02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 101–110
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया ।
सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो ॥ १४ ॥
यह सुनकर मैं कौरवोंकी दशा देखनेके लिये तुम्हारे पास आया हूँ । राजन्! तुम्हारे ऊपर सदासे ही मेरा स्नेह और प्रेम अधिक रहा है ॥ १४ ॥
नैतदौपयिकं राजंस्त्वयि भीष्मे च जीवति ।
यदन्योन्येन ते पुत्रा विरुध्यन्ते कथंचन ॥ १५ ॥
महाराज! तुम्हारे और भीष्मके जीते - जी यह उचित नहीं जान पड़ता कि तुम्हारे पुत्र किसी प्रकार आपसमें विरोध करें ॥ १५ ॥
मेढीभूतः स्वयं राजन् निग्रहे प्रग्रहे भवान् ।
किमर्थमनयं घोरमुत्पद्यन्तमुपेक्षसे ॥ १६ ॥
महाराज! तुम स्वयं इन सबको बाँधकर नियन्त्रणमें रखनेके लिये खंभेके समान हो; फिर पैदा होते हुए इस घोर अन्यायकी क्यों उपेक्षा कर रहे हो ॥ १६ ॥
दस्यूनामिव यद् वृत्तं सभायां कुरुनन्दन ।
तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे ॥ १७ ॥
कुरुनन्दन! तुम्हारी सभामें डाकुओंकी भाँति जो बर्ताव किया गया है, उसके कारण तुम तपस्वी मुनियोंके समुदायमें शोभा नहीं पा रहे हो ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम् ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा मैत्रेयो भगवानृषिः ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर महर्षि भगवान् मैत्रेय अमर्षशील राजा दुर्योधनकी ओर मुड़कर उससे मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले ॥ १८ ॥
मैत्रेय उवाच
दुर्योधन महाबाहो निबोध वदतां वर ।
वचनं मे महाभाग ब्रुवतो यद्धितं तव ॥ १ ९ ॥
मैत्रेयजीने कहा – महाबाहु दुर्योधन! तुम वक्ताओंमें श्रेष्ठ हो; मेरी एक बात सुनो । महाभाग! मैं तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ ॥ १ ९ ॥
मा द्रुहः पाण्डवान् राजन् कुरुष्व प्रियमात्मनः ।
पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्षभ ॥ २० ॥
राजन्! तुम पाण्डवोंसे द्रोह न करो । नरश्रेष्ठ! अपना, पाण्डवोंका, कुरुकुलका तथा सम्पूर्ण जगत्का प्रिय साधन करो ॥ २० ॥
ते हि सर्वे नरव्याघ्राः शूरा विक्रान्तयोधिनः ।
सर्वे नागायुतप्राणा वज्रसंहनना दृढाः ॥ २१ ॥
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मनुष्योंमें श्रेष्ठ सब पाण्डव शूरवीर, पराक्रमी और युद्धकुशल हैं । उन सबमें दस हजार हाथियोंका बल है । उनका शरीर वज्रके समान दृढ़ है ॥ २१ ॥
सत्यव्रतधराः सर्वे सर्वे पुरुषमानिनः ।
हन्तारो देवशत्रूणां रक्षसां कामरूपिणाम् ॥ २२ ॥
हिडिम्बबकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः । वे सब-के-- सब सत्यव्रतधारी और अपने पौरुषपर अभिमान रखनेवाले हैं । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले देवद्रोही हिडिम्ब आदि राक्षसोंका तथा राक्षसजातीय किर्मीरका वध भी उन्होंने ही किया है ॥ २२ ॥
इतः प्रद्रवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम् ॥ २३ ॥
आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः ।
तं भीमः समरश्लाघी बलेन बलिनां वरः ॥ २४ ॥
जघान पशुमारेण व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा ।
