सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 301–310
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 301–310
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वैवाहिक रीति- विशेषोंका रहस्य २७३ निष्कर्ष है कि — मैं ऋषिऋण, देवऋण, पितृऋणसे बंध गया हूं । अव इन्हें उतारूंगा । यदि पांच गांठें हों, तो देशॠण तथा जातिऋण भी साथ समझ लेने चाहियें । कई उस कङ्कणमें मरिणस्थानापन्न मोती भी बांधे जाते हैं, उनका भाव है - शरीरसे उनका स्पर्श होता रहे । वे स्पर्शसे विशेष लाभ पहुँचाते हैं । अथर्ववेदसंहितामें मणियोंका • प्रभाव बहुत वर्णित किया गया है । तब परम्परासे लोगोंको पता होता है कि अमुक मोती लाभदायक है; उसे भी कङ्कणके साथ जाता है । देवाह्वान, नवग्रही, तेल आदि: -विवाह में देवताओं की कृपा अपेक्षित होती है, अतः गणपति-पूजा - पूर्वक सब देवताओं का आह्वान तथा पूजा की जाती है । स्त्रियाँ घड़ा भर लाती हैं । कुम्भस्थापन होता है । फिर ग्रहोंसे सम्बन्ध होनेसे नवग्रहोंकी पूजा की जाती है; उन्हें पूड़ी आदिकी बलि दो जाती है - इसमें नौ ब्राह्मणों को जिमाया जाता है । जितने दान दिये जाते हैं; दानका अधिकारी पुरोहित ब्राह्मण माना गया है; अतः देवसम्बन्धी भोजन भी उसे कराया जाता है । मनुस्मृति में देवकार्य में तथा पितृकार्य में ब्राह्मणको ही भोजन कराना लिखा है - ' तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमाः ' ( ३।१२४ ) ' द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीन् एकैकमुभयत्र वा । भोजयेत ' ( ३।१२५ ) पारस्कर-गृह्यसूत्रमें प्रत्येक संस्कारादि - कर्म में ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ' कहकर ब्राह्मणका विधान कहा है । अतः इसमें कोई सन्देहका अवकाश नहीं । १८ स ० ध ०
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२७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) फिर सुगन्धित तैल लड़की लड़के के सिरपर लगाया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि — ब्रह्मचर्यमें उत्तेजक होने से सुगन्धित तैलों के प्रयोगका निषेध था, पर अब ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त होनेसे गृहस्थावस्थामें तो इसका सेवन करना ही चाहिये, जिससे चित्त प्रसन्न हो; और उद्दीपन भी होवे । लड़कीको सौभाग्यवती स्त्रियाँ तेल लगाती हैं, जिससे यह भी सौभाग्यवती रहे । मुकुट, घुड़चढ़ी फिर वरको मुकुट पहिराया जाता है । कारण यह है- उस समय वरको राजा जैसा बनाया जाता है । इसीलिए उसे म्यानमें एक तलवारके स्थानापन्न छुरी रखनी पड़ती है । इसीलिए ही घोड़ी पर चढ़ना पड़ता है । साथके लोग सैनिकों - जैसे होते हैं । घोड़े पर न चढ़कर घोड़ी पर चढ़नेके रहस्य भी कई हैं । एक तो यह कि - घोड़ा बहुत चंचल होता है; घोड़ी अपेक्षाकृत शान्त है । इससे उससे गिरने की आशंका नहीं होती स्वयं जाना जा सकता है रहती । दूसरा भी रहस्य कि उसका काम घोड़ेपर सवार होना नहीं, किन्तु घोड़ीपर सवार होना है और उस घोड़ीको अपने कण्ट्रोल में रखना है । राजा जैसा होने से वाजे - गाजे भी खूब बजते हैं । मार्गमें शमीवृक्षका पूजन करके वर उस छुरीसे शमी के वृक्षके पत्ते उतारता है । उस शमीकी परिक्रमा करता है । यह शमीके पत्र फिर लाजाहोम में काम आते हैं । शमी न हो तो किसी देवमन्दिरमें जाता है; देवको नमस्कार करता है, दक्षिणा चढ़ाता है । पीछेसे बहन वरके वस्त्रोंपर केसर डालती आती है । अन्य सम्बन्धिनियाँ
