सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 851–860

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 851–860

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= न 1 न ी के - } a II I गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय २३ विश्वास से आक्रान्त नहीं रखोगे; तो तुम्हारा व्यवहार नहीं चल सकता । विश्वासकी उपासना सव कार्योंकी आदिमें आवश्यक है । यदि विश्वास न किया जायगा, केवल तर्क ही रखा जायगा, तो तर्क यह कहेगा कि ' क ' की आकृति यह क्यों है? ऐसी आकृति ' ख ' की क्यों नहीं? इस तर्कका फल क्या होगा? यही कि अक्षर-ज्ञान ही न होगा । व्यापारीका यदि अन्य व्यापारीपर विश्वास न होगा; तो हुण्डी चलना ही असम्भव हो जायगा । अतः यहाँ यह सिद्ध हो रहा है कि ' तर्क ' भी विश्वासके अंकुशके बिना ' कुतर्क ' हो जाता है, और विश्वास भी ' तर्क ' के बिना ' अन्धविश्वास ' हो जाता है । अतः तर्कको श्रद्धा - विश्वाससे आक्रान्त करके रखने से तर्क हानिप्रद नहीं होता । चूहे में बल भी बहुत होता है । वही पुरुषोंसे सारा घर भी छुड़वा सकता है । दक्षिण दिशा से दो निरंकुश चूहे प्रकट हुए । एकने प्लेग शुरू कराई, दूसरेने एक सम्प्रदाय ( आर्यसमाज ) खड़ा कराया । वेदोंके परम्परागत अर्थ भी बदलवा दिये । तर्कवादका इस युग में प्राबल्य भी कर दिया । जनताके करोड़ों रुपये इधर-उधर करवा दिये । इसी चूहेने मुसलमान जातिमें ' ताजिये ' शुरू कराकर उनसे उनकी छातियाँ पिटवाई । ऐसे प्रबल - चूहेको गण-पतिने अपना वाहन बना लिया । गणनायकको भी स्वयं श्रद्धा - विश्वासरूप होकर, दूसरोंका श्रद्धास्पद तथा विश्वास - भाजन बनकर, तर्करूप- चूहेपर सवारी करनी पड़ती है, तर्कका सहारा लेना पड़ता है । तभी वह विघ्न-

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.६२४ श्री सनातनधर्म लोक ( ५ ) हरण बनता है । तभी उसे विजय प्राप्त होती है । २ ' ब्रह्मणस्पति ' – गणनायकको ' ब्रह्मणस्पति ' भी होना चाहिये । ब्रह्मधर्म, वेदधर्म, ब्राह्मरण - धर्मका पति - संरक्षक बनना पड़ता है । तभी वह गणोंका ' गणपति ' बनता है । ' गणपति ' ' गजानन ' भी वेद - संरक्षण से ही होता है । वेद चार होते हैं, ऋग्, यजुः, सामन्, अथर्वन् । इन्हीं चारोंका अन्तिम अक्षर लेकर ' गजानन ' नाम रखा जाता है । ३ ' कवि ' – गणनायकको ' कवि ' - क्रान्तदर्शी भी होना चाहिये । कवियोंका कवि होनेपर ही महाभारत ( महा - भा ( शोभा ) रत ) ग्रन्थ - लेखक बनता है । क्रान्तदर्शी ही अपने पीछे जनताको कठ-पुतलीकी तरह चला सकता है । इसलिए इसे ऋ ० सं ० ( १०।११२।६ ) में ' विप्रतम ' ( मेधावी ) कहा गया है । ४ ‘ ज्येष्ठराज ’ – गणनायकको ' ज्येष्ठराज ' भी बनना चाहिये, ज्येष्ठों - श्रेष्ठों में राजित- शोभित होनेवाला । यदि वह साधारण-पुरुषों में ही शोभित होनेवाला हो, तो उसका गणपतित्व भी कैसे हो सकता है? ५ ‘ बृहस्पति ’ —– गणनायकको ' बृहस्पति ' भी बनना आवश्यक है । ' बृहती ' वाक्को कहते हैं, वाणीका पति, गीर्पति अर्थात् व्याख्यान - वाचस्पति । यदि गणनायकका वाकूपर अधिकार नहीं, वक्तृत्व पर आधिपत्य नहीं, तब वह गणनायक कैसे बन सकता है? बृहस्पति — अर्थात् प्रभावशाली वक्तृतावाला ही गणनायक बन सकता है, वह जनताको अपनी ओर खींच सकता है ।

