाल्गुन मास नाम रखा जाता है ।
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६१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) फिर अगले महीने में हस्त नक्षत्र छूटकर चित्रा आ जाने से १२ चैत्रमास, स्वाति छूटकर विशाखा आ जाने से १ वैशाख, अनुराधा समाप्त हो जाने और ज्येष्ठा आ जाने से २ ज्येष्ठ, मूल छूटकर पूर्वाषाढा आ जानेसे ३ आषाढ मास नाम रखा जाता है । उत्तराषाढा छूटने से श्रवण आकर ४ श्रावण नाम, धनिष्टा और शतभिषा यह नक्षत्र छूटकर पूर्वा भाद्रपदा नक्षत्र आ जाने से ५ भाद्रपद मास नाम रखा जाता है । फिर उत्तरा भाद्रपदा और रेवती दो नक्षत्र छूटकर उसके बाद अश्विनीका क्रम होता है, जिससे ६ आश्विन मास बनता है - यह पूर्व कहा जा चुका है । यह है हमारे देशी मासोंके नामोंका रहस्य । वार - क्रम - रहस्य | सूर्य, चन्द्र आदि वारोंका नाम सात दृश्य ग्रहोंके कारण है-यह तो स्पष्ट है, पर सूर्यके चन्द्र और चन्द्रके बाद भौम आदिका यह क्रम क्यों है - इसपर भी पाठकगण याद रखें । ' सूर्यसिद्धान्त ' एक ज्योतिषका प्रसिद्ध, प्रामाणिक एवं प्राचीन ग्रन्थ है । यह २ कृतयुग – ( सत्ययुग ) के अन्तमें बनाया गया है, जैसा कि उसमें कहा है- ' अष्टाविंशाद युगादस्माद् यातमेतत् कृतं युगम् ' ( १ | २३ ) ' अल्पावशिष्टे तु कृते ' ( १।२ ) । अस्तु । उसी सूर्य - सिद्धान्त में व्योमकक्षा में ग्रहों का क्रम इस प्रकार कहा है - ' ब्रह्माण्डमध्ये परिधिव्यमकक्षाभिधीयते । तन्मध्ये भ्रमणं यहां पर ' संज्ञापूर्वको विधिरनित्यः ' इस परिभाषा के बलसे पूर्व अचूको वृद्धि नहीं होती ।
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वार - क्रम- रहस्य ६१७ भानामधोऽधः क्रमतस्तथा ' ( १२।३० ) यहाँ कहा गया है कि — व्योम -कक्षामें ग्रह एक - दूसरेसे नीचे क्रमशः रहकर घूमा करते हैं । ग्रहों का कक्षा - क्रम यह बताया गया है - ' मन्दाऽमरेज्य- १ शनि भूपुत्रसूर्यशुक्रेन्दुजेन्दवः । २ गुरु परिभ्रमन्त्यधोऽधःस्थाः भौम सिद्धविद्याधरा घनाः ४ सूर्य ( १२।३१ ) यहां पर मन्द् ५ शुक्र ( शनि ), अमरेज्य ( गुरु ), ६ बुध भूपुत्र ( भौम ), सूर्य, शुक्र, ७ चन्द्र इन्दुज ( बुध ), इन्दु ( चन्द्र ) का आकाश में कक्षा - क्रम बतलाया गया गया है । सबसे ऊपर शनिकी कक्षा, शनिसे नीचे गुरुकी, उससे नीचे भौमकी, उससे नीचे रविकी, फिर शुक्र और फिर बुधकी; सबसे नीचे चन्द्रकी कक्षा है । फिर ' सूर्यसिद्धान्त ' में कहा है- ' मन्दादधः क्रमेण स्युः चतुर्था दिवसाधिपाः । वर्षाधिपतयस्तद्वत् तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः । ' ( १२/७८ ) ऊर्ध्वक्रमेण शशिनो मासानामधिपाः स्मृताः । होरेशाः सूर्यतनयादधोऽधः क्रमतस्तथा ' ( ७६ ) इसका यह अर्थ है कि ' शनैश्वर से नीचेके क्रमसे चौथा - चौथा ग्रह दिन ( वार ) का स्वामी होता है, और तीसरा- तीसरा ग्रह वर्षका स्वामी होता है 1 । चन्द्रसे ऊपर - ऊपरके ग्रह मासके स्वामी होते हैं । शनिसे निचले - निचले ग्रह क्रमसे दिनके प्रत्येक घण्टे के स्वामी हुआ करते हैं । ' यहांपर पूर्वका वाक्य और अन्तिम वाक्य – यह प्रकृत हैं । पहला वाक्य यह है - ' शनि से नीचे के क्रमसे चौथा- चौथा ग्रह दिनका स्वामी है ' . और अन्तिम वाक्य यह है कि- शनिसे निचले ग्रह, क्रम से एक.
