सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 441–450

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान ४१३ है, उसमें पत्थर एक - दूसरे पर इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि — उनके पास मध्यम स्वरसे बजाने से वे कांपते हैं । कुछ समय तक वैसा होनेपर उनके गिरनेकी शङ्का भी हो सकती है । इस कारण वहां गाना निषिद्ध है । इस प्रकार वैज्ञानिक तथ्योंके आधारसे कहा जा सकता है कि - ध्वनिसमूह ( मन्त्र ) द्वारा बहुतसे विचित्र कार्य किये जा सकते हैं । पशुओं और मनुष्योंपर ध्वनियोंका जो प्रभाव पड़ता है; उसे सभी जानते हैं । ऋतुविशेष या समयविशेषमें जो ध्वनि - समूह कार्य करते हैं; वे हमारी राग - रागनियोंके आधार हैं । रोगियोंके ऊपर भी ध्वनियोंका प्रभाव अनुभवसिद्ध है । उपयुक्त ध्वनिराशि शरीर, मस्तिष्क और नसोंके क्षोभको शान्त करके उसमें पुनः साम्यावस्था ला सकती है, जिसका पर्याय शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य है । इस प्रकार उपयुक्त ध्वनियोंकी आवृत्ति अर्थात् मन्त्रविशेषोंके जपसे मस्तिष्कके उपयोगी केन्द्रोंको कम्पित किया जा सकता है, और उनके द्वारा चित्तके चौथे स्तर अचेतनके विशेषको प्रबुद्ध किया जा सकता है, जिनसे योगी सिद्धियों को प्राप्त कर सके । जब कि - आजकल निरर्थक, मुसलमान आदियोंके - मन्त्र भी सांप - बिच्छू आदिके दमनमें सफलता पाते हुए देखे जाते हैं; तब जगद्गुरु भारतवर्षके जगद्गुरु ब्राह्मणोंसे समाधि - द्वारा दृष्ट वा सृष्ट मन्त्र - तन्त्रशास्त्रके मन्त्र भला कैसे झूठे हो सकते हैं? इस-लिए महाभाष्यके पस्पशाह्निकमें ' ज्ञान - कर्मके धर्माधर्माधिकारण ' में

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४१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कहा है- ' यथा वेदशब्दा नियमपूर्वमधीताः फलवन्तो भवन्ति ' इससे वेदमन्त्रोंके नियमबद्ध जपनसे फल प्रदान - शक्ति सिद्ध होती है । इसलिए उनका प्रभाव कारीरीयज्ञमें बादलोंपर भी पड़ता है, वृष्टि भी हो जाती है । पुत्रेष्टियज्ञमें स्त्रीके गर्भाशय पर भी पड़ता हैं, जिससे उसमें शुक्र स्थिर होकर सन्तान भी हो जाती है । वेदके मन्त्र स्वयम्भूका वचन होनेसे साक्षात् फलशाली होते हैं । पुराणोंके तथा तन्त्रशास्त्रोंके मन्त्र भी पुराणोंके अनादि होने से अनादिकाल से चले आ रहे हैं; वे भी वेदानुसारी होने से वेदवाला - फ़ल रखते हैं । कई मन्त्र वेद वा पुराणसे भिन्न भी होते हैं; उनमें मन्त्रके : आविष्कर्ताओं की तपस्याका बल फलदायक होता है; वा वे विविध देवोंकी कृपासे प्रसूत होनेसे उनके बलसे फलदायक हुआ करते हैं । कई पौरुषेय मन्त्र भी उनके अनुयायियों में सफलता प्राप्त करते हुए देखे जाते हैं; वहाँ पर आविष्कर्ताओं की तपस्या तथा उनके अनुयायिओंका पूर्ण विश्वास फलदायक बनता है । वह ' उनकी तपस्या यावत्कालावस्थायिनी रहेगी, तब तक वे मन्त्र भी सफल होते रहेंगे; बादमें वे निष्फल वा निष्प्रभाव हो जायेंगे । पर वेदमन्त्र सदा ही सफल होते हैं; पर उसका प्रयोक्ता शास्त्रोक्त अधिकारी, निष्ठावान् तथा शुद्ध उच्चारणवाला होना चाहिए । इस प्रकार याज्ञिक मन्त्रों द्वारा वशीकृत देवशक्ति हम पर. अनुग्रह करती है । वह उच्चयोनि तथा लोकोत्तर- बलशालिनी होने से हमें अपने मनोरथोंकी पूर्ति में सुगम सुझाव देती है । उन

