सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 291–300
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 291–300
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कन्याका विवाह कब? २६३ सकेगी? इसलिए उसका भार पितापर ही ठीक है । कन्याके वाल्य वा यौवनमें अनुभव पिताके वार्धक्यके अनुभवसे न्यून ही होता है । इस कारण वहां पिताके परिपक्क अनुभवकी अतिशयित आवश्यकता होती है । केवल स्वतन्त्रतामें लाये हुए कुमार युवक - युवति एकमात्र रूपके पिपासु होते हैं । शीतला आदि रोगके वश बादमें उनकी सुन्दरता में थोड़ी भी हानि प्राप्त हो; तो उनका प्रेम विच्छिन्न हो जायगा । इस प्रकार तो बड़ी अव्यवस्था होगी । परस्पराभिलषितता भी ठीक तब होती है कि — पुरुष शीघ्रस्खलनादिदोषोंसे रहित हो, और स्त्री योनिरोगादिसे रहित हो । रूपमात्र से यह नहीं जाना जा सकता । तब क्या उन्हें कौमार्य में ही एकान्तसेवनका आदेश दिया जायगा? वस्तुतः इस समय यदि धर्मबन्धन स्थापित न किया गया; विवाह में केवल अभिलाषामात्र ही रख दी गई; तो कुछ समयके बाद उस अभिलाषाके दूर होनेपर क्योंकि — ' नयेके नौ दिन ' यह कथन प्रसिद्ध है; तो स्वयं ही विवाहविच्छेद हो जायगा । इससे वेश्याओंकी वृद्धि अनिवार्य होगी । बद्ध समुद्र फिर भी मर्यादा नहीं तोड़ता; परन्तु बंधी हुई नदी तो बढ़कर अपनी मर्यादाको भी तोड़ देती है; और निकटवालेकी हानि भी कर देती है । इसी प्रकार यौवन तक अविवाहिता कुमारी भी बँधी हुई नदीकी भांति होती है । यदि नदीको बांधा न न जावे; उसका शनैः - शनैः उपयोग किया जावे; तब वह नदी स्वयं भी मर्यादामें रहती है; दूसरोंकी भी हानि नहीं करती । इस
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२६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ३ ) प्रकार कुमारीका शास्त्रानुसार १२ वर्षमें विवाह कर दिया जावे; फिर ऋतुकाल प्राप्त होनेपर उसका ऋतुमात्रगमन हो; तब उच्च यौवनमें प्राप्त भी वह हानिकारक सिद्ध नहीं होती । विवाह मुख्यतया धर्माचरणके उद्देश्यसे ही होता है, काम-भोगार्थं मुख्यतया नहीं । तभी कहा जाता है; ' आवसथ्याधानं दारकाले ' ( पार ० १1०1१ ) कामभोग तो अवान्तर उद्देश्य है । यदि कामभोग ही विवाहका साक्षात् उद्देश्य हो; तो सारी आयुकेलिए विवाह बन्धन ही व्यर्थ है । उसके लिए तो काममात्रफला वेश्या ही ठीक रह सकती है । इससे स्पष्ट है कि विवाहका साक्षाद् उद्देश्य विशुद्ध दाम्पत्य के प्रेमद्वारा शास्त्रादिष्ट धर्मसाधन ही है । तभी पत्नीको ' धर्मपत्नी ' कहा जाता है ' कामपत्नी ' नहीं । फलतः ऋतुकालसे कुछ पूर्व ही शास्त्रानुसार कन्या विवाह होनेपर और ऋतुकालमें ही उसका उपयोग होनेपर सभी प्रकारकी हानियों से सुरक्षा है । इस विषयपर भिन्न पुष्पमें प्रकाश डाला जायगा । अब कई वैवाहिक रीतियोंका रहस्य भी बताया जाता है-वैवाहिक रीति - विशेषोंका रहस्य । सनातनधर्मी - विवाहों में कई देश वा कुलधर्मके अनुसार रस्में की जाती हैं, उनका श्रुति - स्मृति में उल्लेख न होनेसे अर्वाचीन लोग उस विवाहको ही अवैदिक वा अशास्त्रीय मानते हैं; परन्तु उन्हें जानना चाहिये कि — विवाह संस्कार मुख्यतासे गृह्यसूत्रका विषय है; उस गृह्यसूत्रमें उन कुलधर्मोके करनेकी अभ्यनुज्ञा दे दी गई है; तब उसमें अशास्त्रीयता कैसी?
