सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 141–150
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 141–150
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शिखाकी वैज्ञानिकता १११ नर ठीक हो सकता है? स्वामी दयानन्दजीने भी कहा है - जो विद्या (? ) का चिन्ह यज्ञोपवीत और शिखाको छोड़कर मुसलमान-वै ईसाइयोंके सदृश बन बैठना व्यर्थ है । ( सत्यार्थप्र ० ११ समु ० पृ ० २४४ ) ष दोप क ( २३ ) कई आक्षेप करते हैं कि मुद्गल नामक ब्राह्मण ने को कार्तिक - माहात्म्यमें ( १५।५५-५६ ) ' इत्युक्तः सोऽपतद् वन्हौ सर्वेषामेव ल पश्यताम् । मुद्गलस्तु तदा क्रोधात् शिखामुत्पाटयत् स्विकाम् । ६, ततस्त्वद्यापि तद्गोत्रे मौद्गला अशिखाभवन् ' अपनी शिखा उखाड़ डाली थी; अतः शिखा रखना - न रखना अपनी इच्छा पर है ' यह का बात ठीक नहीं । रागद्वेषसे किया जानेवाला कार्य प्रमाणभूत नहीं = होता । जब चौल राजा से बहुत यज्ञदान आदि अपने आचार्यत्व में कराने पर भी राजगुरु मुद्गलने उसकी सद्गति - प्राप्ति न देखी, नं और उसके प्रतिद्वन्द्वी विष्णुदास ब्राह्मणकी साधारण कार्तिकव्रत आदिसे भी विमान प्राप्ति देखी; इस खेदसे राजाका यज्ञकुण्डकी ब अग्निमें गिर जाना देखा; तो क्रोधसे अपनी शिखा उखाड़ डाली । वह उसका क्रोधमूलक विरुद्ध आचार था । उस मुद्गलका अनुकरण मुद्गल - गोत्रवालोंको भी उचित नहीं; अन्योंका तो क्या कहना? इतिहासवर्णित सभी व्यवहार आचरणीय नहीं हो जाता । ई क्योंकि - ‘ देश - जाति - कुलधर्माश्च आम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणम् ' ( गौतम-धर्मसूत्र २ २ २ ० ) शिखात्याग किन्हींका कुलधर्म होनेपर भी ती आम्नायसे विरुद्ध ही है, अतः ग्राह्य नहीं । ' श्रियै शिखा ' ( यजु ० से
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११२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वा ० सं ० १६। २ ) इस आम्नाय वचन से शिखाका स्वीकार अनिवार्य है । ‘ मङ्गलार्थं शिखिनोऽन्ये ' ( ४०।७ ) इस ' काठक- गृह्यसूत्र ' के सूत्र पर देवपालने लिखा है- ' निः शिखत्वं तु अमङ्गलधर्मोऽरिष्टहेतुः ' । तथा च पठन्ति - ' अमेध्यमेतत् शिरोऽशिखम् ' ' यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति निन्दावादः, यन्मूलं शिखा कर्मस्मरणम् ' । ' खल्वाटत्वादिदोषेण विशिखश्चेन्नरो भवेत् । कौशीं तदा धारयीत ब्रह्मग्रन्थियुतां शिखाम् ' यह ' नागदेव ' का वचन खल्वाटत्वमें अनुसरणीय है । तब कुशाकी शिखा बनावे । शिखाको काटना पहले समय में तब होता था; जब किसीको मृत्युदण्ड - जैसा दण्ड देना हो । तब उसे स्वयं कटवा डालना अपने आपको मृत्युदण्ड देना है । ( २४ ) कई महोदय उपनयनकाल में ' पारस्करगृह्यसूत्र ' में ' पर्यु प्तशिरसमलङ्कृतमानयन्ति ' इत्यादि वचनों से ' मुण्डो वा ' इस मनु - वचनसे, ' सशिखं वपनं कार्यम् आम्नानाद् ब्रह्मचारिणाम् ' इत्यादि छन्दोगपरिशिष्टके वचनसे चूडाकरणमें लड़केका शिखा-सहित मुण्डन मानते हैं - वह भी ठीक नहीं, क्योंकि गृह्यसूत्रोंमें शिखा छोड़कर ही मुण्डन कहा है, यह हम पूर्व कह ही चुके हैं । इसलिए इस संस्कारका नाम भी ' चूडाकरण ' है, ' चूडायाः - शिखायाः करणम् - स्थापनम् । तब चूड़ाका करण शिखातिरिक्त केश मुण्डनसे ही हो सकता है । ' तं च ( कुमार ) पर्युप्तशिरसम् ' ( २।२२५ ) इस पारस्करके वचनमें ' परितः सर्वतः उप्तम् - मुण्डितम् ' यह देखकर मध्य शिखाका काटना तो ठीक नहीं । ' परिक्रमा ' शब्द में जैसे ' परितः