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६१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अहोरात्रके प्रत्येक - घण्टेके स्वामी होते हैं । ' अब पूर्ववाक्यानुसार गणना करनी चाहिये । कक्षा - क्रमसे शनिसे नीचेका चौथा ग्रह सूर्य है; अतः रवि ही शनिसे अगले दिनका स्वामी हुआ । सूर्य से नीचेका चौथा ग्रह चन्द्र है; अतः वही अगले दिनका स्वामी हुआ । चन्द्रसे चौथा भौम है, इसीलिए वही चन्द्रसे अग्रिम दिनका स्वामी होता है । भौमसे नीचे चौथा ग्रह बुध है; अमः भौमके बाद बुधका क्रम होता है । इस प्रकार बुधसे चौथा ग्रह गुरु, और उससे नीचे चतुर्थ शुक्र और शुक्र से चतुर्थ शनि है, अतः वही शुक्र से अग्रिम दिनका स्वामी होता है । उस - उस ग्रह से चतुर्थ ही उस दिनका स्वामी कैसे है - यह जानने के लिए अब पूर्वोक्त दो पद्योंके अन्तिम वाक्यको लीजिये किं शनैश्चरसे नीचे - नीचेका ग्रह क्रमसे एक दिनरातकी प्रत्येक होराका स्वामी होता है । अहोरात्रका चौबीसवां भाग ' होरा ' कहाता है । ' अहोरात्र के आदिम और अन्तिम अक्षरको लुप्त करके ' होरा ' शब्द बनता है । अब ' होरा ' का अर्थ हुआ --- ' घंटा ' । अहोरात्रके २४ होरा ( घण्टे ) होते हैं । उक्त कक्षावाले ग्रह एक-एक होराके क्रमशः स्वामी होते हैं; तब जो ग्रह २४ वें घण्टेका स्वामी है; उससे अग्रिम - होराका जो स्वामी सूर्योदय के समय बनता है; वही उस दिनका स्वामी माना जाता है । अब पाठकगंग इसकी गणना करें । हम कह चुके हैं कि - १ शनि, २ गुरु, ३ भौम, ४ रवि, ५ शुक्र, ६ बुध, ७ चन्द्र यह है ग्रहोंका कक्षा - क्रम । मान लीजिये कि - आज..