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-परिक्रमाका विज्ञान ४१२ मन्त्रोंके प्रकम्पनोंका प्रभाव हमारे शरीरपर होनेसे वे हमारे रोग • आदिके परमाणुओं को भी बहिष्कृत करने में समर्थ हो जाते हैं । • मानसिक एवं शारीरिक अस्वास्थ्य दूर हुआ; तो लोककल्याण स्वयं उपस्थित हो जाता है । ( सं ० नं ० ) ( ३५ ) परिक्रमाका विज्ञान सन्ध्याके जप - विज्ञानपर प्रकाश सम्यक् पड़ चुका है; अब उसका अन्तिम श्रङ्ग परिक्रमा रह रही है; कुछ उसपर भी विचार कर लेना अप्रासङ्गिक नहीं होगा । सन्ध्या जब की जाती है; तो एक विशेष दिशाकी ओर मुख करके की जाती है; पर परमात्मा-जिसका हम ध्यान कर रहे होते हैं, वह है सर्वतो व्याप्त 1 । हमें भी उसका सर्वतः सम्मान करना चाहिए । यद्यपि जैसा वह अखण्ड है; हम वैसे अखण्ड होकर व्यापक नहीं; तथापि यथाशक्ति अभि-नयरूप से सही -हम उसकी परिक्रमा कर लेते हैं, इससे हमें यह • ध्यान रह जाता है कि परमात्मा सर्वव्यापक है । आर्यसमाज तो यह समझकर कि - हम परमात्माका अन्त कैसे पा सकते हैं - उसकी ' मानसिक - परिक्रमा ' कर लिया करता है । सनातनधर्मी भी यह जानते हैं; वे यह भी जानते हैं कि उस अनन्त तथा असीमितकी तो पूजा भी नहीं हो सकती; तथापि मूर्तिपूजाके ढंगसे उसकी वे उपासना कर लेते हैं; तथा शारीरिक परिक्रमा भी । क्योंकि पुरुषके अधिकारमें जितना सम्भव हो सकता है, वह उतना ही करता है । अस्तु । यह परिक्रमा भी प्राचीनकालका एक सम्मान है । आज भी

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४१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) श्राद्धों के समय श्रद्धालु लोग ब्राह्मणोंकी भी परिक्रमा करते हैं । यज्ञमें अग्निकुण्डकी परिक्रमा तो सभी करते ही हैं, आर्यसमाजी भी विवाह के समय यज्ञकुण्डकी एवं अग्निकी परिक्रमा करते ही हैं । आजकल जैसे मोटरोंवाले, सिपाहीकी दाहिनी ओर परिक्रमा करके जाते हैं यह एक कानून है; नहीं तो सिपाही उनका चालान कर देता है; वह उस समय हाथ ऐसे रखता है, जैसे आशीर्वाद देनेवाले करते हैं । दिलीपने स्वर्ग से आते समय कामधेनुकी परिक्रमा नहीं की थी— इसलिए उसने उसका चालान कर दिया . था; अर्थात् शाप दे दिया था कि तुम्हारे लड़का नहीं होगा । अस्तु । यह परिक्रमा सन्ध्याके अन्त में भी होती है एक मूर्तिको स्थिर करके । देवमन्दिरमें भी होती है । परिक्रमासे उस स्थान- विशेष में प्रसृत दिव्य तेज में प्रवेश हो जाता है । उसमें कारण यह है कि चक्राकार गतिसे आकर्षण और विकर्षणका योग होता है । इसी कारण सूर्य और चन्द्रमा आदिकी परिक्रमा हुआ करती है । सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि अपनी कक्षा में परिक्रमा ही तो किया करते हैं । आजकलके मतमें भूमि भी तो सूर्यकी परिक्रमा किया करती है । सूर्य भी किसी और सूर्य की । तब यह परिक्रमा प्राकृतिक - व्यवहार सिद्ध हुआ । जब कोई जादूगर अपना खेल शुरू करता है; तो जनता उसे चारों ओर घेरकर बैठती है । जब कोई लैकचरार लैकचर देता है; तब भी जनता उसे घेरकर बैठती है । यह भी परिक्रमाका ही स्वरूप है । ऐसा क्यों? वह इसलिए कि हमने जिसकी उपासना करनी होती है; उससे योगकरणार्थं