पश्य दिग्विजये राजन् यथा भीमेन पातितः ॥ २५ ॥
जरासंधो महेष्वासो नागायुतबलो युधि ।
सम्बन्धी वासुदेवश्च श्यालाः सर्वे च पार्षताः ॥ २६ ॥
यहाँसे रातमें जब वे महात्मा पाण्डव चले जा रहे थे, उस समय उनका मार्ग रोककर भयंकर और पर्वतके समान विशालकाय किर्मीर उनके सामने खड़ा हो गया । युद्धकी श्लाघा रखनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने उस राक्षसको बलपूर्वक पकड़कर पशुकी तरह वैसे ही मार डाला, जैसे व्याघ्र छोटे मृगको मार डालता है । राजन्! देखो, दिग्विजयके समय भीमसेनने उस महान् धनुर्धर राजा जरासंधको भी युद्धमें मार गिराया, जिसमें दस हजार हाथियोंका बल था । ( यह भी स्मरण रखना चाहिये कि ) वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण उनके सम्बन्धी हैं तथा द्रुपदके सभी पुत्र उनके साले हैं ॥ २३–२६ ॥
कस्तान् युधि समासीत जरामरणवान् नरः ।
तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ ॥ २७ ॥
जरा और मृत्युके वशमें रहनेवाला कौन मनुष्य युद्धमें उन पाण्डवोंका सामना कर सकता है । भरतकुल - भूषण! ऐसे महापराक्रमी पाण्डवोंके साथ तुम्हें शान्तिपूर्वक मिलकर ही रहना चाहिये ॥ २७ ॥
कुरु मे वचनं राजन् मा मन्युवशमन्वगाः ।
राजन्! तुम मेरी बात मानो; क्रोधके वशमें न होओ ॥ २७ ॥
वैशम्पायन उवाच एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशाम्पते ॥ २८ ॥
ऊरुं गजकराकारं करेणाभिजघान सः ।
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दुर्योधनः स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन् महीम् ॥ २ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन्! मैत्रेयजी जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय दुर्योधनने मुसकराकर हाथीके सूँड़के समान अपनी जाँघको हाथसे ठोंका और पैरसे पृथ्वीको कुरेदने लगा ॥ २८-२९ ॥
न किंचिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किंचिदवाङ्मुखः ।
तमशुश्रूषमाणं तु विलिखन्तं वसुंधराम् ॥ ३० ॥
दृष्ट्वा दुर्योधनं राजन् मैत्रेयं कोप आविशत् ।
स कोपवशमापन्नो मैत्रेयो मुनिसत्तमः ॥ ३१ ॥
उस दुर्बुद्धिने मैत्रेयजीको कुछ भी उत्तर न दिया । वह अपने मुँहको कुछ नीचा किये चुपचाप खड़ा रहा । राजन्! मैत्रेयजीने देखा, दुर्योधन सुनना नहीं चाहता, वह पैरोंसे धरतीको कुरेद रहा है । यह देख उनके मनमें क्रोध जाग उठा । फिर तो वे मुनिश्रेष्ठ मैत्रेय कोपके वशीभूत हो गये ॥ ३०-३१ ॥ विधिना सम्प्रणुदितः शापायास्य मनो दधे ।
ततः स वार्युपस्पृश्य कोपसंरक्तलोचनः ।
मैत्रेयो धार्तराष्ट्रं तमशपद् दुष्टचेतसम् ॥ ३२ ॥
विधातासे प्रेरित होकर उन्होंने दुर्योधनको शाप देनेका विचार किया । तदनन्तर मैत्रेयने क्रोधसे लाल आँखें करके जलका आचमन किया और उस दुष्ट चित्तवाले धृतराष्ट्रपुत्रको इस प्रकार शाप दिया— ॥ ३२ ॥
यस्मात् त्वं मामनादृत्य नेमां वाचं चिकीर्षसि ।
तस्मादस्याभिमानस्य सद्यः फलमवाप्नुहि ॥ ३३ ॥
' दुर्योधन! तू मेरा अनादर करके मेरी बात मानना नहीं चाहता; अतः तू इस अभिमानका तुरंत फल पा ले ॥ ३३ ॥
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त्वदभिद्रोहसंयुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत् ।
