02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1051–1060
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1051–1060
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' रमणीय पर्वतों और समस्त सरोवरोंमें विशेषतः परम पुण्यमय समुद्रके जलमें इन महात्माओंके साथ भलीभाँति स्नान एवं आचमन किया है ॥ ७ ॥
इला सरस्वती सिन्धुर्यमुना नर्मदा तथा ।
नानातीर्थेषु रम्येषु सूपस्पृष्टं सह द्विजैः ॥ ८ ॥
‘ इला, सरस्वती, सिंधु, यमुना तथा नर्मदा आदि नाना रमणीय तीर्थोंमें भी ब्राह्मणोंके साथ विधिवत् स्नान और आचमन किया है ॥ ८ ॥
गङ्गाद्वारमतिक्रम्य बहवः पर्वताः शुभाः ।
हिमवान् पर्वतश्चैव नानाद्विजगणायुतः ॥ ९ ॥
' गंगाद्वार ( हरिद्वार ) -को लाँघकर बहुत- से मंगलमय पर्वत देखे तथा बहुसंख्यक ब्राह्मणोंसे युक्त हिमालय पर्वतका भी दर्शन किया ॥ ९ ॥
विशाला बदरी दृष्टा नरनारायणाश्रमः ।
दिव्या पुष्करिणी दृष्टा सिद्धदेवर्षिपूजिता ॥ १० ॥
‘ विशाल बदरीतीर्थ, भगवान् नर- नारायणके आश्रम तथा सिद्धों और देवर्षियोंसे पूजित इस दिव्य सरोवरका भी दर्शन किया ॥ १० ॥
यथाक्रमविशेषेण सर्वाण्यायतनानि च ।
दर्शितानि द्विजश्रेष्ठा लोमशेन महात्मना ॥ ११ ॥
‘ विप्रवरो! महात्मा लोमशजीने हमें सभी पुण्य- स्थानोंके क्रमशः दर्शन कराये हैं ॥ ११ ॥
इमं वैश्रवणावासं पुण्यं सिद्धनिषेवितम् ।
कथं भीम गमिष्यामो गतिरन्तरधीयताम् ॥ १२ ॥
‘ भीमसेन! यह सिद्धसेवित पुण्यप्रदेश कुबेरका निवासस्थान है । अब हम कुबेरके भवनमें कैसे प्रवेश करेंगे? इसका उपाय सोचो ' ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवति राजेन्द्रे वागुवाचाशरीरिणी ।
न शक्यो दुर्गमो गन्तुमितो वैश्रवणाश्रमात् ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज युधिष्ठिरके ऐसा कहते ही आकाशवाणी बोल उठी
—‘कुबेरके इस आश्रमसे आगे जाना सम्भव नहीं है । यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है ॥ १३ ॥
अनेनैव पथा राजन् प्रतिगच्छ यथागतम् ।
नरनारायणस्थानं बदरीत्यभिविश्रुतम् ॥ १४ ॥
‘ राजन्! जिससे तुम आये हो, उसी मार्गसे विशाला बदरीके नामसे विख्यात भगवान् नर- नारायणके स्थानको लौट जाओ ॥ १४ ॥
तस्माद् यास्यसि कौन्तेय सिद्धचारणसेवितम् ।
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बहुपुष्पफलं रम्यमाश्रमं वृषपर्वणः ॥ १५ ॥
‘ कुन्तीकुमार! वहाँसे तुम प्रचुर फल- फूलसे सम्पन्न वृषपर्वाके रमणीय आश्रमपर जाओ, जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं ॥ १५ ॥
अतिक्रम्य च तं पार्थ त्वार्ष्टिषेणाश्रमे वसेः ।
ततो द्रक्ष्यसि कौन्तेय निवेशं धनदस्य च ॥ १६ ॥