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वाणीका उपवास वा मानसिक - तप, मौन: ४१७ T ए र्य और लाभ प्राप्त्यर्थं हमारी गोलाकार स्थिति स्वाभाविक हुआ करती है । परिक्रमा अपेक्षित लाभकी प्राप्ति एवं आत्मगत - तेजकी वृद्धि हुआ करती है । मूर्तिपूजा में परिक्रमा अपना विशेषस्थान रखती है । परिक्रमा के समय जिधर मुख करे; उसे उस देवको प्राप्त होनेकी आस्था रहती है; उस देवके गुणोंका चिन्तन भी होता रहता है । हमने भी जब पृथ्वीका अन्त पाना होता है; तब पृथ्वी - परिक्रमा करते हैं । फलतः परिक्रमा भी रहस्यपूर्ण - व्यवहार है । कोई उपहासकी बात नहीं । ( ३६ ) वाणीका उपवास, वा मानसिक - तप, मौन । सन्ध्या आदिके समय अपेक्षित मन्त्रोच्चारणादिके बिना और किसीसे बातचीत न करना यह ' मौन ' कहाता है । इसमें भी कई रहस्य हैं । एक यह कि यज्ञ में अपभाषणका निषेध है । सन्ध्या वाजप आदि भी यज्ञरूप होते हैं; इनमें हम वातचीत करेंगे; तो हिन्दीमें करेंगे । हिन्दी अपभ्रष्ट भाषा है; उसका व्यवहार करने से दोष उपस्थित होता है । महाभाष्य में कहा है कि - असुरोंने विजयकेलिए किये जा रहे हुए यज्ञ में ' हेलयः - हेलयः ' कहते हुए-अपभाषण किया; और वे पराजित हो गये । इसलिए हमारे पूजा - सम्बन्धी कार्यों में भी संस्कृत शब्दोंका व्यवहार देखा गया है । यह नहीं कहते कि ' हम देवताके घर जाते हैं ', किन्तु कहते हैं-' देवमन्दिरमें जाते हैं ' यह नहीं कहते कि — देवताको देखने जाते हैं; किन्तु कहते हैं कि- ' देवदर्शनार्थ जाते हैं ' इत्यादि । २७ स ० ध ०

पृष्ठ 446

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४१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) दूसरा सन्ध्या आदिमें. वेरोकटोक वात - चीत होनेसे हमारा ध्यान उसी ओर जावेगा । फिर हमारी उपासनाकी एकाग्रता नष्ट होगी । यह तो हुई पूजाकी बात; वैसे भी समय - समय पर मौन रहना यह मानसिक - तप है । प्रत्येक समय बोलनेवाले, अधिक बोलने-वाले जब बोलेंगे; उसमें जहां वाणीका खर्च होगा; वहां अपनी भीतरी - शक्तिका, भीतरी -विद्युत्का भी, अपने तेजका भी ह्रास होगा । प्रायः मौन अबलम्बन करनेवालेकी वह शक्ति सुरक्षित रहती है; इसलिए समयपर बोलनेवालेका प्रभाव भी दूसरेपर होता है । जिस इन्द्रियका जितना संयम होगा; उसकी शक्ति उतनी बढ़ेगी, भविष्य में भी वह अधिक कार्य देगी । फिर अधिक बोलनेसे उसमें असत्य - बहुलता भी रहेगी । असत्य बोलना भी ' हमारे तपको क्षीण करनेवाला होता है । अस्तु । ' मौन ' का अर्थ है ' मुनेर्भावः ' । तो यह मौन मुनित्व है । मुनि इसी मौनका ही व्यवहार अधिकांशमें करते थे । जैसे कायिक उपवास एकादशी व्रत है— जिसका विवेचन हम आगे करेंगे, उससे शरीरकी शुद्धि होती है; वैसे ही वाणीका उपवास मौनव्रत है; इससे वाणीकी शुद्धि हो जाती है । मौन मानसिक - तप है । जैसे कि भगवान् ने कहा है- ' मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनम् आत्म-• विनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते ' ( गीता १७/१६ ) । मनकी प्रसन्नता रखनी ( कुढ़ते न रहना ), सौम्य रहना, मौन रहना, आत्म - संयम रखना, भावकी शुद्धि रखनी - यह मानस - तप कहा है ।