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वैवाहिक रीतित्रिशेषोंका रहस्य २६४ आश्वलायनगृह्यसूत्र एक प्रसिद्ध सूत्र - प्रन्थ है । स्वामी दयानन्दजीने अन्त्येष्टि कर्मकी रीतियाँ इसीसे ली हैं । उसी गृह्य-सूत्रमें विवाहकी देश वा ग्राम - सम्बन्धी एवं कुल - सम्बन्धी रस्मोंके लिए लिखा है- ' अथ खलु उच्चावचा जनपद्धर्मा ग्रामधर्माश्च, तान् विवाहे प्रतीयात् ' ( १/७/१ ) इसका गार्ग्यनारायणकी वृत्ति में इस प्रकार विवरण किया गया है - " धर्मशब्दादेव द्वितीयानिर्देशे सति अन्वये सिद्धे ' तान् ' इति वचनं ' कुलधर्मा अपि कार्या ' इत्येवमर्थम् । तान् — तादृशानित्यर्थः । विवाहाधिकारे प्रचलत्यपि विवाहग्रहणं कृत्स्ने विवाहे यथा स्युरित्येवमर्थम् इतरथा उपयमनकालाद् उत्तर-कालं विहितत्वाद् उपयमने न स्युः । उपयमनं नाम कन्यायाः स्वीकरणम् । प्रतीयात् — कुर्यात्! ” यहाँ यह बताया गया है, कि – कन्याके स्वीकरणसे लेकर विवाहकी समाप्ति तक ग्रामधर्म किये जा सकते हैं, केवल विवाह में ही क्या, प्रत्युत सब अवसरोंमें अपने कुलधर्म - रीतियोंको करनेकी शास्त्रीय आज्ञा है; इसी कारण स्मृति में कहा गया है- ' न यत्र विधयः साक्षाद् न निषेधः श्रुतौ स्मृतौ । देशाचार- कुलाचारैस्तत्र धर्मों निरूप्यते ' । इसीलिए मनुस्मृति में ' वेद: स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ' ( २।१२ ) यहाँ श्रुति तथा स्मृति से अतिरिक्त ' सदाचार ' को भी - जो पिता- पितामह से आई हुई कुलरीतियोंका बोधकँ है — धर्मके साक्षात् लक्षणों में माना गया है । तभी तो मनु जीने कहा है-' येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात् सतां
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२६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मार्गं तेन गच्छन् न रिष्यते ' ( ४ | १७८ ) अर्थात् - जो बाप - दादे रीतियाँ करते आये हैं; उनके करते - आते रहने से कुछ हानि नहीं होती; क्योंकि — वे उनको तभी तो करते रहे कि —– उनको उन रस्मोंसे कोई हानि नहीं पहुँची, किन्तु कुछ लाभ ही पहुँचा । तब यहाँ उन रस्मोंकी करणीयता बता देनेसे धर्मता सिद्ध होगई । इसी लिए मनुस्मृतिमें कुलधर्म भी माने गये हैं । इसीलिए कहा है-' देशधर्मान्, जातिधर्मान्, कुलधर्मांश्च शाश्वतान् । पाषण्डगण-धर्मांश्च शास्त्रेस्मिन् प्रोक्तवान् मनुः ' ( १।११८ ) । वृहत्पराशरस्मृतिमें भी कहा है – ' कुलाचारोपि कर्तव्य इति शास्त्रविदो विदुः । देशाचारस्तथा धर्म इति प्राह पराशरः ' ( ४ | ११७ ) यहां पर कुलाचार तथा देशाचारको भी कर्तव्य एवं धर्म बताया गया है । केवल इसी स्मृति में नहीं, किन्तु ' गौतमधर्मसूत्र ' में भी कहा - ' देश जाति - - कुलधर्माश्च आम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणम् ' ( ११।१ ) अर्थात् उन देश, जाति वा कुलकी रस्मोंका वेदसे साक्षात् विरोध न हो; तो वे भी प्रमाण हैं; और कर्त्तव्य हैं । इस प्रकार देशधर्म तथा कुलधर्मोकी कर्त्तव्यता सिद्ध हो गई । इसीलिए आश्वलायन-गृह्यसूत्रमें मुण्डन - संस्कारमें कुलकी रीतियोंका भी आदर किया है - ' तृतीय- वर्षे चौलं यथाकुलधर्मं वा ' ( १११७११ ) अर्थात् - लड़के का मुण्डन तीसरे वर्ष में करवाओ; अथवा जैसा आपके कुलका धर्म ( रीति - रिवाज़ ) हो उसी समय कराओ । आपस्तम्बगृह्यसूत्रमें भी कुलधर्मके अनुसरणार्थ कहा गया है - ' यथर्षि शिखां निद्धाति, यथां वा एषां कुलधर्मः स्यात् ' ( ६।५।६-७,