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गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय २५: ६ ' तत्पुरुष ' – गणनायकको ' तत्पुरुष ' प्रसिद्ध - पुरुष होना चाहिये । यदि वह देश - विदेशमें प्रसिद्ध पुरुष नहीं, तो फिर गणनायक होनेके योग्य भी नहीं हो सकता । ७ ‘ कराटः —— गणनायकको ' कराट ' भी बनना पड़ता है । ' करम् - शुण्डाम् आटयति - भ्रमयति इंति कराटः । अपनी सूँडको घुमानेवाला, आपत्ति - समय में शत्रु- सम्मर्द होनेपर कर — शुण्डा-दण्ड घुमानेपर शत्रुओंको शीघ्र तितर - बितर किया जा सकता है । अथवा ' कर ' ' टैक्सका नाम भी होता है; उसे अटन करानेवाला अर्थात् जनताके उपयोग में लगानेवाला । इससे वह भली - भांति गण - नेतृत्वके योग्य सिद्ध होता है । ८ ' प्रियपति ' - गणनायकको प्रियों में ' प्रियपति ' बनना चाहिये । प्रिय - पति बनने पर वह गणका नायक, उस गणका विश्वस्त नहीं हो सकता । ६ ' निधिपति ' – गणनायकको ' निधिपति ' बनना तो आवश्यक है । जो ' निधिपति ' नहीं, वह ' गणपति ' भी नहीं । वह गणनायक . कैसा? निधिके बिना भला उसका कार्य कैसे चल सकता है?. निधिके बिना उसका गण कैसे बन सकता है? इसलिए इसे ऋ ० सं ० ( १०।११२।९ ) में ' मघवा ' भी कहते हैं । १० ' वसु ' अथवा ' वरद ' - गणनायकको ' वसु ' सर्वनिवास भी होना चाहिये, गण उसके पास निवास कर सके; तभी वह नेता बन सकेगा । ‘ वरद ' वर देनेवाला भी होना चाहिये । गणको उत्साहित करने केलिए समय - समय पर वरदान दे, उपाधि - प्रदान—

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८२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) पदवी - प्रदान, मनोरथ - प्रदान करे । ऐसे नायकको गण लिपटे रहते हैं, उसकेलिए अपने देहको होम देते हैं । ११ ' चतुर्भुज ' – गणनायकको ' चतुर्भुज ' होना चाहिये । ' चतुर्भु'ज ' से उसका सपत्नीकत्व इष्ट है । उसकी पत्नी हो । अथवा उसके अपने चार हाथ होने चाहियें, अंकुश ( नियन्त्रण- कन्ट्रोल ) होना चाहिए । दूसरे रखे, कमलकी मनोहरता रखे । ' पद्मपत्रमिवाम्भसा ' जलमें रहता हुआ भी उससे अछूता रहे, उससे ऊपर भुजामें रणभेरीके प्रतिनिधि स्वरूप शङ्ख धारण करे उसे बजावे, जिसका घोष ' धार्तराष्ट्राणां हृदयानि चरितार्थ करनेवाला बने । चतुर्थ- हस्त में मोदकधारी समय पर गणमें मधुर - प्रसाद बांटे, स्वयं भी खावे । भी गणनेत्री एक मुजा में हाथमें कमल इस न्याय से रहे । तीसरी । समय पर व्यदारयत्'को रहे । समय-१२ विघ्नेश्वर अथवा स्वस्तिक । गणनायक ' विघ्नेश्वर ' भी हो, विघ्नोंके अधीन होजानेवाला न हो, विघ्न उसके अधीन रहने वाले हों । जब वह चाहे विघ्नोंको भगा दे, जब चाहे - विघ्नोंको शत्रु - समाजमें भेज सके । ' परमाणु- चम ' का आविष्कारक उससे शत्रुनाश भी कर सकता है; उसे अच्छे कामों में भी प्रयुक्त कर सकता है । यही विघ्न लाभप्रद भी हो सकते हैं - यदि उनका प्रयोग अपने अधिकारियोंके कुकृत्योंमें किया जाय । कुकृत्यों में विघ्न उपस्थित कर देने से वे कुकृत्योंसे विरत हो जाते हैं । गण-नायकको ' स्वस्तिक ' स्वस्तिकारक भी होना चाहिये । यदि वह स्वस्तिक — चारों ओर स्वस्ति - कल्याण करनेवाला नहीं; तो वह

