पञ्चम सुमन · प्रकरण 16
वैवाहिक विधियोंका रहस्य
मुद्रित पृष्ठ 277–292 16 पृष्ठ
277वही फल उसका शरीरके साथ निरन्तर स्पर्श में भी होता है 1 । जैसे कि- मरहम, लेप, मालिश, इन्जैक्शन आदिके द्वारा भी विविध ओषधियाँ भीतर प्रविष्ट कराई जाती हैं । भावी वन्ध्यात्व आदि रोगोंकी निवृत्त्यर्थ गजदन्तका खण्ड आरम्भ से ही धारण किया हुआ अधिक फलप्रद होता है ।
फिर वर और कन्याका पिता ग्रह- देवादिपूजन करता है । उस के बाद वरका पाद्यादिद्वारा पूजन होता है ।
वैवाहिक - विधियोंका रहस्य
पाद्यमधुपर्कादि-
विवाह के आरम्भ में पाद्यादि देना तो वरका प्राचीन कालका सत्कार है; मधुपर्क अर्पण करना जहां सत्कार है, वहाँ उसके द्वारा वरको यह भी सूचित किया जाता है कि गृहस्थाश्रममें तुम दधि- मधु - नवनीतका उपयोग किया करो । इसीसे वीर्यप्राप्ति होगी — यही तुम्हारा वाजीकरण है ।
वस्त्रप्रदानादि
फिर वर कन्याको वस्त्र देकर तथा स्वयं वस्त्र पहनकर यह सिद्ध करता है कि मैं तुम्हारे तथा अपने पालनमें समर्थ हूँ —यह देखकर पिता अपनी कन्याको उसे दान कर देता है । पहले कन्यादानका संकल्प कराके, फिर कन्याको वस्त्र देना अयुक्त तथा स्वार्थपूर्ण है । पिता देखेगा कि - यह कन्याका वस्त्रादिद्वारा पोषण कर सकता है । तभी तो वह कन्या दे देनेका संकल्प करेगा । कन्यादानके बाद फिर उनको परस्पर - समीक्षणका अवसर देना भी ठीक ही है ।
278कन्यादान
कन्यादानमें वरके हाथपर वधूका हाथ रखकर फिर उसपर शङ्खसे संकल्पकेलिए जल डाला जाता है तथा अग्निको समक्ष रक्खा जाता है । हाथके सम्बन्धद्वारा दोनोंका विद्युत्प्रवाह चलता है और जल विद्युत्का संचालक होता है । इससे पति - पत्नीकी प्रेमधाराका एक - दूसरेमें प्रवेश और प्रेमकी विद्युत् - शक्ति के दृढ होने में बड़ी सहायता मिलती है । किसी वस्तुको दृढ करने के लिए जल और अग्निकी सहायता ली जाती है । मिट्टीका घड़ा तभी दृढ होता है, जब मिट्टीको भिगोकर पहले घड़ेका आकार दिया जाय; फिर कच्चे घड़ेको अग्निमें तपाकर दृढ कर दिया जाय । दो भिन्न, वस्तुओंका सम्वन्ध मिलाना और उस सम्बन्धको दृढ तथा स्थायी वनाना जल और अग्निकी सहायता से उत्तम - रूपसे होता है । इस प्रकार विवाह में पति - पत्नी के सम्बन्धको जलद्वारा स्थिर किया जाता है, उसे दृढ तथा जन्म - जन्मान्तरतक स्थायी बनाने के लिए अग्निका साक्षीरूपसे आश्रय लिया जाता है । 1
अग्निकी साक्षी
अग्निकी साक्षीमें कन्याका देना, फिर वर - वधूका अग्नि- परिक्रमा करना इसमें यह रहस्य है कि- कौमार्यमें कन्या के सोम, गन्धर्व, अग्नि- ये तीन क्रमशः पति ( पालक ) होते हैं । एक - एक वर्षं वे अपना आधिपत्य रखकर फिर वादवालेको सौंप देते हैं । कौमार्य में अन्तिम पति अग्निदेव होते हैं । उनको स्थापित करके यह भाव प्रकाशित किया जा रहा है कि वही अग्नि अपनी आश्रित 279कुमारीको मानव - वरको दे रहा है । जैसा कि — ' तृतीयो अग्निष्टे पतिः तुरीयस्ते मनुष्यजा: ' ( ऋ ० १० ८५२४० ) । ( तुम्हारा तीसरा पति ( पालक ) अग्नि - देव है और यह मनुष्यज मैं तुम्हारा चौथा पति हूँ । ) ' रयिं च पुत्रांश्चादाद् श्रग्निर्मह्यमथो इमाम् ' ( ऋ ० सं ० १०।८५ । ४१ ) । ( अग्निदेव इस कन्याको मुझे पत्नीरूपमें प्रदान करते हैं साथ धन और पुत्र भी ) यह मन्त्र बता रहा है । इसीलिए वह पुरुष स्त्रीके रखने ( संन्यास से पूर्व ) तक सस्त्रीक अग्निकी हवि आदि से पूजा करता है ।