‘ उस आश्रमको भी लाँघकर आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना और वहीं निवास करना ।
तदनन्तर तुम्हें धनदाता कुबेरके निवासस्थानका दर्शन होगा ' ॥ १६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वायुर्दिव्यगन्धवहः शुचिः ।
सुखप्रह्लादनः शीतः पुष्पवर्षं ववर्ष च ॥ १७ ॥
इसी समय दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण पवित्र वायु चलने लगी, जो शीतल तथा सुख और
आह्लाद देनेवाली थी । साथ ही वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ १७ ॥
श्रुत्वा तु दिव्यामाकाशाद् वाचं सर्वे विसिस्मियुः ।
ऋषीणां ब्राह्मणानां च पार्थिवानां विशेषतः ॥ १८ ॥
वह दिव्य आकाशवाणी सुनकर सबको बड़ा विस्मय हुआ । ऋषियों, ब्राह्मणों और विशेषतः राजर्षियोंको अधिक आश्चर्य हुआ ॥ १८ ॥
श्रुत्वा तन्महदाश्चर्यं द्विजो धौम्योऽब्रवीत् तदा ।
न शक्यमुत्तरं वक्तुमेवं भवतु भारत ॥ १ ९ ॥
वह महान् आश्चर्यजनक बात सुनकर विप्रर्षि धौम्यने कहा - ' भारत! इसका प्रतिवाद
नहीं किया जा सकता । ऐसा ही होना चाहिये ' ॥ १ ९ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा प्रतिजग्राह तद् वचः ।
प्रत्यागम्य पुनस्तं तु नरनारायणाश्रमम् ॥ २० ॥
भीमसेनादिभिः सर्वैर्भ्रातृभिः परिवारितः ।
पाञ्चाल्या ब्राह्मणाश्चैव न्यवसन्त सुखं तदा ॥ २१ ॥
तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने वह आकाशवाणी स्वीकार कर ली और पुनः नर- नारायणके आश्रममें लौटकर भीमसेन आदि सब भाइयों और द्रौपदीके साथ वहीं रहने लगे । उस समय साथ आये हुए ब्राह्मण लोग भी वहीं सुखपूर्वक निवास करने लगे ॥ २०-२१ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां पुनर्नरनारायणाश्रमागमने षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगम पाण्डवोंका पुनः नर-नारायणके आश्रममें आगमनविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥
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(जटासुरवधपर्व) सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर, नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध वैशम्पायन उवाच
ततस्तान् परिविश्वस्तान् वसतस्तत्र पाण्डवान् ।
पर्वतेन्द्रे द्विजैः सार्धं पार्थागमनकाङ्क्षया ॥ १ ॥
गतेषु तेषु रक्षःसु भीमसेनात्मजेऽपि च ।
रहितान् भीमसेनेन कदाचित् तान् यदृच्छया ॥ २ ॥
जहार धर्मराजानं यमौ कृष्णां च राक्षसः ।
ब्राह्मणो मन्त्रकुशलः सर्वशास्त्रविदुत्तमः ॥ ३ ॥
इति ब्रुवन् पाण्डवेयान् पर्युपास्ते स्म नित्यदा ।
परीप्समानः पार्थानां कलापानि धनूंषि च ॥ ४ ॥
अन्तरं सम्परिप्रेप्सुर्द्रौपद्या हरणं प्रति ।
