श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 111–120

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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' युधिष्ठिर! यदि पहले बकासुरने भीमसेनको छोड़ दिया, तो आज मैं तुम्हारे देखते-देखते इसे खा जाऊँगा ॥ ३६ ॥

एनं हि विपुलप्राणमद्य हत्वा वृकोदरम् ।

सम्भक्ष्य जरयिष्यामि यथागस्त्यो महासुरम् ॥ ३७ ॥

‘ जैसे महर्षि अगस्त्यने वातापि नामक महान् राक्षसको खाकर पचा लिया, उसी प्रकार मैं भी इस महाबली भीमको मारकर खा जाऊँगा और पचा लूँगा' ॥ ३७ ॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सत्यसंधो युधिष्ठिरः ।

नैतदस्तीति सक्रोधो भर्त्सयामास राक्षसम् ॥ ३८ ॥

उसके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं सत्यप्रतिज्ञ युधिष्ठिरने कुपित हो उस राक्षसको फटकारते हुए कहा - ' ऐसा कभी नहीं हो सकता' ॥ ३८ ॥

ततो भीमो महाबाहुरारुज्य तरसा द्रुमम् ।

दशव्याममथोद्विद्धं निष्पत्रमकरोत् तदा ॥ ३ ९ ॥

तदनन्तर महाबाहु भीमसेनने बड़े वेग से हिलाकर एक दस व्याम- लम्बे वृक्षको उखाड़ लिया और उसके पत्ते झाड़ दिये ॥ ३ ९ ॥

चकार सज्यं गाण्डीवं वज्रनिष्पेषगौरवम् ।

निमेषान्तरमात्रेण तथैव विजयोऽर्जुनः ॥ ४० ॥

इधर विजयी अर्जुनने भी पलक मारते - मारते अपने उस गाण्डीव धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा दी, जिसे वज्रको भी पीस डालनेका गौरव प्राप्त था ॥ ४० ॥

निवार्य भीमो जिष्णुं तं तद् रक्षो मेघनिःस्वनम् ।

अभिद्रुत्याब्रवीद् वाक्यं तिष्ठ तिष्ठेति भारत ॥ ४१ ॥

भारत! भीमसेनने अर्जुनको रोक दिया और मेघके समान गर्जना करनेवाले उस राक्षसपर आक्रमण करते हुए कहा – ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ ४१ ॥

इत्युक्त्वैनमतिक्रुद्धः कक्ष्यामुत्पीड्य पाण्डवः ।

निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदष्टौष्ठपुटो बली ॥ ४२ ॥

तमभ्यधावद् वेगेन भीमो वृक्षायुधस्तदा ।

यमदण्डप्रतीकाशं ततस्तं तस्य मूर्धनि ॥ ४३ ॥

पातयामास वेगेन कुलिशं मघवानिव ।

असम्भ्रान्तं तु तद् रक्षः समरे प्रत्यदृश्यत ॥ ४४ ॥

ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए बलवान् पाण्डुनन्दन भीमने वस्त्रसे अच्छी तरह अपनी कमर कस ली और हाथ से हाथ रगड़कर दाँतोंसे ओंठ चबाते हुए वृक्षको ही आयुध बनाकर बड़े वेगसे उसकी तरफ दौड़े और जैसे इन्द्र वज्रका प्रहार करते हैं, उसी प्रकार यमदण्डके समान उस भयंकर वृक्षको राक्षसके मस्तकपर उन्होंने बड़े जोरसे दे मारा । तो भी वह निशाचर युद्धमें अविचल भावसे खड़ा दिखायी दिया ॥ ४२–४४ ॥

पृष्ठ 112

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चिक्षेप चोल्मुकं दीप्तमशनिं ज्वलितामिव ।