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शिखाकी वैज्ञानिकता ११३ क्रमणम् ' अर्थमें मध्यवाले देवप्रतिमास्थानको छोड़कर ही चारों ओर परिक्रमा होती है, ' पर्यु'क्षण ' शब्द में जैसे ' परितः उक्षणम् ' अर्थ में यज्ञकुण्डके मध्यवाले प्रदेशको छोड़कर ही चारों ओर जल-सेचन होता है, ' परितः कृष्णं गोपाः ' इसमें भी गोपोंकी स्थिति मध्यस्थित कृष्ण -अधिष्ठित देशको छोड़कर ही सर्वसम्मत है; वैसे ही सिर के मध्यदेश ( शिखा ) को छोड़कर ही मुण्डन ' पर्यु ' प्रशिरसम् ' शब्दसे उपदिष्ट है, सम्पूर्ण नहीं । इसी कारण ' तासां ( गौणशिखानां ) मध्यशिखावर्जमुपनयने वपनं कार्यम् ' यह ' निर्णयसिन्धु ' में कहा है, ' उपनयनकाले मध्यशिखेतरशिखानां वपनं कृत्वा मध्यभाग एव उपनयनोत्तरं शिखा कार्या ' यह ' धर्मसिन्धु ' में कहा है । तब मध्य-शिखाका मुण्डन कहीं भी विहित नहीं । अथवा ' एते लूनशिखास्तत्र दशनैरचिरोद्गतैः । कुशाः काशा विराजन्ते बटवः सामगा इव ' इस ' वीरमित्रोदय ' ( संस्कार - प्रकाश, उपनीत - धर्मप्रकरण ) स्थित ' विष्णु पुराण ' के वचन से कई छन्दोग-शाखावालोंका, अथवा ' मुण्डा भृगवः ' ( ४०।४ ) इस ' काठकगृह्यसूत्र'-के वचनसे भृगुगोत्रियोंका शिखा सहित मुण्डन मान भी लिया जावे; तथापि इनसे भिन्नोंका वैसा व्यवहार कैसे हो सकता है? ऐकदेशिक व्यवहारका सार्वदेशिकता में उपयोग करनेमें कोई प्रमाण नहीं । ( २५ ) कइयों का यह विचार हो कि - ' चूडाकरणमें मुण्डन इसलिए हुआ करता है कि लड़का माताके गर्भसे जिन बालोंको लाया; उनका मुण्डन कर्तव्य ही है; क्योंकि — उन गर्भज केशों में म स ० ६०
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११४ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) शुद्धता तथा हानिप्रद गैस हुआ करती हैं; तब माता के गर्भ से आये हुए बालोंको शिखाकेलिए ही क्यों रखा जावे? इस कारण उनके सारे सिरका ही मुण्डन इष्ट है ' परन्तु यह बात ' चूडाकरण ' से विरुद्ध ही है; सर्वमुण्डनमें ' चूडा - करण ' किस प्रकार हो सकता है? तथापि उनके भी मत में बालकके अपने वालोंके उत्पन्न होने के बाद शिखाका रखना इष्ट होता है; हमारे मत में तो मातृगर्भस्थ शिखाकेश स्वयं ही क्रमसे गिर जाते हैं; क्रमशः नवीन केश उनके स्थानको लेते जाते हैं । अतः शिखाके केशोंका मुण्डन आवश्यक नहीं । शेष केशोंका ही वहां मुण्डाना सफल है । ' मुण्डो वा, जटिलो वा स्याद्, अथवा स्याच्छिखाजट: ( २।२१६ ) यह मनु - वचन उपकुर्वाण सामग ब्रहाचारियोंके लिए है - जैसा कि पूर्व ' विष्णु-पुराण ' ' का संवाद दे चुके हैं, सर्वसाधारणकेलिए नहीं । अथवा ' मुण्ड ' से नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंका बोध होता है; उनका संन्यासियोंकी तरह गेरुआ वस्त्र पहनने आदिका आचार होनेसे मुण्डन भी उनका उन्हीं की तरह शिखा सहित हो जाता है । अस्तु-इस प्रकार शिखाका स्थापन रहस्यमय होनेसे आवश्यक सिद्ध हुआ । परमुखापेक्षी, परानुकरणप्रवण तथा अकर्मण्य लोग ही दूसरों के अवगुणोंको गुण जानते हुए, अपने गुणों को भी अवगुण जानते हैं; क्योंकि – अकर्मण्यतासे उनकी विवेचना - शक्ति नष्ट हो जाती है; तभी वे अपने पूर्वजोंसे नियमित ' श्रियै शिखा ’ ” ( यजुः १६/६२ ) इस वैदिक शोभाको भी अवहेलित करके शिखा-हीनता को ही श्री जनक मानते हैं; परन्तु इस प्रकारके दूसरोंके