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वार - क्रम - रहस्य ६ १६ सूर्योदय में पहली होराका ( ६ वजेसे ७ बजे तक ) स्वामी ' शनि ' है । तब २ री, ३ री, ४ थी, ५ वीं, ६ ठी ७ वीं होराके स्वामी गुरु, भौम, रवि, शुक्र, बुध, चन्द्र हुए । यह पहला चक्र १ बजे मध्याह्न तक समाप्त हुआ । फिर वें घण्टेका स्वामी दो बजे मध्याह्नमें पुनः शनि हुआ । ६, १०, ११, १२, १३, १४ घण्टेके स्वामी क्रमसे गुरुसे लेकर चन्द्र तक हुए । यह दूसरा चक्र रात्रिके ८ बजे तक समाप्त हुआ । फिर १५ ब घण्टेका स्वामी नौ बजे रात्रिमें फिर शनि हुआ । फिर १६, १७, १८, १६, २०, २१ घंटेके स्वामी क्रमसे गुरुसे लेकर चन्द्र तक हुए, यह सात ग्रहोंका तीसरा चक्र रात्रिके तीन बजे समाप्त हुआ । अब चौथे चक्रमें २२ वें घटेका स्वामी पुनः शनि हुआ । २३ वेंका गुरु, २४ वेंका भौम हुआ । इस प्रकार यह अहोरात्र प्रातः छः बजेसे कुछ पूर्व समाप्त हुआ । फिर दूसरे दिनके प्रथम घंटे ( २५ ) में ६ बजे सूर्योदय हुआ । उसमें भौमके आगे रविका क्रम हुआ । इस प्रकार शनिके २४ वें घण्टेकी समाप्ति के बाद अगले दिन प्रथम घण्टेका स्वामी रवि हुआ; इसी कारण शनिवार के आगे रविवार आता है । वारका अर्थ होता है ' क्रम ' | रविवारके आगे सोमवार क्यों आता है; इसपर फिर आगे भी गणनाक्रम पूर्वकी भांति जानना चाहिये । सूर्योदय में पहले घण्टेका स्वामी रवि तो हुआ ही । तब द्वितीय चक्रमें पवेंका, तृतीय चक्रमें १५ वें का, चतुर्थ चक्रमें २२ वें घण्टेका स्वामी भी रवि ही हुआ 1 । फिर २३ वें घंटेका स्वामी शुक्र,
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६२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) २४ वेंका बुध हुआ । फिर दूसरे दिनके प्रथम घंटेका स्वामी बुधका अगला चन्द्र ही हुआ, जो रविसे चतुर्थ होता है । इसलिए रविवारके आगे चन्द्रवार आता है । भाव यह है कि — - वें, १५ वें, २२ वें घण्टेका स्वामी तो वही ग्रह होता है । फिर २२ से २४ वें घरटे तक अपने से तीसरा ग्रह रहता है । अग्रिम दिनके प्रथम ( २५ वें ) घण्टे में अपनेसे चौथा ग्रह आ जाता है । इसी कारण यह वारोंका क्रम जो आज प्रचलित है; यह सोपपत्तिक और विज्ञानपूर्ण ही सिद्ध है । न यह आकस्मिक है, न स्वेच्छा - कल्पित । यह तो आकाशको देखकर रखा गया है । ( २ ) अब जो लोग राशि, वार आदिकी प्रवृत्तिका यूनानियों द्वारा भारतको सिखाना मानते हैं - वे अंग्रेजी भाषासे प्रभावित होने से अंग्रेजोंके मानसिक दास ही हैं । वस्तुतः जिस समय से हमारे वेदादि - शास्त्र हैं; उसी समय से राशि, और वार आदिकी प्रवृत्ति है । सनातनधर्म के मत में वेद अपौरुषेय हैं, प्रत्येक सृष्टिकी आदि में यथापूर्वं प्रकट होते हैं । अर्वाचीनों के मत में भी वेद आदिम ग्रन्थ माने जाते हैं । अथर्ववेद ( शौ ० ) संहिता में ' शं नो दिविचरा ग्रहाः ' ( १६६६६७ ) ' शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शम् यादित्यश्च राहुणा ' ( अ ० १६/६/१० ) यहां ग्रहोंका संकेत दिया है । यद्यपि सूर्यादि ग्रह राहु - केतु के साथ नौ हैं; तथापि दृश्य- ग्रह सात ही हैं; वे ही धारके स्वामी होते हैं ।
