सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 461–470

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४३३ = प्रकारके क्षेत्र में, अमुक - नक्षत्र में, अमुक मन्त्रोंसे बोई जाती थीं; उन्हें अमुकप्रकारके जलसे सींचा जाता था; और उनमें अमुक खाद दिये जाते थे । अमुक मुहूर्त में उन्हें तोड़ा जाता था, म अमुक मन्त्रोंसे संस्कार करके उन्हें यज्ञके योग्य बनाया जाता था । जिन गौओंका घृत उपयोगमें लेना होता था, उन्हें अमुक प्रकारकी ते घास, अमुक - अन्न, अमुकप्रकारका जल दिया जाता था; उनका चं दूध अमुक - प्रकारके पात्रमें दुहकर, अमुक - लकड़ीकी रईसे विलो -+ -भी कि र, त लिए क कर घृत निकाला जाता था । उसी प्रकार समिधाएँ, चरु, आज्य आदिको संस्कारित किया जाता था कि - अमुक कामनामें कौनसी समिधा हो, कैसी सामग्री हो १? यज्ञके आचार्य आदिको तथा यजमानको अमुक - प्रकारके रहन - सहन, एवं नियमोंका पालन करना होता था । इस प्रकार संस्कार होने से उन सबमें सूक्ष्म - चेतना उत्पन्न होती थी, और उस चेतनामय वातावरणको यज्ञ - द्वारा उद्दीप्त करके आकाशको अभीष्ट तत्त्वों से परिपूर्ण कर दिया जाता था, जिससे यज्ञकर्ताकी मनः - कामनाएँ पूर्ण हो जाती थीं । इतना सूक्ष्म विश्लेषण किया था हमारे पूर्वजोंने । आधुनिक वैज्ञानिकोंने यह स्वीकार कर लिया है कि — स्थूलसे सूक्ष्म और व्यक्तसे अव्यक्त बलवान् होता है । हमारे वैज्ञानिक-मूर्धन्य मुनियोंने तत्तन्मनोरथोपयुक्त स्थूल यज्ञ - सामग्रीको सूक्ष्म करनेवाली अग्निको ही जा ढूंढा था; जिससे कार्य शीघ्र सिद्ध हो जावे । उनका कहना था कि - सूर्यकी किरणें, अग्नि और विशेष शब्द ( मन्त्र ) यह पृथक् - पृथक् तथा समुदायरूप से परमाणुओं २८ स ० ध ०

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४३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) को विभक्त करते हैं । परमाणुओं से विजातीय द्रव्योंको पृथक् करके उन्हें अपने अनुकूल बनानेसें उक्त तीनों पदार्थोंको वे लोग काम में लाते थे, उसका कारण बनता था यज्ञ । यज्ञमें वे इन तीन तत्त्वोंका उपयोग लेते थे । अर्वाचीन जड़ - विज्ञान जिन बांधायको हटाने में सर्वथा असमर्थ है, प्राच्य विज्ञान उन बाधाओंको यज्ञ द्वारा तथा उसके अङ्गभूत जप - पाठ आदि से हटा देता है । वेदों में यज्ञ-विद्या भरी हुई है: कल्पसूत्र उनके विनियोजक हैं; अब चाहियें उसके प्रयोगकर्ता । फलतः जब तक हमें व्यवस्था में रहना है, तब तक हमें अग्नि-चयन करना ही पड़ेगा । अग्नि ही यज्ञका देव एवम् आधार है । जैसा कि - वेद में कहा है- ' यज्ञस्य देवम् ' ( ऋ ० सं ० १११११ ) अग्निका त्याग और व्यवहारका त्याग समान वस्तु है । सम्भवतः इसी व्यवहार - त्यागके कारण संन्यासियोंका अग्नि - परित्याग शास्त्र-कारोंको इष्ट है । वेदोंका विषय यज्ञ है — यह संकेत दिया ही जा चुका है । वेदोंका आविर्भाव यज्ञ करने करानेकेलिए हुआ है । इसलिए वेदके अधिकारकी प्राप्त्यर्थ यज्ञोपवीत धारण करना पड़ता है, वह यज्ञोपवीत यज्ञके वस्त्र ( बर्दी ) होनेसे ही उस नामको धारण करता है । वेद तथा यज्ञ दोनोंमें उपास्य देवता हुआ करते हैं-जो हमसे उच्चयोनिवाले हैं - जिनमें हमारी विविध - कामनाओंको पूर्ण करनेकी क्षमता होती है, जिसका संकेत ऋग्वेदसंहिताका ' न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधिकामा अयंसत ' ( १०।६४।२ )