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शिखाकी वैज्ञानिकता ११२ अनुकरणमें लगे व्यक्ति अपनी जाति एवम् अपने सम्प्रदाय तथा अपने धर्मके अहित - कारक होनेसे दूरसे ही नमस्करणीय हैं । जो ' हैट ' पहनने से तो सिरमें भार नहीं समझते, परन्तु शिखा ना रखने से सिरमें भार समझते हैं, लार्ड मैकालेके मानसिक दास परानुकरण - प्रवण वे वस्तुतः दयनीय हैं । यदि हिन्दुजाति शिखाको थ छोड़ देगी; तो उसके न होने पर निम्न हानियाँ होगी; तब अधि-पति - नामक सम्राट्भूत मर्मस्थानकी शीत - उष्ण, जलवर्षण, वायु क आदिसे शीघ्र हानि हो सकती है । अधिपतिकी म्लानिमें उसके T, आश्रित समग्र अन्य मर्मस्थानोंकी भी ग्लानि हो सकती है; जिससे न शीत - उष्णकी सहनशक्तिका नाश हो जा सकता है । J- ( २६ ) समस्त जातियोंमें हिन्दु जाति ही शीत - उष्णके द्वन्द्वके सहनेमें ना प्रसिद्ध है; शीतकाल में प्रातः स्नान - सन्ध्या आदिसे नहीं डरती, च उसका कारण शिखाका धारण ही है । शिखा छोड़ने पर मर्म-ले स्थानों में दुर्बलता हो जाती है, जिससे वैसा व्यक्ति सर्दी गर्मी नहीं सह सकता । सर्दीमें भूलकर भी स्नान नहीं करना चाहता । गर्मी में क अग्निहोत्र में नहीं बैठ सकता । इसके अतिरिक्त शिखा छोड़ने पर यह I सामाजिक एवं धार्मिक चिह्नविशेष नष्ट होगा, जिसकी छत्रछाया में संपूर्ण 7 हिन्दु - जातिकी एकता स्थापित है । एकता नष्ट होनेपर जो अनेकता होगी; उसकी हानि स्पष्ट है । शिखाके त्यागमें शुक्रकी अधोगामिनी - " - गति होने पर कैसी हानि होगी - यह भी परोक्ष नहीं । पुरुषत्वकी - हानिमें अपनी स्त्रियाँ अपने वशमें नहीं रहतीं, व्यभिचारमें लग जाती हैं । हिन्दुः स्त्रियाँ पतियोंकी शिखाके कारण पतिव्रता प्रसिद्ध ६
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११६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) हैं । जिन जातियोंमें शिखास्थापन नहीं होता वा हटता जाता है; उस जातिकी ही स्त्रियाँ अधिक व्यभिचार में लग जाती हैं; तलाक यदि वही करती या चाहती हैं । यह एक बड़ी भारी हानि है । शिखा शुक्रकी ऊर्ध्वगति में सहायक हुआ करती है । ऊर्ध्वरेताः ही जितेन्द्रिय होता है । जितेन्द्रियों के ही घरमें योगियों का जन्म सम्भव हुआ करता है । उनकी स्त्रियाँ उनके वशमें होती हैं । हिन्दुजाति में ही योगियोंका जन्म अधिकतया हुआ है 1 । शिखा-त्यागमें निकम्मी, निर्धर्मक सन्तानें हुआ करती हैं । इस प्रकार शिखाके छोड़ने में बहुत हानियाँ हैं । आशा है ' आलोक ' पाठकोंने यह शिखा - रहस्य शास्त्रीय दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक एवं लौकिक दृष्टिकोणसे सुपरीक्षित किया होगा । आगे ' उपनयन - रहस्य ' दिया जाता है । सूचना - पृ ० ८ पं ० १० में ' याज्ञवल्क्यस्मृति ' उनकी अपनी अपौरुषेय रचना है ' यहां पर ' पौरुषेय रचना है ' - यह पढ़ना चाहिये । पृ ० ११-१२ में ( छ ) ( ज ) ( झ ) के स्थान ( च ) ( छ ) पढ़ा जाए ।
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} है stir क F ताः न्म चा-ने क या ( ४ ) यज्ञोपवीत - रहस्य ' सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च । विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत् कृतम् ॥ ' ( कात्यायनस्मृतिः १1४ )
