सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 521–530
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 521–530
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श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान I करके, इसमें मृतकोंकी सद्गतिका विचार करके उनकी अस्थियां डाली जाने लगीं । इससे उनसे पूर्व भी गङ्गाके यह गुण थे, और हमारे पूर्वजोंको ज्ञात थे । इसी उपयोगिताके कारण ऋषि-. मुनियों, एवं प्राच्य प्रन्थकारोंका इसकी अतिशयित स्तुति करना उचित ही है । शरद - ऋतुके दिनोंमें गंगाजल और भी निर्मल एवं विशुद्ध हो जाता है; क्योंकि दिनमें सूर्यकी प्रभासे यह तप्त रहता है और-रात्रि में चाँदनी से शीतल; और इस ऋतुका भी इसपर विशेष प्रभाव पड़ता है । ऐसे ही जलको लोग अमृतके समान मानते हैं, और यही कारण है कि कार्तिक में गंगास्नानका विशेष माहात्म्य माना गया है । पहाड़ोंसे होकर वहनेके कारण चुम्बकीय पदार्थों का इसपर प्रभाव पड़नेसे गंगाजल क्षय, संग्रहणी यादि असाध्य रोगोंको दूर कर सकता है । यदि गंगाजल में ऐसी रोगनिवारिणी दिव्य शक्ति न होती; तो कौन इस जलको महत्तापूर्ण मानता १ इसी कारण शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य और ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' सात्त्विकता और बुद्धि - शुद्धि भी करने के कारण इसे यदि स्वर्गदाता कहा गया है; सद् - गतिकारक कहा गया है; तो इसमें आश्चर्यका क्या अवकाश सूर्य - संशोधित आकाशगंगासे भी इसका सम्बंन्ध सम्भव है; क्योंकि वृष्टि करने वाला सूर्य होता है । हिमालय बहुत ऊँचा पर्वत है, ऊँचे पर्वत पर वृष्टि बहुत होती है; सम्भव है कि— वह आकाशगंगा वाली वृष्टि होती हो; और वही हिमालय से गंगा
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४३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) रूप में आती हो । फिर यह गंगा पाताल में भी जाती हो । महादेवके सिरसे गंगा के तीन छींटे करके आकाश, पृथिवी, पातालकी तीन गंगा बनना जो पुराणों में वर्णित है - वह इसी रहस्यको संकेतित करता है । अस्तु । इतने ऋषि - मुनि, वैद्य, डाक्टर, वैज्ञानिक, देशी - विदेशी, विद्वान् जो कि गंगाजलकी लेखोंद्वारा, पुस्तकोंद्वारा, भाषणोंद्वारा अति-शयित स्तुति कर चुके तथा करते हैं - वह इसकी विशेषताको व्यक्त कर रहा है । धार्मिक दृष्टिमें तो गंगा पापहारिणी, पवित्र, पारलौकिक फल देने वाली है ही । इसी केलिए प्रसिद्ध है - ' गाङ्ग ' वारि ' मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ' ' शरीरे जर्जरीभूते व्याधिग्रस्ते कलेवरे । औषधं जाह्नवी - तोयं वैद्यो नारायणो हरिः । ' यदि गंगाजल में कोई विशेषता न होती, तो लोग प्रयास करके अपने धन और समयको व्यर्थ न करते । ‘ नह्यमूला