ऋतुकालसे पूर्व विवाह
अग्नि कन्याके भीतरके ऋतुधर्मका स्वामी होता है । जबतक आर्तव कन्याके अन्दर है, तबतक उसमें आधिपत्य भी अग्निका होता है । जब आर्तवका सम्बन्ध भीतर से बाहरको होना चाहता है, उस समय उसे वर मिलना चाहिये - यही अग्निदेवका मानव- वरको सौंपनेका रहस्य है । इससे कन्याका विवाह देशकालानुसार ऋतु - दर्शनके कुछ पूर्व कर्तव्य है । जिस उष्ण देशमें कन्याका ऋतु - प्राकट्य ६-१० वर्षकी अवस्था में होता है वहाँ उसका विवाह भी ८ वर्षकी अवस्था में करना चाहिये । जहाँपर ऋतुप्राकट्य १३ वें या १४ वें वर्ष में होता है, वहाँ कन्याका विवाह भी १२-१३ वर्षकी ही अवस्थामें करना चाहिये । जिस शीत - देशमें ऋतु - दर्शन १६-१७ वर्षकी अवस्था में होता है, वहाँ कन्याका विवाह भी १५ वें, १६ वर्ष में ही कर्तव्य है । उसका विवाह संस्कार एवं दान उसकी शुद्ध अवस्थामें हो जाय – यही ऋतुकालसे पूर्व कन्या विवाहका तात्पर्य 280- २८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
है, क्योंकि विवाहमें कन्या- दान कर्तव्य होता है और दान शुद्ध वस्तुका ही होता है । ऋतुकालके पूर्वका समय कुमारावस्था ही कन्यादानका उचित काल है । लड़कीको ऋतुमती पति के घर ही होना चाहिये । ऋतुस्नान के समय उसे पुरुष अपेक्षित होता है । जैसे कि - ' जायेव पत्य उशती सुवासाः ' ( ऋ ० १०/७१ | ४,१११२४।७ )
' मलवद्वासाः ' ( मलिन वस्त्रवाली ) के ' प्रतिद्वन्द्वी ' ' सुवासाः ' पदद्वारा ऋतुस्नानको बताकर ऋतुस्नाताकी ' पत्ये उशती ' इन पदों- द्वारा पतिविषयक कामना बताई गई है ।
' महाभाष्य ' पस्पशाह्निकके उद्योतमें श्रीनागेशभट्टने इस मन्त्रके अर्थ में लिखा है - ' जाया सुवासाः - निर्णिक्तवासा नीरजस्का ऋतुकालेषु विवृत्तसर्वाङ्गावयवा भूत्वा उशती - कामयमाना भर्त्रे प्रेम्णा दर्शयति आत्मानम् । तदा हि अतितमां स्त्री पुरुषं प्रार्थयते ' । ( ' सुवासा - धुले हुए वस्त्रवाली पत्नी रज निवृत्त होनेपर ऋतुकालमें शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको निरावृत करके प्रेमपूर्वक पतिकी कामना करती हुई अपने आपको उसके सामने प्रस्तुत कर देती है; क्योंकि उस समय स्त्रीको पुरुषकी अत्यधिक अभिलाषा होती है । )
इसी प्रकारके मन्त्रपर श्रीसायणने लिखा है- ' पत्ये उशती- कामयमाना सुवासाः— पूर्वं रजोदर्शनसमये मलिनवस्त्रा सती स्नाना- नन्तरं शोभनवस्त्राभरणादिना शोभमाना विशेषेण पतिभोगाय कांक्षन्ती तेन सह संक्रीडते । '
पतिकी प्रथम ऋतुकालमें उपस्थिति तभी हो सकती है जब 281ऋतुप्राकट्यसे कुछ पूर्व विवाह सम्पन्न हो जाय । ऋतु पुष्प कहलाता है; उसका प्रादुर्भाव करके प्रकृति इ ंगित करती है कि अब पुत्ररूप फल प्राप्त होना चाहिये । तभी ' कृष्णयजुर्वेद ' की ‘ तैत्तिरीयसंहिता’में आया है - ' स ( इन्द्रः ) खीषं सादमुपासीदृद् अस्यै ब्रह्महत्यायै तृतीयं प्रतिगृह्णीतेति । ता अब्रुवन् – ' वरं वृणामहै, ऋत्वियात् प्रजां विन्दामहै, काममाविज नितोः सम्भवाम । १ ( २।५।१५ )