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वैवाहिक रीतिविशेषोंका रहस्य २७५ माङ्गलिक भजन गाती आती हैं । पुरोहित घीका चौमुखा दीपक थाली में रखकर चलता है । एक तो प्रयोजन पूजाका होता है । दूसरा घोड़ी पर चढ़े हुए इसी कारण ऊँचे हुए - हुए बरको घृतके परमाणु प्राप्त होवें । यदि कुत्सित वायु हो तो उसका ज्ञान हो जाय; इससे घृतका दीपक बुझ जाता है । बाज़ारोंमें वरको घुमाया जाता है— जिससे उसे उधरका मार्ग ज्ञात हो जावे । द्वाराचार, स्वागत, वर- मानक्रिया, गोत्रोच्चार, मुट्ठी खुलवाना आदि कन्यागृहके द्वारपर वरको घोड़ीसे उतारकर उसका तथा उसके पिता आदिका स्वागत - सत्कार होता है । देवपूजा कराई जाती है । वरकी मानक्रिया ( नाप ) होती है । कन्या - पक्षवाले वरके आनेपर उसका मान ( नाप ) उसकी परीक्षार्थ करते हैं । एक दृढ सूत्रको लेकर उसका एक अग्रभाग उसके दक्षिण- स्तन पर रखना पड़ता है । शेष सूत्र ग्रीवासे लाकर वाम - स्तन पर दृढ़ रौंचकर रखना पड़ता है । इससे वक्षःस्थलकी चौड़ाई नापी जाती है । इस प्रकार सिरके पिछले भागसे लेकर माथे तक नापना पड़ता है । यदि वह सूत्र कम हो; तो वरको ब्रह्मचारी समझो कि — उसने ब्रह्मचर्यका अव-लम्वन ठीक - ठीक किया है । यदि वह सूत्र बढ़ जाय; तो वरका ब्रह्मचर्य स्खलित हो चुका है - यह ज्ञान हो जाता है । फिर तीन पीढ़ियोंतक दोनों पक्षोंका गोत्रोच्चार पढ़ना पड़ता है, जिससे तीन पीढ़ियोंके नामका पता लग जावे, जिनका आगे पितृ-कार्य आदि में उपयोग होता है ।
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२७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) फिर वरको अन्दर ले जाते हैं । वरका संरक्षक ( आनर, संभाला ) उसका बहनोई साथ होता है । वह उसका सचिव-स्थानीय वा अङ्गरक्षक - स्थानीय होता है । वह द्वारपर बंधी हुई एक रस्सीको वरकी छुरी लेकर उसे काटता है । कभी - कभी उसमें लोहेकी तार जड़ दी जाती है । उसे भी यथाकथंचित् तोड़ना पड़ता है । तभी अन्दर जानेका अधिकार होता है । फिर द्वारपर कन्या ठहरी हुई होती है । उसके हाथमें गुड़ होता है, और मुट्ठी बंधी हुई होती है । वरको उसे एक हाथ से खोलना पड़ता है । यदि उसे खोल लिया गया; तो वर शक्तिशाली माना जाता है— नहीं तो उसपर उपहास होता है कि —तुम नपुंसक हो, वा निर्बल हो । स्त्री तुमसे ज़बर्दस्त है । फिर भीतर कई रस्में होती हैं यह सब वरकी परीक्षाएं होती हैं, कुछ रस्में उसे कुछ गार्हस्थ्य सम्बन्धी बातें सिखलाने वाली होती हैं । फिर उषाकालमें या विशेष लग्न में विवाहसंस्कार प्रारम्भ होता है । गजदन्त - धारण सबसे पूर्व कन्याके नाना वा मामाकी ओर से लड़कीको सौभाग्य-प्रतिष्ठार्थ गजदन्तकी चार और तीन कुल सात चूड़ियां पहराई जाती हैं । वैद्य लोग स्त्रीसम्बन्धी रोगमें गजदन्तके चूर्ण का प्रयोग करवाते हैं । वन्ध्यात्वदोषके दूरीकरणार्थ गजदन्तको अत्युत्तम माना जाता है । यूनानी हकीम भी गजदन्तके चूर्णको ऋतु - संशोधक और उत्तमलाभप्रद मानते हैं । जो फल उसके खानेमें होता है,