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यज्ञका वैज्ञानिक - महत्त्व ४३२ ( ' देवताओंसे अन्य कोई सुख प्रदाता नहीं; अतः मेरी कामनाएँ भी देवताओंमें नियन्त्रित - नियमित हैं ) यह मन्त्र दे रहा है । ‘ यज्ञ ' शब्द ‘ यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ् ' ( ३ | ३ | १० ) इस पाणिनि -सूत्र से यज धातुसे नङ् प्रत्यय करनेपर बनता है, और यज धातुका अर्थ ' यज देवपूजा - संगतिकरण - दानेषु इस पाणिनिके धातुपाठके अनुसार देवताओंकी अर्चना तथा देवताओंको दान, और देवताओंका यज्ञमें संगतिकरण होता है । देवता परमात्माके ही अङ्ग होते हैं, जैसेकि - अथर्ववेदसंहितामें कहा है- ' यस्य त्रय-स्त्रिंशद् देवा अंगे गात्रा विभेजिरे ' ( १०/७/२७ ) अङ्गों - बिना अङ्गीकी पूजा नहीं हो सकती । अंशके बिना भला अंशीकी पूजा किस प्रकार हो? इस कारण देवपूजन यज्ञरूप - भगवान्का आराधन ही है, जैसा कि ब्राह्मणभागात्मक वेद में कहा है- ' तद् यद् इदमाहुः-अमु ं यज, अमु ं यज - — इति एकैकं देवम्, एतस्यैव सा विसृष्टिः, एष उ ह्येव सर्वे देवाः ' ( शतपथ ० १४ | ४ | २ | १२ ) अर्थात् देवता परमात्माकी ही विसृष्टि ( विकास ) है, वह परमात्मा सर्वदेवमय है । मनुस्मृतिमें भी आया है - ' आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम् ' ( १२।१११ ) यहाँ श्रीकुल्लूकभट्टने ऐसी ही व्याख्या की है— ' इन्द्राद्याः सर्वदेवताः परमात्मैव, सर्वात्मत्वात् परमात्मनः ' । अब यह प्रश्न है कि — देवपूजनात्मक यज्ञ किस माध्यम द्वारा हो? इसका उत्तर वेदादि शास्त्रों में आया है कि अग्निके बिना । देवता प्रसन्न नहीं होते ( ऋ ० सं ० ७१११।१ ) अग्निमें दिया हुआ यज्ञ देवताओंको पहुँचता है, यह ऋग्वेदशाकल्यसंहिता ( १ | १ | ४,