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चार - क्रम - रहस्य ६२१ ' अतः जगद्गुरु भारतवर्ष ही सर्वादिम, अतः सब देशोंका गुरु और समस्त विद्याओंका प्रवर्तक है । उसीसे भिन्न - भिन्न देशके रहनेवालोंने भिन्न - भिन्न विद्याएं सीखीं । पाश्चात्य लोग जो कि भारतवर्षको सभी विद्याओं का श्रेय नहीं देते, उसका कारण यह है कि- वे यूनानसे प्राचीन इतिहास मानते ही नहीं । पर वस्तुतः यह महामोह है । जब कि वेद पूर्व कहे मन्त्रसे तथा ' यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाऽविध्यदासुरः " ( ५/४०१६ ) इस ऋग्वेदसं ० के मन्त्रसे ग्रहण बताता है; तब ग्रहणका ज्ञान राशि- मण्डलके ज्ञानके बिना और सूर्य - चन्द्रादि ग्रहों के वारोंके ज्ञानके बिना असम्भव है । तब राशिविद्याका प्रतिपादक वेद ही सिद्ध हुआ; और वार आदि भी वैदिक काल से ही सिद्ध हुए । यदि प्राचीन पुस्तकों में राशिवर्णन वा वारादिवर्णन स्पष्ट न मिले, तो इससे प्राचीनोंको उसका अज्ञान सिद्ध नहीं होता । सर्वसाधारणतः प्रचलित सभी बातें स्पष्ट रूपसे नहीं भी कही गई जावें — यह सम्भव हुआ करता है । वेदादिमें धोतीका बान्धना यदि स्पष्ट न मिले तो क्या मानना पड़ेगा कि हमें धोती बांधना भी यूनानियोंने सिखाया? वेद - संहिताओं में तो आचार्यकुल, वा गुरुकुल शब्द भी सुनाई नहीं पड़ता, उसमें परमात्मा - शब्द भी नहीं आता; तब क्या यह सब शब्द हिन्दु यूनानियोंसे सीखे?! वाह!!! हमारे बहुत से प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हैं; उनमें उनकी सत्ता प्राप्त हो सकना सम्भव है । ' सूर्य - सिद्धान्तमें ' हम बता चुके हैं कि - वारोंका तथा राशियों-
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६२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) का वर्णन है; और वह ग्रन्थ सत्ययुग में बनाया गया है; इसे हम पूर्व लिख चुके हैं । तभी तो उसमें अन्य ज्योतिषके ग्रन्थोंकी तरह तीन संख्या में कहीं ' राम ' शब्द नहीं दिया, नौ संख्यामें ' नन्द ' ' शब्द नहीं दिया । २४ संख्या में ' सिद्ध ' शब्द नहीं दिया । उसमें वारोंका वर्णन मिल रहा है; तब कौन कह सकता है कि - भारतने यवनोंसे वार वा राशि सीखे? प्राचीन पुस्तक ' वैखानसगृह्यसूत्र में सब ग्रहोंका नाम तथा तर्पण आया है I । जैसेकि - ' आदित्यं तर्पयामि सोमं... अङ्गारकं... बुधं..., बृहस्पतिं, शुक्रं, शनैश्चरं, राहु, केतु ग्रहान् तर्पयामि ' ( १।४ ) यह ग्रह - तर्पण आया है । अब उसी गृह्यसूत्रमें वारका नाम भी देखिये- ' बुधवारे तिथिं गृह्णाति ' ( २।१२ ) यहाँ बुधवारका नाम लिया गया है । इस प्रकार स्मृतिचन्द्रिका, वीरमित्रोदय आदि बहुत निबन्ध प्रन्थों में वारोंका विचार प्राचीन पुस्तकों से संगृहीत किया गया है | जो लोग महाभारतमें राशि वा वारका वर्णन नहीं मानते, वे निम्न - प्रमाणोंको देखें । वहाँ — ' यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती । एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् ' ( वनपर्व १६० / ६०,६१ ) यहाँ ' राशि ' शब्द प्रत्यक्ष है । ' वक्रानुवक्रं कृत्वा च ' श्रवणं पावक - प्रभः । ब्रह्मराशिं समाश्रित्य लोहिताङ्गो व्यवस्थितः ' ( भीष्मपर्व ६।३।१८ ) वहाँ तो भौमका और ब्रह्मकी राशिका वर्णन भी आया है । सूर्यसिद्धान्त में तो राशियों का वर्णन स्पष्ट है, ग्रहण सिद्ध करनेमें राहु, केतु, सूर्य और चन्द्रकी राशियों की आवश्यकता