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वैवाहिक रीतिविशेषोंका रहस्य २६७ ७ | २० | १६ ) यहां प्रवरानुसार शिखाएँ रखना कहा है; फिर कहा है - जैसा उनके कुलका धर्म हो; वैसा करें । भगवद्गीता में भी कहा है – ' उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन! नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ' ( १।४४ ) यहां कुलधर्मों के उल्लंघन करनेवालों को नरककी प्राप्ति कही गई है । ' दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकर-कारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ' ( गीता १।४३ ) वहां भी जातिधर्म तथा कुलधर्मोकी अवहेलना वर्णसंकरकारक बताई गई है । राजाओं को भी उन धर्मोंको नहीं हटवाना चाहिये । जैसे कि स्मृति में कहा है- ' यस्मिन् देशे य श्राचारः पारम्पर्य-क्रमागतः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशमुपागतः ' । यदि नया राज आते ही बलात् उन परम्परासे आये हुए देश आदिके धर्मों को हटवायेगा, वा कानूनका प्रयोग करेगा; तो उस राजाका राज्य भी चिरस्थायी नहीं हो सकता; क्योंकि इससे उन पुरुषोंकी भावनाको धक्का पहुँचता है । ' श्रद्धामयोऽयं पुरुषः यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' ( १७१३ ) यह श्रीभगवद्गीता में कहा है कि सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अन्तःकरणके अनुरूप होती है और पुरुष श्रद्धामय होता है; अतः जिसकी जिसमें जैसी श्रद्धा है, वह स्वयं भी वही बना रहता है । अतः उसे बलात् हटवाना आफत मोल लेना है । इससे जो कि सनातनधर्मी विवाह आदिके अवसर पर देश वा ग्राम एवं कुलकी रस्में किया करते हैं; उनमें शास्त्रीयता वा आक्षेपार्हता नहीं हो सकती । उन रीति - विशेषोंकी भी यदि ऐति-हासिक विवेचना की जावे; तो पता लगेगा कि उनके शुरू करने में
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२६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) एक विशेष उद्देश्य था, जैसे कि प्रत्येक कार्योंका होता है । मान लीजिये कि आपने एक दुर्गम अरण्यको पार करके किसी नियत स्थान में पहुँचना है । उस वनमें कोई मार्ग नहीं दीखता । उस समय आप पूर्वके विद्वानोंके परामर्शसे निश्चित दिशामें चलकर उस स्थानको प्राप्त कर लेते हैं । आपके पदचिन्ह भूमिमें बन जायेंगे, लेकिन वे स्पष्ट नहीं होते । फिर आप तथा आपके दूसरे सम्बन्धी भी उस मार्ग पर चलकर उस नियत स्थानको पहुँच जाएँगे । तब वह पद्धति ( पगडंडी ) बन जायगी । तव वे पदचिन्ह स्पष्ट हो जाएँगे । दूसरोंको वे मार्ग - प्रदर्शन करके उन्हें भी उस नियत स्थान पर पहुँचा देंगे । फिर वही पगडंडी क्रमशः छोटी सड़क, फिर बड़ी सड़क बन जावेगी । फिर भविष्यत्की सन्ततियोंको भी उधर जाने में सुविधा हो जायगी । यही रीति - विशेषोंका भी रहस्य हुआ करता है । ' महाजनो येन गतः स पन्थाः ' ( महाभारत वनपर्व ३१३।११७ ) ' येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ' ( मनु ० ४।१७८ ) इन उक्तियों का भी यही रहस्य है । ऋषि - मुनियोंने वेदसे वा अपने तपोबलसे कर्त्तव्य पालनका या मुक्ति - प्राप्तिका जो कार्यक्रम नियत किया था; जनताने उसका अनुसरण करना शुरू किया । उसी कार्यक्रमका नाम ' रीति - रस्म ' हो गया । लोग पूछते हैं कि - यजमान पूर्व दिशामें मुँह क्यों करे? - विवाह में वधू सात पद ही क्यों चले? ' ऐसा कहते हुओं को पूछना चाहिये कि राजद्वारमें जाने पर इतनी दूरसे नमस्कार करनी चाहिये, इतनी बार नमस्कार करनी