पृष्ठ 447

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वाणीका उपवास वा मानसिक - तप, मौन ४१६ जैसे सदा अन्न, कदन्न ( खराव अन्न ) आदि खानेसे शरीर में अशुद्धि व्याप्त हो जाने से शरीर रोगी हो जाता है, और शारीरिक उपवास करनेपर वह अशुद्धि दूर होकर शरीर की शुद्धि हो जाया करती है, और वह शरीर भी नीरोग हो जाया करता है, वैसे ही सतत - भाषणसे, सुभाषण और अपभाषणके मिश्रण हो जाने से वाणी भी अस्वस्थ हो जाती है, वह असत्य भी वोलने लग जाती है - यही उसकी अस्वस्थता - रुग्णता होती है । वही वाणी फिर निर्भर्त्सन, और गालिप्रदान आदिमें परिणत होकर क्रोधके प्राज्य - साम्राज्यको आविष्कृत करके ‘ वाक्पारुष्याद् नान्यदस्त्यप्रियत्वम् ' इस न्यायसे कलह, युद्ध एवं महायुद्धोंकी सृष्टि करनेवाली बन जाती है । वाणी जब तक हमारे अन्दर है, हमारी है । जब मुख बाहर हुई; तब वह दूसरेकी हो जाती है । उससे यदि दूसरा क्षत को प्राप्त करता है; तब वह उस वाक्के प्रयोक्ता पर प्रहार करता है; उसके मारनेका प्रयत्न करता है । परन्तु मौनव्रत वाणीके उस रोगको शान्त करनेवाला अमोघ औषध होता है । मौनव्रत से न केवल वाणीका बल, प्रत्युत मनोबल, बुद्धिबल, आत्मबल तथा शारीरिक बल भी प्राप्त होता है । अधिक भाषण शारीरिक- बलके साथ मनोबल एवं बुद्धिबलका भी ह्रास करता है; क्योंकि वाणीके विकासमें यह तरीका है कि उस समय हमारा आत्मा और बुद्धि हमारे शरीर में कौन्सिल करते हैं; कि अमुक अर्थको कहना है । वे मनको प्रेरित करते हैं । मन उस समय शारीरिक अग्निको पीटता है, वह अग्नि वायुको प्रेरित करती है । वह वायु नाभिप्रदेशसे

पृष्ठ 448

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४२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ऊपर छाती आदिमें प्रवेश करती है, फिर ऊपर आती है और ' शब्द मुखसे उत्पन्न होता है । यही वाणी है । इसमें हमारे शरीरका मथन होता है । उसकी अग्नि हसित होती है । इसलिए लैकचरार और अध्यापक जिनको चिल्ला - चिल्लाकर बोलना पड़ता है, शीघ्र मरते हैं । हमारी भाषण - क्रियाको हमारा गला और फेफड़े विशेषरूपसे सम्पन्न करते हैं । फेफड़ोंमें वायुसंचार होनेपर ही वाणीकी प्रक्रिया संपन्न होती है, उसका प्रभाव हमारे मस्तिष्क एवं शरीरपर भी पड़ता है । मौनव्रत से फेफड़ोंकी सुरक्षा होती है; और वे रक्तशुद्धि के कार्य में निरन्तर लगे रहते हैं । इससे शारीरिक स्वास्थ्य उन्नत होता है, मन भी दृढ होता है । इसलिए शारीरिक या मानसिक विविध रोगियोंके लिए मौन बिना - मूल्य की दवाई है । मौनसे शारीरिक, मानसिक एवं वाचिक स्वास्थ्य प्रवृत्त रहता है । इस संसार में सारा व्यवहार शरीर, वाणी और मनपर निर्भर है " । इनकी विषमता होनेपर ही विविध कलहोंकी सृष्टि होती है । उनके साम्य वा स्वास्थ्य रहनेपर सांसारिक सब व्यवहारोंका सामञ्जस्य रहता है । इस कारण वाचंयमता - मौनव्रत एक आवश्यक व्यवहार है । इस प्रकार मौनसे जीवन सुखी हो जाता है । अप-भाषण - गाली - गलौज़की प्रवृत्ति घटती है । मित्र बढ़ते हैं । कुटुम्ब में ऐक्य रहता है; कुटुम्बके ऐक्य में समाज जीवन स्वस्थ रहता है । मौनकी समाप्तिमें भी वाणी- निग्रह आवश्यक है । मितभाषण मौनका प्रथम सोपान है । मितभाषी पुरुषके शब्द