तदुदस्तमलातं तु भीमः प्रहरतां वरः ॥ ४५ ॥

पदा सव्येन चिक्षेप तद् रक्षः पुनराव्रजत् ।

किर्मीरश्चापि सहसा वृक्षमुत्पाट्य पाण्डवम् ॥ ४६ ॥

दण्डपाणिरिव क्रुद्धः समरे प्रत्यधावत ।

तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् ॥ ४७ ॥

वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोर्यथा स्त्रीकाङ्क्षिणोः पुरा । तत्पश्चात् उसने भी प्रज्वलित वज्रके समान जलता हुआ काठ भीमके ऊपर फेंका, परंतु योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीमने उस जलते काठको अपने बाँयें पैरसे मारकर इस तरह फेंका कि वह पुनः उस राक्षसपर ही जा गिरा । फिर तो किर्मीरने भी सहसा एक वृक्ष उखाड़ लिया और क्रोधमें भरे हुए दण्डपाणि यमराजकी भाँति उस युद्धमें पाण्डुकुमार भीमपर आक्रमण किया । जैसे पूर्वकालमें स्त्रीकी अभिलाषा रखनेवाले वाली और सुग्रीव दोनों भाइयोंमें भारी युद्ध हुआ था, उसी प्रकार उन दोनोंका वह वृक्षयुद्ध वनके वृक्षोंका विनाशक था ॥ ४५— ४७ ॥ शीर्षयोः पतिता वृक्षा बिभिदुर्नैकधा तयोः ॥ ४८ ॥

यथैवौत्पलपत्राणि मत्तयोर्द्विपयोस्तथा । जैसे दो मतवाले गजराजोंके मस्तकपर पड़े हुए कमलपत्र क्षणभरमें छिन्न - भिन्न होकर बिखर जाते हैं, वैसे ही उन दोनोंके मस्तकपर पड़े हुए वृक्षोंके अनेक टुकड़े हो जाते थे ॥ ४८३ ॥

मुञ्जवज्ञ्जर्जरीभूता बहवस्तत्र पादपाः ॥ ४ ९ ॥ चीराणीव व्युदस्तानि रेजुस्तत्र महावने ।

तद् वृक्षयुद्धमभवन्मुहूर्तं भरतर्षभ ।

राक्षसानां च मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ॥ ५० ॥

वहाँ उस महान् वनमें बहुत- से वृक्ष मूँजकी भाँति जर्जर हो गये थे । वे फटे चीथड़ोंकी तरह इधर- उधर फैले हुए सुशोभित होते थे । भरतश्रेष्ठ! राक्षसराज किर्मीर और मनुष्योंमें श्रेष्ठ भीमसेनका वह वृक्षयुद्ध दो घड़ीतक चलता रहा ॥ ४ ९ -५० ॥

ततः शिलां समुत्क्षिप्य भीमस्य युधि तिष्ठतः ।

प्राहिणोद् राक्षसः क्रुद्धो भीमश्च न चचाल ह ॥ ५१ ॥

तदनन्तर राक्षसने कुपित हो एक पत्थरकी चट्टान लेकर युद्धमें खड़े हुए भीमसेनपर चलायी । भीम उसके प्रहारसे जडवत् हो गये ॥ ५१ ॥

तं शिलाताडनजडं पर्यधावत राक्षसः ।

बाहुविक्षिप्तकिरणः स्वर्भानुरिव भास्करम् ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 113

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वे शिलाके आघातसे जडवत् हो रहे थे । उस अवस्थामें वह राक्षस भीमसेनकी ओर उसी तरह दौड़ा जैसे राहु अपनी भुजाओंसे सूर्यकी किरणोंका निवारण करते हुए उनपर आक्रमण करता है ॥ ५२ ॥

तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् ।

उभावपि चकाशेते प्रवृद्धौ वृषभाविव ॥ ५३ ॥

वे दोनों वीर परस्पर भिड़ गये और दोनों दोनोंको खींचने लगे । दो हृष्ट -पुष्ट साँड़ोंकी भाँति परस्पर भिड़े हुए उन दोनों योद्धाओंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५३ ॥

तयोरासीत् सुतुमुलः सम्प्रहारः सुदारुणः ।

नखदंष्ट्रायुधवतोर्व्याघ्रयोरिव दृप्तयोः ॥ ५४ ॥

नख और दाढ़ोंसे ही आयुधका काम लेनेवाले दो उन्मत्त व्याघ्रोंकी भाँति उन दोनोंमें अत्यन्त भयंकर एवं घमासान युद्ध छिड़ा हुआ था ॥ ५४ ॥