' अमौक्तिकमसौवर्णं ब्राह्मणानां विभूषणम् ।
देवतानां पितॄणां च भागो येन प्रदीयते ॥
( मृच्छकटिक ( १०/१८ ) उपनयन का अर्थ और उसके अधिकारी संस्कार सोलह प्रसिद्ध हैं, इसे हम अग्रिम निबन्धमें लिखेंगे । उनमें भी उपनयन और विवाह यह दो संस्कार अत्यन्त प्रसिद्ध और प्रचलित हैं । उनमें यहां उपनयन विषय पर कुछ विचार किया जाता हैं । यद्यपि संस्कार सभी हैं; पर ' संस्कार ' यह नाम मुख्यतया उपनयनका ही प्रसिद्ध है । उपनयनका सम्बन्ध वेदाधि-कारियोंसे है । जिनको वेद पढ़नेका अधिकार नहीं है, उनको उपनयनका अधिकार भी नहीं है । उसका अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पुरुषोंको है । इसीलिए ' गर्भाष्टमेन्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्यो-पनायनम् । गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भाच्च द्वादशे विशः ' ( मनु ० २।३६ ) ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत गर्भाष्टमे वा, एकादशवर्षं राजन्यम्, द्वादशवर्ष वैश्यम् ' ( पारस्क ० २।२।१ - २ - ३ ) इत्यादि वचनोंसे उपनयन नी. ब्राह्मणादि तीनोंका कहा है, न तो यहां मनुष्यमात्र शब्द है, न स्त्रियोंका ग्रहण है ।
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११६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका वास्तविक संस्कार इसी उपनयन-संस्कारसे होता है । ' उप - समीपे नयनम् ' यह इसका व्युत्पत्त्यर्थ है । परन्तु इसका केवल व्युत्पत्त्यर्थ स्वीकार करने पर जहां - तहां अति-व्याप्ति हो सकती है । तब तो किसी पुरुषको वेश्याके पास ले जाना ( नयन ) भी ' उपनयन ' हो जावेगा । किसी शूद्रका अन्य शूद्रके समीप ले जाना भी ' उपनयन ' माना जा सकेगा; परन्तु यह इष्ट नहीं | तब यह शब्द ' विवाह ' ' श्राद्ध ' आदि शब्दोंकी भान्ति पारिभाषिक या रूढ या योगरूढ इष्ट है, केवल यौगिक नहीं । वेदमें भी इस प्रकारके शब्द देखनेसे, वहां भी यही अर्थ विवक्षित होने से वेदमें भी योगरूढ, रूढ वा पारिभाषिक शब्द सिद्ध हुए, जिन्हें वादी नहीं मानते । परिभाषा के अनुसार ' आचार्य के समीप वैध नयन ' ही ' उपनयन ' शब्दवाच्य हुआ करता है । इसीलिए कहा है-' गृह्येोक्तकर्मणा येन समीपे नीयते गुरोः । बालो वेदाय, तद्योगाद् बालोपनयनं विदुः ' । आचार्यके साथ ही साथ उपनेय वटुको अग्नि तथा गायन्नीके समीप भी लाया जाता है । इसीलिए ही ' अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयेत ' ( २।२।१ ) इस पारस्करके सूत्रकी व्याख्या करते. हुए गदाधर भट्टने कहा है- ' आचार्यस्य उप - समीपे माणवकस्य नयनम् ' उपनयन ' शब्देन उच्यते । उपनयनं च विधिना श्राचार्य-समीपनयनम्, अग्निसमीपे नयनं वा, सावित्रीवाचनं वा ' । आचार्यके पास पहुँचने पर उस वटुको आचार्यकी सेवा करनी पड़ती है जिसके द्वारा वह मानसिक - शक्तिको प्राप्त करता है और