( ' वे इन्द्र स्त्रियोंके पास गये और बोले ' तुम इस ब्रह्महत्याका तीसरा भाग ग्रहण कर लो । ' वे बोलीं- ' हम इसके लिए वर लेंगी । ऋतुदर्शनके पश्चात् हम संतान प्राप्त करें । हमें इच्छानुसार काम - भोग प्राप्त हों । ) ऋतुदर्शनके वाद लड़कीमें कामसंचार प्रारम्भ हो जाता है - यह हम सप्रमाण निरूपित कर चुके हैं । तब उसकी मनोवृत्ति चञ्चल हो उठती है । उस समय उनकी मानसिक प्रवृत्तियों का एक केन्द्र हो जाय; जिससे वे एकमें स्थिर हो जाएं; इससे ऋतुकालसे कुछ पूर्व ही उसका विवाह कर देनेकी आज्ञा है, तभी उसका चित्त स्थिर रहता है । बहुत देरके बाद पति मिलनेपर उसकी मानसिक पृष्ठभूमि प्रायः मलिन हो चुकती है । उसपर कई चित्र बन और बिगड़ चुकते हैं । उसी दशा में यदि वह अपने मार्गसे च्युत हो गई; तो उसका सारे जन्ममें सुधार होना असम्भव हो जाता है, और उस समय वह नवीन शाखा होने से पति के अनुकूल मोड़ी जा सकती है । बड़ी आयु में वह पक्की शाखा हो जानेसे टूट सकती है, पर अपनी ओर मोड़ी नहीं जा सकती; अतः ऋतुदर्शनसे पूर्व ही कन्याका विवाह 282लाभप्रद है ।
फलतः विवाह ऋतुप्राकट्यसे कुछ पूर्व तथा ऋतुदान ऋतु- स्नानके पश्चात् करना चाहिये, पर गुणवान् वरके अन्वेषणमें यदि कन्या ऋतुमती भी हो जाय तो मनुजी दोष नहीं मानते । जैसे कि — ‘ काममामरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यतु मत्यपि । न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् । ( ६८६ ) ( कन्या ऋतुमती हो जानेपर भी भले ही घरमें आजीवन कुमारी रह जाय; परन्तु उसे कभी गुणहीन ( अयोग्य ) वरके साथ नहीं व्याहना चाहिये । ) पर गुणवान् वरकी प्राप्ति में ऋतुकालसे पूर्व ही उसका विवाह उचित है ।
चार परिक्रमा - उसी कन्याके अन्तिम अधिपति अग्निंकी साक्षीमें कन्या लेकर फिर वरको हवनद्वारा अग्निकी पूजा करनी पड़ती है, फिर दोनोंको अग्निकी प्रदक्षिणा करनी पड़ती है । पहली तीन परिक्रमाओं में स्त्री आगे होती है, पहले बैठनेके समय भी स्त्री पुरुषके दाहिने होती है - इसका रहस्य यह है कि उस समयतक पुरुषका उसपर पूरा आधिपत्य नहीं होता । इसी अवसर में कन्या अपने कन्यात्वको समाप्त करनेकेलिए पतिकी सहायतासे लाजाहोम करती है । चतुर्थ परिक्रमा में कन्या अवशिष्ट लाजोंका होम करके अपने कन्यात्वको समाप्त कर देती है, तब वह पतिकी भार्या - पोष्या हो जाती है, अतः चौथी परिक्रमा में वह पतिके पीछे चलती है ।
चार परिक्रमाओं में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - चतुर्वर्ग भी 283तात्पर्यके विषय हो सकते हैं । सो पहलेके तीन वर्गोंमें स्त्री पुरुषसे आगे ही रहती है । धर्मके कार्य में भी स्त्री पुरुषसे आगे ही रहती है— बढ़ी रहती है । अर्थ - धनके कार्य में भी । तभी श्रीमनुजीने स्त्रीकेलिए कहा है— ' अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ' ( १।११ ) ( स्त्रीको धनके संग्रह और व्ययके कार्य में नियुक्त करे । )
पति यदि संगृहीत धन स्त्रीके हाथमें दे, तो वह उसका उपयुक्त बैंक सिद्ध हो सकती है । इससे आपत्तिकालमें पुरुषको अर्थकष्टका मुख नहीं देखना पड़ता । काममें तो स्त्री अगुआ होती ही है । चतुर्थ परिक्रमा मोक्षकी होती है । मोक्षमें स्त्री मार्ग - प्रदर्शन नहीं कर सकती; अत; चतुर्थ परिक्रमा में स्त्रीको आगे न रखकर पुरुषको ही आगे रक्खा जाता है ।