दुष्टात्मा पापबुद्धिः स नाम्ना ख्यातो जटासुरः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर पर्वतराज गन्धमादनपर सब पाण्डव अर्जुनके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए ब्राह्मणोंके साथ निःशंक रहने लगे । उन्हें पहुँचानेके लिये आये हुए राक्षस चले गये । भीमसेनका पुत्र घटोत्कच भी विदा हो गया । तत्पश्चात् एक दिनकी बात है, भीमसेनकी अनुपस्थितिमें अकस्मात् एक राक्षसने धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीको हर लिया । वह ब्राह्मणके वेषमें प्रतिदिन उन्हींके साथ रहता था और सब पाण्डवोंसे कहता था कि ' मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ और मन्त्र- कुशल ब्राह्मण हूँ । ' वह कुन्तीकुमारोंके तरकस और धनुषको भी हर लेना चाहता था और द्रौपदीका अपहरण करनेके लिये सदा अवसर ढूँढ़ता रहता था । उस दुष्टात्मा एवं पापबुद्धि राक्षसका नाम जटासुर था ॥
पोषणं तस्य राजेन्द्र चक्रे पाण्डवनन्दनः ।
बुबुधे न च तं पापं भस्मच्छन्नमिवानलम् ॥ ६ ॥
जनमेजय! पाण्डवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले युधिष्ठिर अन्य ब्राह्मणोंकी तरह उसका भी पालन - पोषण करते थे । परंतु राखमें छिपी हुई आगकी भाँति उस पापीके
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असली स्वरूपको वे नहीं जानते थे ॥ ६ ॥
स भीमसेने निष्क्रान्ते मृगयार्थमरिन्दम ।
घटोत्कचं सानुचरं दृष्ट्वा विप्रद्रुतं दिशः ॥ ७ ॥
लोमशप्रभृतींस्तांस्तु महर्षीश्च समाहितान् ।
स्नातुं विनिर्गतान् दृष्ट्वा पुष्पार्थं च तपोधनान् ॥ ८ ॥
रूपमन्यत् समास्थाय विकृतं भैरवं महत् ।
गृहीत्वा सर्वशस्त्राणि द्रौपदीं परिगृह्य च ॥ ९ ॥
प्रातिष्ठत स दुष्टात्मा त्रीन् गृहीत्वा च पाण्डवान् ।
सहदेवस्तु यत्नेन ततोऽपक्रम्य पाण्डवः ॥ १० ॥
विक्रम्य कौशिकं खड्गं मोक्षयित्वा ग्रहं रिपोः ।
आक्रन्दद् भीमसेनं वै येन यातो महाबलः ॥ ११ ॥
शत्रुसूदन! हिंसक पशुओंको मारनेके लिये भीमसेनके आश्रमसे बाहर चले जानेपर उस राक्षसने देखा कि घटोत्कच अपने सेवकोंसहित किसी अज्ञात दिशाको चला गया, लोमश आदि महर्षि ध्यान लगाये बैठे हैं तथा दूसरे तपोधन स्नान करने और फूल लाने लिये कुटियासे बाहर निकल गये हैं, तब उस दुष्टात्माने विशाल, विकराल एवं भयंकर दूसरा रूप धारण करके पाण्डवोंके सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्र, द्रौपदी तथा तीनों पाण्डवोंको भी लेकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया । उस समय पाण्डु- कुमार सहदेव प्रयत्न करके उस राक्षसकी पकड़से छूट गये और पराक्रम करके म्यानसे निकली हुई अपनी तलवारको भी उससे छुड़ा लिया । फिर वे महाबली भीमसेन जिस मार्गसे गये थे, उधर ही जाकर उन्हें जोर- जोरसे पुकारने लगे ॥ ७–११ ॥