तत्र भीमो गदाघातैस्तवोरुं भेत्स्यते बली ॥ ३४ ॥
‘ तेरे द्रोहके कारण बड़ा भारी युद्ध छिड़ेगा, उसमें बलवान् भीमसेन अपनी गदाकी चोटसे तेरी जाँघ तोड़ डालेंगे ' ॥ ३४ ॥
इत्येवमुक्ते वचने धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
प्रसादयामास मुनिं नैतदेवं भवेदिति ॥ ३५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर महाराज धृतराष्ट्रने मुनिको प्रसन्न किया और कहा –' भगवन्! ऐसा न हो ' ॥ ३५ ॥
मैत्रेय उवाच
शमं यास्यति चेत् पुत्रस्तव राजन् यदा तदा ।
शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति ॥ ३६ ॥
मैत्रेयजीने कहा— राजन्! जब तुम्हारा पुत्र शान्ति धारण करेगा ( पाण्डवोंसे वैर-विरोध न करके मेल - मिलाप कर लेगा ), तब यह शाप इसपर लागू न होगा । तात! यदि इसने विपरीत बर्ताव किया तो यह शाप इसे अवश्य भोगना पड़ेगा ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच विलक्षयंस्तु राजेन्द्रो दुर्योधनपिता तदा ।
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मैत्रेयं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब दुर्योधनके पिता महाराज धृतराष्ट्रने भीमसेनके बलका विशेष परिचय पानेके लिये मैत्रेयजीसे पूछा— ' मुने! भीमने किर्मीरको कैसे मारा? ' ॥ ३७ ॥
मैत्रेय उवाच
नाहं वक्ष्यामि ते भूयो न ते शुश्रूषते सुतः ।
एष ते विदुरः सर्वमाख्यास्यति गते मयि ॥ ३८ ॥
मैत्रेयजीने कहा— राजन्! तुम्हारा पुत्र मेरी बात सुनना नहीं चाहता, अतः मैं तुमसे इस समय फिर कुछ नहीं कहूँगा । ये विदुरजी मेरे चले जानेपर वह सारा प्रसंग तुम्हें बतायेंगे ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा मैत्रेयः प्रातिष्ठत यथाऽऽगतम् ।
किर्मीरवधसंविग्नो बहिर्दुर्योधनो ययौ ॥ ३ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर मैत्रेयजी जैसे आये थे वैसे ही चले गये । किर्मीरवधका समाचार सुनकर उद्विग्न हो दुर्योधन भी बाहर निकल गया ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि मैत्रेयशापे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें मैत्रेयशापविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ||
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( किर्मीरवधपर्व ) एकादशोऽध्यायः भीमसेनके द्वारा किर्मीरके वधकी कथा धृतराष्ट्रउवाच
किर्मीरस्य वधं क्षत्तः श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ।
रक्षसा भीमसेनस्य कथमासीत् समागमः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा – विदुर! मैं किर्मीरवधका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ, कहो। उस राक्षसके साथ भीमसेनकी मुठभेड़ कैसे हुई? ॥ १ ॥
विदुर उवाच
शृणु भीमस्य कर्मेदमतिमानुषकर्मणः ।
श्रुतपूर्वं मया तेषां कथान्तेषु पुनः पुनः ॥ २ ॥
विदुरजीने कहा- राजन्! मानवशक्तिसे अतीत कर्म करनेवाले भीमसेनके इस भयानक कर्मको आप सुनिये, जिसे मैंने उन पाण्डवोंके कथाप्रसंगमें ( ब्राह्मणोंसे ) बार- बार सुना है ॥ २ ॥
इतः प्रयाता राजेन्द्र पाण्डवा द्यूतनिर्जिताः ।
जग्मुस्त्रिभिरहोरात्रैः काम्यकं नाम तद् वनम् ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! पाण्डव जूएमें पराजित होकर जब यहाँसे गये, तब तीन दिन और तीन रातमें काम्यकवनमें जा पहुँचे ॥ ३ ॥