चौथी परिक्रमाके वाद वाएँ ओर बैठाना - स्त्रीका वाम ओर बैठाना प्राचीनकाल से चालू हुई- हुई प्रथा है । उसमें कारण है कि स्त्री कोमलाङ्गी होती है; उसे दृढाङ्ग पुरुषकी रक्षाकी अपेक्षा होती है । इसी भावके द्योतक होते हैं पति - पत्नी शब्द । पति रक्षक है, पातीति पतिः । पत्नी रक्षणीय है । जैसा कि वेद कहता है- ‘ ममेयमस्तु पोष्या ' ( अ ० १४ । १ । ५२ ) । शरीरके अन्दर कोमलतम एवं प्रेमका आधार अङ्ग हृदय होता है । उसे परमात्माने बाईं ओर रखा है; अतएव जब स्त्री पूर्ण पत्नी नहीं बनी तब वह भार्या ( भर्तव्या ) भी नहीं थी । इसलिए प्रेमका आधार और हमारा अभिन्न हृदय भी नहीं थी, और उसके परिवर्तनकी भी आशंका थी; अतः उसे पहले दाहिनी ओर बैठाया गया । जब उसमें पुरुषका
284श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
अधिकार हो गया तो चौथी परिक्रमा में उसे वरने जो उससे आगे चल रही थी अपने पीछे किया; फिर चौथी परिक्रमाके बाद वा सप्तपदी हो चुकने पर अपने हृदयकी भांति उसे बाईं ओर बैठा दिया जाता है | वह पत्नी भी हृदयकी भांति कोमल है, अतः प्रेम का आधार भी बन गई । कहीं कन्यादानादिके अवसर पर सुविधा केलिए कन्यादाताका अपनी पत्नीको दाहिने बैठाना अपवाद है । उत्सर्ग यही है कि उसे बाएँ ओर बैठाया जाय । अतएव स्त्रीका नाम ‘ वामाङ्गी ' प्रसिद्ध है ।
लाजाहोम का रहस्य
शमीसे मिश्रित लाजाओंका अग्निमें हवन करनेसे जो परमाणु सूक्ष्म होकर निकलते है, वे विवाहित वर - वधू के लिए लाभप्रद होते हैं । वधूके तथा वरके भीतरी दोषोंको दूर करनेवाले होते हैं । उसीमें कन्या ' आयुष्मानस्तु मे पतिः, एधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा ' यह आकांक्षा करती है । वधू अपने भ्रातासे वे लाजा लेती है, पति अपने सहारेसे उसे डलवाता है; उसका यह तात्पर्य है कि दोनों मिलकर यज्ञकर्म किया करें । मन्त्रपाठ वर करता है; कभी कोई स्त्रीका मन्त्र - विशेष या जावे तो उसके प्रातिनिध्य से भी मन्त्र- पाठ कर लेता है । क्योंकि स्त्री में पूर्ण धातु तथा पूर्ण स्वर न होने से वह स्वर वर्ण आदिके पूर्ण उच्चारण में समर्थ नहीं होती, अतः वरका आश्रय उसे सदा अपेक्षित रहता ही है । अतः उसका स्वतन्त्रतासे यज्ञकर्ममें अधिकार नहीं रहता । ' वसिष्ठस्य पत्नी ' में वसिष्ठकी पत्नीको वसिष्ठकट क यज्ञकी फलभोकूत्री माना जाता है । 285तब यज्ञ पति करता है, फल पत्नीको भी मिल जाता है; तभी तो दोनोंके वस्त्रको ग्रन्थिबद्ध करना होता है, हाथ उसमें स्त्रीका भी होता ही है ।
भाई द्वारा लाजाएँ इसलिए दिलवाई जाती हैं कि यह कन्या अभ्रातृका तो नहीं; कि कहीं इसे ' पुत्रिका - धर्म ' न करना पड़े, अर्थात् इसकी सन्तानका मैं मालिक न बनकर इस लड़कीका पिता ही कहीं मेरी सन्तानका मालिक बने । इसलिए मन्वादि धर्मशास्त्रों तथा वेदादिमें अभ्रातृका कन्याके विवाहका निषेध आया है ।
लाजाहोममें कन्या यह भी सूचित करती है कि- स्वामीजी! आपका वंश शमीकी भांति कैसा ही हरा - भरा क्यों न हो; परन्तु मेरे अनादरसे आपकी दशा खोलोंकी तरह होगी । जैसे खीलोंका अंकुर नहीं होता; वैसे आप भी सन्तानरूप अंकुरको प्राप्त नहीं कर सकेंगे । इससे यह प्रतीत हो रहा है कि - लाजा धान्यरूपा होती है । त्वक् तथा तण्डुलका उसमें पहले संयोग होता है । जब तक तो इनका संयोग है; तब तक दोनोंकी रक्षा है और तण्डुलमें उत्पादक शक्ति भी है । वधू कहती है- मैं त्वक् हूँ, आप तण्डुल
.