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तमब्रवीद् धर्मराजो ह्रियमाणो युधिष्ठिरः ।
धर्मस्ते हीयते मूढ न तत्त्वं समवेक्षसे ॥ १२ ॥
इधर जिन्हें वह जटासुर हरकर लिये जा रहा था ' वे धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले — ‘ अरे मूर्ख! इस प्रकार ( विश्वासघात करनेसे ) तो तेरे धर्मका ही नाश हो रहा है । किंतु उधर तेरी दृष्टि नहीं जाती है ॥
येs ये क्वचिन्मनुष्येषु तिर्यग्योनिगताश्च ये ।
धर्मं ते समवेक्षन्ते रक्षांसि च विशेषतः ॥ १३ ॥
'दूसरे भी जहाँ कहीं मनुष्य अथवा पशु - पक्षीकी योनिमें स्थित प्राणी हैं, वे सभी धर्मपर दृष्टि रखते हैं । राक्षस तो ( पशु- पक्षीकी अपेक्षा भी ) विशेषरूपसे धर्मका विचार करते ॥ १३ ॥
धर्मस्य राक्षसा मूलं धर्मं ते विदुरुत्तमम् ।
एतत् परीक्ष्य सर्वं त्वं समीपे स्थातुमर्हसि ॥ १४ ॥
देवाश्च ऋषयः सिद्धाः पितरश्चापि राक्षस ।
गन्धर्वोरगरक्षांसि वयांसि पशवस्तथा ॥ १५ ॥
तिर्यग्योनिगताश्चैव अपि कीटपिपीलिकाः ।
मनुष्यानुपजीवन्ति ततस्त्वमपि जीवसि ॥ १६ ॥
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‘ राक्षस धर्मके मूल हैं । वे उत्तम धर्मका ज्ञान रखते हैं । इन सब बातोंका विचार करके तुझे हमलोगोंके समीप ही रहना चाहिये । राक्षस! देवता, ऋषि, सिद्ध, पितर, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पशु, तिर्यग्योनिके सभी प्राणी और कीड़े - मकोड़े, चींटी आदि भी मनुष्योंके आश्रित हो जीवन - निर्वाह करते हैं । इस दृष्टिसे तू भी मनुष्योंसे ही जीविका चलाता है ॥ १४— १६ ॥
समृद्धया ह्यस्य लोकस्य लोको युष्माकमृध्यति ।
इमं च लोकं शोचन्तमनुशोचन्ति देवताः ॥ १७ ॥
' इस मनुष्यलोककी समृद्धिसे ही तुम सब लोगोंका लोक समृद्धिशाली होता है । यदि इस लोककी दशा शोचनीय हो तो देवता भी शोकमें पड़ जाते हैं ॥ १७ ॥
पूज्यमानाश्च वर्धन्ते हव्यकव्यैर्यथाविधि ।
वयं राष्ट्रस्य गोप्तारो रक्षितारश्च राक्षस ॥ १८ ॥
‘ क्योंकि मनुष्यद्वारा हव्य और कव्यसे विधिपूर्वक पूजित होनेपर उनकी वृद्धि होती है । राक्षस! हमलोग राष्ट्रके पालक और संरक्षक हैं ॥ १८ ॥
राष्ट्रस्यारक्ष्यमाणस्य कुतो भूतिः कुतः सुखम् ।
न च राजावमन्तव्यो रक्षसा जात्वनागसि ॥ १ ९ ॥
'हमारे द्वारा रक्षित न होनेपर राष्ट्रको कैसे समृद्धि प्राप्त होगी और कैसे उसे सुख मिलेगा? राक्षसको भी उचित है कि वह बिना अपराधके कभी किसी राजाका अपमान न करे ॥ १ ९ ॥
अणुरप्यपचारश्च नास्त्यस्माकं नराशन ।
विघसाशान् यथाशक्त्या कुर्महे देवतादिषु ॥ २० ॥