दुर्योधननिकाराच्च बाहुवीर्याच्च दर्पितः ।

कृष्णानयनदृष्टश्च व्यवर्धत वृकोदरः ॥ ५५ ॥

दुर्योधनके द्वारा प्राप्त हुए तिरस्कारसे तथा अपने बाहुबलसे भीमसेनका शौर्य एवं अभिमान जाग उठा था । इधर द्रौपदी भी प्रेमपूर्ण दृष्टिसे उनकी ओर देख रही थी; अतः वे उस युद्धमें उत्तरोत्तर उत्साहित हो रहे थे ॥ ५५ ॥

अभिपद्य च बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः ।

मातङ्गमिव मातङ्गः प्रभिन्नकरटामुखम् ॥ ५६ ॥

उन्होंने अमर्षमें भरकर सहसा आक्रमण करके दोनों भुजाओंसे उस राक्षसको उसी तरह पकड़ लिया, जैसे मतवाला गजराज गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले दूसरे हाथीसे भिड़ जाता है ॥ ५६ ॥

स चाप्येनं ततो रक्षः प्रतिजग्राह वीर्यवान् ।

तमाक्षिपद् भीमसेनो बलेन बलिनां वरः ॥ ५७ ॥

उस बलवान् राक्षसने भी भीमसेनको दोनों भुजाओंसे पकड़ लिया; तब बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने उसे बलपूर्वक दूर फेंक दिया ॥ ५७ ॥

तयोर्भुजविनिष्पेषादुभयोर्बलिनोस्तदा ।

शब्दः समभवद् घोरो वेणुस्फोटसमो युधि ॥ ५८ ॥

अथैनमाक्षिप्य बलाद् गृह्य मध्ये वृकोदरः ।

धूनयामास वेगेन वायुश्चण्ड इव द्रुमम् ॥ ५ ९ ॥

युद्धमें उन दोनों बलवानोंकी भुजाओंकी रगड़से बाँसके फटनेके समान भयंकर शब्द हो रहा था । जैसे प्रचण्ड वायु अपने वेगसे वृक्षको झकझोर देती है, उसी प्रकार भीमसेनने बलपूर्वक उछलकर उसकी कमर पकड़ ली और उस राक्षसको बड़े वेगसे घुमाना आरम्भ किया ॥ ५८-५९ ॥

पृष्ठ 114

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स भीमेन परामृष्टो दुर्बलो बलिना रणे ।

व्यस्पन्दत यथाप्राणं विचकर्ष च पाण्डवम् ॥ ६० ॥

बलवान् भीमकी पकड़में आकर वह दुर्बल राक्षस अपनी शक्तिके अनुसार उनसे

छूटनेकी चेष्टा करने लगा । उसने भी पाण्डुनन्दन भीमसेनको इधर- उधर खींचा ॥ ६० ॥

तत एनं परिश्रान्तमुपलक्ष्य वृकोदरः ।

योक्त्रयामास बाहुभ्यां पशुं रशनया यथा ॥ ६१ ॥

तदनन्तर उसे थका हुआ देख भीमसेनने अपनी दोनों भुजाओंसे उसे उसी तरह कस लिया, जैसे पशुको डोरीसे बाँध देते हैं ॥ ६१ ॥

विनदन्तं महानादं भिन्नभेरीस्वनं बली ।

भ्रामयामास सुचिरं विस्फुरन्तमचेतसम् ॥ ६२ ॥

राक्षस किर्मीर फूटे हुए नगारेकी-सी आवाजमें बड़े जोर- जोरसे चीत्कार करने और छटपटाने लगा । बलवान् भीम उसे देरतक घुमाते रहे, इससे वह मूर्छित हो गया ॥ ६२ ॥

तं विषीदन्तमाज्ञाय राक्षसं पाण्डुनन्दनः ।

प्रगृह्य तरसा दोर्भ्यां पशुमारममारयत् ॥ ६३ ॥

उस राक्षसको विषादमें डूबा हुआ जान पाण्डुनन्दन भीमने दोनों भुजाओंसे वेगपूर्वक दबाते हुए पशुकी तरह उसे मारना आरम्भ किया ॥ ६३ ॥

आक्रम्य च कटीदेशे जानुना राक्षसाधमम् ।

पीडयामास पाणिभ्यां कण्ठं तस्य वृकोदरः ॥ ६४ ॥

भीमने उस राक्षसके कटिप्रदेशको अपने घुटनेसे दबाकर दोनों हाथोंसे उसका गला मरोड़ दिया ॥ ६४ ॥