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वैवाहिक रीतिविशेपोंका रहस्य चाहिये । राजद्वारकी पौशाक ऐसी होनी चाहिये । विश्वविद्यालयोंके चोगे नियत प्रकारके होते हैं - इस प्रकारकी रीतियां आजतक मी प्रचलित हैं । वस्तुतः कारण यह है कि विशेष रस्में कुंडुन्य या समाजके संघटनार्थ भी हैं ॥ वे जैसे ऐक्यके बाह्य साधन हैं वैसे ही दृष्ट लाभोंके लिए भी हैं । ' एका क्रिया द्र्यर्थकरो प्रसिद्धा ' । वे रीतियाँ धर्मकी बाहरी त्वचा होती हैं; धर्मकी रक्षा करनेवाली होती हैं । चावलोंके ऊपर धान्यकी त्वचा हुआ करती है; वह चावलोंकी रक्षार्थ हुआ करती है । उस त्वचाके विना चावलोंकी उत्पत्ति, स्थिति तथा वृद्धि नहीं हो सकती । यही त्वचा चावलकी उन्नतिमें सहायता देती है । यदि यह त्वचा न होती, तो चावलकी रक्षा भी न होती I । तो चावलकी त्वचाको निस्सार वा व्यर्थ बताना यह महामोह है | तब रस्में धर्मरूप चावलके रक्षण तथा प्रवर्धनके लिए त्वक् ( छिलका ) रूप हैं । चावलों से अलग की हुई त्वचा जैसे आपाततः निस्सार प्रतीत होती है; वैसे ही यह रीतियाँ भी धार्मिक दृष्टिकोणको छोड़कर आपाततः देखनेसे निस्सार - सी प्रतीत होती हैं; पर वस्तुतः ऐसे नहीं हैं । तब प्राच्यों से नियमित, देशकालादिमें नियमित रीतिविशेषोंका अनुसरण धर्म तथा धार्मिक संघटनके प्रसारणार्थ अत्युपयुक्त साधन है; क्योंकि – अपने वर्गवाले जिस भी देशकालमें रहते हैं — वैसी ही रोतियोंका अनुसरण करते हैं — इससे उनके संघटनका भी प्रभाव दूसरों पर पड़ता है । फलतः परम्परासे आई हुई कुल - रीतियोंका अनुसरण कोई प्रक्षेप्य बात नहीं । पुरुष बाहरी कामों में लगे हुए उन कुलरीतियों-
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' २७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) को भूल भी जाते हैं; पर घरकी स्त्रियाँ उन पारम्परिक रीतियोंको जान रखती हैं । इसलिए गृह्यसूत्रों में कहा है कि जिन रस्मोंको स्त्रियाँ कहें; वे भी कर लेनी चाहियें । जैसे कि - वैखानस - गृह्यसूत्र में कहा है- ' यत् स्त्रिय आहुः पारम्पर्यागतं शिष्टाचारम्, तत्तत् करोति ' ( ३।२१ ) । आग्निवेश्यगृह्यसूत्र में भी कहा है- ' यच्चात्र स्त्रिय आहुः, तत् कुर्वन्ति ' ( २ | २ | ३, ३ | ५ | ४-८, ३।६।१-३ ) । काठकगृह्यसूत्रमें भी कुलाचारोंकी कर्तव्यता कही है— ' आचारिकाणि ' ( २५/७ ) यहाँ देवपालने टीका की है- ' अस्मिन्नवसरे आचारिकाणि - आचारादागतानि देश - जाति- कुलधर्मतया प्रसिद्धानि कर्माणि कारयेत् ' । वहीं पर ब्रह्मबलने भी यही कहा है – ' अस्मिन् अवसरे देश - जाति - कुलोचितानाम् आचारिकाणां मङ्गल्यानां कर्मणां कालः ' । वहीं आदित्यशरणने भी लिखा है- ' अस्मिन् अवसरे आचारकाणि कर्माणि कुर्यात् देश - जाति- कुलव्यवस्थया स्थितानि । अशास्त्रार्थमिति न प्रतिवध्नीयात् ' अर्थात् - यह रस्में शास्त्रीय हैं - यह कहकर उनके करने में प्रतिबन्ध न डाले । यह हम थोड़ी - सी वैवाहिक - रीतियोंपर कुछ प्रकाश डालते हैं; शेष अपनी कुलरीतियोंका रहस्य स्वयं समझनेका प्रयत्न करना चाहिए । संस्कारका महत्त्व संस्करण - संशोधनका नाम संस्कार होता है । अपने शरीर पर की जानेवाली क्रियाओंसे जो एक अतिशय हो जाता है, यही संस्कार हो जाता है । पूर्व विद्यमान पदार्थोंके दोषोंको हटाकर