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वसन्त पंचमी ८२७ गणनायकता में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । इन ऊपरके नामोंके होनेपर ही ऋद्धि और सिद्धि गणपति पर चँवर डुलाती हैं । यह गणपति – गणेश – गणनायकके वैदिक एवं पौराणिक और लौकिक - स्वरूपका राजनीतिक परिचय है । यह इसके तीन प्रकारके वारह नाम कहे हैं । इन्हींसे गणपतित्वकी पूर्णता होती है । इन सब बारह नामोंका फल इस प्रकार कहा है- ' द्वादशैतानि नामानि यः पठेत् शृणुयादपि । विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ' । इस प्रकार सभी व्यक्ति, सभी कार्योंकी आदिमें दिव्य गणपति तथा लौकिक गरण-नायकका आह्वान करते हैं, उसीकी सबसे पूर्व अर्चना - वन्दना करते हैं । ' गणनायकता ' के इच्छुक भक्तोंको इन तीन प्रकारके बारह नामोंकी सर्वदा ही उपासना करनी चाहिये । उसी गणेशजीकी यह ' गणेशचतुर्थी ' है । ( २१ ) वसंत - पञ्चमी । ' ऋतूनां कुसुमाकरः ' ( १०।३५ ) भगवद्गीताके इस पद्यमें भगवान्ने वसन्त ऋतुको अपनी विभूति कहा है । इसीसे वसन्त का महत्त्व सिद्ध होता है । इसमें शीतका वह भयानक आक्रमण, जिसमें हिमपात, तुषारपात दिसे पौधे म्लान हो जाते हैं, वृद्ध लोग कालके गाल में जा समाते हैं; समाप्त हो जाते हैं । खेत लह-लहा उठते हैं, सरसोंके फूलोंकी वह पीतच्छटा आंखोंका आसेचन कर रही होती है । इस ऋतुसे सभी प्रसन्न होते हैं । शीतकाल में कुहरे दिसे सूर्य नहीं दीख पाता था; रात्रिको चन्द्रमा भी मलिन

पृष्ठ 856

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५२८ श्रीसनातनधर्मालीक ( १ ) सा दीखता था; यह सब अब ठीक हो जाता है । यह कामदेवकी ऋतु मानी जाती है । यद्यपि वसन्त ऋतु तो चैत्र वैशाखमें ही होती है; तो माघ-मासमें शुक्लपक्षको पञ्चमीमें वसन्त कैसे - यह प्रश्न उठता है । इसपर उत्तर यह है कि — जैसे किसी राजाके आगमनसे पूर्व ही प्रजाकी ओर से तत्सम्बन्धी तैयारियां होने लगती हैं, अथवा जैसे— ' पूर्वरङ्गः प्रसङ्गाय नाटकीयस्य वस्तुनः ' किसी नाटक होनेसे पूर्व उसकी रिहर्सल होने लगती है, वैसे ही ऋतुराज वसन्तके आनेकी सूचना भी प्रकृति इसी तिथि से ही विशेषरूपसे देने लगती है । इसकी प्रजा पवन, भ्रमर, कोकिलादि ४० दिन पहले ही सुसज्जित होने लगते हैं । पतझरके पीले पत्तोंको गिराकर नवीन हरे - भरे किसलयको धारण करती हुई, मनोमोहक आम्रमञ्जरीसे सुवासित, मन्द मलयानिलस्नात, मधुमाधवी - प्रकृतिका जो रमणीय दृश्य इस ऋतुमें देखनेको मिलता है, वैसा अन्य किसी ऋतुमें नहीं । कहीं सरस - सरसोंकी पीली - मञ्जरी दिखाई दे रही होती है; तो कहीं आम्रविटपपर बैठी कोलिल जीवन - सङ्गीत सुना रही होती है; और कहीं स्वच्छ - सरोवरोंमें सरोजोंपर गुजारते हुए भ्रमर नव - जीवन सन्देश सुना रहे होते हैं । कितना सुन्दर समय होता है यह? इसमें वृक्ष पुष्पोंसे लदे होते हैं; अतः सुगन्धित - पवनका प्रवाह होता है । सर्वत्र नव - उल्लास एवं स्फूर्ति तथा कार्यका उत्साह होता है । शीत - भीति जो कार्य नहीं करने देती थी, इसमें वह आलस्य नहीं रहता । इसमें सर्वत्र सौन्दर्य ही सौन्दर्य दीखता है ।