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देवाहिक विधियोंका रहस्य ३७७ वही फल उसका शरीरके साथ निरन्तर स्पर्श में भी होता है 1 । जैसे कि- मरहम, लेप, मालिश, इन्जैक्शन आदिके द्वारा भी विविध ओषधियाँ भीतर प्रविष्ट कराई जाती हैं । भावी वन्ध्यात्व आदि रोगोंकी निवृत्त्यर्थ गजदन्तका खण्ड आरम्भ से ही धारण किया हुआ अधिक फलप्रद होता है । फिर वर और कन्याका पिता ग्रह- देवादिपूजन करता है । उस के बाद वरका पाद्यादिद्वारा पूजन होता है । वैवाहिक - विधियोंका रहस्य पाद्यमधुपर्कादि-विवाह के आरम्भ में पाद्यादि देना तो वरका प्राचीन कालका सत्कार है; मधुपर्क अर्पण करना जहां सत्कार है, वहाँ उसके द्वारा वरको यह भी सूचित किया जाता है कि गृहस्थाश्रममें तुम दधि-मधु - नवनीतका उपयोग किया करो । इसीसे वीर्यप्राप्ति होगी — यही तुम्हारा वाजीकरण है । वस्त्रप्रदानादि फिर वर कन्याको वस्त्र देकर तथा स्वयं वस्त्र पहनकर यह सिद्ध करता है कि मैं तुम्हारे तथा अपने पालनमें समर्थ हूँ —यह देखकर पिता अपनी कन्याको उसे दान कर देता है । पहले कन्यादानका संकल्प कराके, फिर कन्याको वस्त्र देना अयुक्त तथा स्वार्थपूर्ण है । पिता देखेगा कि - यह कन्याका वस्त्रादिद्वारा पोषण कर सकता है । तभी तो वह कन्या दे देनेका संकल्प करेगा । कन्यादानके बाद फिर उनको परस्पर - समीक्षणका अवसर देना भी ठीक ही है ।
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२७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कन्यादान कन्यादानमें वरके हाथपर वधूका हाथ रखकर फिर उसपर शङ्खसे संकल्पकेलिए जल डाला जाता है तथा अग्निको समक्ष रक्खा जाता है । हाथके सम्बन्धद्वारा दोनोंका विद्युत्प्रवाह चलता है और जल विद्युत्का संचालक होता है । इससे पति - पत्नीकी प्रेमधाराका एक - दूसरेमें प्रवेश और प्रेमकी विद्युत् - शक्ति के दृढ होने में बड़ी सहायता मिलती है । किसी वस्तुको दृढ करने के लिए जल और अग्निकी सहायता ली जाती है । मिट्टीका घड़ा तभी दृढ होता है, जब मिट्टीको भिगोकर पहले घड़ेका आकार दिया जाय; फिर कच्चे घड़ेको अग्निमें तपाकर दृढ कर दिया जाय । दो भिन्न, वस्तुओंका सम्वन्ध मिलाना और उस सम्बन्धको दृढ तथा स्थायी वनाना जल और अग्निकी सहायता से उत्तम - रूपसे होता है । इस प्रकार विवाह में पति - पत्नी के सम्बन्धको जलद्वारा स्थिर किया जाता है, उसे दृढ तथा जन्म - जन्मान्तरतक स्थायी बनाने के लिए अग्निका साक्षीरूपसे आश्रय लिया जाता है । 1 अग्निकी साक्षी अग्निकी साक्षीमें कन्याका देना, फिर वर - वधूका अग्नि-परिक्रमा करना इसमें यह रहस्य है कि- कौमार्यमें कन्या के सोम, गन्धर्व, अग्नि- ये तीन क्रमशः पति ( पालक ) होते हैं । एक - एक वर्षं वे अपना आधिपत्य रखकर फिर वादवालेको सौंप देते हैं । कौमार्य में अन्तिम पति अग्निदेव होते हैं । उनको स्थापित करके यह भाव प्रकाशित किया जा रहा है कि वही अग्नि अपनी आश्रित