जनश्रुतिः ' यह कहावत प्रसिद्ध है । गुरण ही पूजाके स्थान होते हैं । तव यदि सनातनधर्मी - हिन्दु गंगाको पूजते हैं, उसे पवित्र मानते हैं; तो उन पर उपहास करना अपना अज्ञान प्रकाशित करना है ( ४३ ) पीपल वृक्ष की पूजाका विज्ञान । देवमन्दिरों में पीपलका वृक्ष भी देखा जाता है; उसकी जल-प्रदानद्वारा पूजा भी की जाती है । अर्वाचीन लोग उस पर पोप-लीलाका कटाक्ष करते हैं । वे कहते हैं कि यह जड़पूजा है । पर यह ठीक नहीं; वृक्ष जीवित हैं - जड़ नहीं; इस विषय पर अग्रिम
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पीपल की पूजाका - विज्ञान निबन्ध द्रष्टव्य है । हमारे धर्मशास्त्रों में पीपलकी महिमा बहुत दिलाई गई है । भगवान् श्रीकृष्ण ‘ प्रश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् ' ( १०/२६ ) यह कह कर उसे अपनी विभूति मान गये हैं । हमारी नारियाँ भी पीपलपर जल चढ़ाती हैं । यह पोपलीला नहीं । यहाँ भी वैज्ञानिक- रहस्यपूर्णता है । पीपल स्त्रियोंके गर्भके आधान में सहायता देता है । पाश्चात्य शिक्षादीक्षित भारतीय भले ही विश्वास न करें, पर हमारे धर्मकृत्य विज्ञान -पूर्ण हैं । पीपलकी छाया भी स्वास्थ्य वर्धक है । शास्त्रों में स्त्रियोंकेलिए पीपलकी सेवा, उसकी परिक्रमा, उस पर जल चढ़ाना, उसके नीचे बैठकर धार्मिक वातोंकी चर्चा यह प्रतारणमात्र नहीं है, किन्तु वैज्ञानिक है । पीपल में सन्तानोत्पादनकी बड़ी शक्ति है । वैशाख-ज्येष्ठ मासमें जब इस पर फल लगता है, तब गोरैया पक्षी ( चिड़ियां ) उस फल को खाते हैं । उन फलोंमें रासायनिक शक्ति होती है । इसलिए आयुर्वेद में उसका चूर्ण पौष्टिक माना गया है । पीपलको जटामें वन्ध्यात्वनाशक विशेष गुण होता है । पीपल-वृक्षके पात्रमें प्रतिदिन दूध पीनेसे गन्धकके पात्रकी भांति बिना ही टानिक दवाई पिये पुष्टि होती है । पीपलसे मिले हुए घरमें रहना निषिद्ध है, क्योंकि चूल्हा जलाने से उस वृक्ष की शाखाएँ तप जाती हैं; उससे एक प्रकारका विषाक्त वायु निकलता है, जिससे सैंकड़ों मनुष्योंको हानि होती है । इसलिए हिन्दुधर्म में पीपलको जल देना धर्ममें रखा गया है
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४६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कि वह सदा शीतल रहे । निरन्तर पीपल की पूजा करने से पुत्रोत्पत्ति होती है - यह हिन्दु - महिलाओंका विश्वास है । इसमें सत्यता है, असत्यता नहीं । आयुर्वेदिक दृष्टि द्वारा वेदमन्त्रोंको देखने पर प्रतीत होता है कि पीपलमें वन्ध्यात्व हटाने तथा पुत्रोत्पादनकी दिव्य - शक्ति है । पीपलके फल सेवन करने से वन्ध्याको भी पुत्र होता है । पीपलकी लकड़ी से बने पात्रमें दूध पीने वाली स्त्रीको सन्तान मिलती है । तभी इसे पुत्रदाता कहते हैं । अथर्ववेदसंहिता के ' अश्वत्थो देवसदनः ' ( ५ | ४ | १ ) इस मन्त्र में अश्वत्थ ( पीपल ) को देवमन्दिर कहा गया है; अतः उसकी पूजासे देवपूजा भी सिद्ध हुई । इस प्रकार यजुर्वेदसंहिता में ' अश्वत्थे वो निपदनं पर्णे वो वसतिष्कृता ' ( १२ | ७ ९ ) पीपल और पर्ण ( पलाश ) वृक्ष में सब ओषधियोंकी स्थिति बताने से यह वृक्ष अत्यन्त गुणकारी सिद्ध हुआ । पीपलसे उत्पन्न लाखके सेवन करनेसे टूटी हुई अस्थिका सन्धान होता है । अश्वत्थका उपयोग वमनके लिए भी गुणकारी है । उर - क्षत रोगमें भी यह लाभ पहुँचाता है । पीपलमें जितनी जीवनी शक्ति है; उतनी अन्य वृक्षों में नहीं । इसमें यही उदाहरण पर्याप्त है कि इसके रोपणकी आवश्यकता नहीं पड़ती । उसमें जलकी भी आवश्यकता नहीं पड़ती, न मिट्टी की । प्रत्युत पत्थर और लकड़ी तक में भी यह पैदा हो जाता है । इसीसे इसकी जीवनी शक्तिका अनुमान कर लेना चाहिये । एतदादि विशिष्ट शक्तियों के कारण ही श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीतामें पीपलको भगवान्का स्वरूप कहा है ।
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वृक्षों की चेतनता १३७ ( ४४ ) वृक्षोंकी चेतनता । पुरुषका ज्ञान कितना अधूरा है, फिर भी अपने पूर्वज ऋषि-मुनियोंसे बनाये शास्त्रोंपर वह अविश्वास करता है, और उनके खण्डनार्थ अनर्गल चेष्टा करता रहता है - वह विचार कर हमें 4 अपने समाजपर बहुत हँसी आती है । हम सैंकड़ों वस्तुओं का प्रयोग करते हैं, दिन - रात उनके साथ रहते हैं; परन्तु हमें उनके जीवन के अस्तित्व के विषय में ज्ञान न स्वयं होता हैं, और न प्राचीन अपने. पूर्वजोंसे की हुई गवेषणा को ही हम स्वीकृत करते हैं । शतशः: चञ्चल युवक - युवतियाँ किसी विकसित पुष्पको देखकर उसके तोड़नेका उद्योग करते हैं । वह उन्हें सुन्दर दीखता है । उसे वे अपने पास रखना चाहते हैं; किन्तु वे नहीं जानते कि - वह पुष्प भी अपनी माँका एकमात्र अपत्य है । उसके वियोगसे उस लताको भी वैसा दुःख होगा जैसा आपकी माताको आपके वियोग में । हां, उन्हें विकसित करनेके सहायक देवताको उसे उपहृत किया जा · सकता है; उसका प्रसाद हम भी ले सकते हैं । सनातनधर्मियों द्वारा की जाती हुई वृक्षोंकी पूजा देखकर यूरोप के विचारोंके दास कई भारतीय उनपर हँसते थे कि - ऐं! यह जड़ - पूजक हैं? क्योंकि — यूरोप भी पहले वृक्षोंको जीवित नहीं मानता था । आज भी अधिक समय नहीं बीता कि - यूरोपनिवासी विचारते रहते थे कि — वृक्षों में भी सुख - दुःखके अनुभवकी शक्ति है या नहीं? हम प्रतिदिन देखते हैं, सुनते हैं कि -सूर्यके उदयमें कमल विकसित होता है, और सूर्यास्त होनेपर बन्द होता ३२ स ० ध ०