‘ नरभक्षी निशाचर! तेरे प्रति हमलोगोंकी ओरसे थोड़ा-सा भी अपराध नहीं हुआ है । हम देवता आदिको समर्पित करके बचे हुए प्रसादस्वरूप अन्नका यथाशक्ति गुरुजनों और ब्राह्मणोंको भोजन कराते हैं ॥ २० ॥
गुरूंश्च ब्राह्मणांश्चैव प्रणामप्रवणाः सदा ।
द्रोग्धव्यं न च मित्रेषु न विश्वस्तेषु कर्हिचित् ॥ २१ ॥
‘ गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके सम्मुख हमारा मस्तक सदा झुका रहता है । किसी भी पुरुषको कभी अपने मित्रों और विश्वासी पुरुषोंके साथ द्रोह नहीं करना चाहिये ॥ २१ ॥
येषां चान्नानि भुञ्जीत यत्र च स्यात् प्रतिश्रयः ।
स त्वं प्रतिश्रयेऽस्माकं पूज्यमानः सुखोषितः ॥ २२ ॥
‘ जिनका अन्न खाये और जहाँ अपनेको आश्रय मिला हो, उनके साथ भी द्रोह या विश्वासघात करना उचित नहीं है । तू हमारे आश्रयमें हमलोगोंसे सम्मानित होकर सुखपूर्वक रहा है ॥ २२ ॥
भुक्त्वा चान्नानि दुष्प्रज्ञ कथमस्मान् जिहीर्षसि ।
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एवमेव वृथाचारो वृथावृद्धो वृथामतिः ॥ २३ ॥
' खोटी बुद्धिवाले राक्षस! तू हमारा अन्न खाकर हमें ही हर ले जानेकी इच्छा कैसे करता है? इस प्रकार तो अबतक तूने ब्राह्मणरूपसे जो आचार दिखाया था, वह सब व्यर्थ ही था । तेरा बढ़ना या वृद्ध होना भी व्यर्थ ही है । तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है ॥ २३ ॥
वृथामरणमर्हश्च वृथाद्य न भविष्यसि ।
अथ चेद् दुष्टबुद्धिस्त्वं सर्वैर्धर्मैर्विवर्जितः ॥ २४ ॥
प्रदाय शस्त्राण्यस्माकं युद्धेन द्रौपदीं हर ।
अथ चेत् त्वमविज्ञानादिदं कर्म करिष्यसि ॥ २५ ॥
अधर्मं चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्यसि केवलम् ।
एतामद्य परामृश्य स्त्रियं राक्षस मानुषीम् । २६ ॥
विषमेतत् समालोड्य कुम्भेन प्राशितं त्वया ।
ततो युधिष्ठिरस्तस्य गुरुकः समपद्यत ॥ २७ ॥
‘ ऐसी दशामें तू व्यर्थ मृत्युका ही अधिकारी है और आज व्यर्थ ही तुम्हारे प्राण नष्ट हो जायँगे । यदि तेरी बुद्धि दुष्टतापर ही उतर आयी है और तू सम्पूर्ण धर्मोंको भी छोड़ बैठा है, तो हमें हमारे अस्त्र देकर युद्ध कर तथा उसमें विजयी होनेपर द्रौपदीको ले जा । यदि तू अज्ञानवश यह विश्वासघात या अपहरण कर्म करेगा, तो संसारमें तुझे केवल अधर्म और अकीर्ति ही प्राप्त होगी । निशाचर! आज तूने इस मानवजातिकी स्त्रीका स्पर्श करके जो पाप किया है, यह भयंकर विष है, जिसे तूने घड़ेमें घोलकर पी लिया है । ' इतना कहकर युधिष्ठिर उसके लिये बहुत भारी हो गये ॥ २४ -२७ ॥
स तु भाराभिभूतात्मा न तथा शीघ्रगोऽभवत् ।
अथाब्रवीद् द्रौपदीं च नकुलं च युधिष्ठिरः ॥ २८ ॥
भारसे उसका शरीर दबने लगा, इसलिये अब वह पहले की तरह शीघ्रतापूर्वक न चल सका । तब युधिष्ठिरने नकुल और द्रौपदीसे कहा – ॥ २८ ॥