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वाणीका उपवास वा मानसिक - तप, मौन ४२१ परिमित होते हैं; उनका दूसरेपर प्रभाव पड़ता है । जिस प्रकार सुनयना, चन्द्रवदना स्त्रीका मुख घूँघट में रहता हैं, तो उसे देखने की चाह बनी रहती है; जव मुख घूँघटसे बाहर आता है, तो सभीकी चित्तवृत्ति वलात् उधर खिंच जाती है, वह मनको हर लेती है; यही बात वाणीकेलिए भी है । मुखमें रहना वाणीका पर्दा है; मुखसे बाहर आना वाणीका पर्देसे वाहर आना है । वाक्-संयमीकी वाणीके प्रारम्भ होनेपर सभी उसके एक - एक शब्दको ध्यान से सुनते हैं । इसमें श्रीगान्धीजी निदर्शन थे । वह नियमित दिनमें मौन करके उसे समाप्त करके जब बोलना शुरू करते थे; E तब जनराशि उनके वचनके सुननेके कुतूहलसे उनके पास इकट्ठी हो जाया करती थी, मौनके कारण भिन्नशब्दोंके प्रयोक्ता- उनके I मितशब्दोंका जन - साधारणपर और राजकीय अधिकारियोंपर • जोरदार प्रभाव पड़ता था । I मौनका यदि दम्भकेलिए सेवन किया जाए; तो विशेष - लाभ र नहीं पहुँचता । श्रद्धासे, विश्वाससे और हृदयसे यदि मौनका I पालन किया जाए; तो वैकारिक भावनाओंका उपशम तथा विशुद्ध I सात्त्विक वृत्तियों का उदय होता है । इस प्रकार पुरुषका चित्त क निर्मल, और चरित्र उत्तरोत्तर विशुद्ध होता जाता है । भोजन-F- समयमें तो मौन अपेक्षित होता ही है; तब उसके अवलम्बनमें व लारके अधिक खर्च न होनेसे भोजनके परिपाकमें सहायता मिलती है । साधक यदि मौनका अवलम्बन लेता है, तो दैवी - सम्पत्तिके आविर्भावक, उदात्त मानसिक - भावका उज्जृम्भण होता है । मौनसे. द

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४२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ही अनायास धर्म, अर्थ, कामकी प्राप्ति होती है, फिर मोक्ष की प्राप्ति भी सुलभ हो जाती है । ' मुखादग्निरजायत ' ( यजु ० ३१११२ ) इस मन्त्रमें मुखसे अग्निको उत्पत्ति कहने से मुखसे उत्पन्न होती हुई वाणी भी अग्नि-स्वरूपा सिद्ध होती है । वही बढ़ी हुई वागग्नि उद्दीप्त होकर - शापरूप-को प्राप्त होकर दूसरोंके कुलोंको भी जला डालती है; इससे तदाश्रय-भूत रसना तथा अपने आत्माका भी अनिष्ट होता है । तब रसना-बल क्षीण हो जाता है । परन्तु वाक्संयममें तो पुरुषके पास स्वर्गीय - चातावरणका उदय होता है । मौन ही हमें आत्म - चिन्तन, मनन, ध्यान आदि में सुविधा देकर आत्माको विशुद्ध करके परमात्मासे मिलाने में सौकर्य कर दिया करता है, मनको दृढ बना दिया करता है, आरोग्यको प्राप्त कराता है । आत्मकल्याणेच्छु पुरुषोंको इस मौनका निश्छल अभ्यास करना चाहिये । ( ३७ क ) घण्टानाद | प्रातःकाल देवमन्दिरोंसे उठनेवाली दीर्घ प्ररणवनाद - सी सुमधुर घण्टा - ध्वनि भारतीय हिन्दुओं को अनादिकाल से परिचित एवं प्रिय है । देवपूजनमें घण्टा वा छोटी घंटीका नाद भी आवश्यक माना जाता है । जहां घंटी रहती है, वहां सर्प, अग्नि तथा बिजलीका भय नहीं होता । घंटे की ध्वनि देवताओंको प्रसन्न करनेवाली, असुर, राक्षस, भूत - प्रेतादिको भगा देने वाली, पापनिवर्तक, एवं अरिष्टनाशक बताई गई है । लौकिकरूपमें यह पता लग जाता है । कि — मन्दिरमें पूजा हो रही है; नियत समय पर होनेसे शहर वा