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४३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ७ । ११ । ५ ) में तथा अथर्ववेदसंहिता ( ५/१२/२ ) में कहा गया है । तब यज्ञका माध्यम भी अग्नि सिद्ध हुआ; क्योंकि अग्निको देवताओंका मुख माना गया है, देखिये इसमें शतपथ ( ३ । ७ । ४ । १० ) । यही बात शाङ्खायनत्राह्मण ( ३।६ ) तथा महाभारत ( १७१७ -१०-११ ) में अग्निके वचनसे सूचित की गई है । तब देवताओंकी हविका भी अग्निमें डालना समूल सिद्ध हुआ । मुखमें डाला हुआ अन्न जैसे श्रङ्गको प्राप्त हो जाता है, वैसे ही देवताओंके मुख- अग्निमें डाला हुआ हव्य भी सब देवोंको प्राप्त हो जाता है । इस बातको हम लौकिक शैलीसे यों कह सकते हैं कि जैसे इस जगत्में प्रत्येक राष्ट्रको सुव्यवस्थित करनेवाली राजशक्ति विविधरूप में हुआ करती है, उससे प्रजापर आई वा आनेवाली आपत्तिको दूर किया जाता है, वैसे सम्पूर्ण भूमण्डलको आवश्यक वृष्टि आदि द्वारा सुव्यवस्थित करनेवाली परमात्माकी विविध शक्तियोंका नाम ही देवता हुआ करता है । उनसे प्रजापर आनेवाली आपत्तिको दूर किया जाता है । जैसे राजशक्तिको अनिवार्य कर ( टैक्स ) ठीक - ठीक न मिलनेपर राजशक्तिका ठीक - ठीक प्रयोग न होनेसे चोरी - डाके आदि घटनाओंसे प्रजा यदा तदा संत्रस्त रहती है, वैसे ही देवशक्तिके समुपबृंहक यज्ञ - याग आदि न होने से ' यज्ञे नष्टे देवनाशः, ततः सर्वं प्रणश्यति ' ( ६०।६ ) इस वायुपुराणके कथनानुसार जल - वायु आदि भूतों पर देवशक्तिके ठीक - ठीक नियन्त्रण न रहने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि, जलप्लावन ( बाढें ) अग्नि-उपद्रव आदि प्रजाको संत्रस्त करनेवाली भीषण ईतियां हुआ

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यज्ञका वैज्ञानिक - महत्त्व ४३७ करती हैं । निरुक्तमें ' यज्ञः कस्मात्? प्रख्यातं यजतिकर्म इति नैरुक्ताः ' ( ३ | १६ | ६ ) यह कहकर यजन- देवपूजन हवनादिका नाम ' यज्ञ ' बताया है । इसमें देवोंका संतर्पण होता है, देवशक्तिकी बलवत्ता हो जाती है; जिससे वे जलशक्ति, वायुशक्ति, अग्निशक्ति आदिको नियन्त्रणमें रखते हैं तथा शुद्ध रखते हैं, जिससे इनके कारण प्रजामें संत्रास नहीं हो पाता । पर आजकल धर्मनिरपेक्षता बढ़ जानेसे उसमें वेदों तथा यज्ञोंका वह महत्त्व नहीं रहा, जिससे हमें आये दिन उक्त दैवी विपत्तियों का सामना करना पड़ रहा होता है; पर यज्ञ - यागादि होनेसे आधिदैविक विपत्तियाँ न आने से जगत् सुखका श्वास ले सकता है । यज्ञसे देवशक्तिके आप्यायनके कारण पृथिवी भी सुरक्षित रहती है; जलशक्ति भी सुव्यवस्थित तथा शुद्ध हो जाती है, अग्नि-शक्ति भी यथायोग्य रहती है, वायुमण्डल भी शुद्ध रहता है । यथायोग्य वृष्टि हो जानेसे सूक्ष्म - वायुमण्डल में, अग्निहोत्रमें हुत . किये हुए और कई सहस्रगुणा हुए - हुए घृतकी सूक्ष्म स्निग्धता आ जानेसे उसके दोष दूर हो जाते हैं । जब इस प्रकार देवशक्ति व्यवस्थित होगई; तो पृथिवीस्थित जल - जो सूर्यसे खींचा गया हुआ गगनमण्डल के समुद्रमें अवस्थित है - देवता लोग उसका यथायोग्य वितरण करते हैं - इससे वृष्टि भी यथायोग्य होती है । तब न अना-वृष्टि होती हैं, न अतिवृष्टि । न सूखा पड़ता है, न बाढें आती हैं; पर शास्त्रोक्त यज्ञविधिमें त्रुटि नहीं आनी चाहिये । यज्ञ मन्त्रोंसे