हैं । यदि आप त्वरूप मुझसे कवचित रहेंगे; तब आपमें उत्पादनशक्ति भी रहेगी । मुझसे विरहित तण्डुलरूप आप उत्पादनशक्तिसे रहित रहेंगे । अकेले तण्डुलको अग्निमें डाला जाता है, वह अग्निमें जलता है और उसकी लाजा बन जाती है; अतः आप भी मुझसे विरहित होकर विरहाग्निमें जलते रहोगे ।
लाजाहोम करके स्त्री यह भी सूचित करती है कि यह लाजा पहले 286छिलकेसे आवृत थी, इस प्रकार मैं भी पितृगृहमें कन्यात्वसे आवृत थी । जब मैं बढ़ी तो मेरा उस छिलके में समाना कठिन हो गया । फिर अग्निका सम्पर्क पाकर इस धान्यका छिलका जल गया और वह खिल गई; इसी प्रकार अग्निस्वरूप आप ( पति ) का सम्पर्क पाकर मेरा कन्यात्व एवं पितृसम्बन्ध समाप्त हो गया है । उस बन्धन से मुक्त होकर और आपको पाकर मैं भी विकसित हो चुकी हूँ । अब जैसे चावलका रक्षक छिलका न रहा; इस प्रकार मुझ कन्यापर भी पिताका कोई आधिपत्य न रहा । कन्या इससे यह भी सूचित कर रही है कि त्वक्से रहित धान्य - करिणका जिस प्रकार उत्पादनशक्ति से रहित होती है, त्वक् - सहित ही वह अनेक धान्य उत्पन्न करती है; वैसे मैं और आप भिन्न - भिन्न रहकर वन्ध्य ही रहेंगे और त्वक्से रहित उस धानको अग्नि में डाल दिया जाता है, अतः आपका और मेरा आपस में एकीभाव होनेसे ही आपका वंश बढ़ेगा और मैं भी सुरक्षित रहूँगी ।
अश्मारोहण — बधूको जो कि पत्थर पर चढ़ाया जाता है; उससे उसको सङ्केतित किया जाता है कि जैसे पत्थर दृढ होता है, वैसे तुम भी दृढ रहना, परपुरुषपर अनुरक्त न रहना; आपत्ति- कालमें भी विचलित न होकर अपने पातिव्रत्य धर्मकी रक्षा करना ।
साङ्गुष्ठ - हस्तग्रहण –— इसका प्रयोजन यह है कि — ' गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तम् ' इत्यङ्गुष्ठमेव गृह्णीयाद् यदि कामयीत पुमांस एव मे पुत्रा जायेरन् ' ( ११७१३ ) ' अंगुलीरेव स्त्रीकामः ' ( १ | ७ | ४ ) ‘ रोमान्ते हस्तं सांगुष्ठमुभयकामः ' ( ११७१५ ) । आश्वलायन - गृह्यसूत्रके 287इस वचनमें विवाह में पाणिग्रहणके समय बताया गया है कि यदि पुरुष चाहता है कि मेरे लड़के हों, तो वधूके हाथमें केवल अंगुष्ठ को पकड़े । ' अंगुष्ठ ' शब्द पुलिङ्ग है; अतः उससे पुत्रका सम्वन्ध स्पष्ट है । यदि पुरुष चाहता है कि मेरे लड़कियां उत्पन्न हों, तो वह पाणिग्रहण करते समय वधूकी अंगुलियां
पकड़े । ' अंगुलि ' शब्द ' स्त्रीलिङ्ग ' है; अतः उससे कन्योत्पत्तिका
सम्बन्ध स्पष्ट है । फिर लिखा है कि यदि दोनों - पुत्र - पुत्रीकी
उत्पत्ति चाहे; तो अंगुष्ठसहित हस्तांगुलियों को पकड़े; तो दोनोंके
उभयलिङ्ग होनेसे पुत्र - पुत्री दोनोंकी उत्पत्ति स्पष्ट है ।
महाभाष्यकारने श्लोकों की अप्रमारणता पर कहा
है कि ' उन्मत्तगीत '
श्लोक, सूत्र आदि प्रमाण नहीं होते; इसका
भाव यह हुआ