रात्रौ निशीथे त्वाभीले गतेऽर्धसमये नृप ।
प्रचारे पुरुषादानां रक्षसां घोरकर्मणाम् ॥ ४ ॥
तद् वनं तापसा नित्यं गोपाश्च वनचारिणः ।
दूरात् परिहरन्ति स्म पुरुषादभयात् किल ॥ ५ ॥
आधी रातके भयंकर समयमें, जब कि भयानक कर्म करनेवाले नरभक्षी राक्षस विचरते रहते हैं, तपस्वी मुनि और वनचारी गोपगण भी उस राक्षसके भयसे उस वनको दूरसे ही त्याग देते थे ॥ ४-५ ॥
तेषां प्रविशतां तत्र मार्गमावृत्य भारत ।
दीप्ताक्षं भीषणं रक्षः सोल्मुकं प्रत्यपद्यत ॥ ६ ॥
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भारत! उस वनमें प्रवेश करते ही वह राक्षस उनका मार्ग रोककर खड़ा हो गया ।
उसकी आँखें चमक रही थीं । वह भयानक राक्षस मशाल लिये आया था ॥ ६ ॥
बाहू महान्तौ कृत्वा तु तथाऽऽस्यं च भयानकम् ।
स्थितमावृत्य पन्थानं येन यान्ति कुरूद्वहाः ॥ ७ ॥
अपनी दोनों भुजाओंको बहुत बड़ी करके मुँहको भयानकरूपसे फैलाकर वह उसी मार्गको घेरकर खड़ा हो गया, जिससे वे कुरुवंशशिरोमणि पाण्डव यात्रा कर रहे थे ॥ ७ ॥
स्पष्टाष्टदंष्ट्रं ताम्राक्षं प्रदीप्तोर्ध्वशिरोरुहम् ।
सार्करश्मितडिच्चक्रं सबलाकमिवाम्बुदम् ॥ ८ ॥
उसकी आठ दाढ़ें स्पष्ट दिखायी देती थीं, आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं एवं सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए और प्रज्वलित - से जान पड़ते थे । उसे देखकर ऐसा मालूम होता था, मानो सूर्यकी किरणों, विद्युन्मण्डल और बकपंक्तियोंके साथ मेघ शोभा पा रहा हो ॥ ८ ॥
सृजन्तं राक्षसीं मायां महानादनिनादितम् ।
मुञ्चन्तं विपुलान् नादान् सतोयमिव तोयदम् ॥ ९ ॥
वह भयंकर गर्जनाके साथ राक्षसी मायाकी सृष्टि कर रहा था । सजल जलधरके समान जोर - जोरसे सिंहनाद करता था ॥ ९ ॥
तस्य नादेन संत्रस्ताः पक्षिणः सर्वतोदिशम् ।
विमुक्तनादाः सम्पेतुः स्थलजा जलजैः सह ॥ १० ॥
उसकी गर्जनासे भयभीत हुए स्थलचर पक्षी जलचर पक्षियोंके साथ चीं -चीं करते हुए सब दिशाओंमें भाग चले ॥ १० ॥
सम्प्रद्रुतमृगद्वीपिमहिषर्क्षसमाकुलम् ।
तद् वनं तस्य नादेन सम्प्रस्थितमिवाभवत् ॥ ११ ॥
भागते हुए मृग, भेड़िये, भैंसे तथा रीछोंसे भरा हुआ वह वन उस राक्षसकी गर्जनासे ऐसा हो गया, मानो वह वन ही भाग रहा हो ॥ ११ ॥
तस्योरुवाताभिहतास्ताम्रपल्लवबाहवः ।
विदूरजाताश्च लताः समाश्लिष्यन्ति पादपान् ॥ १२ ॥
उसकी जाँघोंकी हवाके वेगसे आहत हो ताम्रवर्णके पल्लवरूपी बाँहोंद्वारा सुशोभित दूरकी लताएँ भी मानो वृक्षोंसे लिपटी जाती थीं ॥ १२ ॥
तस्मिन् क्षणेऽथ प्रववौ मारुतो भृशदारुणः ।
रजसा संवृतं तेन नष्टज्योतिरभून्नभः ॥ १३ ॥
इसी समय बड़ी प्रचण्ड वायु चलने लगी । उसकी उड़ायी हुई धूलसे आच्छादित हो आकाशके तारे भी अस्त हो गये से जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणामविज्ञातो महारिपुः ।
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पञ्चानामिन्द्रियाणां तु शोकावेश इवातुलः ॥ १४ ॥
जैसे पाँचों इन्द्रियोंको अकस्मात् अतुलित शोकावेश प्राप्त हो जाय, उसी प्रकार पाँचों पाण्डवोंका वह तुलनारहित महान् शत्रु सहसा उनके पास आ पहुँचा; पर पाण्डवोंको उस राक्षसका पता नहीं था ॥ १४ ॥