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४85 श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है । कुमुद चन्द्रमाके उदयमें खिलता है; अस्त होनेपर मुद्रित होता है । सूर्यमुखी - फूल सूर्य के सामने रहता है । अधिक गर्मी में शीतल-देशके वृक्ष म्लान हो जाते हैं, बहुत सर्दी में उष्णदेशके वनस्पति जड़ हो जाते हैं । प्रायः नीमका वृक्ष रोता हुआ दीखता है । लाजवन्ती वूटी अंगुलि लगाने से ही सकुचती हुई देखी गई है । शिरीषका सोना महाभाष्यकारने ( ३ । १ । ७ ) सूत्रके भाष्य में लिखा है । फिर भी लोगोंको विश्वास नहीं होता था कि वृक्ष चेतन हैं । बल्कि आर्यसमाजके श्रीकृपाराम शर्मा ( स्वा ० दर्शनानन्द ) वृक्षोंको अचेतन ही सिद्ध किया करते थे । एक आर्यसमाजीने हमें एक अपनी कविता सुनाई थी जिसका आशय यह था कि ' जब इतना अज्ञान और पाप - पाखण्ड फैला था किं - लोग जड़ वृक्षों पर भी खोया- रबड़ी आदि चढ़ाया करते थे, तब स्वा ० दयानन्दजीका जन्म हुआ; उन्होंने यह अज्ञान हटवा दिया । ' हमने कहा कि - ' वृक्ष तो चेतन माने जाते हैं; उन पर तो कुछ ग्रास आदि चढ़ाया जाया करे - यह ठीक ही है पर स्वा ० दयानन्दजी तो जड़ ऊखल - मूसलको भी भोग लगवा गये; उस पर ग्रास रखवाते थे, और ' वनस्पतिभ्यो नमः ' कहकर उन्हें वृक्षोंका प्रतिनिधि मानते थे, पटेले पर भी घी, दूध, शक्कर चढ़वाते थे कि यह पटेला हमें अन्न देने वाला है । तब वे वृक्षोंकी पूजा तो स्वयं प्रचलित करवा गये; तो उन्होंने भी क्या वही अज्ञान फैलाया? यह सुनकर वह नव - कवि चुप्पी लगा गया । शास्त्रों में वृक्षों की चेतनताका शतशः - स्थानों में स्पष्ट वर्णन आया
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वृक्षोंकी चेतनता ४88. है । जैसे कि – महाभारत शान्तिपर्व में - ' जीवं पश्यामि वृक्षाणाम-चैतन्यं न विद्यते ' ( १८४ | १७ ) यहाँ वृक्षोंकी चेतनता स्पष्ट कही गई है । तव विशेष वृक्षोंकी पूजा जड़पूजा कहाँ हुई? मनुस्मृतिमें तो इससे भी स्पष्ट कहा है- ' तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना । अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुख - दुःखसमन्विताः ' ( १ | ४६ ) ' शरीरजै: कर्म-दोषैर्याति स्थावरतां नरः ' ( मनु ० १२२६ ) इन दो पद्योंमें वृक्षों की योनि पूर्वजन्मके कर्मोंके कारण मानी गई है, और इन्हें जीवित, एवं सुख - दुःखका अनुभव करने वाला माना गया है । इस विषय में मनुस्मृतिके अन्य पद्य भी हैं । देखिये- ' स्थावराः. कृमिकीटाश्च ' ' जघन्या तामसी गतिः ' ( १२।४२ ) ' तृणगुल्मलतानां च शतशो गुरुतल्पगः [ योनिं प्राप्नोति ] ( १२।५८ ) ' स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात् ' ( ११।२४० ) यहाँ सर्वत्र स्थावरोंको भी एक योनि माना गया है । एक प्रश्न यह है कि - यह तामस योनि बताई गई है; इनकी पूजा कैसी? इस पर यह जानना चाहिए कि- मनुस्मृतिके १२।