अनुन्मत्त गीत अर्थात् सावधान होकर कहे हुए श्लोक - सूत्रादि प्रमाण होते हैं । यदि विचित्र बात केवल एक व्यक्ति कहे; तो उसके वचनके अप्रामाण्यकी शंका हो सकती है; पर अन्योंकी भी जब उसमें सम्मति वा साक्षी मिल जावे तो ' सौ सयाने एकमत ' यह कहावत चरितार्थ हो जाती है । जैसे कि भगवद्गीता में कहा है- ' व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च वुद्ध- योऽव्यवसायिनाम् ' ( २।४१ ) अर्थात् निश्चयात्मिका बुद्धि एक हुआ करती है और अनिश्चयात्मक बुद्धियां अनेक एवं परस्पर - विप्रतिपन्न हुआ करती है ।
अब इसमें अन्य आचार्योंकी सम्मति भी देखनी चाहिये । हिरण्यकेशीयगृह्यसूत्रमें भी पूर्व जैसी ही बात लिखी है- ' यदि 288२८८. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
कामयेत पु ँ
सो जनयेयम इति, अंगुष्ठं गृह्णीयात् । यदि कामयेत स्त्रीः इति, अंगुलीः । यदि कामयेत उभयं जनयेयम् इति, अभीव लोमानि अंगुष्ठ ँ
सहांगुलिभिगृहीयात् ' ( १६।६।२० ) । इस साक्षी से पूर्वोक्त बात यथार्थ सिद्ध हो गई ।
इस प्रकार आघस्तम्बगृह्यसूत्र में भी कहा है- ' यदि कामयेत स्त्रीरेव जनयेयम् इति अंगुलीरेव गृह्णीयात् ( २।४।१२ ) । यदि कामयेत पु ंस एव जनयेयम् इति अंगुष्ठमेव ' ( २ । ४ । १३ ) । आर्य-
पुरुष - स्थापन और हवन ० समाजियोंकी संस्कार - विधिके १५२ पृष्ठमें भी वधूका अंगूठा पकड़- वाया जाता है, मालूम नहीं कि वे इसमें क्या प्रयोजन मानते हैं?
वैवाहिक होमसे पूर्व वर - कन्याके पीछे एक दृढ पुरुषको ठहराना पड़ता है; उसके साथमें जलका कुम्भ भी होता है उसे चुप होकर अभिषेक तक ठहरना पड़ता है । कुम्भ वा लोटेको वह ऊपर उठाकर ठहरे, ऐसा नियम है । उसमें एक रहस्य यह है कि- होमके घृत, तथा घृताक्त हविके परमाणु ऊपर जाते हैं; उन्हें हाथके कुम्भका जल अपने में आकृष्ट करता है । वे मन्त्र - संस्कृत हविके परमाणु कितने शुद्ध एवं लाभप्रद हो सकते हैं, यह हम आगे यज्ञ - रहस्यमें लिखेंगे । होम समाप्त होने पर उस दृढ- पुरुषसे वह कुम्भ लेकर वर उसमें पड़ी हुई कुशा वा आमके पत्ते से अपने पर तथा अपनी वधू पर ' आपो हि ष्ठा ' आदि मन्त्रोंसे अभिषेक करता है । उससे उसका तथा उसकी वधूका अतिशयित लाभ होता है ।
289हुन त वर - वधूके वस्त्र पर लग जाए. तो उस
दूसरा | लौकिक लाभ वह भी है कि कभी हवनके समय उठा समय जलकी आवश्यकता पड़ेगी ही । ' संदीप्त भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ' उस समय पानी मंगानेकी शीघ्रता में कुछ सूझता नहीं; अतः पहले से उसका प्रबन्ध भी रखना ही चाहिये । इसीलिए दृढ- पुरुषको चुपचाप ठहरना पड़ता है कि उसका ध्यान दूसरी ओर न वँटे, केवल वर - वधूका तथा अग्निका ध्यान रखे । इसी कारण वर - वधूके पीछे उसे ठहराना संगत भी हो जाता है; पर यह ध्यान रहे कि यह अवान्तर प्रयोजन है; मुख्य प्रयोजन तो पूर्व कहा ही जा चुका है ।
ग्रन्थिबन्धन - परिक्रमाके समय ग्रन्थिबन्धनका रहस्य यह है कि हम दोनों पहले अलग - अलग थे; अब हम एक बन्धनमें बद्ध हुए हैं, इसलिए मिलकर सब कार्य करेंगे । वही गांठका कपड़ा इस समय से लेकर वरके घरमें पहुँचने तक दोनों में बँधा होता है; इससे लौकिक लाभ यह भी होता है कि स्त्रीका पतिसे पार्थक्य आशङ्कित नहीं होता । ऐसा न होनेसे एक बार रेलगाड़ीसे उतरती हुई दो बारातों की दो नववधुएँ घूँघट होनेसे बदल गईं, एककी वधू दूसरेके साथ चली गई, क्योंकि इस अवसर पर वधुओंके वस्त्र प्रायः एक-