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४३८ श्रीसनातन धर्मालोक ( ) ५ होते हैं । उसमें कर्म, कर्ता, साधन इन तीनोंकी विगुणता इष्ट-मनोरथकी पूर्ति में प्रतिबन्धक बन जाती है । इष्टि - सम्बन्धी कर्म यथावत् होवे; उसमें दक्षिणा आदिको त्रुटि भी न होवे । कर्ता पवित्र आचरण वाला हो, वेदमन्त्रोंके स्वर वर्ण आदिका यथावत् ज्ञाता हो । शास्त्रनिषिद्ध अधिकारियोंमें न हो । इष्टिका साधन भी त्रुटिंयुक्त न हो, सामग्री पूर्ण हो और पवित्र हो । इससे जहाँ शुद्ध वातावरण बनेगा; वहाँ जलकी वृष्टि तथा मनोरथोंकी दृष्टि भी यथायोग्य होगी । तब इस दैवी - कर्म यज्ञमें लगा हुआ पुरुष ' स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद् दैवे चैवेह कर्मणि । दैवे कर्मणि युक्तो हि बिभर्तीं चराचरम् ' ( ३७५ ) मनुजीके इन शब्दोंसे सारे संसारका पालन कर रहा होता है । यह कथन केवल अर्थवाद नहीं, किन्तु युक्तियुक्त भी सिद्ध है । पहले हम कह चुके हैं कि - यज्ञाग्निमें डाले हुए घृत, श्रोषधि आदि पौष्टिक तथा रोगनाशक पदार्थ नष्ट नहीं होते, किन्तु अग्नि उन्हें भिन्न - भिन्न करके सूक्ष्म बना देती है । वे सूक्ष्म - पदार्थ वायुद्वारा ' आकाशमण्डलमें व्याप्त होकर सब प्राणियोंके नासिका तथा रोम-कूपोंद्वारा पहुँचकर उनके रोगों तथा निर्बलताओं को दूर करके उन्हें स्वस्थ, बलवान् तथा नीरोग बना देते हैं । इसका उदाहरण देखिये- हमारे पास सौ मनुष्य बैठे हैं, हम चाहते हैं कि सभी उठ जाएं । यदि हम उन्हें उठानेके उद्द ेश्यसे एक-एक लालमिर्च खिला दें; तो वे उन्हें खा लेंगे; पर उठेंगे नहीं; पर यदि ' उनकी संख्या से चौथाई से भी कम मिर्चीको बारीक पीसकर उनका

पृष्ठ 467

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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४३६ अग्निमें होम कर दें; तो उसके प्रभावसे प्रभावित होकर वे सभी तो वहां से उठ जावेंगे, अन्य पुरुषोंपर भी उनका प्रभाव पड़ेगा । यह क्यों? यह इसलिए कि — अग्निने अपने गुणोंसे उसको सूक्ष्म कर दिया; और उसकी शक्तिको कई गुना बढ़ा दिया । अग्निद्वारा स्थूल जल सूक्ष्म वाष्प बनकर इतना शक्तिशाली होता है कि हजारों मनुष्योंसे भरी हुई गाड़ीको ६०-७० मील घण्टेकी तीव्र गतिसे खींचकर ले जाता है; किन्तु स्थूल जल इससे कई गुना अधिक भी गाड़ीको अपने स्थान से हिला तक नहीं सकता । एक तोला सुवर्ण में उतना बल और शक्ति देनेकी सामर्थ्य नहीं, जितनी अग्निद्वारा भस्म बने हुए सुवर्णकी एक रत्ती मात्रामें है । बीज जब तक स्थूलावस्था में है; तब तक कोई उपकार नहीं करता । जब उसे भूमिमें बोया जाता है; उसमें जल डाला जाता है; तब भूमिकी अग्नि उसे सूक्ष्म कर देती है, जितना सूक्ष्म होता जाता है, उतनी उसकी वृद्धि होती जाती है । इस प्रकार जब अग्नि अपनेमें डाले हुए छोटेसे पदार्थको सूक्ष्म करके बड़ी शक्तिवाला बना देता है, तब उसमें अभिमन्त्रित करके डाली हुई सेरों वा मनों सामग्री कितने असंख्य प्राणियोंकी • कल्याणकारक होगी । इससे अग्निमें घृत चावल आदिका डालना उनका नष्ट करना नहीं; किन्तु एक बीज बोकर सैकड़ों बीज वाली खेती पा लेना है । तब मनुजीका यह कहना कि - ' दैवे कर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदें चराचरम् ' ( ३।७५ ) कि यज्ञकर्ता सम्पूर्ण जगत्को पालता है - यह ठीक ही है ।