मा भैष्ट राक्षसान्मूढाद् गतिरस्य मया हृता ।
नातिदूरे महाबाहुर्भविता पवनात्मजः ॥ २ ९ ॥
‘ तुमलोग इस मूढ़ राक्षससे डरना मत । मैंने इसकी गति कुण्ठित कर दी है । वायुपुत्र महाबाहु भीमसेन यहाँसे अधिक दूर नहीं होंगे ॥ २ ९ ॥
अस्मिन् मुहुर्ते सम्प्राप्ते न भविष्यति राक्षसः ।
सहदेवस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं मूढचेतनम् ॥ ३० ॥
उवाच वचनं राजन् कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
राजन् किंनाम सत्कृत्यं क्षत्रियस्यास्त्यतोऽधिकम् ॥ ३१ ॥
यद् युद्धेऽभिमुखः प्राणांस्त्यजेच्छत्रुं जयेत वा ।
एष चास्मान् वयं चैनं युद्धयमानाः परंतप ॥ ३२ ॥
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सूदम महाबाहो देशकालो ह्ययं नृप ।
क्षत्रधर्मस्य सम्प्राप्तः कालः सत्यपराक्रमः ॥ ३३ ॥
‘ इस आगामी मुहूर्तके आते ही इस राक्षसके प्राण नहीं रहेंगे । ' इधर सहदेवने उस मूढ़ राक्षसकी ओर देखते हुए कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे कहा– ' राजन्! क्षत्रियके लिये इससे अधिक सत्कर्म क्या होगा कि वह युद्धमें शत्रुका सामना करते हुए प्राणोंका त्याग कर दे अथवा शत्रुको ही जीत ले । राजन्! इस प्रकार यह हमें अथवा हम इसे युद्ध करते हुए मार डालें। परंतप महाबाहु नरेश! यह क्षत्रिय धर्मके अनुकूल देश- काल प्राप्त हुआ है । यह समय यथार्थ पराक्रम प्रकट करनेके लिये है ॥ ३०–३३ ॥
जयन्तो हन्यमाना वा प्राप्तुमर्हाम सद्गतिम् ।
राक्षसे जीवमानेऽद्य रविरस्तमियाद् यदि ॥ ३४ ॥
नाहं ब्रूयां पुनर्जातु क्षत्रियोऽस्मीति भारत ।
भो भो राक्षस तिष्ठस्व सहदेवोऽस्मि पाण्डवः ॥ ३५ ॥
हत्वा वा मां नयस्वैनां हतो वाद्येह स्वप्स्यसि ।
तदा ब्रुवति माद्रेये भीमसेनो यदृच्छया ॥ ३६ ॥
प्रत्यदृश्यद् गदाहस्तः सवज्र इव वासवः ।
सोऽपश्यद् भ्रातरौ तत्र द्रौपदीं च यशस्विनीम् ॥ ३७ ॥
' भारत! हम विजयी हों या मारे जायँ, सभी दशाओंमें उत्तम गति प्राप्त कर सकते हैं । यदि इस राक्षसके जीते - जी सूर्य डूब गये, तो मैं फिर कभी अपनेको क्षत्रिय नहीं कहूँगा । अरे ओ निशाचर! खड़ा रह, मैं पाण्डुकुमार सहदेव हूँ, या तो तू मुझे मारकर द्रौपदीको ले जा या स्वयं मेरे हाथों मारा जाकर आज यहीं सदाके लिये सो जा । ' माद्रीनन्दन सहदेव जब ऐसी बात कह रहे थे, उसी समय अकस्मात् गदा हाथमें लिये भीमसेन दिखायी दिये, मानो वज्रधारी इन्द्र आ पहुँचे हों । उन्होंने वहाँ ( राक्षसके अधिकारमें पड़े हुए) अपने दोनों भाइयों तथा यशस्विनी द्रौपदीको देखा ॥ ३४-३७ ॥
क्षितिस्थं सहदेवं च क्षिपन्तं राक्षसं तदा ।
मार्गाच्च राक्षसं मूढं कालोपहतचेतसम् ॥ ३८ ॥
भ्रमन्तं तत्र तत्रैव देवेन विनिवारितम् ।