होते हैं ।
अन्तर - पट विधान
' परं मृत्यो ' इत्यादि मन्त्रसे आहुतिके समयमें जो वर - वधूके मध्य में वा आगे वस्त्रका आवरण दिया जाता है उसका अभिप्राय 290यह है कि वह आहुति मृत्युको दी जाती है । मेरी वधू अकाल में अपनी वा मेरी मृत्युको आगे न देखे । इसी कारण अन्तर - पट दिया जाता है ।
फिर सप्तपदी करके पतिकी प्रिया बनकर -- पतिका हृदय बनकर वह उसके वामाङ्गमें हो जाती है । पुरुषका हृदय उसका प्रिय तथा वाम अङ्गमें हुआ करता है - ऐसा वैज्ञानिक मानते हैं ।
सप्तपदी - सप्तपदी में पति अपनी पत्नीको अपने पीछे सात पग चलवाता है । सतां साप्तपदं सख्यम् ' इस शास्त्रोक्तिसे सात पग इकट्ठा चलनेपर सत्पुरुषोंमें मैत्री मानी जाती है । सप्तपदीमें सात बातें बताई गई हैं । इससे लोक व्यवहारकी तथा दाम्पत्य की पूर्णता होती है । इसमें पहली वस्तु है अन्न । धनके बिना जीवन चल जाता है, पर अन्नके बिना नहीं चलता । पश्चिमी बंगाल में जब अकाल पड़ा था — और बहुत भारी रकम खर्च करके भी अन्न नहीं मिलता था— उसमें जनता की कितनी दुर्दशा हुई थी । वेश्याओं को अपनी लड़कियां देकर उनसे अन्न लिया जाता था । अतः सप्तपदी में पहले ' एकमिषे ' में अन्नके संरक्षणार्थ स्त्रीकी प्राप्ति कही गई । दूसरेमें ऊकू ' ( शारीरिक - बल ) मांगा गया । बलवीर्य सम्पन्न व्यक्ति ही दाम्पत्यका निर्वाह कर सकते हैं । अपने से छोटी आयुकी स्त्री भी बलवर्धक मानी गई है । तीसरे में रायस्पोष ( धन - वस्त्र ) मांगा गया । धन - वस्त्रादिके बिना गृहस्थ जीवन सर्वथा नीरस और उद्वेगप्रद रहता है । अतः इसमें धन - वस्त्र प्रार्थित किया गया । चौथे में मयोभुव ( सुख ) मांगा गया । सुख ही गृहस्थका प्रारण है; यदि
291दैवाहिक रीतिविशेषोंका रहस्य २६-१ उसमें सुख नहीं मिला; तो गृहस्थाश्रम निष्प्राण है - मुर्दा है । पांचवें में पशु ( गाय आदि ) मांगे गये । गृहस्थावस्थामें दूध - घी आदिके लिए गौ आवश्यक है ही । तभी गृहस्थी ठीक चल सकेगी । उसके दही आदि भी बहुत लाभप्रद हैं । उसकी देखरेख भी स्त्री ही ठीक कर सकती है । छठेमें ऋतुओंका सुख मांगा गया । शीतकाल एवं उष्णकालका सुख स्त्रीके द्वारा ही प्राप्त होता है । सातवें में पत्नीका सखित्व, अपना अनुव्रत अनुसरण होना मांगा गया । वही अबसे आवश्यक है; अतः इसे उत्तरपक्षमें रखा गया । इन सातों साधनों से मिला हुआ ही पुरुष पूर्ण - गृहस्थ होता है - यह इससे सूचित किया गया है । पतिके वामाङ्गमें आकर इस प्रकार पत्नी उसकी पोष्या बनी एवं उसकी अधीनता स्वीकार की ।