अथ जर्जरसर्वाङ्गं व्यावृत्तनयनोल्बणम् ।

भूतले भ्रामयामास वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ६५ ॥

किर्मीरका सारा अंग जर्जर हो गया और उसकी आँखें घूमने लगीं, इससे वह और भी भयंकर प्रतीत होता था । भीमने उसी अवस्थामें उसे पृथ्वीपर घुमाया और यह बात कही - ॥ ६५ ॥

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हिडिम्बबकयोः पाप न त्वमश्रुप्रमार्जनम् ।

करिष्यसि गतश्चापि यमस्य सदनं प्रति ॥ ६६ ॥

‘ ओ पापी! अब तू यमलोकमें जाकर भी हिडिम्ब और बकासुरके आँसू न पोंछ सकेगा' ॥ ६६ ॥

इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- स्तं राक्षसं क्रोधपरीतचेताः ।

विस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त- मुद्भ्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज ॥ ६७ ॥

ऐसा कहकर क्रोधसे भरे हृदयवाले नरवीर भीमने उस राक्षसको, जिसके वस्त्र और आभूषण खिसककर इधर- उधर गिर गये थे और चित्त भ्रान्त हो रहा था, प्राण निकल जानेपर छोड़ दिया ॥ ६७ ॥

तस्मिन् हते तोयदतुल्यरूपे

कृष्णां पुरस्कृत्य नरेन्द्रपुत्राः ।

भीमं प्रशस्याथ गुणैरनेकै- र्हष्टास्ततो द्वैतवनाय जग्मुः ॥ ६८ ॥

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उस राक्षसका रूप -रंग मेघके समान काला था । उसके मारे जानेपर राजकुमार पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए और भीमसेनके अनेक गुणोंकी प्रशंसा करते हुए द्रौपदीको आगे करके वहाँसे द्वैतवनकी ओर चल दिये ॥ ६८ ॥

विदुर उवाच

एवं विनिहतः संख्ये किर्मीरो मनुजाधिप ।

भीमेन वचनात् तस्य धर्मराजस्य कौरव ॥ ६ ९ ॥

विदुरजी कहते हैं – नरेश्वर! इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भीमसेनने किर्मीरको युद्धमें मार गिराया ॥ ६ ९ ॥

ततो निष्कण्टकं कृत्वा वनं तदपराजितः ।

द्रौपद्या सह धर्मज्ञो वसतिं तामुवास ह ॥ ७० ॥

तदनन्तर विजयी एवं धर्मज्ञ पाण्डुकुमार उस वनको निष्कण्टक ( राक्षसरहित ) बनाकर द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे ॥ ७० ॥

समाश्वास्य च ते सर्वे द्रौपद्रीं भरतर्षभाः ।

प्रहृष्टमनसः प्रीत्या प्रशशंसुर्वृकोदरम् ॥ ७१ ॥

भरतकुलके भूषणरूप उन सभी वीरोंने द्रौपदीको आश्वासन देकर प्रसन्नचित्त हो प्रेमपूर्वक भीमसेनकी सराहना की ॥ ७१ ॥

भीमबाहुबलोत्पिष्टे विनष्टे राक्षसे ततः ।

विविशुस्ते वनं वीराः क्षेमं निहतकण्टकम् ॥ ७२ ॥

भीमसेनके बाहुबलसे पिसकर जब वह राक्षस नष्ट हो गया, तब उस अकण्टक एवं कल्याणमय वनमें उन सभी वीरोंने प्रवेश किया ॥ ७२ ॥

स मया गच्छता मार्गे विनिकीर्णो भयावहः ।

वने महति दुष्टात्मा दृष्टो भीमबलाद्धतः ॥ ७३ ॥

मैंने महान् वनमें जाते और आते समय रास्तेमें मरकर गिरे हुए उस भयानक एवं दुष्टात्मा राक्षसके शवको अपनी आँखों देखा था, जो भीमसेनके बलसे मारा गया था ॥ ७३ ॥

तत्राश्रौषमहं चैतत् कर्म भीमस्य भारत ।

ब्राह्मणानां कथयतां ये तत्रासन् समागताः ॥ ७४ ॥

भारत! मैंने वनमें उन ब्राह्मणोंके मुखसे, जो वहाँ आये हुए थे, भीमसेनके इस महान् कर्मका वर्णन सुना ॥ ७४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं विनिहतं संख्ये किर्मीरं रक्षसां वरम् ।