भ्रातॄंस्तान् ह्रियतो दृष्ट्वा द्रौपदीं च महाबलः ॥ ३ ९ ॥
क्रोधमाहारयद् भीमो राक्षसं चेदमब्रवीत् ।
विज्ञातोऽसि मया पूर्वं पाप शस्त्रपरीक्षणे ॥ ४० ॥
उस समय सहदेव धरतीपर खड़े होकर राक्षसपर आक्षेप कर रहे थे और वह मूढ़ राक्षस मार्गसे भ्रष्ट होकर वहीं चक्कर काट रहा था। कालसे उसकी बुद्धि मारी गयी थी । दैवने ही उसे वहाँ रोक रखा था । भाइयों और द्रौपदीका अपहरण होता देख महाबली
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भीमसेन कुपित हो उठे और जटासुरसे बोले – ' ओ पापी! पहले जब तू शस्त्रोंकी परीक्षा कर रहा था, तभी मैंने तुझे पहचान लिया था ॥ ३८–४० ॥
आस्था तु त्वयि मे नास्ति यतोऽसि न हतस्तदा ।
ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रियम् ॥ ४१ ॥
'तुझपर मेरा विश्वास नहीं रह गया था, तो भी तू ब्राह्मणके रूपमें अपने असली स्वरूपको छिपाये हुए था और हमलोगोंसे कोई अप्रिय बात नहीं कहता था । इसीलिये मैंने तुम्हें तत्काल नहीं मार डाला ॥ ४१ ॥
प्रियेषु रममाणं त्वां न चैवाप्रियकारिणम् ।
अतिथिं ब्रह्मरूपं च कथं हन्यामनागसम् ॥ ४२ ॥
राक्षसं जानमानोऽपि यो हन्यान्नरकं व्रजेत् ।
अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते ॥ ४३ ॥
' तू हमारे प्रिय कार्योंमें मन लगाता था । जो हमें प्रिय न लगे, ऐसा काम नहीं करता था । ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आया था और कभी कोई अपराध नहीं किया था । ऐसी दशामें मैं तुझे कैसे मारता? जो राक्षसको राक्षस जानते हुए भी बिना किसी अपराधके उसका वध करता है, वह नरकमें जाता है । अभी तेरा समय पूरा नहीं हुआ था, इसलिये भी आजसे पहले तेरा वध नहीं किया जा सकता था ॥ ४२-४३ ॥
नूनमद्यासि सम्पक्वो यथा ते मतिरीदृशी ।
दत्ता कृष्णापहरणे कालेनाद्भुतकर्मणा ॥ ४४ ॥
‘ आज निश्चय ही तेरी आयु पूरी हो चुकी है, तभी तो अद्भुत कर्म करनेवाले कालने तुझे इस प्रकार द्रौपदीके अपहरणकी बुद्धि दी है ॥ ४४ ॥
बडिशोऽयं त्वया ग्रस्तः कालसूत्रेण लम्बितः ।
मत्स्योऽम्भसीव स्यूतास्यः कथमद्य भविष्यसि ॥ ४५ ॥
‘ कालरूपी डोरेसे लटकाया हुआ बंसीका काँटा तूने निगल लिया है । तेरा मुँह जलकी मछलीके समान उस काँटेमें गुँथ गया है, अतः अब तू कैसे जीवन धारण करेगा? ॥ ४५ ॥
यं चासि प्रस्थितो देशं मनः पूर्वं गतं च ते ।
न तं गन्तासि गन्तासि मार्गं बकहिडिम्बयोः ॥ ४६ ॥
‘ जिस देशकी ओर तू प्रस्थित हुआ है और जहाँ तेरा मन पहलेसे ही जा पहुँचा है, वहाँ अब तू न जा सकेगा । तुझे तो बक और हिडिम्बके मार्गपर जाना है, ॥ ४६ ॥
एवमुक्तस्तु भीमेन राक्षसः कालचोदितः ।
भीत उत्सृज्य तान् सर्वान् युद्धाय समुपस्थितः ॥ ४७ ॥
भीमसेनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस भयभीत हो उन सबको छोड़कर कालकी प्रेरणासे युद्धके लिये उद्यत हो गया ॥ ४७ ॥
अब्रवीच्च पुनर्भीमं रोषात् प्रस्फुरिताधरः ।
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न मे मूढा दिशः पाप त्वदर्थं मे विलम्बितम् ॥ ४८ ॥
उस समय रोषसे उसके ओठ फड़क रहे थे । उसने भीमसेनको उत्तर देते हुए कहा
——ओ पापी! मुझे दिग्भ्रम नहीं हुआ था । मैंने तेरे ही लिये विलम्ब किया था ॥ ४८ ॥
श्रुता मे राक्षसा ये ये त्वया विनिहता रणे ।
तेषामद्य करिष्यामि तवात्रेणोदकक्रियाम् ॥ ४ ९ ॥
' तूने जिन-जिन राक्षसोंको युद्धमें मारा है, उन सबके नाम मैंने सुने हैं । आज तेरे रक्तसे ही मैं उनका तर्पण करूँगा, ॥ ४ ९ ॥
एवमुक्तस्ततो भीमः सृक्किणी परिसंलिहन् ।
स्मयमान इव क्रोधात् साक्षात् कालान्तकोपमः ॥ ५० ॥
(ब्रुवन् वै तिष्ठ तिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः । )
बाहुसंरम्भमेवैक्षन्नभिदुद्राव राक्षसम् ।
राक्षसोऽपि तदा भीमं युद्धार्थिनमवस्थितम् ॥ ५१ ॥
मुहुर्मुहुर्व्याददानः सृक्किणी परिसंलिहन् ।
अभिदुद्राव संरब्धो बलिर्वज्रधरं यथा ॥ ५२ ॥
राक्षसके ऐसा कहनेपर भीमसेन अपने मुखके दोनों कोने चाटते हुए कुछ मुसकराते - से प्रतीत हुए फिर क्रोधसे साक्षात् काल और यमराजके समान जान पड़ने लगे । रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं ‘ खड़ा रह, ' खड़ा रह कहते हुए ताल ठोंककर राक्षसकी ओर दृष्टि गड़ाये उसपर टूट पड़े । राक्षस भी उस समय भीमसेनको युद्धके लिये उपस्थित देख बार-बार मुँह फैलाकर मुँहके दोनों कोने चाटने लगा और जैसे बलिराजा वज्रधारी इन्द्रपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार कुपित हो उसने भीमसेनपर धावा किया ॥ ५०–५२ ॥
( भीमसेनोऽप्यवष्टब्धो नियुद्धायाभवत् स्थितः ।
राक्षसोऽपि च विस्रब्धो बाहुयुद्धमकाङ्क्षत ॥
वर्तमाने तदा ताभ्यां बाहुयुद्धे सुदारुणे ।
माद्रीपुत्रावतिक्रुद्धावुभावप्यभ्यधावताम् ॥ ५३ ॥
भीमसेन भी स्थिर होकर उससे युद्धके लिये खड़े हो गये और वह राक्षस भी निश्चिन्त हो उनके साथ बाहुयुद्धकी इच्छा करने लगा । उस समय उन दोनोंमें बड़ा भयंकर बाहुयुद्ध होने लगा । यह देख माद्रीपुत्र नकुल और सहदेव अत्यन्त क्रोधमें भरकर उसकी ओर दौड़े ॥ ५३ ॥
न्यवारयत् तौ प्रहसन् कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ।
शक्तोऽहं राक्षसस्येति प्रेक्षध्वमिति चाब्रवीत् ॥ ५४ ॥
परंतु कुन्तीकुमार भीमसेनने हँसकर उन दोनोंको रोक दिया और कहा - ‘ मैं अकेला
ही इस राक्षसके लिये पर्याप्त हूँ । तुमलोग चुप- चाप देखते रहो ' ॥ ५४ ॥
आत्मना भ्रातृभिश्चैव धर्मेण सुकृतेन च ।