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यज्ञोपवीत - रहस्य ११६ के त I E 7 न ने व a र अपने कार्य में पटुता भी प्राप्त करता है । फिर उसे अग्निकी उपासना करनी पड़ती है, जिसके द्वारा वह शारीरिक शक्तिको पाता है । फिर गायत्री मन्त्रकी उपासना ( जप ) करनी पड़ती है, जिसके द्वारा वह बुद्धि - पवित्रतारूप आत्मिक बलको प्राप्त करता है । इसीका नाम यज्ञोपवीत - संस्कार वा आचार्यकरण अथवा व्रत-बन्ध वा उपनयन है । उपनयनसे पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ' एकज ' होते हैं; उपनयनसे वे ' द्विज ' होते हैं । अर्थात् उनका एक जन्म माताके गर्भ से होता है, दूसरा जन्म आचार्यके गर्भ से होता है । यही दूसरा जन्म महत्त्वपूर्ण होता है । तभी श्रीमनुजीने कहा है-' आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद् वेदपारगः । उत्पादयति सावित्र्या सा सत्या, साऽजराऽमरा ' ( २।१४८ ) अर्थात – आचार्य उपनयनके समय गायत्री - मन्त्रके उपदेशसे जिस जन्मका सम्पादन करता है; वह दृढ होता है । आचार्य - द्वारा गायत्री प्रदानसे पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एकज ' थे । फिर ' द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति ' इस न्यायसे उपनयनके समय आचार्य उन्हीं तीन एकज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंको तीन दिन अपने गर्भमें रखता है । तब तीन दिनोंके बाद फिर उन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका दूसरी बार जन्म होता है । पहले वे एकज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य थे; अब द्विज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, होगये । ' द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति ' इस न्यायसे सुदृढ होगये । इसी लिए वेदमें भी कहा है- ' आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः । तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति, तं जातं द्रष्टुमभि-
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१२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) संयन्ति देवाः ' ( अथर्व ० सं ० ११ ॥ ३ ) । यहां तीन रात आचार्यके गर्भमें रहकर उसके बाद उत्पन्न हुए ब्रह्मचारीके दर्शनकेलिए देवता भी आते हैं - यह कहा है । तब आचार्य उपनयनसूत्र, यज्ञसूत्र या ब्रह्मसूत्र या उपवीतको विधिपूर्वक ब्रह्मचारीके गलेमें पहिनाता है । यज्ञोपवीत पहनानेका मन्त्र यह है - ' यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रथ ' प्रतिमुञ्च शुभ्र यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ' ( पारस्करगृ ० २/२/११ ) यज्ञोपवीतका लक्षण ‘ गोभिलीयगृह्यकर्मप्रकाशिका ' में उपनयनसूत्रका लक्षण दिया गया है, कात्यायन - परिशिष्ट में भी । ' पारस्करगृह्यसूत्र ' के हरिहर -भाष्य में तथा ' कात्यायनस्मृति के आरम्भ में भी यज्ञोपवीतकी विधि बताई गई है । हम उसे हिन्दी में स्पष्ट कर देंगे । यज्ञोपवीत के विषयमें पहले यह जानना चाहिए कि यज्ञोपवीत-का सम्बन्ध यज्ञसे है, यज्ञका सम्बन्ध वेदसे है । जैसे कि ' न्यायदर्शन ' में कहा है- ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः ' ( वात्स्या ० भा ० ४ | १ | ६२ ) वेदका सम्बन्ध वेदाधिकारियों से है, जिन्हें ब्रह्मसूत्र पहनना पड़ता है । बिना यज्ञोपवीत पहने द्विजातिवंशोत्पन्न भी वेदाध्ययनाधिकारी नहीं हो सकता, तो यज्ञोपवीताधिकार से विरहित पुरुष भला वेदाध्ययनमें कैसे अधिकृत हो सकते हैं? यज्ञोपवीत किस प्रकार पुरुषपर वेदका भार रखता है, यज्ञोपवीतियोंको कितना वेद आवश्यक है, यज्ञोपवीत त्रैवर्णिक पुरुषोंका क्यों होता है; इत्यादि बातोंका उत्तर यज्ञोपवीतसूत्र स्वयं