श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासार्तवत् तदा ॥ ७५ ॥

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वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार राक्षसप्रवर किर्मीरका युद्धमें मारा जाना सुनकर राजा धृतराष्ट्र किसी भारी चिन्तामें डूब गये और शोकातुर मनुष्यकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे ॥ ७५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि किर्मीरवधपर्वणि विदुरवाक्ये एकादशोऽध्यायः ॥ ११ || इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत किर्मीरवधपर्वमें विदुरवाक्यसम्बन्धी ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

* दोनों भुजाओंको दोनों ओर फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियोंके सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे ' व्याम' कहते हैं । यही पुरुषप्रमाण है । इसकी लम्बाई लगभग ३ हाथकी होती है ।

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(अर्जुनाभिगमनपर्व) द्वादशोऽध्यायः अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दुःखका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना वैशम्पायन उवाच

भोजाः प्रव्रजिताञ्छ्रुत्वा वृष्णयश्चान्धकैः सह ।

पाण्डवान् दुःखसंतप्तान् समाजग्मुर्महावने ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जब भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीरोंने सुना कि पाण्डव अत्यन्त दुःखसे संतप्त हो राजधानीसे निकलकर चले गये, तब वे उनसे मिलनेके लिये महान् वनमें गये ॥ १ ॥

पाञ्चालस्य च दायादो धृष्टकेतुश्च चेदिपः ।

केकयाश्च महावीर्या भ्रातरो लोकविश्रुताः ॥ २ ॥

वने द्रष्टुं ययुः पार्थान् क्रोधामर्षसमन्विताः ।

गर्हयन्तो धार्तराष्ट्रान् किं कुर्म इति चाब्रुवन् ॥ ३ ॥

पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, चेदिराज धृष्टकेतु तथा महापराक्रमी लोकविख्यात केकयराजकुमार सभी भाई क्रोध और अमर्षमें भरकर धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करते हुए कुन्तीकुमारोंसे मिलनेके लिये वनमें गये और आपसमें इस प्रकार कहने लगे, ‘ हमें क्या करना चाहिये ' ॥ २-३ ॥ वासुदेवं पुरस्कृत्य सर्वे ते क्षत्रियर्षभाः ।

परिवार्योपविविशुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।

अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठं विषण्णः केशवोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥

भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके वे सभी क्षत्रियशिरोमणि धर्मराज युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर बैठे । उस समय भगवान् श्रीकृष्ण विषादग्रस्त हो कुरुप्रवर युधिष्ठिरको नमस्कार करके इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥

वासुदेव उवाच

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दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः ।

दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥५ ॥

श्रीकृष्णने कहा- राजाओ! जान पड़ता है, यह पृथ्वी दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि और चौथे दुःशासन – इन सबके रक्तका पान करेगी ॥ ५ ॥

एतान् निहत्य समरे ये च तस्य पदानुगाः ।

तांश्च सर्वान् विनिर्जित्य सहितान् सनराधिपान् ॥ ६ ॥

ततः सर्वेऽभिषिञ्चामो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।

निकृत्योपचरन् वध्य एष धर्मः सनातनः ॥ ७ ॥

युद्धमें इनको और इनके सब सेवकोंको अन्य राजाओंसहित परास्त करके हम सब लोग धर्मराज युधिष्ठिरको पुनः चक्रवर्ती नरेशके पदपर अभिषिक्त करें । जो दूसरेके साथ छल- कपट अथवा धोखा करके सुख भोग रहा हो उसे मार डालना चाहिये, यह सनातन धर्म है ॥ ६-७ ॥ वैशम्पायन उवाच

पार्थानामभिषङ्गेण तथा क्रुद्धं जनार्दनम् ।

अर्जुनः शमयामास दिधक्षन्तमिव प्रजाः ॥ ८ ॥

संक्रुद्धं केशवं दृष्ट्वा पूर्वदेहेषु फाल्गुनः ।

कीर्तयामास कर्माणि सत्यकीर्तेर्महात्मनः ॥ ९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुन्तीपुत्रोंके अपमानसे भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे कुपित हो उठे, मानो वे समस्त प्रजाको जलाकर भस्म कर देंगे । उन्हें इस प्रकार क्रोध करते देख अर्जुनने उन्हें शान्त किया और उन सत्यकीर्ति महात्माद्वारा पूर्व शरीरोंमें किये हुए कर्मोंका कीर्तन आरम्भ किया ॥ ८ -९ ॥