पृष्ठ 468

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४४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) इसी वैज्ञानिक बातको अव शास्त्रीय सरणीसे जाँचना चाहिए । हमारी कामनाओं को पूर्ण करनेमें समर्थ देवताओं को हमने हव्य देना है । कैसे दें? हम हैं स्थूल, पर देवता हैं सूक्ष्म । हम उन्हें स्थूल हव्य देंगे, तो उन्हें कैसे प्राप्त होगा? उन्हें तो सूक्ष्म हव्य चाहिए; तभी वे प्रसन्न होंगे । इसका उपाय सोचा गया था ' यज्ञ ' । . इसका दृष्टान्त भी समझ लेना चाहिए । हमने अपने आत्माको भोजन देना है । हम भी स्थूल हैं, हमसे दिया हुआ भोजन भी : स्थूल है, पर आत्मा हमारा सूक्ष्म है । उसे वह स्थूल भोजन कैसे मिल सकता है? उसे चाहिए सूक्ष्म - भोजन । उसका उपाय यह सोचा गया था कि - हम उस स्थूल - भोजनका मुखके द्वारा दाँतोंसे छोटा करके अपनी प्रदीप्त जठराग्निमें होम करें । ऐसा करनेसे • वह जठराग्नि उस स्थूल - भोजनको सूक्ष्म कर देती है । वही सूक्ष्म अन्न हमारे आत्मा एवं मन आदिको प्राप्त हो जानेसे वह हमारे शरीरको स्वस्थ रखता है । यदि आत्माको वह स्थूल अन्न सूक्ष्म करके न पहुँचाया जायगा; तो हमारा शरीर, मन, इन्द्रियाँ आदि सभी अस्वस्थ हो जाएँगे ॥ फिर हम न अपना कोई लाभ कर सकेंगे, न दूसरोंका उपकार । न कुछ बुद्धि द्वारा दूसरोंका, न अपना कुछ हित सोच सकेंगे । वह स्थूल अन्न सूक्ष्म हो जाने से . हमारे शरीर के अवयव अवयव में व्याप्त हो जाता है । यह हुआ मनुष्यके आत्माके तर्पणका प्रकार । मनुष्यसे ऊँचे हैं पितर । वे पितर भूलोकमें न रहकर पितृलोक - चन्द्रलोकमें रहते हैं । उन्हें भी तृप्त करना हमारे कर्तव्यों में आता है । वे हमसे भी