४२ पद्यके अनुसार सर्प भी तामस - योनि माने गये हैं; फिर भी उनकी वेदमें ' ये वाऽवटेषु शेरते, तेभ्यः सर्पेभ्यो-नमः ' ( यजुः १३।७ ) इस मन्त्रमें पूजा बताई गई है । नागपञ्चमी तो प्रसिद्ध है ही । ' रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ' ( १२।४४ ) यहाँ मनुजीके कथनानुसार राक्षस - पिशाच आदियोंको तामस माना गया है । फिर भी उनकी पूजा आयुर्वेद में सुश्रुतसंहिताके उत्तरतन्त्र ६० अध्यायमें कही गई है । अस्तु । यह भिन्न विषय है । अब प्रकरण पर आइये । सांख्यदर्शन विज्ञानभिक्षुके भाष्य में
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कहा है - न वाह्यज्ञानं यन्त्रास्ति, तदेव शरीरम् इति नियमः, किन्तु वृक्षादीनाम् अन्तःसंज्ञानामपि भोक्तृभोगायतनत्वं शरीरं मन्तव्यम् । यतः पूर्ववद् यो भोक्त्राधिष्ठानं विना मनुष्यादि शरीरस्य पूतीभावः, . तद्वदेव वृक्षादिशरीरेष्वपि शुष्कतादिकमित्यर्थः । तथा च श्रुतिः ---' अस्य यदेकाभ्रंशाखां जीवो जहाति, अथ सा शुष्यतिः सर्वं जहाति, सर्वः शुष्यति ' इति छान्दो ० [ ६।११।२ ], ( ५१२२ ) ' स्मृतेश्व'-' शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ' मनु ० ( १२/६ ) इत्यादि -स्मृतेरपि वृक्षादिषु भोक्तृभोगायतनत्वमिति ' ( ५।१२४ ) यहाँ श्री-विज्ञानभिक्षु छान्दोग्यकी श्रुति तथा मनुस्मृतिका वचन देकर समयपर वृक्षादिका सुखना दिखलाकर वृक्षमें भी जीव दिखलाकर उसका भी शरीर माना है । उक्त छान्दोग्य- श्रुतिपर श्रीशङ्कराचार्य-स्वामीने भाष्य किया है- ' वृक्षस्य रस स्रवणशोषणादिलिंगाद् जीवत्वम् । दृष्टान्तं श्रुतेश्च चेतनावन्तः स्थावरा इति ' यहाँ भी वृक्षोंकी चेतनता मानी है ।, श्रीमद्भागवतपुराण में भी यही कहा है- ' वनस्पत्योषधिलताः त्वकूसाराः वीरुधो द्रुमाः । उत्स्रोतसः तमः प्राया अन्तःस्पर्शा विशेषिणः ' ( ३।१०।१६ ) यहाँ ' तमः प्रायाः ' का अर्थ श्रीधरस्वामी किया है - ' अव्यक्त चैतन्याः ' अर्थात् वृक्ष आदिकी चेतनता है तो सही; पर बाहर प्रकट है । इस प्रकार वैशेषिकदर्शनके उपस्कारमें भी कहा है- ' वृक्षादयोपि शरीरभेदा एव; भोगाधिष्ठानत्वात् । न खलु भोगाधिष्ठानत्वमन्तरेण जीवन - मरण - प्रजागरणभेषजप्रयोग-बीजसजातीयानुबन्धानुकूलोपगमप्रतिकूलापगमादयः सम्भवन्ति ।
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२०१ वृद्धि - क्षतभग्नसंरोहणे च भोगोपपादके स्फुटे एव । आगमोष्यस्मिन्-' नर्मदातीरसम्भूताः सरलार्जु नपादपाः । नर्मदातोय - संस्पर्शात् ते यान्ति परमां गतिम् ' इत्यादि । ' श्मशाने जायते वृक्षः कङ्कगृध्रोप-सेवितः ’ ं इत्यादिश्च ( ४ | २ | ५ ) यहाँ पर वृक्षोंका बढ़ना, सूखना, क्षतवृक्षके अंगोंकी पूर्ति, वृक्षोंकी दवाई आदि यह प्रत्यक्ष बात, और विशेष - नदीके जलसे वृक्षोंकी परमगति, तथा अमुक - कर्मसे वृक्ष बनना दिखलाकर वृक्षको चेतन तथा कर्मबन्धनसे युक्त