स दृष्ट्वा पाण्डवान् दूरात् कृष्णाजिनसमावृतान् ।
आवृणोत् तद्वनद्वारं मैनाक इव पर्वतः ॥ १५ ॥
उसने दूरसे ही पाण्डवोंको कृष्ण- मृगचर्म धारण किये आते देख मैनाक पर्वतकी भाँति उस वनके प्रवेश- द्वारको घेर लिया ॥ १५ ॥
तं समासाद्य वित्रस्ता कृष्णा कमललोचना ।
अदृष्टपूर्वं संत्रासान्न्यमीलयत लोचने ॥ १६ ॥
उस अदृष्टपूर्व राक्षसके निकट पहुँचकर कमल-लोचना कृष्णाने भयभीत हो अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये ॥ १६ ॥
दुःशासनकरोत्सृष्टविप्रकीर्णशिरोरुहा ।
पञ्चपर्वतमध्यस्था नदीवाकुलतां गता ॥ १७ ॥
दुःशासनके हाथोंसे खुले हुए उसके केश सब ओर बिखरे हुए थे । वह पाँच पर्वतोंके बीचमें पड़ी हुई नदीकी भाँति व्याकुल हो उठी ॥ १७ ॥
मोमुह्यमानां तां तत्र जगृहुः पञ्च पाण्डवाः ।
इन्द्रियाणि प्रसक्तानि विषयेषु यथा रतिम् ॥ १८ ॥
उसे मूर्च्छित होती हुई देख पाँचों पाण्डवोंने सहारा देकर उसी तरह थाम लिया, जैसे विषयोंमें आसक्त हुई इन्द्रियाँ तत्सम्बन्धी अनुरक्तिको धारण किये रहती हैं ॥ १८ ॥
अथ तां राक्षसीं मायामुत्थितां घोरदर्शनाम् ।
रक्षोघ्नैर्विविधैर्मन्त्रैर्धौम्यः सम्यक्प्रयोजितैः ॥ १ ९ ॥
पश्यतां पाण्डुपुत्राणां नाशयामास वीर्यवान् ।
सनष्टमायोऽतिबलः क्रोधविस्फारितेक्षणः ॥ २० ॥
काममूर्तिधरः क्रूरः कालकल्पो व्यदृश्यत ।
तमुवाच ततो राजा दीर्घप्रज्ञो युधिष्ठिरः ॥ २१ ॥
तदनन्तर वहाँ प्रकट हुई अत्यन्त भयानक राक्षसी मायाको देख शक्तिशाली धौम्य मुनिने अच्छी तरह प्रयोगमें लाये हुए राक्षसविनाशक विविध मन्त्रोंद्वारा पाण्डवोंके देखते-देखते उस मायाका नाश कर दिया । माया नष्ट होते ही वह अत्यन्त बलवान् एवं इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला क्रूर राक्षस क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देखता हुआ कालके समान दिखायी देने लगा । उस समय परम बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने उससे पूछा— ॥ १ ९– २१ ॥ को भवान् कस्य वा किं ते क्रियतां कार्यमुच्यताम् ।
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प्रत्युवाचाथ तद् रक्षो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ २२ ॥
' तुम कौन हो, किसके पुत्र हो अथवा तुम्हारा कौन- सा कार्य सम्पादन किया जाय? यह सब बताओ । ' तब उस राक्षसने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ २२ ॥
अहं बकस्य वै भ्राता किर्मीर इति विश्रुतः ।
वनेऽस्मिन् काम्यके शून्ये निवसामि गतज्वरः ॥ २३ ॥
‘ मैं बकका भाई हूँ, मेरा नाम किर्मीर है, इस निर्जन काम्यकवनमें निवास करता हूँ।
यहाँ मुझे किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं है ॥ २३ ॥
युधि निर्जित्य पुरुषानाहारं नित्यमाचरन् ।
के यूयमभिसम्प्राप्ता भक्ष्यभूता ममान्तिकम् ।
युधि निर्जित्य वः सर्वान् भक्षयिष्ये गतज्वरः ॥ २४ ॥
' यहाँ आये हुए मनुष्योंको युद्धमें जीतकर सदा उन्हींको खाया करता हूँ। तुमलोग कौन हो? जो स्वयं ही मेरा आहार बननेके लिये मेरे निकट आ गये? मैं तुम सबको युद्धमें परास्त करके निश्चिन्त हो अपना आहार बनाऊँगा ' ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तु तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य दुरात्मनः ।