पुरुषस्याप्रमेयस्य सत्यस्यामिततेजसः ।

प्रजापतिपतेर्विष्णोर्लोकनाथस्य धीमतः ॥ १० ॥

भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्यामी, अप्रमेय, सत्यस्वरूप, अमिततेजस्वी, प्रजापतियोंके भी पति, सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक तथा परम बुद्धिमान् श्रीविष्णु ही हैं ( अर्जुनने उनकी इस प्रकार स्तुति की) ॥ १० ॥

अर्जुन उवाच

दश वर्षसहस्राणि यत्रसायंगृहो मुनिः ।

व्यचरस्त्वं पुरा कृष्ण पर्वते गन्धमादने । ११ ॥

अर्जुन बोले- श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें गन्धमादन पर्वतपर आपने यत्रसायंगृह* मुनिके रूपमें दस हजार वर्षोंतक विचरण किया है; अर्थात् नारायण ऋषिके रूपमें निवास किया है ॥ ११ ॥

पृष्ठ 120

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दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च ।

पुष्करेष्ववसः कृष्ण त्वमपो भक्षयन् पुरा ॥ १२ ॥

सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें कभी इस धराधाममें अवतीर्ण हो आपने ग्यारह हजार वर्षों - तक केवल जल पीकर रहते हुए पुष्करतीर्थमें निवास किया है ॥ १२ ॥

ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां मधुसूदन ।

अतिष्ठ एकपादेन वायुभक्षः शतं समाः ॥ १३ ॥

मधुसूदन! आप विशालापुरीके बदरिकाश्रममें दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये केवल वायुका आहार करते हुए सौ वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे हैं ॥ १३ ॥

अवकृष्टोत्तरासङ्गः कृशो धमनिसंततः ।

आसीः कृष्ण सरस्वत्यां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ १४ ॥

कृष्ण! आप सरस्वती नदीके तटपर उत्तरीय वस्त्रतकका त्याग करके द्वादशवार्षिक यज्ञ करते समयतक शरीरसे अत्यन्त दुर्बल हो गये थे । आपके सारे शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं ॥ १४ ॥

प्रभासमप्यथासाद्य तीर्थं पुण्यजनोचितम् ।

तथा कृष्ण महातेजा दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ १५ ॥

अतिष्ठस्त्वमथैकेन पादेन नियमस्थितः ।

लोकप्रवृत्तिहेतुस्त्वमिति व्यासो ममाब्रवीत् ॥ १६ ॥

गोविन्द! आप पुण्यात्मा पुरुषोंके निवासयोग्य प्रभासतीर्थमें जाकर लोगोंको तपमें प्रवृत्त करनेके लिये शौच- संतोषादि नियमोंमें स्थित हो महातेजस्वी स्वरूपसे एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक एक ही पैरसे खड़े रहे । ये सब बातें मुझसे श्रीव्यासजीने बतायी हैं ॥ १५-१६ ॥

क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामादिरन्तश्च केशव ।

निधानं तपसां कृष्ण यज्ञस्त्वं च सनातनः ॥ १७ ॥

केशव! आप क्षेत्रज्ञ ( सबके आत्मा), सम्पूर्ण भूतोंके आदि और अन्त, तपस्याके अधिष्ठान, यज्ञ और सनातन पुरुष हैं ॥ १७ ॥

निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले ।

प्रथमोत्पतितं कृष्ण मेध्यमश्वमवासृजः ॥ १८ ॥

आप भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर अदितिके दोनों मणिमय कुण्डलोंको ले आये थे; एवं आपने ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होनेवाले यज्ञके उपयुक्त घोड़ेकी रचना की थी ॥ १८ ॥

कृत्वा तत् कर्म लोकानामृषभः सर्वलोकजित् ।

अवधीस्त्वं रणे सर्वान् समेतान् दैत्यदानवान् ॥ १ ९ ॥