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संस्कारका महत्त्व २७१. गुणाधान करनेसे उनको ठीक - ठीक कर देनेके कारण संस्कार आवश्यक हैं । असंस्कृत हुआ हुआ सोना कभी कामिनियोंके कमनीय कण्ठमें, और कामुकोंके कमनीय करमें कान्तिको नहीं द़िया करता, जब तक सुवर्णको अग्निमें शुद्ध न किया जावे और उसके कर्षण - घर्षण आदि संस्कार न हों । जैसे यहाँ पर संस्कारकी आवश्यकता है, वैसे ही मानवको मानव एवं चारु बनानेकेलिए भी संस्कार आवश्यक हैं । यह सब विचारकर परम अनु-कम्पायुक्त पारस्कर आदि आचार्योंने स्थूल- बुद्धि पुरुषोंके उपकारार्थ संस्कारोंकी प्रक्रिया बनानेवाले ग्रन्थोंको बनाया था । उनमें कई संस्कार दोष हटानेवाले हैं, और दूसरे गुण डालने वाले हैं । उनमें विवाह - संस्कार प्रधान है; क्योंकि — उसे सभी करते हैं; और दूसरे संस्कारोंका, वर्णोंका तथा आश्रमोंका बल्कि समस्त सृष्टिका मूल है । दूसरे संस्कारोंमें एक ही संस्कृत होता है, परन्तु इस विवाह में दो व्यक्ति संस्कृत होते हैं - इस लिए भी प्रधान है । हमारे यहां वैध वैदिक संस्कारसे स्त्री - पुरुषका जोड़ा पक्का हो जाता है; पर विदेशों वा भिन्न - सम्प्रदायों में केवल कामुकता होने से वहांका जोड़ा कच्चा रह जानेसे विवाहोच्छेद आदि करना पड़ जाता है; जिससे उनका विवाह असफल हो जाता है । हमारे गृहसूत्रोक्त संस्कार दम्पतिके आत्मा, मन, प्राण, शरीर — जिसमें अस्थि, त्वचा आदि आ जाते हैं, सबका एकीकरण हो जाता है, बल्कि उसका दूसरे जन्म तक सम्बन्ध भी रहता है- ' सती न योषित् प्रकृतिश्व निश्चला, पुमांसमभ्येति भवान्तरेष्वपि, '
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२७२ श्रीसनातनधर्मालोकं ( ५ ) ( शिशुपालवध १ सर्ग ) पर दूसरे सम्प्रदाय चाहे एक - दूसरे को देख - दिखलाकर कार्य करते हैं, तब भी साधारण ही कारणोंमें उनका विवाह विच्छिन्न हो जाता है । यह है हमारे शास्त्रीय संस्कारका महत्त्व । वाग्दान जैसे प्रस्ताव की पहले - पहले भूमिका प्रारम्भ होती है; जैसे अनुमान करनेकेलिए पांच अवयवों में पहले प्रतिज्ञांकी आवश्यकता होती है; वैसे ही विवाहका आरम्भ ' वाग्दान ' से होता है । मनुस्मृति में लिखा है- ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( ५/१५२ ) अर्थात् जब लड़कीका, किसी कुल - शीलवाले अपने से देखे - भाले हुए लड़के को उसके पिता आदि सम्बन्धियोंकी उपस्थिति में वाणी द्वारा दान कर दिया जाता हैं; यह बात लड़कीको भी पता लग जाती है; उस दिनसे वह उस पितृ - प्रदत्त पुरुषको अपना पति मान लेती है । उस दिन से माता - पिता आदि उस वरकी प्रशंसा आदि करते रहते हैं— जिससे उस लड़कीका उस लड़के के प्रति आकर्षण हो जाता ' है । गणेशपूजा आदि तथा फलप्रदान, मिष्टान्नपान आदि द्वारा परस्पर दोनों वर - वधू पक्षवालोंका पारस्परिक विश्वास एवं प्रेम तथा एक - दूसरेसे सुख - दुःखमें सहानुभूति उपस्थित हो जाती है । और दोनों पक्ष विवाहकी तैयारी भी प्रारम्भ कर देते हैं । वैवाहिक कङ्कण कङ्कण बन्धनका यह तात्पर्य होता है कि मैं इस गृहस्थ-आश्रममें बद्ध होगया वा होगई हूँ । उसमें तीन गांठोंका यह