माना गया है । इस प्रकार ‘ वैयाकरण - सिद्धान्तकौमुदी ' में ' भत्तेरहिंसार्थस्य न ' ( १ | ४ | ५२ ) इस वार्तिकके ' भक्षयति बलीवर्दान् सस्यम् ' इस, प्रत्युदा-हरणमें खेतमें बढ़ रहे हुए सस्य ( धान्य ) का खिलाना हिंसा माना है । हिंसा माननेसे उनकी चेतनता स्पष्ट बता दी गई । इससे पक चुके हुए अन्नका खाना अहिंसा सूचित की गई है; उसका चिह्न यह है कि आगे वह नहीं बढ़ते; और सूख जाते हैं । टीकाओं में ' आपोमयः प्राणः ' इससे शस्यमें जलमय प्राण भी दिखलाया गया है । इस पर तत्त्वबोधिनीमें लिखा है- ' क्षेत्रस्थानां यवानां भक्ष्य-मारणानां हिंसा ज्ञेया, तस्यामवस्थायां तेषां चेतनत्वात् ' । यही बात ' बालमनोरमा ' में कही है- ' सस्यस्य तदानीम् अन्तःप्रज्ञत्वात् तद्भक्षणं हिंसैव ' । भाष्यकारने भी अहिंसार्थके प्रत्युदाहरणमें ' भक्षयति, बलीवर्दान् यवान् ' ( १ । ४ । ३ । ५२ ) यह प्रत्युदाहरण दिया है । इस पर कैयटने स्पष्ट किया है- ' क्षेत्रस्थानाम् अंकुराद्यवस्थायां यवानां. भक्षणाद् हिंसा भवति । तदवस्थायां कैश्चित् चैतन्याभ्युपगमात् ’
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श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) ५०२ यहाँपर कैश्चित् ' ' शब्द चिन्तनीय है, अर्थात् खेतके अंकुर रूपमें ठहरे हुओं को कई चेतन मानते हैं । फिर कैयटने दूसरोंके खेत खिलाने से भी हिंसा दिखाई है; पर भाष्यकारको ऐसा इष्ट नहीं, अन्यथा वे ' परकीयान् ' यह शब्द देते । इसीलिए श्रीनागेश भट्टने लिखा है – ' अत्र श्राद्यमेव युक्तं, भाष्यस्वरसादित्याहु: ' अर्थात् भाष्यकार खेतकी अवस्था वाले जीवोंको सर्वथा चेतन मानते हैं । ३७ कारिकाकी न्यायसिद्धान्तमुक्तावली में भी वृत्तोंका शरीर मानकर उन्हें चेतन माना है, वहाँ आध्यात्मिक प्राणवायुका भग्नक्षत-संरोहणके अनुमानसे अस्तित्व माना है । अस्तु । इस प्रकार हमारे आचार्योंने अनेक वैज्ञानिक ग्रन्थियाँ पूर्वसे ही सुलझा रखी हैं, किन्तु परप्रत्ययनेय - बुद्धि लोग हमारे शास्त्रोंको पोप - पाखण्डियोंसे वने हुए मानकर उनका अपमान करते हैं । यह समयकी गति है । गाँवोंमें आज भी प्राचीन स्त्रियाँ कच्चे फलोंका काटना और उन्हें भूनना हिंसा मानती हैं । रातके समय वृक्षका पत्ता तोड़ने में भी वे पापकी शंका करती हैं । इन बातों में कितना तथ्य है - यह बात विज्ञानाचार्य श्रीजगदीशचन्द्र बोसने विज्ञान द्वारा प्रत्यक्ष भी सिद्ध कर दी है । जगदीशचन्द्र वसु - महोदय कैम्ब्रिज युनिवर्सिटीमें चार वर्ष पढ़कर विज्ञानकी सर्वोच्च परीक्षा पास करके भारत वापिस आये । इन्होंने बहुतसे वैज्ञानिक लेख लिखे, जिनका रायलसोसायटी - द्वारा खूब सम्मान हुआ । इंगलैण्डके वैज्ञानिक - संसार पर भी उसका प्रभाव पड़ा ।. बहुत परिश्रमके बाद इन्होंने एक यन्त्र बनाया,