ध्रुवदर्शन; सूर्यदर्शन आदि - सूर्यका दर्शन वधूको इसलिए कराया जाता है कि वह भी सूर्य से शक्ति प्राप्त करके १०० वर्ष तक जिये, क्योंकि सूर्य स्थावर - जङ्गमका आत्मा है । रात्रिको वा उस समय उसे जो ध्रुवदर्शन कराया जाता है उसमें रहस्य यह है कि उसे ध्रुवकी भांति स्थिरताका संकेत दिया जाता है । अन्य तारे सारी रातभर पूर्व से पश्चिममें जाते हुए दीखते हैं; पश्चिममें जाकर अस्त हो जाते हैं; पर ध व अपने ही स्थान पर उत्तरमें ठहरा रहता है; जरा भी नहीं विचलित होता है । यही बात स्त्रीको समझाई जाती है । तलाक देनेवाली, एक पतिको छोड़कर इतस्ततः गतागत करनेवाली चंचल - स्त्रियोंको इस ध्रुवसे शिक्षा लेनी 292चाहिये कि वे अपने विवाहित उसी पतिमें अविचलित भावसे रहें । जहाज चलानेवाले भी ध्रुवके आश्रयसे ही अपने गन्तव्य वा लक्ष्य स्थलको प्राप्त होते हैं, मार्गभ्रष्ट नहीं होते । वैसे स्त्री भी ध्रुवको देखकर अपने एकपति व्रतको स्वीकार करके मार्ग से भ्रष्ट न होवे, यही स्त्रीको ध्रुवदर्शन करानेका रहस्य है ।
आगे सिन्दूरदान आदिसे स्त्रीका सौभाग्यवती होना बताया गया है । विधवाके माथेमें दुर्भगतावश सिन्दूरकी बिन्दी नहीं होती ।
विवाह - संस्कार ही कन्याका उपनयनस्थानीय संस्कार है । इसमें पति उसका आचार्यस्थानीय होता है । पतिकुल उसका आचार्यकुल होता है, पतिकुलवास एवं पतिसेवा उसका आचार्य- कुलवासके साथ आचार्य सेवन होता है । घरका काम - काज, पति के यज्ञमें सहायता करना, उसमें उसके साथ बैठना — यही उसका अग्निहोत्र होता है । इस प्रकार विवाह ही उसका द्विजत्व- सम्पादक संस्कार है । इसी कारण जैसे आचार्य उपनयन्में शिष्यको सूर्य - दर्शन कराता है, - ' मम व्रते ते हृदयं दधामि ' ( ' मेरा जो व्रत है, उसमें तुम्हारे हृदयको लगाता हूँ । ) - आदि मन्त्र पढ़कर शिष्यका हृदय - स्पर्श करता है, वैसे ही पति पत्नीका उसी मन्त्रसे हृदयालम्भनादि करता है । यह गृह्यसूत्रादिमें स्पष्ट है । हिरण्यकेशी गृह्यसूत्रमें उपनयनमें आचार्य ब्रह्मचारीको- ' या अकृन्तन्... आयुष्मन् इदं परिधत्स्व वासः ' ' जरां गच्छ परिधत्स्व वासः ' ( ' जिन्होंने काता " आयुष्मन्! यह वस्त्र पहन लो । ' ' यह वस्त्र धारण करो एवं वृद्धावस्थातक पहुँचो ।१ ) -
In English
The Secrets of Marriage Rituals
This chapter explains the symbolic meanings behind wedding rites such as offering food, exchanging clothes, and the ritual of giving the bride away. It argues that marriage should occur before a woman's first menstrual cycle to ensure the rituals are performed while she is still a maiden. The text also describes the role of fire as a protector and witness in the union.
This chapter answers
- Meaning of madhuparka in marriage?
- Symbolism of water and fire in wedding rituals?
- Why should marriage happen before menstruation?
- Significance of agni as a husband in kanyadan?
- Purpose of exchanging clothes between bride and groom?
Also written: Vaivahika, Vidhiyonka, Rahasya, Vaivahika Vidhiyonka Rahasya, वैवाहिक विधियोंका रहस्य