पृष्ठ 469

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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४४१ सूक्ष्म होते हैं । हम स्थूल उन्हें सूक्ष्म अन्न कैसे पहुँचावें? ऋषि-मुनियोंने उसका उपाय भी सोच लिया था । वह यह था कि-वेद - शास्त्र - विद्वान् ब्राह्मण द्वारा उन्हें कव्य दिया जाय । ब्राह्मणको शास्त्रों में वैश्वानर - अग्निरूप माना गया है । ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( यजुः ३१।११ ) ' मुखादग्निरजायत ' ( ३१।१२ ) ब्राह्मण और अग्नि दोनोंकी उत्पत्ति परमात्मा के मुख से बताई गई है; अतः यहाँ दोनों की सहोदरता सिद्ध है । इसलिए मीमांसादर्शन के १ । ४ । २४ सूत्रके - शावर भाष्य में ' आग्नेयो वै ब्राह्मण: ' पर प्रकाश डालते ' हुए ब्राह्मण तथा अग्निको प्रश्नोत्तररूपसे एकजातीय वताया गया है । ( प्र ० ) अनाग्नेयेषु ( ब्राह्मणेषु ) आग्नेयादिशब्दाः केन प्रकारेण? ( उ ० ) गुणवादेन । ( प्र ० ) को गुणवादः? ( उ ० ) अग्निसम्बन्धः । ( प्र ० ) कथम्? ( उ ० ) एकजातीयत्वात् तयोः ( अग्निब्राह्मणयोः ) । ( प्र ० ) किमेकजातीयकत्वं [ तयोः ]? ' ( उ ० ) ' प्रजापतिरकामयत प्रजाः सृजेयमिति स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत । तमग्निर्देवता अन्वसृज्यत, ब्राह्मणो मनुष्याणाम् ' । यहाँपर अग्नि और ब्राह्मणकी एकजातीयता स्पष्ट शब्दों में कही है । अन्यत्र भी ब्राह्मणका अग्नि - सम्बन्ध यया है- ' ब्राह्मणो ह वा इममग्निं वैश्वानरं बभार ' ( गोपथब्रा ० १ २ ।१० ) । ' अथर्ववेद-संहितामें भी कहा है- ' अग्निर्ब्राह्मणानाविवेश ' ( १६५६/२ ) । कठोपनिषत् में भी यही कहा है- ' वैश्वानरः प्रविशति अतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । ' ( १ । १७ ) यहां श्रीशङ्कराचार्यस्वामीने स्पष्टता की है— ' वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात् प्रविशति अतिथिः सन् ब्राह्मणो गृहान् ' ।

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४४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भविष्यपुराण में भी कहा है- ' ब्राह्मणा ह्यग्निदेवास्तु ' । ( ब्राह्मपर्व १३।३६ ) । इतना अवश्य है कि वह ब्राह्मण वेदशास्त्र आदि का विद्वान् हो; अविद्वान् ब्राह्मणको वैश्वानर अग्नि न कहकर तृणाग्नि-की तरह शीघ्र शान्त होनेवाला एवं भस्मीभूत कहा गया है; उसके मुखमें कव्यका हवन करना योग्य नहीं माना गया है । जैसे कि श्रीमनुजीने कहा है- ' ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति । तस्मै हव्यं ( कव्यमपि ) न दातव्यं नहि भस्मनि हूयते । ' ( ३।१६८ ) ' नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् । भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद् दत्तानि दातृभिः । ( ३६७ ) ' वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणायोप-पादयेत् । ' ( ३ | ६ ) ' विद्यातपः समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु । निस्तारयति दुर्गाच्च महतश्चैव किल्विषात् ' ( ३६८ ) । अस्तु । तब ब्राह्मणस्थ तीव्र वैश्वानर- अग्नि उस कव्यको सूक्ष्म करके, सूक्ष्म महाग्निके साथ मिलकर पितरोंको पहुँचाता है 1 । वे सूक्ष्म कव्यसे. तृप्त हो जाते हैं । मनुष्यकी अपनी जठराग्निद्वारा सूक्ष्मीकृत अन्नसे मनुष्यके आत्माके तृप्त होनेसे मनुष्यका वैयक्तिक लाभ होता है । मनुष्यसे उच्च योनिके पितरोंके, पहली सामान्याग्निसे उच्च ब्राह्मणकी वैश्वा-नराग्निद्वारा सूक्ष्मीकृत अन्नसे तृप्त होनेसे उनके वंशवाले पुत्र पौत्रादि सबका लाभ हुआ करता है । अब मनुष्य और पितरोंसे उच्च हैं देवता । देवता भी सूक्ष्म हुआ करते हैं । उन्हें भी हमें सूक्ष्म हवि देनी है । उन्हें भी सूक्ष्म- हवि कैसे भेजी जावे; वे तो चन्द्रलोकसे भी ऊपरके द्युलोकमें रहते हैं? । उसकेलिए भी