आचचक्षे ततः सर्वं गोत्रनामादि भारत ॥ २५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! उस दुरात्माकी बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उसे गोत्र एवं नाम आदि सब बातोंका परिचय दिया ॥ २५ ॥
युधिष्ठिरउवाच
पाण्डवो धर्मराजोऽहं यदि ते श्रोत्रमागतः ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्भीमसेनार्जुनादिभिः ॥ २६ ॥
हृतराज्यो वने वासं वस्तुं कृतमतिस्ततः ।
वनमभ्यागतो घोरमिदं तव परिग्रहम् ॥ २७ ॥
युधिष्ठिर बोले- मैं पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हूँ । सम्भव है, मेरा नाम तुम्हारे कानोंमें भी पड़ा हो । इस समय मेरा राज्य शत्रुओंने जूएमें हरण कर लिया है । अतः मैं भीमसेन, अर्जुन आदि सब भाइयोंके साथ वनमें रहनेका निश्चय करके तुम्हारे निवासस्थान इस घोर काम्यकवनमें आया हूँ ॥ २६-२७ ॥ विदुर उवाच
किर्मीरस्त्वब्रवीदेनं दिष्ट्या देवैरिदं मम ।
उपपादितमद्येह चिरकालान्मनोगतम् ॥ २८ ॥
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विदुरजी कहते हैं - राजन्! तब किर्मीरने युधिष्ठिरसे कहा - ' आज सौभाग्यवश देवताओंने यहाँ मेरे बहुत दिनोंके मनोरथकी पूर्ति कर दी ॥ २८ ॥
भीमसेनवधार्थं हि नित्यमभ्युद्यतायुधः ।
चरामि पृथिवीं कृत्स्नां नैनं चासादयाम्यहम् ॥ २ ९ ॥
‘ मैं प्रतिदिन हथियार उठाये भीमसेनका वध करनेके लिये सारी पृथ्वीपर विचरता था; किंतु यह मुझे मिल नहीं रहा था ॥ २ ९ ॥
सोऽयमासादितो दिष्ट्या भ्रातृहा काङ्क्षितश्चिरम् ।
न हि मम भ्राता बको विनिहतः प्रियः ॥ ३० ॥
वैत्रकीयवने राजन् ब्राह्मणच्छद्मरूपिणा ।
विद्याबलमुपाश्रित्य न ह्यस्त्यस्यौरसं बलम् ॥ ३१ ॥
‘ आज सौभाग्यवश यह स्वयं मेरे यहाँ आ पहुँचा । भीम मेरे भाईका हत्यारा है, मैं बहुत दिनोंसे इसकी खोजमें था । राजन्! इसने ( एकचक्रा नगरीके पास ) वैत्रकीयवनमें ब्राह्मणका कपटवेष धारण करके वेदोक्त मन्त्ररूप विद्याबलका आश्रय ले मेरे प्यारे भाई बकासुरका वध किया था; वह इसका अपना बल नहीं था ॥ ३०-३१ ॥ हिडिम्बश्च सखा मह्यं दयितो वनगोचरः हतो दुरात्मनानेन स्वसा चास्य हृता पुरा ॥ ३२ ॥
‘ इसी प्रकार वनमें रहनेवाले मेरे प्रिय मित्र हिडिम्बको भी इस दुरात्माने मार डाला और
उसकी बहिनका अपहरण कर लिया । ये सब बहुत पहलेकी बातें हैं ॥ ३२ ॥
सोऽयमभ्यागतो मूढो ममेदं गहनं वनम् ।
प्रचारसमयेऽस्माकमर्धरात्रे स्थिते स मे ॥ ३३ ॥
‘ वही यह मूढ़ भीमसेन हमलोगोंके घूमने -फिरनेकी बेलामें आधी रातके समय मेरे इस गहन वनमें आ गया है ॥ ३३ ॥
अद्यास्य यातयिष्यामि तद् वैरं चिरसम्भृतम् ।
तर्पयिष्यामि च बकं रुधिरेणास्य भूरिणा ॥ ३४ ॥
‘ आज इससे मैं उस पुराने वैरका बदला लूँगा और इसके प्रचुर रक्तसे बकासुरका तर्पण करूँगा ॥ ३४ ॥
अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुः सख्युस्तथैव च ।
शान्तिं लब्धास्मि परमां हत्वा राक्षसकण्टकम् ॥ ३५ ॥
‘ आज मैं राक्षसोंके लिये कण्टकरूप इस भीमसेनको मारकर अपने भाई तथा मित्रके ऋणसे उऋण हो परम शान्ति प्राप्त करूँगा ॥ ३५ ॥
यदि तेन पुरा मुक्तो भीमसेनो बकेन वै ।
अद्यैनं भक्षयिष्यामि पश्यतस्ते युधिष्ठिर ॥ ३६ ॥