पृष्ठ 857

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वसन्त पञ्चमी ८२६ अांखें बाग - बगीचोंके मनोरम दृश्यको देखना चाहती हैं; पांव विहारार्थ चलना चाहते हैं । उत्तरायणका समय पुण्यप्रद माना जाता है । उसमें भी मकर-संक्रमण अन्य भी विशिष्ट होता है । फिर माघमास भी पुण्यप्रद मास माना है; इसमें प्रातः स्नानका विशेष महत्त्व माना जाता है । उसमें भी शुक्लपक्ष शुभ माना गया है, उसमें भी पञ्चमी तिथि जिसे ज्योतिःशास्त्रमें ' पूर्णा ' तिथि कहा गया है । प्रत्येक शुभकार्य पूर्णा- तिथि में करने से विशिष्ट - फलदायक होते हैं । यह कामकी तिथि मानी गई है 1 । मनकी कामनायें इसमें पूर्ण होती हैं । इसे ' श्रीपञ्चमी ' भी कहते हैं, श्री, शोभा तथा लक्ष्मी दोनोंका नाम होता है । शोभा इसमें प्रत्यक्ष होती है, लक्ष्मीकी ऋतु तो यह होती है, शीतकाल में भयानक शीतसे व्यापारमें जो शिथिलता आ जाती थी, इस दिनसे नवीन स्फूर्तिका सवार होकर उसमें नया कार्य प्रारम्भ हो जाता है । ' व्यापारे वसति लक्ष्मीः ' यह प्रसिद्ध है ही । इस दिन सरस्वती - पूजन भी किया जाता है । जनता इस ऋतुका ही रूप सिरपर रखती है अर्थात वसन्ती रंगके साफे पहनती है । इसकी प्रसन्नता में कई खेल, कई उत्सव मनाये जाते हैं । इसी दिन वीर हकीकतरायने हिन्दुधर्मकी रक्षा के लिए आत्म-बलिदान दिया था ।

पृष्ठ 858

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८३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( २२ ) शिवरात्रिकी शास्त्रीय महत्ता । फाल्गुन - कृष्ण चतुर्दशी ही शिवरात्रिका दिन माना जाता है । इसमें उन्होंने आसुरी शक्तियोंको नष्ट किया था । समस्त संसार सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंमें विभक्त है । देवता लोग भी इससे नहीं छूट पाये । भगवद्गीता में भी कहा है- ' न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्त ' यदेभिः स्यात् त्रिभिर्गु णैः, ( १८।४० ) । उसमें ब्रह्मा रजोगुण, विष्णु सत्त्व-गुण और रुद्र तमोगुणका अवलम्बन करते हैं । चतुर्दशी - तिथिके स्वामी भी भगवान् शिव हैं । शिव ' तम ' तत्त्वके अधिनायक हैं । एवं ' तम ' रात्रि में होता है; अतः शिवरात्रिको भी सायंकाल - व्यापिनी माना जाता है । इसे कालरात्रि भी कहा जाता है । शिव वैदिक - देव हैं । शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी . यह पांच - देवता उपासना में प्रसिद्ध हैं । इसमें शिवको महादेव कहा जाता है । यह आशुतोष कहे जाते हैं । आराधना से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं । इन्होंने हालाहल - पान करके देवताओंको भी अभयदान दिया धा । यह इतने अहिंसक हैं कि सांप भी इनके भूषण बने हुए हैं । संहारके देवता यही हैं । इनकी मूर्त्ति शिव-लिङ्ग कही जाती है । ब्रह्माण्ड इनका लिङ्ग है - ज्ञापक है । " उसका ब्रह्मा तथा विष्णु भी पार नहीं पा सके । यही बात बतलाने के लिए शिवपुराण में शिवलिङ्गकी कथा लिखी है - जिसे न समझकर प्रतिपक्षी लोग उपहास करके अपना अज्ञान प्रकाशित करते हैं । सो शिवलिङ्ग शिवकी अण्डाकार मूर्ति होती है । ' भग '