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वैवाहिक विधियोंका रहस्यं ३७३ कुमारीको मानव - वरको दे रहा है । जैसा कि — ' तृतीयो अग्निष्टे पतिः तुरीयस्ते मनुष्यजा: ' ( ऋ ० १० ८५२४० ) । ( तुम्हारा तीसरा पति ( पालक ) अग्नि - देव है और यह मनुष्यज मैं तुम्हारा चौथा पति हूँ । ) ' रयिं च पुत्रांश्चादाद् श्रग्निर्मह्यमथो इमाम् ' ( ऋ ० सं ० १०।८५ । ४१ ) । ( अग्निदेव इस कन्याको मुझे पत्नीरूपमें प्रदान करते हैं साथ धन और पुत्र भी ) यह मन्त्र बता रहा है । इसीलिए वह पुरुष स्त्रीके रखने ( संन्यास से पूर्व ) तक सस्त्रीक अग्निकी हवि आदि से पूजा करता है । ऋतुकालसे पूर्व विवाह अग्नि कन्याके भीतरके ऋतुधर्मका स्वामी होता है । जबतक आर्तव कन्याके अन्दर है, तबतक उसमें आधिपत्य भी अग्निका होता है । जब आर्तवका सम्बन्ध भीतर से बाहरको होना चाहता है, उस समय उसे वर मिलना चाहिये - यही अग्निदेवका मानव-वरको सौंपनेका रहस्य है । इससे कन्याका विवाह देशकालानुसार ऋतु - दर्शनके कुछ पूर्व कर्तव्य है । जिस उष्ण देशमें कन्याका ऋतु - प्राकट्य ६-१० वर्षकी अवस्था में होता है वहाँ उसका विवाह भी ८ वर्षकी अवस्था में करना चाहिये । जहाँपर ऋतुप्राकट्य १३ वें या १४ वें वर्ष में होता है, वहाँ कन्याका विवाह भी १२-१३ वर्षकी ही अवस्थामें करना चाहिये । जिस शीत - देशमें ऋतु - दर्शन १६-१७ वर्षकी अवस्था में होता है, वहाँ कन्याका विवाह भी १५ वें, १६ वर्ष में ही कर्तव्य है । उसका विवाह संस्कार एवं दान उसकी शुद्ध अवस्थामें हो जाय – यही ऋतुकालसे पूर्व कन्या विवाहका तात्पर्य
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- २८० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है, क्योंकि विवाहमें कन्या- दान कर्तव्य होता है और दान शुद्ध वस्तुका ही होता है । ऋतुकालके पूर्वका समय कुमारावस्था ही कन्यादानका उचित काल है । लड़कीको ऋतुमती पति के घर ही होना चाहिये । ऋतुस्नान के समय उसे पुरुष अपेक्षित होता है । जैसे कि - ' जायेव पत्य उशती सुवासाः ' ( ऋ ० १०/७१ | ४,१११२४।७ ) ' मलवद्वासाः ' ( मलिन वस्त्रवाली ) के ' प्रतिद्वन्द्वी ' ' सुवासाः ' पदद्वारा ऋतुस्नानको बताकर ऋतुस्नाताकी ' पत्ये उशती ' इन पदों-द्वारा पतिविषयक कामना बताई गई है । ' महाभाष्य ' पस्पशाह्निकके उद्योतमें श्रीनागेशभट्टने इस मन्त्रके अर्थ में लिखा है - ' जाया सुवासाः - निर्णिक्तवासा नीरजस्का ऋतुकालेषु विवृत्तसर्वाङ्गावयवा भूत्वा उशती - कामयमाना भर्त्रे प्रेम्णा दर्शयति आत्मानम् । तदा हि अतितमां स्त्री पुरुषं प्रार्थयते ' । ( ' सुवासा - धुले हुए वस्त्रवाली पत्नी रज निवृत्त होनेपर ऋतुकालमें शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको निरावृत करके प्रेमपूर्वक पतिकी कामना करती हुई अपने आपको उसके सामने प्रस्तुत कर देती है; क्योंकि उस समय स्त्रीको पुरुषकी अत्यधिक अभिलाषा होती है । ) इसी प्रकारके मन्त्रपर श्रीसायणने लिखा है- ' पत्ये उशती-कामयमाना सुवासाः— पूर्वं रजोदर्शनसमये मलिनवस्त्रा सती स्नाना-नन्तरं शोभनवस्त्राभरणादिना शोभमाना विशेषेण पतिभोगाय कांक्षन्ती तेन सह संक्रीडते । ' पतिकी प्रथम ऋतुकालमें उपस्थिति तभी हो सकती है जब