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शिवरात्रिकी शास्त्रीय महत्ता ८३१ प्रकृतिका नाम होता है । ठीक देखा जावे; तो यह ॐकारकी मूर्त्ति स्पष्ट दीख पड़ती है । प्रतिपक्षियोंके अनुसार शिवलिङ्गको शिवका लिङ्ग तथा जलहरीको पार्वतीका ‘ भग ' भी माना जावे; और उसे पूजनीय मानने में शङ्का की जावे; तो उसपर यह जानना चाहिये कि महादेव जगत् के जनक ( पिता ) माने जाते हैं; और पार्वती जननी ( माता ) । जननीका जननीत्व वस्तुतः किस अङ्गमें होता है? जनक ( पिता ) का जनकत्व किसमें है? वे दो यही अङ्ग हैं, पर अपवित्रता होने से लोकमें इन अङ्गोंकी पूजा अव्यवहार्य होती है; अतः नहीं की जाती; पर जगत्के जनक - जननी पार्वती - परमेश्वर पवित्र देवता होने से इनके यह दोनों अङ्ग भी पवित्र हैं; अतः उनकी पूजा में भी कोई न तो दोष है, न उपहसनीयता । यह लिङ्ग - योनि अङ्ग कहां नहीं हैं; सर्वत्र हैं । मनुष्यके इन अङ्गोंमें लज्जा मानी जाती है, अन्यत्र नहीं । इस प्रकार देवताओंके भी अङ्गों में कुछ उपहस-नीयता वा लज्जाकी बात नहीं, क्योंकि वह मनुष्य नहीं, इस विषय पर हमारा निबन्ध भिन्न- पुष्प में प्रकाशित होगा । शिवपुराण में विष्णुकी निन्दा, और विष्णुपुराण में यदि शिवकी निन्दा पाई जाती हैं, तो यह अपने - अपने देवताकी अनन्य-भक्त्यर्थ है । ' नहिं निन्दा निन्द्य निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' | किसी वस्तुकी निन्दा उसके निन्दनार्थ नहीं होती; किन्तु अन्यके स्तुत्यर्थ होती है, ऐसा समझनेसे शास्त्रीय निन्दा - स्तुतिका तात्पर्य ज्ञात होता है, नहीं तो परस्पर विरोध ही विरोध दीखता है ।

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८३२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शिवपूजा बहुत प्राचीन ( वैदिक ) कालसे चली आ रही है । आये दिन भूगर्भकी खुदाइयां हुआ करती हैं । मुहंजोदड़ों तथा हडप्पा में जो खनन हुआ था; उसकी मिली वस्तुओं के लिए भी अनुसन्धाताओंका विश्वास था कि यह वस्तुएँ वैदिक सभ्यता से भी प्राचीन हैं । उस खननमें शिवलिङ्गको मूर्तियां प्रायः मिलीं थी । अतः शिव प्राचीन-देव हैं, वैदिक देव हैं, और आर्योंके देव हैं । उन्हीं शिवका इस दिन व्रत किया जाता है । रात्रिमें जागरण कर रुद्राष्टाध्यायीका पाठ किया जाता है । ( २३ ) शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक । - शिवभक्त बालक दयाराम के सामने १८६४ वा ६५ संवत्की शिवरात्रिमें शिव - प्रतिमापर चढ़नेवाले एक चूहेने अपनी बल-बत्ताका खूब परिचय दिया । एक तो उसने धार्मिक - संसार में उथल-पुथल कर देनेवाला, वेदमन्त्रोंका अपनी इच्छानुसार अर्थ करने-वाला एक सम्प्रदाय खड़ा करा दिया; दूसरा उसने शिवरात्रि - पर्वको छामर करवा दिया । अब इस शिवरात्रिके अवकाश होते हैं । शिवका कीर्तन होता है -कहीं अनुयोगिविधया, तो कहीं प्रतियोगि-विधया । शिवलिङ्गकी पूजा अत्यन्त प्राचीनकाल से [ कई लोगों के अनुसार तो वैदिककाल से भी पहले वे लोग मुहखोदाड़ोकी खुदाई की वस्तुओंको तो वैदिककालसे भी प्राचीन मानते हैं ] चली आती थी; यह हडप्पा और मुहअदड़ेके खनन से सिद्ध हो चुका है । कदाचित् श्रीदेवेन्द्रनाथ - मुखोपाध्यायने स्वा ० दयानन्दके बाल्यकालका नाम ' दयाराम ' बताया है ।.