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वैवाहिक विधियोंका रहस्य २८१ ऋतुप्राकट्यसे कुछ पूर्व विवाह सम्पन्न हो जाय । ऋतु पुष्प कहलाता है; उसका प्रादुर्भाव करके प्रकृति इ ंगित करती है कि अब पुत्ररूप फल प्राप्त होना चाहिये । तभी ' कृष्णयजुर्वेद ' की ‘ तैत्तिरीयसंहिता’में आया है - ' स ( इन्द्रः ) खीषं सादमुपासीदृद् अस्यै ब्रह्महत्यायै तृतीयं प्रतिगृह्णीतेति । ता अब्रुवन् – ' वरं वृणामहै, ऋत्वियात् प्रजां विन्दामहै, काममाविज नितोः सम्भवाम । १ ( २।५।१५ ) ( ' वे इन्द्र स्त्रियोंके पास गये और बोले ' तुम इस ब्रह्महत्याका तीसरा भाग ग्रहण कर लो । ' वे बोलीं- ' हम इसके लिए वर लेंगी । ऋतुदर्शनके पश्चात् हम संतान प्राप्त करें । हमें इच्छानुसार काम - भोग प्राप्त हों । ) ऋतुदर्शनके वाद लड़कीमें कामसंचार प्रारम्भ हो जाता है - यह हम सप्रमाण निरूपित कर चुके हैं । तब उसकी मनोवृत्ति चञ्चल हो उठती है । उस समय उनकी मानसिक प्रवृत्तियों का एक केन्द्र हो जाय; जिससे वे एकमें स्थिर हो जाएं; इससे ऋतुकालसे कुछ पूर्व ही उसका विवाह कर देनेकी आज्ञा है, तभी उसका चित्त स्थिर रहता है । बहुत देरके बाद पति मिलनेपर उसकी मानसिक पृष्ठभूमि प्रायः मलिन हो चुकती है । उसपर कई चित्र बन और बिगड़ चुकते हैं । उसी दशा में यदि वह अपने मार्गसे च्युत हो गई; तो उसका सारे जन्ममें सुधार होना असम्भव हो जाता है, और उस समय वह नवीन शाखा होने से पति के अनुकूल मोड़ी जा सकती है । बड़ी आयु में वह पक्की शाखा हो जानेसे टूट सकती है, पर अपनी ओर मोड़ी नहीं जा सकती; अतः ऋतुदर्शनसे पूर्व ही कन्याका विवाह
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२८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) लाभप्रद है । फलतः विवाह ऋतुप्राकट्यसे कुछ पूर्व तथा ऋतुदान ऋतु-स्नानके पश्चात् करना चाहिये, पर गुणवान् वरके अन्वेषणमें यदि कन्या ऋतुमती भी हो जाय तो मनुजी दोष नहीं मानते । जैसे कि — ‘ काममामरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यतु मत्यपि । न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् । ( ६८६ ) ( कन्या ऋतुमती हो जानेपर भी भले ही घरमें आजीवन कुमारी रह जाय; परन्तु उसे कभी गुणहीन ( अयोग्य ) वरके साथ नहीं व्याहना चाहिये । ) पर गुणवान् वरकी प्राप्ति में ऋतुकालसे पूर्व ही उसका विवाह उचित है । चार परिक्रमा - उसी कन्याके अन्तिम अधिपति अग्निंकी साक्षीमें कन्या लेकर फिर वरको हवनद्वारा अग्निकी पूजा करनी पड़ती है, फिर दोनोंको अग्निकी प्रदक्षिणा करनी पड़ती है । पहली तीन परिक्रमाओं में स्त्री आगे होती है, पहले बैठनेके समय भी स्त्री पुरुषके दाहिने होती है - इसका रहस्य यह है कि उस समयतक पुरुषका उसपर पूरा आधिपत्य नहीं होता । इसी अवसर में कन्या अपने कन्यात्वको समाप्त करनेकेलिए पतिकी सहायतासे लाजाहोम करती है । चतुर्थ परिक्रमा में कन्या अवशिष्ट लाजोंका होम करके अपने कन्यात्वको समाप्त कर देती है, तब वह पतिकी भार्या - पोष्या हो जाती है, अतः चौथी परिक्रमा में वह पतिके पीछे चलती है । चार परिक्रमाओं में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - चतुर्वर्ग भी